भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
  • अध्याय १८ * ३४७

सायं चान्नस्य सिद्धस्य पत्न्यमन्त्रं बलिं हरेत्। भूतयज्ञस्त्वयं नित्यं सायं प्रातर्विधीयते॥ १०९॥

एकं तु भोजयेद् विप्रं पितॄनुद्दिश्य सत्तमम्। नित्यश्राद्धं तदुद्दिष्टं पितृयज्ञो गतिप्रदः॥ ११०॥

उद्धृत्य वा यथाशक्ति किञ्चिदन्नं समाहितः। वेदतत्त्वार्थविदुषे द्विजायैवोपपादयेत्॥ १११॥

पूजयेदतिथिं नित्यं नमस्येदर्चयेद् द्विजम्। मनोवाक्कर्मभिः शान्तमागतं स्वगृहं ततः॥ ११२॥

हन्तकारमथाग्रं वा भिक्षां वा शक्तितो द्विजः। दद्यादतिथये नित्यं बुध्येत परमेश्वरम्॥ ११३॥

भिक्षामार्हुग्रासमात्रमग्रं तस्याश्चतुर्गुणम्। पुष्कलं हन्तकारं तु तच्चतुर्गुणमुच्यते॥ ११४॥

गोदोहमात्रं कालं वै प्रतीक्ष्यो ह्यतिथिः स्वयम्। अभ्यागतान् यथाशक्ति पूजयेदतिथिं यथा॥ ११५॥

भिक्षां वै भिक्षवे दद्याद् विधिवद् ब्रह्मचारिणे। दद्यादन्नं यथाशक्ति त्वर्थिभ्यो लोभवर्जितः॥ ११६॥

सर्वेषामप्यलाभे तु अन्नं गोभ्यो निवेदयेत्। भुञ्जीत बन्धुभिः सार्धं वाग्यतोऽन्नमकुत्सयन्॥ ११७॥

अकृत्वा तु द्विजः पञ्च महायज्ञान् द्विजोत्तमाः। भुञ्जीत चेत् स मूढात्मा तिर्यग्योनिं स गच्छति॥ ११८॥

वेदाभ्यासोऽन्वहं शक्त्या महायज्ञक्रिया क्षमा। नाशयत्याशु पापानि देवानामार्चनं तथा॥ ११९॥

यो मोहादथवालस्यादकृत्वा देवतार्चनम्। भुङ्क्ते स याति नरकान् शूकStatus/शूकरेष्वभिजायते॥ १२०॥


पत्नी सायंकाल पके हुए अन्नकी बलि बिना मन्त्रके प्रदान करे, यही भूतयज्ञ है, जो नित्य सायंकाल और प्रातःकाल किया जाता है। पितरोंके उद्देश्यसे एक श्रेष्ठ ब्राह्मणको प्रतिदिन भोजन कराना चाहिये, इसे नित्य-श्राद्ध कहा गया है। यह पितृयज्ञ (उत्तम) गति प्रदान करनेवाला है॥ १०९-११०॥

अथवा यथाशक्ति कुछ अन्न निकालकर वेदके तत्त्वार्थको जाननेवाले ब्राह्मणको समाहित होकर देना चाहिये। तदनन्तर अपने घर आये हुए शान्त द्विज अतिथिका मन, वाणी तथा कर्मके द्वारा नित्य नमस्कार, पूजन एवं अर्चन करना चाहिये। द्विज अतिथिको यथाशक्ति नित्य 'हन्तकार', 'अग्र' अथवा भिक्षा प्रदान करे और उसे परमेश्वरका रूप समझे॥ १११-११३॥

ग्रासमात्र (अन्न)-को भिक्षा और उसके चौगुने अर्थात् चार ग्रासके बराबर अन्नको अग्र कहा जाता है। अग्रके चौगुने अर्थात् सोलह ग्रासके बराबर पर्याप्त अन्नको हन्तकार कहा जाता है। गोदोहनकाल-पर्यन्त अतिथिकी स्वयं प्रतीक्षा करनी चाहिये। जिस प्रकार अतिथिकी^१ पूजा की जाती है, उसी प्रकार अभ्यागतोंकी^२ भी यथाशक्ति पूजा (सेवा) करनी चाहिये॥ ११४-११५॥

ब्रह्मचारी भिक्षुकको विधिवत् भिक्षा प्रदान करे। लोभरहित होकर याचकोंको यथाशक्ति अन्न प्रदान करे, इन सभीके न मिलनेपर गौओंको अन्न निवेदित करे। तदनन्तर भोजनकी निन्दा न करते हुए बन्धुओंके साथ मौन होकर भोजन करे॥ ११६-११७॥

द्विजोत्तमो! यदि द्विज पञ्च महायज्ञोंको बिना किये ही भोजन करता है तो वह मूढात्मा तिर्यग्योनि प्राप्त करता है। प्रतिदिन यथाशक्ति किया गया वेदोंका अभ्यास, महायज्ञ कर्म, क्षमाका भाव और देवताओंका पूजन—ये शीघ्र ही पापोंका नाश करते हैं। जो मोहपूर्वक अथवा आलस्यसे देवताओंकी पूजा किये बिना भोजन करता है, वह नरकोंको प्राप्त करता है और बादमें शूकरकी योनिमें जन्म लेता है॥ ११८-१२०॥


१-अज्ञातपूर्वगृहागत व्यक्ति (अकस्मात् घरपर आ जानेवाला) अतिथि है। (श्रीधरस्वामी)
२-ज्ञातपूर्वगृहागत व्यक्ति (जिसका पहलेसे घरपर आना ज्ञात है ऐसा व्यक्ति) अभ्यागत है।

३४८ * कूर्मपुराण *


तस्मात् सर्वप्रयत्नेन कृत्वा कर्माणि वै द्विजाः।<br>भुञ्जीत स्वजनैः सार्धं स याति परमां गतिम्॥ १२१॥द्विजो! इसलिये सभी प्रकारके प्रयत्नोंके द्वारा (नित्य) (अपने अधिकारानुसार शास्त्रविहित) कर्मोंको (श्रद्धापूर्वक) करनेके बाद स्वजनोंके साथ भोजन करना चाहिये। ऐसा करनेवाला परमगति प्राप्त करता है॥ १२१॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे अष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें अठारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १८॥


उन्नीसवाँ अध्याय

भोजन-विधि, ग्रहणकालमें भोजनका निषेध, शयन-विधि, गृहस्थके नित्यकर्मोंके अनुष्ठानका महत्त्व

व्यास उवाचव्यासजीने कहा—पवित्र आसनपर बैठकर पाँवोंको भूमिपर रखकर पूर्वकी ओर अथवा सूर्याभिमुख होकर अन्न (भोजन) ग्रहण करना चाहिये। पूर्वाभिमुख होकर भोजन करनेसे लम्बी आयु, दक्षिणाभिमुख होकर भोजन करनेसे यश, पश्चिमाभिमुख होकर भोजन करनेसे सम्पत्ति और उत्तरकी ओर मुख करके भोजन करनेसे सत्यकी प्राप्ति होती है॥ १-२॥
प्राङ्मुखोऽन्नानि भुञ्जीत सूर्याभिमुख एव वा।<br>आसीनस्त्वासने शुद्धे भूम्यां पादौ निधाय तु॥ १॥<br><br>आयुष्यं प्राङ्मुखो भुङ्क्ते यशस्यं दक्षिणामुखः।<br>श्रियं प्रत्यङ्मुखो भुङ्क्ते ऋतं भुङ्क्ते उदङ्मुखः॥ २॥
पञ्चार्द्रो भोजनं कुर्याद् भूमौ पात्रं निधाय तु।<br>उपवासेन तत्तुल्यं मनुराह प्रजापतिः॥ ३॥<br><br>उपलिप्ते शुचौ देशे पादौ प्रक्षाल्य वै करौ।<br>आचम्यार्द्राननोऽक्रोधः पञ्चार्द्रो भोजनं चरेत्॥ ४॥<br><br>महाव्याहृतिभिस्त्वन्नं परिधायोदकेन तु।<br>अमृतोपस्तरणमसीत्यापोशानक्रियां चरेत्॥ ५॥पाँचों अङ्गों (दोनों हाथ, दोनों पैर तथा मुख)-का प्रक्षालनकर (भोजन) पात्रको भूमिपर रखकर भोजन करना चाहिये। प्रजापति मनुने इस प्रकारके भोजनको उपवासके समान बताया है। दोनों हाथ, पैर एवं मुखको धोनेके बाद आचमनकर (गोबर इत्यादिसे) लीपे गये पवित्र स्थानमें (बैठकर) क्रोधरहित होकर भोजन करना चाहिये। महाव्याहृतियोंका उच्चारण करते हुए जलसे अन्नको परिवेष्टितकर 'अमृतोपस्तरणमसि' ऐसा कहकर आपोशान¹ (आचमन) क्रिया (सम्पन्न) करे॥ ३-५॥
स्वाहाप्रणवसंयुक्तां प्राणायाद्याहुतिं ततः।<br>अपनाय ततो हुत्वा व्यानाय तदनन्तरम्॥ ६॥<br><br>उदानाय ततः कुर्यात् समानायेति पञ्चमीम्।<br>विज्ञाय तत्त्वमेतेषां जुहुयादात्मनि द्विजः॥ ७॥तदनन्तर स्वाहा एवं प्रणवके साथ 'प्राणाय' का उच्चारण कर (ॐ प्राणाय स्वाहा) कहकर पहली आहुति देनी चाहिये। तदुपरान्त 'ॐ अपानाय स्वाहा' और फिर 'ॐ व्यानाय स्वाहा', पुनः 'ॐ उदानाय स्वाहा' और अन्तमें 'ॐ समानाय स्वाहा' कहकर पाँचवीं आहुति देनी चाहिये। इनका रहस्य समझते हुए द्विजको आत्मामें आहुति देनी चाहिये²॥ ६-७॥

१-भोजनके आरम्भ एवं अन्तमें आपोशान (आचमन) करके अन्नको अनग्र एवं अमृत किया जाता है।
२-आत्मामें आहुति देनेकी भावनासे भोजनके प्रारम्भमें छोटे-छोटे पाँच ग्रास मुखमें 'प्राणाय स्वाहा' आदि पाँच मन्त्रोंसे देना चाहिये।

* अध्याय १९ *३४९
शेषमन्नं यथाकामं भुञ्जीतव्यं जनैर्युतम्।<br>ध्यात्वा तन्मनसा देवमात्मानं वै प्रजापतिम्॥ ८॥<br><br>अमृतापिधानमसीत्युपरिष्टादपः पिबेत्।<br>आचान्तः पुनराचामेदायं गौरिति मन्त्रतः॥ ९॥<br><br>द्रुपदां वा त्रिरावर्त्य सर्वपापप्रणाशिनीम्।<br>प्राणानां ग्रन्थिरसीत्यालभेद हृदयं ततः॥ १०॥<br>आचम्याङ्गुष्ठमात्रेति पादाङ्गुष्ठेऽथ दक्षिणे।<br>निःस्रावयेद् हस्तजलमूर्ध्वहस्तः समाहितः॥ ११॥<br><br>हुतानुमन्त्रणं कुर्यात् श्रद्धायामिति मन्त्रतः।<br>अथाक्षरेण स्वात्मानं योजयेद् ब्रह्मणोति हि॥ १२॥<br><br>सर्वेषामेव यागानामात्मयागः परः स्मृतः।<br>योऽनेन विधिना कुर्यात् स याति ब्रह्मणः क्षयम्॥ १३॥<br>यज्ञोपवीती भुञ्जीत स्रग्गन्धालङ्कृतः शुचिः।<br>सायंप्रातर्नान्तरा वै संध्यायां तु विशेषतः॥ १४॥<br><br>नाद्यात् सूर्यग्रहात् पूर्वमह्नि सायं शशिग्रहात्।<br>ग्रहकाले च नाश्नीयात् स्नात्वाश्नीयात् तु मुक्तयोः॥ १५॥<br><br>मुक्ते शशिनि भुञ्जीत यदि न स्यान्महानिशा।<br>अमुक्तयोरस्तंगतयोर्दृष्ट्वा दृष्ट्वा परेऽहनि॥ १६॥<br>नाश्नीयात् प्रेक्षमाणानामप्रदायैव दुर्मतिः।<br>न यज्ञशिष्टादन्यद् वा न क्रुद्धो नान्यमानसः॥ १७॥<br><br>आत्मार्थं भोजनं यस्य रत्यर्थं यस्य मैथुनम्।<br>वृत्त्यर्थं यस्य चाधीतं निष्फलं तस्य जीवितम्॥ १८॥फिर देव प्रजापति तथा आत्माका मनसे ध्यान करते हुए अवशिष्ट अन्न (भोजन)-का बन्धुओंके साथ इच्छानुसार भोजन करना चाहिये। (भोजन कर लेनेके बाद) 'अमृतापिधानमसि' यह मन्त्र पढ़कर जल पीना (आचमन करना) चाहिये। आचमनके उपरान्त पुनः 'आयं गौः*०' इस मन्त्रको पढ़ते हुए आचमन करना चाहिये। तदनन्तर सभी प्रकारके पापोंका नाश करनेवाली 'द्रुपदा०' का तीन बार पाठकर 'प्राणानां ग्रन्थिरसि' इस मन्त्रसे हृदयका स्पर्श करे॥ ८-१०॥<br><br>ऊपर हाथ किये हुए समाहितमन होकर आचमन करके 'अङ्गुष्ठमात्रेति' मन्त्रद्वारा दाहिने पैरके अँगुठेपर हाथका जल गिराना चाहिये। 'श्रद्धायाम्०' इस मन्त्रसे हुतानुमन्त्रण करे। तदनन्तर 'ब्रह्मण०' इस मन्त्रसे अपनी आत्माका अक्षर-तत्त्वसे योग करना चाहिये। सभी यागोंमें आत्मयाग श्रेष्ठ कहा गया है। जो इस विधिसे (आत्मयाग) करता है, वह ब्रह्मधाममें जाता है॥ ११-१३॥<br><br>यज्ञोपवीती होकर अर्थात् सव्य होकर तथा माला (एवं चन्दनकी) सुगन्धिसे अलंकृत होकर पवित्रतापूर्वक भोजन करना चाहिये। सायंकाल, प्रातःकाल, मध्याह्नकाल और विशेषरूपसे संध्याकाल (प्रदोषकाल)-के समय भोजन नहीं करना चाहिये। सूर्यग्रहणसे पहले दिनमें, चन्द्रग्रहणसे पूर्व सायंकालमें तथा ग्रहणकालमें भोजन नहीं करना चाहिये। ग्रहणकी मुक्ति हो जानेपर स्नान करनेके अनन्तर भोजन करना चाहिये। चन्द्रमाके ग्रहणसे मुक्त हो जानेपर यदि अर्धरात्रि न हो तो भोजन करना चाहिये। बिना ग्रहणसे मुक्त हुए चन्द्रमा और सूर्य दोनोंके अस्त हो जानेपर दूसरे दिन उनका दर्शन करके भोजन करना चाहिये॥ १४-१६॥<br><br>देखनेवालों (भूखे व्यक्तियों)-को बिना दिये हुए तथा दुर्मना होकर भोजन नहीं करना चाहिये। यज्ञसे अवशिष्ट अन्नसे भिन्न अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिये। अन्यमनस्क होकर तथा क्रुद्ध होकर भोजन नहीं करना चाहिये। जो केवल अपने लिये ही भोजन बनाता है, जो केवल कामसुखके लिये ही मैथुन करता है और जो केवल आजीविका प्राप्त हो जाय-इस उद्देश्यसे अध्ययन करता है, उसका जीवन निष्फल ही है॥ १७-१८॥

  • आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदनू मातरं पुरः। पितरं च प्रयन्त्स्वः। (यजु० ३। ६)

३५० * कूर्मपुराण *


यदभुङ्क्ते वेष्टितशिरा यच्च भुङ्क्ते उदङ्मुखः।<br>सोपानत्कश्च यद् भुङ्क्ते सर्वं विद्यात् तदासुरम्॥ १९॥जो सिर ढककर भोजन करता है, उत्तरकी ओर मुख करके भोजन करता है और जूता पहनकर भोजन करता है, उसके इस प्रकार किये गये भोजनको आसुरी भोजन समझना चाहिये। ठीक अर्धरात्रि, ठीक मध्याह्न, अजीर्ण होनेपर, गीले वस्त्र धारणकर, दूसरेके लिये निर्दिष्ट आसनपर, सोते हुए, खड़े होकर, टूटे-फूटे पात्रमें, भूमिपर तथा हाथपर भोजन नहीं करना चाहिये। जूठे होकर न तो घृत ग्रहण करे और न सिरका ही स्पर्श करे॥ १९-२१॥
नार्धरात्रे न मध्याह्ने नाजीर्णे नार्द्रवस्त्रधृक्।<br>न च भिन्नासनगतो न शयानः स्थितोऽपि वा॥ २०॥
न भिन्नभाजने चैव न भूम्यां न च पाणिषु।<br>नोच्छिष्टो घृतमादद्यान्न मूर्धानं स्पृशेदपि॥ २१॥
न ब्रह्म कीर्तयन् वापि न निःशेषं न भार्यया।<br>नान्धकारे न चाकाशे न च देवालयादिषु॥ २२॥(भोजन करते हुए) वेदका उच्चारण नहीं करना चाहिये और बिना कुछ* भोजन छोड़े ही अर्थात् पूर्ण भोजन न करे तथा भार्याके साथ भी भोजन न करे। न अन्धकारमें, न आकाशके नीचे (शून्य स्थानमें), न देवमन्दिरोंमें ही भोजन करे। एक वस्त्र पहनकर, सवारी या शय्यापर बैठकर भोजन नहीं करना चाहिये। बिना खड़ाऊँ उतारे और हँसते हुए तथा रोते हुए भी भोजन नहीं करना चाहिये॥ २२-२३॥
नैकवस्त्रस्तु भुञ्जीत न यानशयनस्थितः।<br>न पादुकानिर्गतोऽथ न हसन् विलपन्नपि॥ २३॥
भुक्त्वैवं सुखमास्थाय तदन्नं परिणामयेत्।<br>इतिहासपुराणाभ्यां वेदार्थानुपबृंहयेत्॥ २४॥इस प्रकार भोजन करके सुखपूर्वक बैठकर उस अन्नको पचाना चाहिये और इतिहास तथा पुराणोंके द्वारा वेदके रहस्योंको विस्तारपूर्वक समझना चाहिये। तदनन्तर द्विजको पूर्वमें बतलायी गयी विधिके अनुसार संध्योपासना करनी चाहिये। पश्चिमकी ओर मुख करते हुए आसनपर बैठकर गायत्री देवीका जप करना चाहिये। जो व्यक्ति पूर्वकी अर्थात् प्रातःकालकी और पश्चिमकी अर्थात् सायंकालकी संध्या नहीं करता है, वह सभी धर्मोंसे रहित होता हुआ लोकमें शूद्रके समान होता है॥ २४-२६॥
ततः संध्यामुपासीत पूर्वोक्तविधिना द्विजः।<br>आसीनस्तु जपेद् देवीं गायत्रीं पश्चिमां प्रति॥ २५॥
न तिष्ठति तु यः पूर्वा नास्ते संध्यां तु पश्चिमाम्।<br>स शूद्रेण समो लोके सर्वधर्मविवर्जितः॥ २६॥
हुत्वाग्निं विधिवन्मन्त्रैर्भुक्त्वा यज्ञावशिष्टकम्।<br>सभृत्यबान्धवजनः स्वपेच्छुष्कपदो निशि॥ २७॥मन्त्रोंके द्वारा विधिपूर्वक अग्निमें हवन करके यज्ञसे बचे अन्नको बन्धु-बान्धव तथा भृत्यजनोंके साथ ग्रहणकर रात्रिमें सूखे पैर होकर (अर्थात् गीला पैर न रहे) शयन करना चाहिये। न तो उत्तरकी ओर सिर करके और न पश्चिमकी ओर सिर करके सोना चाहिये। खुले आकाशके नीचे (अथवा शून्य स्थानमें), नग्न होकर, अपवित्र अवस्थामें और बैठनेके आसनपर कभी नहीं सोना चाहिये॥ २७-२८॥
नोत्तराभिमुखः स्वप्यात् पश्चिमाभिमुखो न च।<br>न चाकाशे न नग्नो वा नाशुचिर्नासने क्वचित्॥ २८॥

* गृहस्थको भोज्य पदार्थ यथायोग्य अवशिष्ट रखकर भोजन करना चाहिये। इसका आशय यह है कि भोजन कर लेनेके अनन्तर यदि कोई ऐसा व्यक्ति आ जाय, जिसे स्वयं भोजन कर लेनेके बाद भी उसकी अपेक्षाके अनुसार भोजन कराया जा सके, जिससे भोज्य पदार्थके अभावमें वह भूखा न रह जाय।

  • अध्याय २० * । ३५१
न शीर्णायां तु खट्वायाँ शून्यागारे न चैव हि।<br>नानुवंशं न पालाशे शयनं वा कदाचन ॥ २९॥<br>इत्येतदखिलेनोक्तमहन्यहनि वै मया।<br>ब्राह्मणानां कृत्यजातमपवर्गफलप्रदम् ॥ ३०॥<br><br>नास्तिक्यादथवालस्यात् ब्राह्मणो न करोति यः।<br>स याति नरकान् घोरान् काकयोनौ च जायते ॥ ३१॥<br><br>नान्यो विमुक्तये पन्था मुक्त्वाश्रमविधिं स्वकम्।<br>तस्मात् कर्माणि कुर्वीत तुष्टये परमेष्ठिनः ॥ ३२॥टूटी-फूटी चारपाईपर, सूनसान घरमें तथा बाँस या पलाससे बनी खाटपर कभी नहीं सोना चाहिये। इस प्रकार मैंने ब्राह्मणों (द्विजों)-के मोक्षदायक प्रतिदिन किये जानेवाले सम्पूर्ण कृत्यों (दैनिक कर्मों)-का पूर्णरूपसे वर्णन किया। जो ब्राह्मण (द्विज) नास्तिकता अथवा आलस्यके कारण इन कर्मोंको नहीं करता, वह घोर नरकोंमें जाता है और काकयोनिमें जन्म लेता है। अपने आश्रमकी विधिको छोड़कर अन्य कोई दूसरा मुक्तिका मार्ग नहीं है। इसलिये परमेष्ठी (परब्रह्म)-की प्रसन्नताके लिये (विहित) कर्मोंको करना चाहिये॥ २९-३२॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥ इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें उन्नीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १९ ॥


बीसवाँ अध्याय

श्राद्ध-प्रकरण—श्राद्धके प्रशस्त दिन, विभिन्न तिथियों, नक्षत्रों और वारोंमें किये जानेवाले श्राद्धोंका विभिन्न फल, श्राद्धके आठ भेद, श्राद्धके लिये प्रशस्त स्थान, श्राद्धमें विहित तथा निषिद्ध पदार्थ

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
अथ श्राद्धममावास्यां प्राप्य कार्यं द्विजोत्तमैः।<br>पिण्डान्वाहार्यकं भक्त्या भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥ १॥<br><br>पिण्डान्वाहार्यकं श्राद्धं क्षीणे राजनि शस्यते।<br>अपराह्ने द्विजातीनां प्रशस्तेनामिषेण च॥ २॥<br><br>प्रतिपत्प्रभृति ह्यन्यास्तिथयः कृष्णपक्षके।<br>चतुर्दशीं वर्जयित्वा प्रशस्ता ह्युत्तरोत्तराः॥ ३॥<br><br>अमावास्याष्टकास्तिस्रः पौषमासादिषु त्रिषु।<br>तिस्रश्चान्वष्टकाः पुण्या माघी पञ्चदशी तथा॥ ४॥<br><br>त्रयोदशी मघायुक्ता वर्षासु तु विशेषतः।<br>शस्यपाकश्चाद्धकाला नित्याः प्रोक्ता दिने दिने॥ ५॥द्विजोत्तमोंको अमावास्या आनेपर भक्तिपूर्वक भोग और मोक्षरूप फल प्रदान करनेवाला पिण्डान्वाहार्यक* नामक श्राद्ध करना चाहिये। चन्द्रमाके क्षीण होनेपर अर्थात् अमावास्या तिथिके अपराह्न-कालमें द्विजातियोंके लिये पिण्डान्वाहार्यक श्राद्ध करना प्रशस्त होता है॥ १-२॥<br><br>कृष्णपक्षमें चतुर्दशीको छोड़कर प्रतिपदादि अन्य तिथियाँ उत्तरोत्तर प्रशस्त हैं। पौष, माघ तथा फाल्गुन मासकी तीनों अष्टकाएँ (तीनों कृष्णाष्टमी) और अमावास्या, तीनों अन्वष्टकाएँ (नवमी) और माघ मासकी पूर्णिमा तिथि (श्राद्धके लिये) पुण्य तिथियाँ हैं। वर्षा-ऋतुमें मघा नक्षत्रयुक्त त्रयोदशी तिथि और फसलके पकनेका समय विशेषरूपसे श्राद्ध करनेका काल होता है। ये सभी श्राद्ध नित्य और प्रतिदिन किये जानेवाले नित्यश्राद्ध हैं॥ ३-५॥

* मनुस्मृति (३। १२२)-के अनुसार पिण्डान्वाहार्यक एक स्वतन्त्र श्राद्ध है। इसे अग्निहोत्री लोग ही कर सकते हैं। यह पिण्ड पितृयज्ञके बाद किया जाता है, इसलिये इसका नाम पिण्डान्वाहार्यक है। यह प्रतिमास किया जाता है। यह नित्यश्राद्ध है।

