भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • अध्याय २० * । ३५१
न शीर्णायां तु खट्वायाँ शून्यागारे न चैव हि।<br>नानुवंशं न पालाशे शयनं वा कदाचन ॥ २९॥<br>इत्येतदखिलेनोक्तमहन्यहनि वै मया।<br>ब्राह्मणानां कृत्यजातमपवर्गफलप्रदम् ॥ ३०॥<br><br>नास्तिक्यादथवालस्यात् ब्राह्मणो न करोति यः।<br>स याति नरकान् घोरान् काकयोनौ च जायते ॥ ३१॥<br><br>नान्यो विमुक्तये पन्था मुक्त्वाश्रमविधिं स्वकम्।<br>तस्मात् कर्माणि कुर्वीत तुष्टये परमेष्ठिनः ॥ ३२॥टूटी-फूटी चारपाईपर, सूनसान घरमें तथा बाँस या पलाससे बनी खाटपर कभी नहीं सोना चाहिये। इस प्रकार मैंने ब्राह्मणों (द्विजों)-के मोक्षदायक प्रतिदिन किये जानेवाले सम्पूर्ण कृत्यों (दैनिक कर्मों)-का पूर्णरूपसे वर्णन किया। जो ब्राह्मण (द्विज) नास्तिकता अथवा आलस्यके कारण इन कर्मोंको नहीं करता, वह घोर नरकोंमें जाता है और काकयोनिमें जन्म लेता है। अपने आश्रमकी विधिको छोड़कर अन्य कोई दूसरा मुक्तिका मार्ग नहीं है। इसलिये परमेष्ठी (परब्रह्म)-की प्रसन्नताके लिये (विहित) कर्मोंको करना चाहिये॥ २९-३२॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९ ॥ इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें उन्नीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १९ ॥


बीसवाँ अध्याय

श्राद्ध-प्रकरण—श्राद्धके प्रशस्त दिन, विभिन्न तिथियों, नक्षत्रों और वारोंमें किये जानेवाले श्राद्धोंका विभिन्न फल, श्राद्धके आठ भेद, श्राद्धके लिये प्रशस्त स्थान, श्राद्धमें विहित तथा निषिद्ध पदार्थ

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
अथ श्राद्धममावास्यां प्राप्य कार्यं द्विजोत्तमैः।<br>पिण्डान्वाहार्यकं भक्त्या भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥ १॥<br><br>पिण्डान्वाहार्यकं श्राद्धं क्षीणे राजनि शस्यते।<br>अपराह्ने द्विजातीनां प्रशस्तेनामिषेण च॥ २॥<br><br>प्रतिपत्प्रभृति ह्यन्यास्तिथयः कृष्णपक्षके।<br>चतुर्दशीं वर्जयित्वा प्रशस्ता ह्युत्तरोत्तराः॥ ३॥<br><br>अमावास्याष्टकास्तिस्रः पौषमासादिषु त्रिषु।<br>तिस्रश्चान्वष्टकाः पुण्या माघी पञ्चदशी तथा॥ ४॥<br><br>त्रयोदशी मघायुक्ता वर्षासु तु विशेषतः।<br>शस्यपाकश्चाद्धकाला नित्याः प्रोक्ता दिने दिने॥ ५॥द्विजोत्तमोंको अमावास्या आनेपर भक्तिपूर्वक भोग और मोक्षरूप फल प्रदान करनेवाला पिण्डान्वाहार्यक* नामक श्राद्ध करना चाहिये। चन्द्रमाके क्षीण होनेपर अर्थात् अमावास्या तिथिके अपराह्न-कालमें द्विजातियोंके लिये पिण्डान्वाहार्यक श्राद्ध करना प्रशस्त होता है॥ १-२॥<br><br>कृष्णपक्षमें चतुर्दशीको छोड़कर प्रतिपदादि अन्य तिथियाँ उत्तरोत्तर प्रशस्त हैं। पौष, माघ तथा फाल्गुन मासकी तीनों अष्टकाएँ (तीनों कृष्णाष्टमी) और अमावास्या, तीनों अन्वष्टकाएँ (नवमी) और माघ मासकी पूर्णिमा तिथि (श्राद्धके लिये) पुण्य तिथियाँ हैं। वर्षा-ऋतुमें मघा नक्षत्रयुक्त त्रयोदशी तिथि और फसलके पकनेका समय विशेषरूपसे श्राद्ध करनेका काल होता है। ये सभी श्राद्ध नित्य और प्रतिदिन किये जानेवाले नित्यश्राद्ध हैं॥ ३-५॥

* मनुस्मृति (३। १२२)-के अनुसार पिण्डान्वाहार्यक एक स्वतन्त्र श्राद्ध है। इसे अग्निहोत्री लोग ही कर सकते हैं। यह पिण्ड पितृयज्ञके बाद किया जाता है, इसलिये इसका नाम पिण्डान्वाहार्यक है। यह प्रतिमास किया जाता है। यह नित्यश्राद्ध है।