भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय १८ * ३४७

सायं चान्नस्य सिद्धस्य पत्न्यमन्त्रं बलिं हरेत्। भूतयज्ञस्त्वयं नित्यं सायं प्रातर्विधीयते॥ १०९॥

एकं तु भोजयेद् विप्रं पितॄनुद्दिश्य सत्तमम्। नित्यश्राद्धं तदुद्दिष्टं पितृयज्ञो गतिप्रदः॥ ११०॥

उद्धृत्य वा यथाशक्ति किञ्चिदन्नं समाहितः। वेदतत्त्वार्थविदुषे द्विजायैवोपपादयेत्॥ १११॥

पूजयेदतिथिं नित्यं नमस्येदर्चयेद् द्विजम्। मनोवाक्कर्मभिः शान्तमागतं स्वगृहं ततः॥ ११२॥

हन्तकारमथाग्रं वा भिक्षां वा शक्तितो द्विजः। दद्यादतिथये नित्यं बुध्येत परमेश्वरम्॥ ११३॥

भिक्षामार्हुग्रासमात्रमग्रं तस्याश्चतुर्गुणम्। पुष्कलं हन्तकारं तु तच्चतुर्गुणमुच्यते॥ ११४॥

गोदोहमात्रं कालं वै प्रतीक्ष्यो ह्यतिथिः स्वयम्। अभ्यागतान् यथाशक्ति पूजयेदतिथिं यथा॥ ११५॥

भिक्षां वै भिक्षवे दद्याद् विधिवद् ब्रह्मचारिणे। दद्यादन्नं यथाशक्ति त्वर्थिभ्यो लोभवर्जितः॥ ११६॥

सर्वेषामप्यलाभे तु अन्नं गोभ्यो निवेदयेत्। भुञ्जीत बन्धुभिः सार्धं वाग्यतोऽन्नमकुत्सयन्॥ ११७॥

अकृत्वा तु द्विजः पञ्च महायज्ञान् द्विजोत्तमाः। भुञ्जीत चेत् स मूढात्मा तिर्यग्योनिं स गच्छति॥ ११८॥

वेदाभ्यासोऽन्वहं शक्त्या महायज्ञक्रिया क्षमा। नाशयत्याशु पापानि देवानामार्चनं तथा॥ ११९॥

यो मोहादथवालस्यादकृत्वा देवतार्चनम्। भुङ्क्ते स याति नरकान् शूकStatus/शूकरेष्वभिजायते॥ १२०॥


पत्नी सायंकाल पके हुए अन्नकी बलि बिना मन्त्रके प्रदान करे, यही भूतयज्ञ है, जो नित्य सायंकाल और प्रातःकाल किया जाता है। पितरोंके उद्देश्यसे एक श्रेष्ठ ब्राह्मणको प्रतिदिन भोजन कराना चाहिये, इसे नित्य-श्राद्ध कहा गया है। यह पितृयज्ञ (उत्तम) गति प्रदान करनेवाला है॥ १०९-११०॥

अथवा यथाशक्ति कुछ अन्न निकालकर वेदके तत्त्वार्थको जाननेवाले ब्राह्मणको समाहित होकर देना चाहिये। तदनन्तर अपने घर आये हुए शान्त द्विज अतिथिका मन, वाणी तथा कर्मके द्वारा नित्य नमस्कार, पूजन एवं अर्चन करना चाहिये। द्विज अतिथिको यथाशक्ति नित्य 'हन्तकार', 'अग्र' अथवा भिक्षा प्रदान करे और उसे परमेश्वरका रूप समझे॥ १११-११३॥

ग्रासमात्र (अन्न)-को भिक्षा और उसके चौगुने अर्थात् चार ग्रासके बराबर अन्नको अग्र कहा जाता है। अग्रके चौगुने अर्थात् सोलह ग्रासके बराबर पर्याप्त अन्नको हन्तकार कहा जाता है। गोदोहनकाल-पर्यन्त अतिथिकी स्वयं प्रतीक्षा करनी चाहिये। जिस प्रकार अतिथिकी^१ पूजा की जाती है, उसी प्रकार अभ्यागतोंकी^२ भी यथाशक्ति पूजा (सेवा) करनी चाहिये॥ ११४-११५॥

ब्रह्मचारी भिक्षुकको विधिवत् भिक्षा प्रदान करे। लोभरहित होकर याचकोंको यथाशक्ति अन्न प्रदान करे, इन सभीके न मिलनेपर गौओंको अन्न निवेदित करे। तदनन्तर भोजनकी निन्दा न करते हुए बन्धुओंके साथ मौन होकर भोजन करे॥ ११६-११७॥

द्विजोत्तमो! यदि द्विज पञ्च महायज्ञोंको बिना किये ही भोजन करता है तो वह मूढात्मा तिर्यग्योनि प्राप्त करता है। प्रतिदिन यथाशक्ति किया गया वेदोंका अभ्यास, महायज्ञ कर्म, क्षमाका भाव और देवताओंका पूजन—ये शीघ्र ही पापोंका नाश करते हैं। जो मोहपूर्वक अथवा आलस्यसे देवताओंकी पूजा किये बिना भोजन करता है, वह नरकोंको प्राप्त करता है और बादमें शूकरकी योनिमें जन्म लेता है॥ ११८-१२०॥


१-अज्ञातपूर्वगृहागत व्यक्ति (अकस्मात् घरपर आ जानेवाला) अतिथि है। (श्रीधरस्वामी)
२-ज्ञातपूर्वगृहागत व्यक्ति (जिसका पहलेसे घरपर आना ज्ञात है ऐसा व्यक्ति) अभ्यागत है।