३५२* कूर्मपुराण *
नैमित्तिकं तु कर्तव्यं ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः।<br>बान्धवानां च मरणे नारकी स्यादतोऽन्यथा॥ ६ ॥चन्द्र और सूर्यके ग्रहणकाल तथा बान्धवोंके मरनेपर नैमित्तिक श्राद्ध करना चाहिये। ऐसा न करनेपर नारकीय गति प्राप्त होती है। ग्रहण आदिके समय किये गये काम्य श्राद्ध प्रशस्त माने गये हैं। उत्तरायण एवं दक्षिणायनके समय, विषुव तथा व्यतीपात योगमें किया हुआ श्राद्ध भी अनन्त फल देनेवाला होता है। संक्रान्ति तथा जन्मके समय किया गया श्राद्ध अक्षय होता है। सभी नक्षत्रोंमें विशेषरूपसे काम्य श्राद्ध करना चाहिये॥ ६-८॥
काम्यानि चैव श्राद्धानि शस्यन्ते ग्रहणादिषु।<br>अयने विषुवे चैव व्यतीपातेऽप्यनन्तकम्॥ ७ ॥
संक्रान्त्यामक्षयं श्राद्धं तथा जन्मदिनेष्वपि।<br>नक्षत्रेषु च सर्वेषु कार्यं काम्यं विशेषतः॥ ८ ॥
स्वर्गं च लभते कृत्वा कृत्तिकासु द्विजोत्तमः।<br>अपत्यमथ रोहिण्यां सौम्ये तु ब्रह्मवर्चसम्॥ ९ ॥श्रेष्ठ द्विज कृत्तिका नक्षत्रमें श्राद्ध कर स्वर्ग प्राप्त करता है। रोहिणीमें श्राद्ध करनेसे संतान और मृगशिरा नक्षत्रमें श्राद्ध करनेसे ब्रह्मतेजकी प्राप्ति होती है। आर्द्रा नक्षत्रमें श्राद्ध करनेसे रौद्र कर्मोंकी सिद्धि तथा शौर्यकी प्राप्ति होती है। पुनर्वसु नक्षत्रमें भूमि और पुष्य नक्षत्रमें लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। आश्लेषा नक्षत्रमें (श्राद्ध करनेसे) सभी कामनाओं और मघा नक्षत्रमें सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। इसी प्रकार उत्तराफाल्गुनीमें धनकी प्राप्ति होती है और पूर्वाफाल्गुनीमें पापका नाश होता है। हस्त नक्षत्रमें किये गये श्राद्धसे अपनी जातिमें श्रेष्ठता और चित्रा नक्षत्रमें बहुतसे पुत्रोंकी प्राप्ति होती है। स्वातीमें व्यापारकी सिद्धि और विशाखामें सुवर्णकी प्राप्ति होती है। अनुराधामें श्राद्ध करनेसे बहुतसे मित्रोंकी तथा ज्येष्ठामें राज्यकी प्राप्ति होती है। मूल नक्षत्रमें कृषि तथा पूर्वाषाढ़ामें समुद्रतककी सफल यात्रा होती है। उत्तराषाढ़ामें सभी कामनाओंकी सिद्धि और श्रवण नक्षत्रमें श्राद्ध करनेसे श्रेष्ठता प्राप्त होती है। धनिष्ठामें सभी कामनाओं और शतभिषामें परम बलकी प्राप्ति होती है। पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रमें श्राद्ध करनेसे कुप्य अर्थात् सोना-चाँदीसे भिन्न धातुएँ और उत्तराभाद्रपदमें शुभ गृह प्राप्त होता है। रेवती नक्षत्रमें किये गये श्राद्धसे बहुत-सी गौएँ और अश्विनीमें श्राद्ध करनेसे घोड़ोंकी प्राप्ति होती है। भरणी नक्षत्रमें यदि श्राद्ध किया जाय तो आयुकी प्राप्ति होती है॥ ९-१५॥
रौद्राणां कर्मणां सिद्धिमाद्र्रायां शौर्यमेव च।<br>पुनर्वसौ तथा भूमिं श्रियं पुष्ये तथैव च॥ १० ॥
सर्वान् कामांस्तथा सार्पे पित्र्ये सौभाग्यमेव च।<br>अर्यम्णे तु धनं विन्द्यात् फाल्गुन्यां पापनाशनम्॥ ११ ॥
ज्ञातिश्रैष्ठ्यं तथा हस्ते चित्रायां च बहून् सुतान्।<br>वाणिज्यसिद्धिं स्वातौ तु विशाखासु सुवर्णकम्॥ १२ ॥
मैत्रे बहूनि मित्राणि राज्यं शाक्रे तथैव च।<br>मूले कृषिं लभेद यानसिद्धिमाप्ये समुद्रतः॥ १३ ॥
सर्वान् कामान् वैश्वदेवे श्रेष्ठ्यं तु श्रवणे पुनः।<br>श्रविष्ठायां तथा कामान् वारुणे च परं बलम्॥ १४ ॥
अजैकपादे कुप्यं स्यादहिर्बुध्न्ये गृहं शुभम्।<br>रेवत्यां बहवो गावो ह्याश्विन्यां तुरगांस्तथा।<br>याम्येऽथ जीवनं तत् स्याद्यदि श्राद्धं प्रयच्छति॥ १५ ॥
आदित्यवारे त्वारोग्यं चन्द्रे सौभाग्यमेव च।<br>भौमे सर्वत्र विजयं सर्वान् कामान् बुधस्य तु॥ १६ ॥रविवारको (श्राद्ध करनेसे) आरोग्य, सोमवारको सौभाग्य, मंगलवारको सर्वत्र विजय और बुधवारको श्राद्धसे सभी कामनाओंकी सिद्धि होती है। बृहस्पतिवारके दिन श्राद्धसे अभीष्ट विद्या, शुक्रवारके दिन श्राद्धसे धन और शनैश्चरको (श्राद्ध करनेसे) आयु प्राप्त होती है।
विद्यामभीष्टां जीवे तु धनं वै भार्गवे पुनः।<br>शनैश्चरे लभेदायूः प्रतिपत्सु सुतान् शुभान्॥ १७ ॥
* अध्याय २० *३५३
कन्यकां वै द्वितीयायां तृतीयायां तु वन्दिनः।<br>पशून् क्षुद्रांश्चतुर्थ्यां तु पञ्चम्यां शोभनान् सुतान्॥ १८ ॥<br><br>षष्ठ्यां द्यूतं कृषिं चापि सप्तम्यां लभते नरः।<br>अष्टम्यामपि वाणिज्यं लभते श्राद्धदः सदा॥ १९ ॥<br><br>स्यान्नवम्यामेकखुरं दशम्यां द्विखुरं बहु।<br>एकादश्यां तथा रूप्यं ब्रह्मवर्चस्विनः सुतान्॥ २० ॥<br><br>द्वादश्यां जातरूपं च रजतं कुप्यमेव च।<br>ज्ञातिश्रैष्ठ्यं त्रयोदश्यां चतुर्दश्यां तु कुप्रजाः।<br>पञ्चदश्यां सर्वकामानाप्नोति श्राद्धदः सदा॥ २१ ॥<br>तस्माच्छ्राद्धं न कर्तव्यं चतुर्दश्यां द्विजातिभिः।<br>शस्त्रेण तु हतानां वै तत्र श्राद्धं प्रकल्पयेत्॥ २२ ॥<br><br>द्रव्यब्राह्मणसम्पत्तौ न कालनियमः कृतः।<br>तस्माद् भोगापवर्गार्थं श्राद्धं कुर्युर्द्विजातयः॥ २३ ॥<br>कर्मारम्भेषु सर्वेषु कुर्यादाभ्युदयं पुनः।<br>पुत्रजन्मादिषु श्राद्धं पार्वणं पर्वणि स्मृतम्॥ २४ ॥<br><br>अहन्यहनि नित्यं स्यात् काम्यं नैमित्तिकं पुनः।<br>एकोद्दिष्टादि विज्ञेयं वृद्धिश्राद्धं तु पार्वणम्॥ २५ ॥<br><br>एतत् पञ्चविधं श्राद्धं मनुना परिकीर्तितम्।<br>यात्रायां षष्ठमाख्यातं तत्प्रयत्नेन पालयेत्॥ २६ ॥<br><br>शुद्धये सप्तमं श्राद्धं ब्रह्मणा परिभाषितम्।<br>दैविकं चाष्टमं श्राद्धं यत्कृत्वा मुच्यते भयात्॥ २७ ॥<br><br>संध्यारात्र्योर्न कर्तव्यं राहोरन्यत्र दर्शनात्।<br>देशानां च विशेषेण भवेत् पुण्यमनन्तकम्॥ २८ ॥प्रतिपदा तिथिको (श्राद्ध करनेसे) शुभ पुत्र प्राप्त होते हैं। द्वितीयामें श्राद्धसे कन्या, तृतीयामें वन्दीजनों, चतुर्थीमें क्षुद्र पशु और पञ्चमीको श्राद्ध करनेसे सुन्दर पुत्रोंकी प्राप्ति होती है। षष्ठीमें श्राद्ध करनेसे द्यूत (-में विजय) और सप्तमीमें श्राद्धसे कृषिकी प्राप्ति होती है। अष्टमीको श्राद्ध करनेवाला सदा वाणिज्य (-में लाभ) प्राप्त करता है। नवमीमें श्राद्धसे एक खुरवाले और दशमीमें श्राद्ध करनेसे दो खुरवाले बहुतसे पशु मिलते हैं। एकादशीको (श्राद्ध करनेसे) रौप्य (रजत) पदार्थ तथा ब्रह्मवर्चस्वी पुत्रोंकी प्राप्ति होती है। द्वादशीको (श्राद्ध करनेसे) जातरूप (स्वर्ण), चाँदी तथा कुप्य, त्रयोदशीको जातिमें श्रेष्ठता और चतुर्दशीको श्राद्ध करनेसे कुप्रजाकी प्राप्ति होती है। पञ्चदशी (पूर्णिमा एवं अमावास्या)-को श्राद्ध करनेवाला सदा सभी कामनाओंको प्राप्त करता है॥ १६-२१॥<br><br>इसलिये द्विजातियोंको चतुर्दशीके दिन श्राद्ध नहीं करना चाहिये। शस्त्र (आदि)-द्वारा जो मरे हुए हों, उनका श्राद्ध (इस चतुर्दशी तिथिको) करना चाहिये। द्रव्य एवं ब्राह्मणके उपलब्ध रहनेपर कालसम्बन्धी कोई नियम नहीं बताया गया है (अर्थात् कभी भी श्राद्ध किया जा सकता है)। इसलिये भोग और मोक्षकी प्राप्तिके लिये द्विजातियोंको श्राद्ध (अवश्य) करना चाहिये॥ २२-२३॥<br><br>सभी (शुभ) कर्मोंके प्रारम्भमें तथा पुत्रजन्म आदि समयोंमें आभ्युदयिक श्राद्ध करना चाहिये। पर्वके दिन पार्वण श्राद्ध करना चाहिये। मनुने प्रतिदिन किये जानेवाले नित्यश्राद्ध, काम्य-श्राद्ध (कामनाविशेषकी सिद्धिके लिये किया जानेवाला श्राद्ध), एकोद्दिष्टादि नैमित्तिक श्राद्ध, वृद्धिश्राद्ध और पार्वण श्राद्ध—इन पाँच प्रकारके श्राद्धोंका वर्णन किया है। यात्राके समय (किया जानेवाला) छठा श्राद्ध कहा गया है, उसे प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये। ब्रह्माने शुद्धिके लिये सातवें श्राद्धका वर्णन किया है। आठवाँ दैविक नामक श्राद्ध है, जिसे करनेसे भयसे मुक्ति हो जाती है। संध्या और रात्रिमें श्राद्ध नहीं करना चाहिये। किंतु राहु और केतुद्वारा सूर्य-चन्द्रके ग्रस्त किये जानेपर रात्रिमें भी श्राद्ध किया जा सकता है। देशविशेषके कारण श्राद्ध अनन्त पुण्य फल देनेवाला होता है॥ २४-२८॥

