भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३४६ * कूर्मपुराण *


निवेदयेत स्वात्मानं विष्णावमलतेजसि ।<br>तदात्मा तन्मनाः शान्तस्तद्विष्णोरिति मन्त्रतः ॥ ९५ ॥<br><br>अथवा देवमीशानं भगवन्तं सनातनम्।<br>आराधयेन्महादेवं भावपूतो महेश्वरम् ॥ ९६ ॥'तद्विष्णोः०' इस मन्त्रके द्वारा तदात्मा और तन्मय होकर शान्तिपूर्वक अपनेको विशुद्ध तेजः-स्वरूप विष्णुमें निवेदित करना चाहिये। अथवा पवित्र भावनासे सनातन भगवान् ईशान महेश्वरदेव महादेवकी आराधना करनी चाहिये ॥ ९५-९६ ॥
मन्त्रेण रुद्रगायत्र्या प्रणवेनाथ वा पुनः।<br>ईशानेनाथ वा रुद्रैस्त्र्यम्बकेन समाहितः ॥ ९७ ॥<br><br>पुष्पैः पत्रैस्तथाद्भिर्वा चन्दनाद्यैर्महेश्वरम्।<br>उक्त्वा नमः शिवायेति मन्त्रेणानेन योजयेत् ॥ ९८ ॥<br><br>नमस्कुर्यान्महादेवं ऋतं सत्यमितीश्वरम्।<br>निवेदयीत स्वात्मानं यो ब्रह्माणमितीश्वरम् ॥ ९९ ॥<br><br>प्रदक्षिणं द्विजः कुर्यात् पञ्च ब्रह्माणि वै जपन्।<br>ध्यायीत देवमीशानं व्योममध्यगतं शिवम् ॥ १०० ॥रुद्रगायत्री, प्रणव, ईशान-मन्त्र, रुद्र तथा त्र्यम्बक-मन्त्रसे एकाग्र-मन होकर पुष्प, पत्र, जल तथा चन्दन आदिके द्वारा महेश्वरकी आराधना करनी चाहिये और मन्त्रका उच्चारणकर मन्त्रके साथ 'नमः शिवाय' को जोड़ना चाहिये। तदनन्तर ऋत एवं सत्यस्वरूप ईश्वर महादेवको नमस्कार करना चाहिये और 'यो ब्रह्माणं० ¹' इस मन्त्रके द्वारा अपनेको ईश्वरके लिये समर्पित करे। द्विजको पाँच ब्रह्म (शिवके पाँच नामों²)-का जप करते हुए प्रदक्षिणा करनी चाहिये और आकाशके मध्य स्थित ईशानदेव शिवका ध्यान करना चाहिये ॥ ९७-१०० ॥
अथावलोकयेदर्कं हंसः शुचिषदित्यृचा।<br>कुर्यात् पञ्च महायज्ञान् गृहं गत्वा समाहितः ॥ १०१ ॥<br><br>देवयज्ञं पितृयज्ञं भूतयज्ञं तथैव च।<br>मानुष्यं ब्रह्मयज्ञं च पञ्च यज्ञान् प्रचक्षते ॥ १०२ ॥इसके अनन्तर 'हंसः शुचिषद०' इस ऋचासे सूर्यका दर्शन करे और घर जाकर ध्यानपूर्वक पञ्चयज्ञोंको करे। देवयज्ञ, पितृयज्ञ, भूतयज्ञ, मनुष्ययज्ञ तथा ब्रह्मयज्ञ—ये पाँच (महा-) यज्ञ कहे गये हैं ॥ १०१-१०२ ॥
यदि स्यात् तर्पणादर्वाक् ब्रह्मयज्ञः कृतो न हि।<br>कृत्वा मनुष्ययज्ञं वै ततः स्वाध्यायमाचरेत् ॥ १०३ ॥<br><br>अग्नेः पश्चििमतो देशे भूतयज्ञान्त एव वा।<br>कुशपुञ्जे समासीनः कुशपाणिः समाहितः ॥ १०४ ॥<br><br>शालाग्नौ लौकिके वाग्नौ जले भूम्यामथापि वा।<br>वैश्वदेवं ततः कुर्याद् देवयज्ञः स वै स्मृतः ॥ १०५ ॥<br><br>यदि स्याल्लौकिके पक्वं ततोऽन्नं तत्र हूयते।<br>शालाग्नौ तन्न देवान्नं विधिरेश सनातनः ॥ १०६ ॥<br><br>देवेभ्यस्तु हुतादन्नाच्छेषाद् भूतबलिं हरेत्।<br>भूतयज्ञः स वै ज्ञेयो भूतिदः सर्वदेहिनाम् ॥ १०७ ॥<br><br>श्वभ्यश्च श्वपचेभ्यश्च पतितादिभ्य एव च।<br>दद्याद् भूमौ बलिं त्वन्नं पक्षिभ्योऽथ द्विजोत्तमः ॥ १०८ ॥यदि तर्पणसे पहले ब्रह्मयज्ञ न किया हो तो मनुष्ययज्ञ करनेके बाद स्वाध्याय (ब्रह्मयज्ञ) करना चाहिये अथवा भूतयज्ञके अन्तमें एकाग्रचित्त होकर हाथमें कुश लेकर अग्निके पश्चिमकी दिशामें कुशपुंजपर बैठकर यज्ञशालाकी अग्नि, लौकिकाग्नि अथवा जलमें या भूमिपर वैश्वदेव करना चाहिये। यह देवयज्ञ कहलाता है। यदि लौकिकाग्निमें अन्न पकाया गया हो तो उसीमें हवन किया जाता है और यदि शालाकी अग्निमें अन्न तैयार किया गया हो तो शालाग्निमें ही वैश्वदेव होम करना चाहिये। यही सनातन विधि है। वैश्वदेव होमके पश्चात् बचे हुए अन्नद्वारा भूतबलिकर्म करना चाहिये। इसे भूतयज्ञ जानना चाहिये। यह सर्वप्राणियोंको ऐश्वर्य प्रदान करता है। द्विजोत्तमको (घरके बाहर) भूमिपर कुत्ता, चाण्डाल, पतित आदि तथा पक्षियोंको अन्नकी बलि देनी चाहिये ॥ १०३-१०८ ॥

१-यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै। तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥ (श्वेताश्वतर० ६। १८)
२-ईशानः ¹ सर्वविद्यानाम् ईश्वरः ² सर्वभूतानाम्। ब्रह्माधिपतिः ³ ब्रह्मणोऽधिपतिः ⁴ ब्रह्मा ⁵ शिवो मे अस्तु सदा शिवोम् ॥