भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 362, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 362
३५२* कूर्मपुराण *
नैमित्तिकं तु कर्तव्यं ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः।<br>बान्धवानां च मरणे नारकी स्यादतोऽन्यथा॥ ६ ॥चन्द्र और सूर्यके ग्रहणकाल तथा बान्धवोंके मरनेपर नैमित्तिक श्राद्ध करना चाहिये। ऐसा न करनेपर नारकीय गति प्राप्त होती है। ग्रहण आदिके समय किये गये काम्य श्राद्ध प्रशस्त माने गये हैं। उत्तरायण एवं दक्षिणायनके समय, विषुव तथा व्यतीपात योगमें किया हुआ श्राद्ध भी अनन्त फल देनेवाला होता है। संक्रान्ति तथा जन्मके समय किया गया श्राद्ध अक्षय होता है। सभी नक्षत्रोंमें विशेषरूपसे काम्य श्राद्ध करना चाहिये॥ ६-८॥
काम्यानि चैव श्राद्धानि शस्यन्ते ग्रहणादिषु।<br>अयने विषुवे चैव व्यतीपातेऽप्यनन्तकम्॥ ७ ॥
संक्रान्त्यामक्षयं श्राद्धं तथा जन्मदिनेष्वपि।<br>नक्षत्रेषु च सर्वेषु कार्यं काम्यं विशेषतः॥ ८ ॥
स्वर्गं च लभते कृत्वा कृत्तिकासु द्विजोत्तमः।<br>अपत्यमथ रोहिण्यां सौम्ये तु ब्रह्मवर्चसम्॥ ९ ॥श्रेष्ठ द्विज कृत्तिका नक्षत्रमें श्राद्ध कर स्वर्ग प्राप्त करता है। रोहिणीमें श्राद्ध करनेसे संतान और मृगशिरा नक्षत्रमें श्राद्ध करनेसे ब्रह्मतेजकी प्राप्ति होती है। आर्द्रा नक्षत्रमें श्राद्ध करनेसे रौद्र कर्मोंकी सिद्धि तथा शौर्यकी प्राप्ति होती है। पुनर्वसु नक्षत्रमें भूमि और पुष्य नक्षत्रमें लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। आश्लेषा नक्षत्रमें (श्राद्ध करनेसे) सभी कामनाओं और मघा नक्षत्रमें सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। इसी प्रकार उत्तराफाल्गुनीमें धनकी प्राप्ति होती है और पूर्वाफाल्गुनीमें पापका नाश होता है। हस्त नक्षत्रमें किये गये श्राद्धसे अपनी जातिमें श्रेष्ठता और चित्रा नक्षत्रमें बहुतसे पुत्रोंकी प्राप्ति होती है। स्वातीमें व्यापारकी सिद्धि और विशाखामें सुवर्णकी प्राप्ति होती है। अनुराधामें श्राद्ध करनेसे बहुतसे मित्रोंकी तथा ज्येष्ठामें राज्यकी प्राप्ति होती है। मूल नक्षत्रमें कृषि तथा पूर्वाषाढ़ामें समुद्रतककी सफल यात्रा होती है। उत्तराषाढ़ामें सभी कामनाओंकी सिद्धि और श्रवण नक्षत्रमें श्राद्ध करनेसे श्रेष्ठता प्राप्त होती है। धनिष्ठामें सभी कामनाओं और शतभिषामें परम बलकी प्राप्ति होती है। पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रमें श्राद्ध करनेसे कुप्य अर्थात् सोना-चाँदीसे भिन्न धातुएँ और उत्तराभाद्रपदमें शुभ गृह प्राप्त होता है। रेवती नक्षत्रमें किये गये श्राद्धसे बहुत-सी गौएँ और अश्विनीमें श्राद्ध करनेसे घोड़ोंकी प्राप्ति होती है। भरणी नक्षत्रमें यदि श्राद्ध किया जाय तो आयुकी प्राप्ति होती है॥ ९-१५॥
रौद्राणां कर्मणां सिद्धिमाद्र्रायां शौर्यमेव च।<br>पुनर्वसौ तथा भूमिं श्रियं पुष्ये तथैव च॥ १० ॥
सर्वान् कामांस्तथा सार्पे पित्र्ये सौभाग्यमेव च।<br>अर्यम्णे तु धनं विन्द्यात् फाल्गुन्यां पापनाशनम्॥ ११ ॥
ज्ञातिश्रैष्ठ्यं तथा हस्ते चित्रायां च बहून् सुतान्।<br>वाणिज्यसिद्धिं स्वातौ तु विशाखासु सुवर्णकम्॥ १२ ॥
मैत्रे बहूनि मित्राणि राज्यं शाक्रे तथैव च।<br>मूले कृषिं लभेद यानसिद्धिमाप्ये समुद्रतः॥ १३ ॥
सर्वान् कामान् वैश्वदेवे श्रेष्ठ्यं तु श्रवणे पुनः।<br>श्रविष्ठायां तथा कामान् वारुणे च परं बलम्॥ १४ ॥
अजैकपादे कुप्यं स्यादहिर्बुध्न्ये गृहं शुभम्।<br>रेवत्यां बहवो गावो ह्याश्विन्यां तुरगांस्तथा।<br>याम्येऽथ जीवनं तत् स्याद्यदि श्राद्धं प्रयच्छति॥ १५ ॥
आदित्यवारे त्वारोग्यं चन्द्रे सौभाग्यमेव च।<br>भौमे सर्वत्र विजयं सर्वान् कामान् बुधस्य तु॥ १६ ॥रविवारको (श्राद्ध करनेसे) आरोग्य, सोमवारको सौभाग्य, मंगलवारको सर्वत्र विजय और बुधवारको श्राद्धसे सभी कामनाओंकी सिद्धि होती है। बृहस्पतिवारके दिन श्राद्धसे अभीष्ट विद्या, शुक्रवारके दिन श्राद्धसे धन और शनैश्चरको (श्राद्ध करनेसे) आयु प्राप्त होती है।
विद्यामभीष्टां जीवे तु धनं वै भार्गवे पुनः।<br>शनैश्चरे लभेदायूः प्रतिपत्सु सुतान् शुभान्॥ १७ ॥