३५४ * कूर्मपुराण *


गङ्गायामक्षयं श्राद्धं प्रयागेऽमरकण्टके।<br>गायन्ति पितरो गाथां कीर्तयन्ति मनीषिणः ॥ २९ ॥<br><br>एष्टव्या बहवः पुत्राः शीलवन्तो गुणान्विताः।<br>तेषां तु समवेतानां यद्येकोऽपि गयां व्रजेत् ॥ ३० ॥<br><br>गयां प्राप्यानुषङ्गेण यदि श्राद्धं समाचरेत् ।<br>तारिताः पितरस्तेन स याति परमां गतिम् ॥ ३१ ॥गङ्गा, प्रयाग तथा अमरकण्टकमें किया गया श्राद्ध अक्षय फल प्रदान करता है। पितर इस गाथाका गान करते हैं और मनीषी ऐसा कीर्तन करते रहते हैं कि 'शीलवान् तथा गुणवान् बहुतसे पुत्रोंकी इच्छा करनी चाहिये, क्योंकि उनमेंसे कोई एक भी किसी प्रसंगवश गया चला जाय और गया पहुँचकर यदि श्राद्ध कर दे तो उसके द्वारा पितर तार दिये जाते हैं (अर्थात् पितरोंको उत्तमोत्तम गति प्राप्त होती है) और वह (श्राद्धकर्ता) परमगतिको प्राप्त करता है'॥ २९-३१॥
वराहपर्वते चैव गङ्गायां वै विशेषतः ।<br>वाराणस्यां विशेषेण यत्र देवः स्वयं हरः ॥ ३२ ॥<br>गङ्गाद्वारे प्रभासे च बिल्वके नीलपर्वते ।<br>कुरुक्षेत्रे च कुब्जाम्रे भृगुतुङ्गे महालये ॥ ३३ ॥<br>केदारे फल्गुतीर्थे च नैमिषारण्य एव च।<br>सरस्वत्यां विशेषेण पुष्करेषु विशेषतः ॥ ३४ ॥<br>नर्मदायां कुशावर्ते श्रीशैले भद्रकर्णके ।<br>वेत्रवत्यां विपाशायां गोदावर्यां विशेषतः ॥ ३५ ॥<br>एवमादिषु चान्येषु तीर्थेषु पुलिनेषु च।<br>नदीनां चैव तीरेषु तुष्यन्ति पितरः सदा ॥ ३६ ॥वराह¹ पर्वत, विशेषरूपसे गङ्गा तथा जहाँ स्वयं भगवान् हर निवास करते हैं विशेषतया उस वाराणसी, गङ्गाद्वार (हरिद्वार), प्रभास, बिल्वकतीर्थ, नीलपर्वत, कुरुक्षेत्र, कुब्जाम्रतीर्थ, भृगुतुङ्ग, महालय, केदारपर्वत, फल्गुतीर्थ, नैमिषारण्य, विशेषरूपसे सरस्वती नदी तथा पुष्कर, नर्मदा, कुशावर्त, श्रीशैल, भद्रकर्णक, वेत्रवती, विपाशा तथा विशेषरूपसे गोदावरी नदी आदि स्थानों तथा अन्य तीर्थों, पुलिनों² और नदियोंके तटोंपर किये गये श्राद्धसे पितर सदा संतुष्ट होते हैं॥ ३२-३६॥
व्रीहिभिश्च यवैर्माषैरद्भिर्मूलफलेन वा।<br>श्यामाकैश्च यवैः शाकैर्नीवारैश्च प्रियङ्गुभिः ।<br>गोधूमैश्च तिलैर्मुद्गैर्मासं प्रीणयते पितॄन् ॥ ३७ ॥<br>आम्रान् पानेरतानिक्षून् मृद्वीकांश्च सदाडिमान्।<br>विदार्यांश्च भरण्डांश्च श्राद्धकाले प्रदापयेत् ॥ ३८ ॥<br>लाजान् मधुयुतान् दद्यात् सक्तून् शर्करया सह।<br>दद्याच्छ्राद्धे प्रयत्नेन शृङ्गाटककशेरुकान् ॥ ३९ ॥<br>द्वौ मासौ मत्स्यमांसेन त्रीन् मासान् हारिणेन तु।<br>औरभ्रेणाथ चतुरः शाकुनेनेह पञ्च तु ॥ ४० ॥<br>षण्मासांश्छागमांसेन पार्षतेनाथ सप्त वै।<br>अष्टावेणस्य मांसेन रौरवेण नवैव तु ॥ ४१ ॥<br>दशमासांस्तु तृप्यन्ति वराहमहिषामिषैः ।<br>शशकूर्मयोर्मांसेन मासानेकादशैव तु ॥ ४२ ॥<br>संवत्सरं तु गव्येन पयसा पायसेन तु।<br>वार्ध्रीणसस्य मांसेन तृप्तिर्द्वादशवार्षिकी ॥ ४३ ॥व्रीहि, जौ, उड़द, जल, मूल, फल, श्यामाक (सावाँ), यव, शाक, नीवार, प्रियङ्गु, गोधूम, तिल तथा मुद्गद्वारा किये गये श्राद्धसे पितर एक महीनेतक प्रसन्न रहते हैं। आम, पानेरत (पानेण, करमईंद अर्थात् करौंदा या करमर्द), ईख, द्राक्षा (अंगूर), दाडिम, विदारी (भूमिकुष्माण्ड) तथा भरण्ड— इन्हें श्राद्धके समय प्रदान करना चाहिये। मधुयुक्त लाजा, शर्कराके साथ सत्तू, सिंघाड़ा तथा कसेरू—इन्हें श्राद्धमें प्रयत्नपूर्वक देना चाहिये॥ ३७—४३॥

१-वराहपर्वतकी चर्चा वह्निपुराणमें तथा महाभारत (२।२१।२)-में है।
२-पुलिन—(नदीके किनारेका वह भाग जहाँसे जल हटा हो (—तोयोत्थितं तत् पुलिनम्)। (अमरकोश)

  • अध्याय २१ * | ३५५ ---|---

कालशाकं महाशल्कं खड्गलोहामिषं मधु।
आनन्त्यायैव कल्पन्ते मुन्यन्नानि च सर्वशः ॥ ४४ ॥
क्रीत्वा लब्ध्वा स्वयं वाथ मृतानाहृत्य वा द्विजः।
दद्याच्छ्राद्धे प्रयत्नेन तदस्याक्षयमुच्यते ॥ ४५ ॥
पिप्पलीं क्रमुकं चैव तथा चैव मसूरकम्।
कूष्माण्डालाबुवार्ताकान् भूस्तृणं सुरसं तथा ॥ ४६ ॥
कुसुम्भपिण्डमूलं वै तन्दुलीयकमेव च।
राजमाषांस्तथा क्षीरं माहिषं च विवर्जयेत् ॥ ४७ ॥
कोद्रवान् कोविदारांश्च पालक्यान् मरिचांस्तथा।
वर्जयेत् सर्वयत्नेन श्राद्धकाले द्विजोत्तमः ॥ ४८ ॥ | श्राद्धमें पिप्पली, सुपारी, मसूर, कूष्माण्ड, (वर्तुलाकार— गोल) लौकी, बैगन, रसयुक्त भूस्तृण, कुसुम्भ, पिण्डमूल (रर्जर), तन्दुलीयक, (चौंराई शाकविशेष) राजमाष (वर्वट, वर्वटी, कड़ाई लोकभाषामें) और भैंसके दूधका प्रयोग नहीं करना चाहिये। श्रेष्ठ द्विजको श्राद्धमें कोदो, कोविदार (कचनार), पालक तथा मरिचका प्रयत्नपूर्वक त्याग करना चाहिये॥ ४४-४८॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें बीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २०॥


इक्कीसवाँ अध्याय

श्राद्ध-प्रकरणमें निमन्त्रणके योग्य पंक्तिपावन ब्राह्मणों तथा त्याज्य पंक्ति-दूषकोंके लक्षण

व्यास उवाच | व्यासजी बोले—द्विजको चाहिये कि चन्द्रमाके क्षय होनेपर अर्थात् अमावास्याको स्नानकर यथोक्त रीतिसे पितरोंका तर्पण करके शान्तचित्त होकर तथा पवित्रतापूर्वक पिण्डान्वाहार्यक श्राद्ध करे। (श्राद्धसे) पूर्व ही वेदमें पारंगत विद्वान् ब्राह्मणका अन्वेषण करना चाहिये, क्योंकि उसे ही (वेदपारग ब्राह्मणको ही) हव्य, कव्य, तीर्थ और दानका अतिथि (अधिकारी) कहा गया है॥ १-२॥ स्नात्वा यथोक्तं संतर्प्य पितॄंश्चन्द्रक्षये द्विजः।<br>पिण्डान्वाहार्यकं श्राद्धं कुर्यात् सौम्यमनाः शुचिः ॥ १ ॥<br><br>पूर्वमेव परीक्षेत ब्राह्मणं वेदपारगम्।<br>तीर्थं तद् हव्यकव्यानां प्रदाने चातिथिः स्मृतः ॥ २ ॥ | ये सोमपा विरजसो धर्मज्ञाः शान्तचेतसः।<br>व्रतिनो नियमस्थाश्च ऋतुकालाभिगामिनः ॥ ३ ॥ | जो सोमपायी, रजोगुणसे हीन, धर्मको जाननेवाले, शान्तचित्त, व्रतपरायण, नियममें स्थित, ऋतुकालमें गमन करनेवाले हैं (वे ब्राह्मण पंक्तिपावन हैं)। पञ्चाग्निका सेवन करनेवाला, अध्ययनशील, यजुर्वेदका ज्ञाता, बह्वृच् (ऋग्वेदी) त्रिसौपर्ण¹ तथा त्रिमधु² अर्थात् ऋग्वेदके अंश-विशेषका अध्येता, ॥ ३-४॥ पञ्चाग्निरप्यधीयानो यजुर्वेदविदेव च।<br>बह्वृचश्च त्रिसौपर्णस्त्रिमधुर्वाथ यो भवेत् ॥ ४ ॥ |


१-ऋग्वेदका विशेष वेदभाग एवं उसका व्रत त्रिसुपर्ण कहा जाता है, अतः इसके सम्बन्धसे ब्राह्मणको त्रिसुपर्ण या त्रिसौपर्ण कहा जाता है (मनु० ३। १८४)।
२-तीन बार मधु शब्द जिन ऋचाओंमें आया है, वे 'मधुव्वाता......' आदि तीन ऋचाएँ (शब्दकल्पद्रुम)।

३५६* कूर्मपुराण *
त्रिणाचिकेतच्छन्दोगो ज्येष्ठसामग एव च।<br>अथर्वशिरसोऽध्येता रुद्राध्यायी विशेषतः॥ ५ ॥त्रिणाचिकेत¹ (यजुर्वेदके अंशविशेषका अध्येता) छन्दोग² (सामवेदका ज्ञाता) ज्येष्ठसामग³—ज्येष्ठसाम (सामगान) तथा अथर्ववेदका अध्येता और विशेषरूपसे रुद्राध्यायका अध्ययन करनेवाला (ब्राह्मण पंक्तिपावन होता है)॥ ५॥
अग्निहोत्रपरो विद्वान् न्यायविच्च षडङ्गवित्।<br>मन्त्रब्राह्मणविच्चैव यश्च स्याद् धर्मपाठकः॥ ६ ॥<br><br>ऋषिव्रती ऋषीकश्च तथा द्वादशवार्षिकः।<br>ब्राह्मदेयानुसंतानो गर्भशुद्धः सहस्रदः॥ ७ ॥<br><br>चान्द्रायणव्रतचरः सत्यवादी पुराणवित्।<br>गुरुदेवाग्निपूजासु प्रसक्तो ज्ञानतत्परः॥ ८ ॥<br><br>विमुक्तः सर्वतो धीरो ब्रह्मभूतो द्विजोत्तमः।<br>महादेवार्चनरतो वैष्णवः पंक्तिपावनः॥ ९ ॥<br><br>अहिंसानिरतो नित्यमप्रतिग्रहणस्तथा।<br>सत्रिणो दाननिरता विज्ञेयाः पंक्तिपावनाः॥ १०॥अग्निहोत्रपरायण, विद्वान्, न्यायवेत्ता, वेदके शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द तथा ज्योतिष—इन छः अङ्गोंको जाननेवाला, वेदके मन्त्रभाग एवं ब्राह्मण-भागको जाननेवाला तथा धर्मशास्त्रको पढ़नेवाला, ऋषियोंके व्रतोंका पालन करनेवाला, ऋषीक⁴, बारह वर्षोंतक चलनेवाले व्रत, यज्ञ (सत्र)-का करनेवाला, ब्राह्म⁵-विवाहद्वारा उत्पन्न संतान, गर्भाधानादि संस्कारसे शुद्ध और सहस्रों (शिष्योंको विद्या) दान करनेवाला (ब्राह्मण) पंक्तिपावन होता है। चान्द्रायणव्रत करनेवाला, सत्यवादी, पुराण जाननेवाला, गुरु, देवता और अग्निकी पूजामें आसक्त, ज्ञानपरायण, आसक्ति आदिसे सर्वथा मुक्त, धीर, ब्रह्मज्ञानी, महादेवकी पूजामें निरत रहनेवाला तथा वैष्णव श्रेष्ठ द्विज पंक्तिपावन होता है। नित्य अहिंसा-व्रतपरायण, अप्रतिग्रही, यज्ञ⁶ करनेवाले और दान देने-वाले (ब्राह्मणों)-को पंक्तिपावन जानना चाहिये॥ ६–१०॥
युवानः श्रोत्रियाः स्वस्था महायज्ञपरायणाः।<br>सावित्रीजापनिरता ब्राह्मणाः पंक्तिपावनाः॥ ११ ॥<br><br>कुलीनाः श्रुतवन्तश्च शीलवन्तस्तपस्विनः।<br>अग्निचित्स्नातका विप्रा विज्ञेयाः पंक्तिपावनाः॥ १२ ॥श्रोत्रिय, स्वस्थ, महायज्ञ⁷-परायण, गायत्री-जप करनेमें निरत ब्राह्मण युवक (सामर्थ्यसम्पन्न) पंक्तिपावन होते हैं। कुलीन, ज्ञानवान्, शीलवान्, तपस्वी एवं अग्निका चयन⁸ करनेवाले स्नातक⁹ ब्राह्मणोंको पंक्तिपावन जानना चाहिये॥ ११–१२॥

१-अध्वर्युवेदभाग (यजुर्वेदका भागविशेष) एवं उसके व्रत त्रिणाचिकेत हैं। इन दोनोंके सम्बन्धसे ब्राह्मण भी 'त्रिणाचिकेत' कहा जाता है (मनु० ३।१८४)।
२-छन्द (वेदविशेष साम)-के गानमें कुशल अथवा सामवेदका अध्येता 'छन्दोग' है (शब्दकल्पद्रुम)।
३-'ज्येष्ठसाम' सामवेद या उसके अध्ययनका अङ्ग व्रत है, इसका सम्बन्ध जिस ब्राह्मणसे है वह 'ज्येष्ठसामग' है।
४-'ऋषीक' का अर्थ 'ऋषिपुत्र' है। प्रकृतमें 'ऋषि-परम्परामें उत्पन्न' अर्थ समझना चाहिये।
५-मूलमें 'ब्राह्मदेयानुसंतान' शब्द है। इसका 'जिसकी कुलपरम्परामें ब्रह्म (वेद)-के अध्ययनाध्यापनकी परम्परा अविच्छिन्नरूपसे चल रही हो'—यह अर्थ भी किया जा सकता है।
६-मूलमें 'सत्री' शब्द है। इसका अर्थ यज्ञ, यज्ञविशेष, दान-परायण, कथाश्रवण एवं अनेक दिन-साध्य अनुष्ठान आदि हैं। इन सबके अनुष्ठाता ब्राह्मणको 'सत्री' कहा जायगा।
७-'महायज्ञ' पञ्चमहायज्ञोंको कहा जाता है, वे इस प्रकार हैं— (१) ब्रह्मयज्ञ (वेदका अध्ययनाध्यापन), (२) पितृयज्ञ (तर्पण), (३) देवयज्ञ (होम), (४) भूतयज्ञ (भूतबलि) और (५) मनुष्ययज्ञ (अतिथि-पूजन)।
८-मूलमें 'अग्निचित्' शब्द है। इसका अर्थ है—'अग्निहोत्री'।
९-सविधि ब्रह्मचर्यव्रत पूर्णकर स्नानविशेषरूप संस्कारके अनन्तर गृहस्थाश्रममें प्रविष्ट या अप्रविष्ट द्विज स्नातक होता है। यहाँ ऐसे ब्राह्मणमात्रको लेना है।

* अध्याय २१ *३५७
मातापित्रोर्हिते युक्तः प्रातःस्नायी तथा द्विजः।<br>अध्यात्मविन्मुनिर्दान्तो विज्ञेयः पंक्तिपावनः ॥ १३ ॥<br><br>ज्ञाननिष्ठो महायोगी वेदान्तार्थविचिन्तकः।<br>श्रद्धालुः श्राद्धनिरतो ब्राह्मणः पंक्तिपावनः ॥ १४ ॥<br><br>वेदविद्यारतः स्नातो ब्रह्मचर्यपरः सदा।<br>अथर्वणो मुमुक्षुश्च ब्राह्मणः पंक्तिपावनः ॥ १५ ॥<br><br>असमानप्रवरको ह्यसगोत्रस्तथैव च।<br>असम्बन्धी च विज्ञेयो ब्राह्मणः पंक्तिपावनः ॥ १६ ॥<br>भोजयेद् योगिनं पूर्वं तत्त्वज्ञानरतं यतिम्।<br>अलाभे नैष्ठिकं दान्तमुपकुर्वाणकं तथा ॥ १७॥<br><br>तदलाभे गृहस्थं तु मुमुक्षुं सङ्गवर्जितम्।<br>सर्वालाभे साधकं वा गृहस्थमपि भोजयेत् ॥ १८ ॥<br>प्रकृतेर्गुणतत्त्वज्ञो यस्याश्नाति यतिर्हविः।<br>फलं वेदविदां तस्य सहस्रादतिरिच्यते ॥ १९ ॥<br><br>तस्माद् यत्नेन योगीन्द्रमीश्वरज्ञानतत्परम्।<br>भोजयेद् हव्यकव्येषु अलाभादितरान् द्विजान् ॥ २० ॥<br>एष वै प्रथमः कल्पः प्रदाने हव्यकव्ययोः।<br>अनुकल्पस्त्वयं ज्ञेयः सदा सद्भिरनुष्ठितः ॥ २१ ॥<br><br>मातामहं मातुलं च स्वस्रीयं श्वशुरं गुरुम्।<br>दौहित्रं विट्पतिं बन्धुमृत्विग्याज्यौ च भोजयेत् ॥ २२ ॥माता-पिताके हितमें लगे हुए, प्रातःस्नान करनेवाले, अध्यात्मवेत्ता, मुनि एवं दान्त ब्राह्मणोंको पंक्तिपावन समझना चाहिये। ज्ञाननिष्ठ, महायोगी, वेदान्तके अर्थका विशेष चिन्तन करनेवाले, श्रद्धासम्पन्न तथा श्राद्धनिरत ब्राह्मण पंक्ति-पावन होते हैं। वेदविद्यामें निरत, सदा ब्रह्मचर्य-परायण, अथर्ववेदका अध्ययन करनेवाला, मुमुक्षु, स्नातक ब्राह्मण पंक्तिपावन होता है। असमान प्रवर, असमान गोत्र (-में सम्बन्ध करनेवाला) और असम्बन्धी (निषिद्ध सम्बन्धरहित) ब्राह्मणको पंक्तिपावन समझना चाहिये॥ १३-१६॥<br><br>सर्वप्रथम तत्त्वज्ञानमें निरत संयतचित्त योगीको भोजन कराना चाहिये। अभाव होनेपर (अर्थात् ऐसा ब्राह्मण न मिलनेपर) इन्द्रियजयी नैष्ठिक ब्रह्मचारी (जो ब्रह्मचर्य-व्रत स्वीकारकर यावज्जीवन गुरुकुलमें ही निवास करता है)-को और ऐसे ब्राह्मणके अभावमें उपकुर्वाणक (जो ब्रह्मचर्यव्रत पूर्णकर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करनेवाला है ऐसे ब्रह्मचारी) ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये। उसका भी अभाव होनेपर आसक्तिरहित मुमुक्षु गृहस्थ ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये। इन सभीके अभाव होनेपर साधक (ब्राह्मण) गृहस्थको भोजन कराना चाहिये॥ १७-१८॥<br><br>प्रकृतिके गुण और तत्त्वको जाननेवाला (तत्त्ववेत्ता) यति (संयतचित्त ब्राह्मण) जिस (व्यक्ति)-का भोजन करता है, उसे (सहस्रों) वेदज्ञको भोजन करानेकी अपेक्षा भी सहस्रगुना अधिक फल मिलता है। इसलिये ईश्वरज्ञानमें तत्पर श्रेष्ठ योगीको देवकार्य एवं पितृकार्यमें प्रयत्नपूर्वक भोजन कराना चाहिये। इनकी प्राप्ति न होनेपर दूसरे ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये॥ १९-२०॥<br><br>हव्य और कव्य प्रदान करनेमें यह प्रथम कल्प है। (इसके अभावमें) सज्जनों (वेदशास्त्रनिष्ठों)-द्वारा सदा अनुष्ठित इस अनुकल्पको जानना चाहिये—मातामह (नाना), मातुल (मामा), भांजा, ससुर, गुरु, दुहितापुत्र (नाती), विट्पति (जामाता), बन्धु (मौसी, बूआ एवं मामी आदिके पुत्र), ऋत्विक् तथा यज्ञ करानेवाले ब्राह्मणको भोजन कराया जाय॥ २१-२२॥

३५८ * कूर्मपुराण *


न श्राद्धे भोजयेन्मित्रं धनैः कार्योऽस्य संग्रहः।<br>पैशाची दक्षिणा सा हि नैवामुत्र फलप्रदा॥ २३॥श्राद्धमें मित्रको भोजन नहीं कराना चाहिये। इनका संरक्षण (संग्रह) धनके आदान-प्रदानद्वारा करना चाहिये। (यदि श्राद्धमें मित्रको भोजन कराकर दक्षिणा दी जाय तो) ऐसी दक्षिणा पैशाची होती है। यह परलोकमें कोई फल नहीं देती। (किसी विशेष स्थिति या उपर्युक्त कल्प-अनुकल्पके अभावमें) श्राद्धमें भले ही मित्रका (यथोचित) सत्कार करे, किंतु अभिरूप (विद्वान्, मनोज्ञ) पात्र होनेपर भी शत्रु‌का सत्कार नहीं करना चाहिये, (क्योंकि) द्वेष रखनेवालेके द्वारा भुक्त हवि परलोकमें निष्फल होती है॥ २३-२४॥
कामं श्राद्धेऽर्चयेन्मित्रं नाभिरूपमपि त्वरिम्।<br>द्विषता हि हविर्भुक्तं भवति प्रेत्य निष्फलम्॥ २४॥<br>ब्राह्मणो ह्यनधीयानस्तृणाग्निरिव शाम्यति।<br>तस्मै हव्यं न दातव्यं न हि भस्मनि हूयते॥ २५॥(वेदादिका) अध्ययन न करनेवाला ब्राह्मण तृणमें लगी अग्निके समान शान्त (निस्तेज) हो जाता है। उसे हव्य (यथासम्भव देव-पित्र्य-कार्यमें भोजनके लिये निमन्त्रण) नहीं देना चाहिये, क्योंकि भस्ममें हवन नहीं किया जाता है। जिस प्रकार ऊसर भूमिमें बीज बोनेवाला कुछ फल नहीं प्राप्त करता, उसी प्रकार वेद न जाननेवालेको हवि देनेसे दाताको कोई फल नहीं मिलता। मन्त्रको न जाननेवाला वह ब्राह्मण देव और पितृकार्यमें जितने पिण्डों (ग्रासों)-को ग्रहण करता है, मृत्युके अनन्तर वह उतने ही स्थूल और प्रज्वलित लोहेके पिण्डों (ग्रासों)-का भक्षण करता है॥ २५-२७॥
यथेरिणे बीजमुप्त्वा न वप्ता लभते फलम्।<br>तथानुचे हविर्दत्त्वा न दाता लभते फलम्॥ २६॥
यावतो ग्रसते पिण्डान् हव्यकव्येष्वमन्त्रवित्।<br>तावतो ग्रसते प्रेत्य दीप्तान् स्थूलांस्त्वयोगुडान्॥ २७॥<br>अपि विद्याकुलैर्युक्ता हीनवृत्ता नराधमाः।<br>यत्रैते भुञ्जते हव्यं तद् भवेदासुरं द्विजाः॥ २८॥हे द्विजो! विद्या-सम्पन्न तथा उत्तम कुलमें उत्पन्न होनेपर भी आचारहीन नीच मनुष्य दैव और पित्र्यकार्यमें जो हव्य आदि ग्रहण करते हैं, वह (हव्यादि) आसुरी हो जाता है। जिसकी तीन पीढ़ी‌तक वेद और यज्ञ आदिका उच्छेद हो जाता है, वह दुर्ब्राह्मण होता है, वह श्राद्ध आदिमें कभी भी पूजाके योग्य नहीं होता। शूद्रका नौकर, राजासे वेतन लेनेवाला, पतित (अधार्मिक), गाँवके पुरोहित, वध और बन्धनद्वारा जीविका चलानेवाले—ये छः ब्रह्मबन्धु होते हैं॥ २८-३०॥
यस्य वेदश्च वेदी च विच्छिद्येते त्रिपूरुषम्।<br>स वै दुर्ब्राह्मणो नार्हः श्राद्धादिषु कदाचन॥ २९॥
शूद्रप्रेष्यो भृतो राज्ञो वृषलो ग्रामयाजकः।<br>वधबन्धोपजीवी च षडेते ब्रह्मबन्धवः॥ ३०॥<br>दत्तानुयोगान् वृत्त्यर्थं पतितान् मनुरब्रवीत्।<br>वेदविक्रयिणो ह्येते श्राद्धादिषु विगर्हिताः॥ ३१॥मनुने जीविकाके लिये नौकरी करनेवालेको पतित बतलाया है। ये सभी एवं वेदका विक्रय करनेवाले (ब्राह्मण) श्राद्ध आदि कार्योंमें निन्दित हैं। जो वेदका विक्रय करनेवाले, हीन अथवा उच्चवर्णकी स्त्रीसे उत्पन्न तथा असमान वर्णोंका पौरोहित्य करनेवाले हैं, वे पतित कहे गये हैं॥ ३१-३२॥
श्रुतिविक्रयिणो ये तु परपूर्वासमुद्भवाः।<br>असमानान् याजयन्ति पतितास्ते प्रकीर्तिताः॥ ३२॥
* अध्याय २१ *३५१
असंस्कृताध्यापका ये भृत्या वाध्यापयन्ति ये।<br>अधीयते तथा वेदान् पतितास्ते प्रकीर्तिताः ॥ ३३ ॥<br><br>वृद्धश्रावकनिर्ग्रन्थाः पञ्चरात्रविदो जनाः।<br>कापालिकाः पाशुपताः पाषण्डा ये च तद्विधाः ॥ ३४ ॥<br><br>यस्याश्नन्ति हवींष्येते दुरात्मानस्तु तामसाः।<br>न तस्य तद् भवेच्छ्राद्धं प्रेत्य चेह फलप्रदम् ॥ ३५ ॥जो असंस्कृतों (संस्काररहितों)-के अध्यापक हैं, वेतनके लिये अध्यापन तथा वेदाध्ययन करनेवाले हैं, वे पतित कहे गये हैं। वृद्ध श्रावक अर्थात् बौद्ध, निर्ग्रन्थ अर्थात् जैन, पाञ्चरात्रके ज्ञाता, कापालिक, पाशुपत (सम्प्रदायविशेषके) और उसी प्रकारके पाखंडी, तमोगुणी, दुरात्मा व्यक्ति—ये जिसके हविष्यान्नका भक्षण करते हैं, उसका किया श्राद्ध न तो इस लोकमें फल देनेवाला होता है और न परलोकमें ॥ ३३—३५ ॥
अनाश्रमी यो द्विजः स्यादाश्रमी वा निरर्थकः।<br>मिथ्याश्रमी च ते विप्रा विज्ञेयाः पंक्तिदूषकाः ॥ ३६ ॥जो द्विज (ब्राह्मण) यथाविधि आश्रमको स्वीकार करनेवाले नहीं हैं अथवा नाममात्रके लिये किसी आश्रमका आश्रय लिये हैं, वे मिथ्याश्रमी कहे गये हैं, उन्हें पंक्तिदूषक समझना चाहिये ॥ ३६ ॥
दुश्चर्मा कुनखी कुष्ठी श्वित्री च श्यावदन्तकः।<br>विद्धप्रजननश्चैव स्तेनः क्लीबोऽथ नास्तिकः ॥ ३७ ॥<br><br>मद्यपो वृषलीसक्तो वीरहा दिधिषूपतिः।<br>आगारदाही कुण्डाशी सोमविक्रयिणो द्विजाः ॥ ३८ ॥विकारयुक्त चर्म एवं नखवालों, कुष्ठरोगी, श्वेत कुष्ठरोगी, स्वभावतः काले दाँतवाला, विद्ध लिङ्गवाला, चोर, नपुंसक, नास्तिक, मद्य पीनेवाला, शूद्रा स्त्रीमें आसक्त, वीरहा (वह अग्निहोत्री जिसका अग्निहोत्र नष्ट हो गया है), विधवा स्त्रीसे विवाह करनेवाला, घरको जलानेवाला, कुण्ड (पतिके जीवित रहते अन्य पुरुषसे उत्पन्न संतान)-का भोजन करनेवाला तथा सोमलताका विक्रय करनेवाला—इस प्रकारके ब्राह्मण (श्राद्धादिमें त्याज्य हैं) ॥ ३७-३८ ॥
परिवेत्ता तथा हिंस्रः परिवित्तिर्निराकृतिः।<br>पौनर्भवः कुसीदी च तथा नक्षत्रदर्शकः ॥ ३९ ॥परिवेत्ता अर्थात् बड़े भाईके अविवाहित अथवा अनग्निक रहते हुए विवाह तथा अग्नि स्वीकार करने-वाला छोटा भाई, हिंसा करनेवाला, परिवित्ति—(छोटे भाईके विवाहित होनेसे पहले अविवाहित रहनेवाला बड़ा भाई), निराकृति अर्थात् पञ्चमहायज्ञोंका अनुष्ठान न करनेवाला, पौनर्भव* (दूसरे पतिसे उत्पन्न पुत्र), ब्याज लेनेवाला तथा नक्षत्रदर्शक (ज्योतिषसे जीविका चलानेवाले)-का श्राद्धादिमें परित्याग करना चाहिये ॥ ३९ ॥
गीतवादित्रनिरतो व्याधितः काण एव च।<br>हीनाङ्गश्चातिरिक्ताङ्गो ह्यवकीर्णिस्तथैव च ॥ ४० ॥गाने-बजानेमें निरत, रोगी, काना, हीन अङ्गोंवाला, अधिक अङ्गोंवाला, अवकीर्णी (स्त्रीसे सम्पर्क कर ब्रह्मचर्यव्रत नष्ट करनेवाला), कन्याको दूषित

* मनुस्मृति (९। १७५)-के अनुसार।

३६०* कूर्मपुराण *
कन्यादूषी कुण्डगोलौ अभिशस्तोऽथ देवलः।<br>मित्रध्रुक् पिशुनश्चैव नित्यं भार्यानुवर्तकः॥ ४१॥करनेवाला, कुण्ड (पतिके जीवित रहते परपुरुषसे उत्पन्न संतान), गोलक (पतिकी मृत्युके बाद उपपतिसे उत्पन्न संतान), अभिशस्त (मिथ्यापवादग्रस्त), (देवल) — मन्दिर आदिसे आजीविका प्राप्त करनेवाले (पुजारी आदि), मित्रद्रोही, चुगली करनेवाला और नित्य भार्याके वशीभूत रहनेवाला — ये श्राद्धादिमें त्याज्य हैं॥ ४०-४१॥
मातापित्त्रोर्गुरोस्त्यागी दारत्यागी तथैव च।<br>गोत्रभिद् भ्रष्टशौचश्च काण्डस्पृष्टस्तथैव च॥ ४२॥माता, पिता, गुरु तथा पत्नीका त्याग करनेवाला, सगोत्र (भाई-बन्धु) - में भेदबुद्धि पैदा करनेवाला, शौचभ्रष्ट (शौचाचारहीन), शस्त्रजीवी, संतानहीन, झूठी गवाही देनेवाला, याचक, रंगद्वारा जीविकोपार्जन करनेवाला (चित्रकार, नाट्यकार), समुद्रकी यात्रा करनेवाला, कृतघ्न और प्रतिज्ञा-भङ्ग करनेवाला, देवनिन्दापरायण, वेदनिन्दामें निरत तथा द्विजकी निन्दा करनेवाला — ये सभी श्राद्धादि कर्मोंमें त्याज्य हैं। कृतघ्न, चुगली करनेवाला, क्रूर, नास्तिक, वेदकी निन्दा करनेवाला, मित्रद्रोही तथा ऐन्द्रजालिक (मायावी, दाम्भिक) — ये विशेषरूपसे पंक्तिदूषक हैं॥ ४२-४५॥
अनपत्यः कूटसाक्षी याचको रङ्गजीवकः।<br>समुद्रयायी कृतहा तथा समयभेदकः॥ ४३॥
देवनिन्दापरश्चैव वेदनिन्दारतस्तथा।<br>द्विजनिन्दारतश्चैते वर्ज्याः श्राद्धादिकर्मसु॥ ४४॥
कृतघ्नः पिशुनः क्रूरो नास्तिको वेदनिन्दकः।<br>मित्रध्रुक् कुहकश्चैव विशेषात् पंक्तिदूषकाः॥ ४५॥
सर्वे पुनरभोज्यान्नास्त्वदानाहेश्च कर्मसु।<br>ब्रह्मभावनिर्हस्ताश्च वर्जनीयाः प्रयत्नतः॥ ४६॥(उपर्युक्त) सभी प्रकारके व्यक्ति श्राद्धमें भोजन न कराने योग्य और सभी कर्मोंमें दानके अयोग्य होते हैं। ब्रह्मभावसे शून्य अर्थात् ब्राह्मणत्वसे च्युत व्यक्तियोंका विशेषरूपसे त्याग करना चाहिये॥ ४६॥
शूद्रान्नरासपुष्टाङ्गः संध्योपासनवर्जितः।<br>महायज्ञविहीनश्च ब्राह्मणः पंक्तिदूषकः॥ ४७॥शूद्रके अन्न एवं रससे पुष्ट हुए अङ्गोंवाला, संध्योपासनासे रहित, पञ्चमहायज्ञोंसे शून्य ब्राह्मण पंक्तिदूषक होता है। पढ़े गये वेदादिका विस्मरण करनेवाला, स्नान एवं होमसे रहित, तमोगुणी तथा रजोगुणी ब्राह्मण पंक्तिदूषक होता है॥ ४७-४८॥
अधीतनाशनश्चैव स्नानहोमविवर्जितः।<br>तामसो राजसश्चैव ब्राह्मणः पंक्तिदूषकः॥ ४८॥
बहुनात्र किमुक्तेन विहितान् ये न कुर्वते।<br>निन्दितानाचरन्त्येते वर्जनीयाः प्रयत्नतः॥ ४९॥अधिक क्या कहा जाय। जो शास्त्रविहित स्वकर्मोंको नहीं करते और शास्त्रनिषिद्ध (निन्दित) कर्मोंका आचरण करते हैं, वे प्रयत्नपूर्वक त्याग करने योग्य हैं॥ ४९॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे एकविंशोऽध्यायः॥ २१॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें इक्कीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २१॥

* अध्याय २२ * ३६१

बाईसवाँ अध्याय

श्राद्ध-प्रकरणमें ब्राह्मण निमन्त्रित करनेकी विधि, निमन्त्रित ब्राह्मणके कर्तव्य, श्राद्धविधि, श्राद्धमें प्रशस्त पात्र, पितरोंकी प्रार्थना, श्राद्धके दिन निषिद्ध कर्म, वृद्धिश्राद्धका विधान, श्राद्ध-प्रकरणका उपसंहार

व्यास उवाचव्यासजी बोले—सावधानीपूर्वक गोबर और जलसे (श्राद्ध) भूमिको शुद्धकर सभी ब्राह्मणोंकी सेवामें पहुँचकर सज्जन पुरुषोंद्वारा उन्हें निमन्त्रित करना चाहिये। श्राद्धके पहले दिन ब्राह्मणोंकी (नम्रभावसे आदरपूर्वक) पूजाकर उनसे कहना चाहिये—'कल हमारे यहाँ श्राद्ध होगा (आपलोग कृपाकर पधारें)'। ऐसा असम्भव होनेपर दूसरे (दिन) अर्थात् श्राद्धके ही दिन यथोक्त लक्षणोंसे समन्वित ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करना चाहिये॥ १-२॥
गोमयेनोदकैर्भूमिं शोधयित्वा समाहितः।<br>संनिपत्य द्विजान् सर्वान् साधुभिः संनिमन्त्रयेत्॥ १ ॥<br><br>श्वो भविष्यति मे श्राद्धं पूर्वेद्युरभिपूज्य च।<br>असम्भवे परेद्युर्वा यथोक्तैर्लक्षणैर्युतान्॥ २ ॥
तस्य ते पितरः श्रुत्वा श्राद्धकालमुपस्थितम्।<br>अन्योन्यं मनसा ध्यात्वा सम्पत्तन्ति मनोजवाः॥ ३ ॥<br><br>ब्राह्मणैस्ते सहाश्नन्ति पितरो ह्यन्तरिक्षगाः।<br>वायुभूतास्तु तिष्ठन्ति भुक्त्वा यान्ति परां गतिम्॥ ४ ॥<br><br>आमन्त्रिताश्च ते विप्राः श्राद्धकाल उपस्थिते।<br>वसेयुर्नियताः सर्वे ब्रह्मचर्यपरायणाः॥ ५ ॥मनके समान शीघ्र गतिवाले पितर जब यह सुन लेते हैं कि श्राद्धकाल उपस्थित है, तब परस्पर विचारकर श्राद्धकर्ताके यहाँ एकत्र हो जाते हैं। अन्तरिक्षमें विचरण करनेवाले पितर वायुरूपसे स्थित रहते हैं, ब्राह्मणोंके साथ भोजन करते हैं और भोजन करके परमगति प्राप्त करते हैं। श्राद्धका समय आनेपर सभी आमन्त्रित ब्राह्मणोंको संयमी और ब्रह्मचर्यपरायण होकर रहना चाहिये॥ ३-५॥
अक्रोधनोऽत्वरोऽमत्तः सत्यवादी समाहितः।<br>भारं मैथुनमध्वानं श्राद्धकृद् वर्जयेज्जपम्॥ ६ ॥श्राद्ध करनेवालेको क्रोध, उतावलापन तथा प्रमादका त्यागकर समाहित होना चाहिये, सत्य बोलना चाहिये। उसे भारका ढोना, मैथुन, मार्गगमन (यात्रा आदि) और जपका (किसी कामनापरक यज्ञादिका श्राद्धके समय) परित्याग करना चाहिये॥ ६ ॥
आमन्त्रितो ब्राह्मणो वा योऽन्यस्मै कुरुते क्षणम्।<br>स याति नरकं घोरं सूकरत्वं प्रयाति च॥ ७ ॥<br><br>आमन्त्रयित्वा यो मोहादन्यं चामन्त्रयेद् द्विजम्।<br>स तस्मादधिकः पापी विष्ठाकीटोऽभिजायते॥ ८ ॥<br><br>श्राद्धे निमन्त्रितो विप्रो मैथुनं योऽधिगच्छति।<br>ब्रह्महत्यामवाप्नोति तिर्यग्योनौ च जायते॥ ९ ॥(पहलेसे ही) निमन्त्रित ब्राह्मण (यदि) किसी दूसरेका निमन्त्रण स्वीकार करता है तो वह घोर नरकमें जाता है और बादमें सूकरकी योनि प्राप्त करता है। (किसी एक) ब्राह्मणको आमन्त्रित करके जो मोहसे दूसरेको आमन्त्रित करता है, वह व्यक्ति उससे भी अधिक पापी होता है (जो निमन्त्रित होनेपर भी दूसरी जगह जाता है) और विष्ठाका कीड़ा होता है। श्राद्धमें निमन्त्रित जो ब्राह्मण मैथुन करता है, वह ब्रह्महत्या (के पाप)-को प्राप्त करता है और बादमें तिर्यक्-योनिमें उत्पन्न होता है॥ ७-९॥

३६२

  • कूर्मपुराण *
निमन्त्रितस्तु यो विप्रो ह्यध्वानं याति दुर्मतिः।<br>भवन्ति पितरस्तस्य तं मासं पांशुभोजनाः ॥ १० ॥<br>निमन्त्रितस्तु यः श्राद्धे प्रकुर्यात् कलहं द्विजः।<br>भवन्ति तस्य तन्मासं पितरो मलभोजनाः ॥ ११ ॥<br><br>तस्मान्निमन्त्रितः श्राद्धे नियतात्मा भवेद् द्विजः।<br>अक्रोधनः शौचपरः कर्ता चैव जितेन्द्रियः ॥ १२ ॥<br>श्वोभूते दक्षिणां गत्वा दिशं दर्भान् समाहितः।<br>समूलानाहरेद् वारि दक्षिणाग्रान् सुनिर्मलान् ॥ १३ ॥<br><br>दक्षिणाप्रवणं स्निग्धं विभक्तं शुभलक्षणम्।<br>शुचिं देशं विविक्तं च गोमयेनोपलेपयेत् ॥ १४ ॥<br><br>नदीतीरेषु तीर्थेषु स्वभूमौ चैव सानुषु।<br>विविक्तेषु च तृप्यन्ति दत्तेन पितरः सदा ॥ १५ ॥<br>पारक्ये भूमिभागे तु पितॄणां नैव निर्वपेत्।<br>स्वामिभिस्तद् विहन्येत मोहाद्यत् क्रियते नरैः ॥ १६ ॥<br><br>अटव्यः पर्वताः पुण्यास्तीर्थान्यायतन‍ानि च।<br>सर्वाण्यस्वामिकान्याहुर्न हि तेषु परिग्रहः ॥ १७ ॥<br><br>तिलान् प्रविकिरेत् तत्र सर्वतो बन्धयेदजान्।<br>असुरोपहतं सर्वं तिलैः शुध्यत्यजेन वा ॥ १८ ॥<br>ततोऽन्नं बहुसंस्कारं नैकव्यञ्जनमच्युतम्।<br>चोष्यपेयसमृद्धं च यथाशक्त्या प्रकल्पयेत् ॥ १९ ॥<br><br>ततो निवृत्ते मध्याह्ने लुप्तलोमनखान् द्विजान्।<br>अभिगम्य यथामार्गं प्रयच्छेद् दन्तधावनम् ॥ २० ॥<br>तैलमभ्यञ्जनं स्नानं स्नानीयं च पृथग्विधम्।<br>पात्रैरुदुम्बरैर्दद्याद् वैश्वदैवत्यपूर्वकम् ॥ २१ ॥<br><br>ततः स्नात्वा निवृत्तेभ्यः प्रत्युत्थाय कृताञ्जलिः।<br>पाद्यमाचमनीयं च सम्प्रयच्छेद् यथाक्रमम् ॥ २२ ॥<br><br>ये चात्र विश्वेदेवानां विप्राः पूर्वं निमन्त्रिताः।<br>प्राङ्मुखान्यासनान्येषां त्रिदर्भोपहितानि च ॥ २३ ॥श्राद्धमें निमन्त्रित जो दुर्बुद्धि ब्राह्मण यात्रा करता है, उसके पितर उस महीने धूलिका भक्षण करते हैं श्राद्धमें निमन्त्रित जो ब्राह्मण कलह करता है, उस महीनेमें उसके पितर मलका भोजन करते हैं, इसलिये श्राद्धमें निमन्त्रित ब्राह्मणको नियतात्मा, क्रोधशून्य तथा शौचपरायण रहना चाहिये और श्राद्धकर्ताको भी जितेन्द्रिय होना चाहिये ॥ १०-१२ ॥<br><br>श्राद्ध-दिनके पूर्व दिन समाहित होकर दक्षिण दिशामें जाकर अत्यन्त निर्मल, जड़सहित और दक्षिणकी ओर झुके हुए कुशों और जलको लाना चाहिये। दक्षिणकी ओर झुके हुए, स्निग्ध, अन्यके सम्बन्धसे रहित (अर्थात् स्व-स्वत्ववाले) शुभ लक्षणोंवाले, पवित्र तथा एकान्त स्थानका गोमयसे उपलेपन करना चाहिये। नदियोंके किनारों, तीर्थों, अपनी भूमिमें, पर्वतके शिखरों तथा एकान्त स्थानोंपर श्राद्ध करनेसे पितर सदा संतुष्ट रहते हैं ॥ १३-१५ ॥<br><br>दूसरेकी भूमिमें पितरोंका श्राद्ध नहीं करना चाहिये। यदि मोहवश मनुष्योंके द्वारा ऐसा किया जाता है तो वह कर्म (भूमिके) स्वामीके द्वारा विफल (नष्ट) कर दिया जाता है। जंगल, पर्वत, पुण्यतीर्थ, देवमन्दिर—ये सभी स्थान बिना स्वामीवाले (अर्थात् सार्वजनिक) कहे जाते हैं। इनपर किसीका स्वामित्व नहीं होता। (श्राद्धभूमिमें) सर्वत्र तिलोंको फैलाना चाहिये। तिलोंके द्वारा असुरोंसे उपहत अर्थात् आक्रान्त (श्राद्धभूमि) शुद्ध हो जाती है ॥ १६-१८ ॥<br><br>तदनन्तर अनेक प्रकारसे शुद्ध किये गये प्रशस्त अन्नसे ऐसे अनेक प्रकारके भोज्य पक्वान्न बनाने चाहिये, जो चोष्य, पेय आदि उत्तमोत्तम व्यंजनोंसे यथाशक्ति समृद्ध हों। तदनन्तर मध्याह्नकाल व्यतीत होनेपर कृतक्षौर (नख और बाल कटाये हुए) द्विजों (ब्राह्मणों)-से मार्गमें मिलकर उन्हें दन्तधावन प्रदान करे ॥ १९-२० ॥<br><br>वैश्वदैवत्य मन्त्रका उच्चारण कर उन्हें उदुम्बरके पात्रोंद्वारा अभ्यञ्जनके लिये उपयोगी तैल, स्नानके लिये जल अलग-अलग दे। तदुपरान्त उनके स्नान कर लेनेपर उठकर हाथ जोड़ते हुए उन्हें क्रमशः पाद्य एवं आचमन देना चाहिये। विश्वेदेवोंके निमित्त जो ब्राह्मण पहले निमन्त्रित हैं, उन्हें तीन कुश रखकर पूर्वाभिमुख आसन प्रदान करना चाहिये ॥ २१-२३ ॥

* अध्याय २२ * ३६३

दक्षिणामुखयुक्तानि पितॄणामासनानि च।<br>दक्षिणाग्रैकदर्भाणि प्रोक्षितानि तिलोदकैः ॥ २४ ॥<br><br>तेषूपवेशयेदेतानासनं स्पृश्य स द्विजम्।<br>आसध्वमिति संजल्पन् आसनास्ते पृथक् पृथक् ॥ २५ ॥<br>द्वौ दैवे प्राङ्मुखौ पित्र्ये त्रयश्चोदङ्मुखास्तथा।<br>एकैकं वा भवेत् तत्र देवमातामहेष्वपि ॥ २६ ॥<br><br>सत्क्रियां देशकालौ च शौचं ब्राह्मणसम्पदम्।<br>पञ्चैतान् विस्तरो हन्ति तस्मान्नेहेत विस्तरम् ॥ २७ ॥<br><br>अपि वा भोजयेदेकं ब्राह्मणं वेदपारगम्।<br>श्रुतशीलादिसम्पन्नमलक्षणविवर्जितम् ॥ २८ ॥पितृ-ब्राह्मणोंको दक्षिणाग्र कुशके ऊपर तिलोदकसे प्रोक्षितकर दक्षिणाभिमुख आसन प्रदान करना चाहिये। श्राद्धकर्ता आसनका स्पर्श करते हुए 'आसध्वम्'—'बैठिये' इस प्रकार कहकर उन पितृ-ब्राह्मणोंको पृथक्-पृथक् आसनपर बिठाये १ ॥ २४-२५ ॥<br>(विश्वेदेव) देवसम्बन्धी दो ब्राह्मणोंको पूर्वाभिमुख, पित्र्यसम्बन्धी तीन ब्राह्मणोंको उत्तराभिमुख बैठाना चाहिये अथवा देवसम्बन्धी और मातामह (पित्र्यसम्बन्धी)-के भी निमित्त एक-एक ब्राह्मणको बैठाना चाहिये। (श्राद्धमें) सत्कार, देश, काल, पवित्रता और ब्राह्मणसम्पद्—इन पाँचोंका (अधिक) विस्तारके कारण नाश होता है, अतः विस्तारकी इच्छा नहीं करनी चाहिये २, विस्तारकी अपेक्षा श्रुतशील आदिसे सम्पन्न अनपेक्षित क्षणोंसे रहित वेदके पारंगत एक ही ब्राह्मणको भोजन कराना उचित है ॥ २६-२८ ॥
उद्धृत्य पात्रे चान्नं तत् सर्वस्मात् प्रकृतात् पुनः।<br>देवतायतने चास्मै निवेद्यान्यत् प्रवर्तयेत् ॥ २९ ॥<br><br>प्रास्येदग्नौ तदन्नं तु दद्याद् वा ब्रह्मचारिणे।<br>तस्मादेकमपि श्रेष्ठं विद्वांसं भोजयेद् द्विजम् ॥ ३० ॥किसी पात्रमें समस्त प्रकृत वस्तुओं (श्राद्धीय भोज्य पदार्थोंमेंसे उचित मात्रामें भोज्य लेकर) देवमन्दिरमें देवताके उद्देश्यसे प्रथम निवेदित करके अन्य कार्य प्रारम्भ करना चाहिये, उस (श्राद्धीय लवणरहित सिद्ध) अन्नको अग्निमें छोड़ना चाहिये अथवा ब्रह्मचारीको देना चाहिये। अतः एक भी श्रेष्ठ विद्वान् ब्राह्मणको भोजन कराना चाहिये ॥ २९-३० ॥
भिक्षुको ब्रह्मचारी वा भोजनार्थमुपस्थितः।<br>उपविष्टेषु यः श्राद्धे कामं तमपि भोजयेत् ॥ ३१ ॥<br><br>अतिथिर्यस्य नाश्नाति न तच्छ्राद्धं प्रशस्यते।<br>तस्मात् प्रयत्नाच्छ्राद्धेषु पूज्या ह्यतिथयो द्विजैः ॥ ३२ ॥श्राद्धमें निमन्त्रित ब्राह्मणोंके बैठ जानेपर भोजनके निमित्त उपस्थित हुए भिक्षुक अथवा ब्रह्मचारीको भी उनकी इच्छानुसार (श्राद्धमें जो यथेष्ट हो वह) भोजन कराना चाहिये। जिसके श्राद्धमें अतिथि भोजन नहीं करता, उसका श्राद्ध प्रशंसनीय नहीं होता। इसलिये द्विजोंको प्रयत्नपूर्वक श्राद्धोंमें अतिथियोंका पूजन करना चाहिये ॥ ३१-३२ ॥
आतिथ्यरहिते श्राद्धे भुञ्जते ये द्विजातयः।<br>काकयोनिं व्रजन्त्येते दाता चैव न संशयः ॥ ३३ ॥<br><br>हीनाङ्गः पतितः कुष्ठी व्रणी पुक्कसनास्तिकौ।<br>कुक्कुटाः शूकरा श्वानो वर्ज्याः श्राद्धेषु दूरतः ॥ ३४ ॥जो द्विज (ब्राह्मण) आतिथ्यरहित श्राद्धमें भोजन करते हैं, वे कौएकी योनिमें जाते हैं और दाताकी भी यही गति होती है, इसमें संदेह नहीं। श्राद्धमें हीन अङ्गवाला, पतित, कुष्ठरोगी, व्रणयुक्त, पुक्कस (जातिविशेष), नास्तिक, कुक्कुट, शूकर तथा कुत्ता—ये दूरसे ही हटा देने योग्य हैं ॥ ३३-३४ ॥

१-सामान्यतः ब्राह्मणकी जगह कुशपर श्राद्ध किया जाता है, किंतु सपात्रिक श्राद्धमें ब्राह्मणको बैठाकर श्राद्ध करनेका विधान है।
२-इसका आशय यह है कि श्राद्धके अवसरपर अधिक विस्तार करनेपर यथायोग्य सत्कार, उचित देश, श्राद्धके शास्त्रविहित काल, यथाशास्त्र पवित्रता तथा श्राद्धयोग्य ब्राह्मणकी सुलभता निश्चित ही संदिग्ध हो जाती है।

३६४* कूर्मपुराण *
बीभत्सुमशुचिं नग्नं मत्तं धूर्तं रजस्वलाम्।<br>नीलकाषायवसनं पाषण्डांश्च विवर्जयेत् ॥ ३५॥वीभत्स, अपवित्र, नग्न, मत्त, धूर्त, रजस्वला स्त्री, नीला और कषाय वस्त्र धारण करनेवाले तथा पाखंडीका परित्याग करना चाहिये ॥ ३५॥
यत् तत्र क्रियते कर्म पैतृकं ब्राह्मणान् प्रति।<br>तत्सर्वमेव कर्तव्यं वैश्वदैवत्यपूर्वकम् ॥ ३६॥श्राद्धमें पितृ-ब्राह्मणोंके प्रति जो भी कर्म किया जाता है, वह सब वैश्वदेवकर्मके अनन्तर करना चाहिये। यथाविधि (श्राद्धीय भोजनमें) बैठे हुए उन सभी (ब्राह्मणों)-को आभूषण, माला, यज्ञसूत्र, शिरोवेष्टन, धूप, वस्त्र तथा अनुलेपन आदिके द्वारा अलंकृत करना चाहिये ॥ ३६-३७॥
यथोपविष्टान् सर्वांस्तानलंकुर्याद् विभूषणैः।<br>स्रग्दामभिः शिरोवेष्टैर्धूपवासोऽनुलेपनैः ॥ ३७॥<br>ततस्त्वावाहयेद् देवान् ब्राह्मणानामनुज्ञया।<br>उदङ्मुखो यथान्यायं विश्वे देवास इत्यृचा ॥ ३८॥तदनन्तर ब्राह्मणोंकी आज्ञासे उत्तराभिमुख होकर यथाविधि 'विश्वे देवास०' इस ऋचाका पाठकर देवोंका आवाहन करना चाहिये। दो पवित्र (कुश) ग्रहणकर 'शं नो देवी०'—यह मन्त्र पढ़कर प्रक्षालित पात्रमें जल डाले और 'यवोऽसीति०' मन्त्रसे यव (जौ) भी डाले। 'या दिव्या०' इस मन्त्रसे (ब्राह्मणके) हाथपर अर्घ (अर्घपात्रका जल) छोड़े और यथाशक्ति गन्ध, माला, धूप तथा दीप आदि प्रदान करे ॥ ३८-४०॥
द्वे पवित्रे गृहीत्वाथ भाजने क्षालिते पुनः।<br>शं नो देव्या जलं क्षिप्त्वा यवोऽसीति यवांस्तथा ॥ ३९॥
या दिव्या इति मन्त्रेण हस्ते त्वर्घ्यं विनिक्षिपेत्।<br>प्रदद्याद् गन्धमाल्यानि धूपादीनि च शक्तितः ॥ ४०॥<br>अपसव्यं ततः कृत्वा पितॄणां दक्षिणामुखः।<br>आवाहनं ततः कुर्यादुशन्तस्त्वेत्यृचा बुधः ॥ ४१॥तदनन्तर विद्वान् व्यक्तिको अपसव्य एवं दक्षिणाभिमुख होकर 'उशन्तस्त्व०' इस ऋचासे पितरोंका आवाहन करना चाहिये। आवाहन करके उनकी आज्ञासे 'आ यन्तु नः०' इस मन्त्रका जप करना चाहिये। 'शं नो देवी०' इस मन्त्रसे पात्रमें जल डाले और 'तिलोऽसि०' इस मन्त्रसे तिल भी छोड़े। पहलेके समान अर्घ प्रदानकर अथवा ब्राह्मणोंके हाथमें (जलादि) प्रदानकर समाहित होकर पात्रमें संस्रव-अर्घका अवशिष्ट जल रखे। तदनन्तर 'पितृभ्यःस्थानम्०' इस मन्त्रसे पात्रको अधोमुख (उलटकर) रखे। घृतयुक्त अन्न लेकर 'अग्नौ करिष्ये' ऐसा पूछे और (उन ब्राह्मणोंद्वारा) 'कुरुष्व—करो' ऐसी आज्ञा प्राप्त होनेपर उपवीती (सव्य होकर) हवन (अग्नौकरण) करे। हाथमें कुश लेकर और यज्ञोपवीती (सव्य) होकर होम करना चाहिये। पितृसम्बन्धी कार्य प्राचीनावीती (अपसव्य) होकर करे और वैश्वदेवसम्बन्धी कार्य होमके समान अर्थात् सव्य होकर करे ॥ ४१-४५॥
आवाह्य तदनुज्ञातो जपेदा यन्तु नस्ततः।<br>शं नो देव्योदकं पात्रे तिलोऽसीति तिलांस्तथा ॥ ४२॥
क्षिप्त्वा चार्घं यथापूर्वं दत्त्वा हस्तेषु वै पुनः।<br>संस्रवांश्च ततः सर्वान् पात्रे कुर्यात् समाहितः।<br>पितृभ्यः स्थानमतेन न्युब्जं पात्रं निधापयेत् ॥ ४३॥
अग्नौ करिष्येत्यादाय पृच्छत्यन्नं घृतप्लुतम्।<br>कुरुष्वेत्यभ्यनुज्ञातो जुहुयादुपवीतवान् ॥ ४४॥
यज्ञोपवीतिना होमः कर्तव्यः कुशपाणिना।<br>प्राचीनावीतिना पित्र्यं वैश्वदेवं तु होमवत् ॥ ४५॥
दक्षिणं पातयेज्जानुं देवान् परिचरन् पुमान्।<br>पितॄणां परिचर्यासु पातयेदितरं तथा ॥ ४६॥पुरुषको दाहिना जानु जमीनपर रखकर देवोंकी परिचर्या करनी चाहिये और पितरोंकी परिचर्यामें बायाँ जानु जमीनपर रखना चाहिये ॥ ४६॥
  • अध्याय २२ * ३६५

सोमाय वै पितृमते स्वधा नम इति ब्रुवन्।<br>अग्नये कव्यवाहाय स्वधेति जुहुयात् ततः॥ ४७ ॥तब ‘सोमाय वै पितृमते स्वधा नमः’ इस मन्त्रका उच्चारणकर ‘अग्नये कव्यवाहनाय स्वधा’ ऐसा कहकर हवन करे॥ ४७ ॥
अग्न्यभावे तु विप्रस्य पाणावेवोपपादयेत्।<br>महादेवान्तिके वाथ गोष्ठे वा सुसमाहितः ॥ ४८ ॥अग्निके अभाव होनेपर सावधानचित्त होकर ब्राह्मणके हाथपर, महादेवके समीप अथवा गोशालामें हवनीय द्रव्य रखना चाहिये।
ततस्तैरभ्यनुज्ञातो गत्वा वै दक्षिणां दिशम्।<br>गोमयेनोपलिप्योर्वी स्थानं कृत्वा तु सैकतम् ॥ ४९ ॥<br><br>मण्डलं चतुरस्रं वा दक्षिणावनतं शुभम्।<br>त्रिरुल्लिखेत् तस्य मध्यं दर्भेणैकेन चैव हि ॥ ५० ॥<br><br>ततः संस्तीर्य तत्स्थाने दर्भान् वै दक्षिणाग्रकान्।<br>त्रीन् पिण्डान् निर्वपेत् तत्र हविः शेषात् समाहितः ॥ ५१ ॥तदनन्तर उनकी आज्ञा प्राप्तकर दक्षिण दिशामें जाकर भूमिको गोमय (गोबर)-से लीपकर उस स्थानमें बालू बिछाये। तदनन्तर उस स्थानपर दक्षिणकी ओर झुकी हुई गोल अथवा चौकोर शुभ (बालुकामय) बेदी बनाये, उस बेदीके बीचमें एक कुशसे तीन रेखा खींचे और उस स्थान (बेदी)-पर दक्षिणाग्र कुशोंको बिछाकर हविके बचे हुए अंशसे निर्मित तीन पिण्ड उस (बेदी)-पर प्रदान करे॥ ४८-५१॥
न्युप्य पिण्डांस्तु तं हस्तं निमृज्याल्लेपभागिनाम्।<br>तेषु दर्भेष्वथाचम्य त्रिरायम्य शनैरसूनू।<br>तदन्नं तु नमस्कुर्यात् पितॄनेव च मन्त्रवित् ॥ ५२ ॥पिण्ड-प्रदानके अनन्तर लेपभागके अधिकारी* पितरोंके लिये पिण्डाधार-कुशोंके मूलमें उस (पिण्ड-शेषसे संसृष्ट) हाथका प्रोक्षण करे। तदनन्तर मन्त्रवेत्ताको चाहिये कि आचमन करे और धीरे-धीरे श्वास खींचकर अपने बायेंसे पीछे मुख करके धीरे-धीरे श्वास छोड़ते हुए पिण्डोंके सामने अपना मुख कर पूरा श्वास छोड़े तथा उस अन्न एवं पितरोंको नमस्कार करे। पुनः पिण्डके समीप (ऊपर) धीरे-धीरे (अर्घपात्रका) शेष जल छोड़े (इसे अवनेजन कहते हैं)।
उदकं निनयेच्छेषं शनैः पिण्डान्तिके पुनः।<br>अवजिघ्रेच्च तान् पिण्डान् यथान्युप्तान् समाहितः ॥ ५३ ॥तदनन्तर सावधानीके साथ रखे हुए उन पिण्डोंको झुककर क्रमानुसार सूंघे (और पाकपात्रमें रख दे)॥ ५२-५३॥
अथ पिण्डावशिष्टान्नं विधिना भोजयेद् द्विजान्।<br>मांसान्यपूपान् विविधान् दद्यात् कृसरपायसम् ॥ ५४ ॥<br><br>सूपशाकफलानीक्षून् पयो दधि घृतं मधु।<br>अन्नं चैव यथाकामं विविधं भक्ष्यपेयकम् ॥ ५५ ॥पिण्डदानसे बचा हुआ अन्न ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक खिलाना चाहिये। पूआ, कृसर, पायस (तिलके साथ पकाये चावलकी खीर), सूप, शाक, फल, ईख, दूध, दही, घृत, मधु, अन्न तथा अनेक प्रकारके खाने और पीने योग्य पदार्थ उनकी (ब्राह्मणोंकी) रुचिके अनुसार खिलाने चाहिये॥ ५४-५५॥
यद यदिष्टं द्विजेन्द्राणां तत्सर्वं विनिवेदयेत्।<br>धान्यांस्तिलांश्च विविधान् शर्करा विविधास्तथा ॥ ५६ ॥श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको जो-जो रुचिकर हो (और श्राद्धमें विहित हो) वह सब देना चाहिये। साथ ही अनेक प्रकारके धान्य, तिल तथा शर्कराका दान करना चाहिये॥ ५६॥

* पितामहके ऊपरके प्रपितामह आदि तीसरी परम्परासे आगेके सभी पितर पिण्डके अधिकारी नहीं होते हैं, अपितु पिण्ड बनाते समय हाथमें जो पिण्डका शेष अन्न संसृष्ट (लगा) रहता है, उसीको ग्रहण करनेके अधिकारी होते हैं, अतः प्रपितामहके आगेकी पीढ़ीवाले पितरोंको 'लेपभागभुक्' कहा जाता है। इनकी तृप्ति तभी होती है, जब प्रपितामहतक तीन परम्पराको पिण्ड प्रदान कर लेनेके अनन्तर पिण्डोंके आधारकुशोंके मूलमें उन दोनों हाथोंका प्रोक्षण किया जाय, जिनसे पिण्डोंको बनाया गया है।

३६६ * कूर्मपुराण *


उष्मन्नं द्विजातिभ्यो दातव्यं श्रेय इच्छता ।<br>अन्यत्र फलमूलेभ्यः पानकेभ्यस्तथैव च ॥ ५७ ॥कल्याण प्राप्त करनेकी इच्छावाले (श्राद्धकर्ताको चाहिये कि) ब्राह्मणोंको फल, मूल और पानक (विविध स्वादयुक्त पेय पदार्थविशेष)-को छोड़कर अन्य सभी अन्न उष्ण-अवस्थामें (गरम-गरम) प्रदान करे ॥ ५७॥
नाश्रूणि पातयेज्जातु न कुप्येन्नानृतं वदेत्।<br>न पादेन स्पृशेदन्नं न चैतदवधूनयेत् ॥ ५८ ॥(श्राद्धकर्ता) कभी भी अश्रुपात न करे, न कोप करे, न झूठ बोले, पाँवसे अन्नको स्पर्श न करे और न अन्नका (पैरोंसे) अवधूनन (मर्दन) करे।
क्रोधेन चैव यद् दत्तं यद् भुक्तं त्वरया पुनः ।<br>यातुधाना विलुम्पन्ति जल्पता चोपपादितम् ॥ ५९ ॥क्रोध करके जो दिया जाता है, जल्दी-जल्दी जो भोजन किया जाता है और बोलते हुए जो खाया जाता है, उस पदार्थको राक्षस हर लेते हैं। ब्राह्मणोंके समीप स्वेदयुक्त शरीरसे न रहे। श्राद्धस्थलसे श्येन,
स्विन्नगात्रो न तिष्ठेत संनिधौ तु द्विजन्मनाम्।<br>न चात्र श्येनकाकादीन् पक्षिणः प्रतिषेधयेत् ।<br>तद्रूपाः पितरस्तत्र समायान्ति बुभुक्षवः ॥ ६० ॥<br>न दद्यात् तत्र हस्तेन प्रत्यक्षलवणं तथा।<br>न चायसेन पात्रेण न चैवाश्रद्धया पुनः ॥ ६१ ॥कौआ आदि पक्षियोंको हटाना नहीं चाहिये, क्योंकि (सम्भव है) इनके ही रूपमें पितृगण वहाँ खानेकी इच्छासे आये हों ॥ ५८-६०॥<br>वहाँ (श्राद्धमें) हाथसे प्रत्यक्ष लवण नहीं देना चाहिये। लोहेके पात्रद्वारा और अश्रद्धासे कोई वस्तु नहीं देनी चाहिये। स्वर्ण, रजत या औदुम्बरके पात्रसे तथा विशेष रूपसे खड्ग नामके पात्रविशेषसे दिया
काञ्चनेन तु पात्रेण राजतौदुम्बरेण वा।<br>दत्तमक्षयतां याति खड्गेन च विशेषतः ॥ ६२ ॥हुआ पदार्थ अक्षय होता है। जो व्यक्ति श्राद्धमें मिट्टीके बर्तनोंमें पितरोंको भोजन कराता है, वह घोर नरकमें जाता है, ऐसे ही भोजन करनेवाले
पात्रे तु मृण्मये यो वै श्राद्धे भोजयते पितॄन् ।<br>स याति नरकं घोरं भोक्ता चैव पुरोधसः ॥ ६३ ॥<br>न पंक्त्यां विषमं दद्यान्न याचेन्न च दापयेत्।<br>याचिता दापिता दाता नरकान् यान्ति दारुणान् ॥ ६४ ॥ब्राह्मण तथा (श्राद्ध करानेवाले) पुरोहित भी नरकमें जाते हैं ॥ ६१-६३॥<br>एक पंक्तिमें (भोजन करनेवालोंके साथ परोसनेमें) विषम व्यवहार नहीं करना चाहिये। सबको समान रूपसे देना चाहिये। (भोजन करनेवालोंको भी विषम दृष्टिसे) न तो माँगना चाहिये न किसी दूसरेको दिलाना चाहिये, क्योंकि ऐसा (करनेपर) माँगनेवाला, दिलानेवाला और देनेवाला-ये तीनों भीषण नरकोंमें जाते हैं। शिष्ट लोगोंको मौन होकर भोजन करना चाहिये। (अन्नके) प्राकृत गुणोंका वर्णन नहीं करना चाहिये।
भुञ्जीरन् वाग्यताः शिष्टा न ब्रूयुः प्राकृतान् गुणान् ।<br>तावद्धि पितरोऽश्नन्ति यावन्नोक्ता हविर्गुणाः ॥ ६५ ॥पितर तभीतक भोजन करते हैं, जबतक भोज्य पदार्थके गुणोंका वर्णन नहीं होता ॥ ६४-६५॥