संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय २० * | ३५३ |
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| कन्यकां वै द्वितीयायां तृतीयायां तु वन्दिनः।<br>पशून् क्षुद्रांश्चतुर्थ्यां तु पञ्चम्यां शोभनान् सुतान्॥ १८ ॥<br><br>षष्ठ्यां द्यूतं कृषिं चापि सप्तम्यां लभते नरः।<br>अष्टम्यामपि वाणिज्यं लभते श्राद्धदः सदा॥ १९ ॥<br><br>स्यान्नवम्यामेकखुरं दशम्यां द्विखुरं बहु।<br>एकादश्यां तथा रूप्यं ब्रह्मवर्चस्विनः सुतान्॥ २० ॥<br><br>द्वादश्यां जातरूपं च रजतं कुप्यमेव च।<br>ज्ञातिश्रैष्ठ्यं त्रयोदश्यां चतुर्दश्यां तु कुप्रजाः।<br>पञ्चदश्यां सर्वकामानाप्नोति श्राद्धदः सदा॥ २१ ॥<br>तस्माच्छ्राद्धं न कर्तव्यं चतुर्दश्यां द्विजातिभिः।<br>शस्त्रेण तु हतानां वै तत्र श्राद्धं प्रकल्पयेत्॥ २२ ॥<br><br>द्रव्यब्राह्मणसम्पत्तौ न कालनियमः कृतः।<br>तस्माद् भोगापवर्गार्थं श्राद्धं कुर्युर्द्विजातयः॥ २३ ॥<br>कर्मारम्भेषु सर्वेषु कुर्यादाभ्युदयं पुनः।<br>पुत्रजन्मादिषु श्राद्धं पार्वणं पर्वणि स्मृतम्॥ २४ ॥<br><br>अहन्यहनि नित्यं स्यात् काम्यं नैमित्तिकं पुनः।<br>एकोद्दिष्टादि विज्ञेयं वृद्धिश्राद्धं तु पार्वणम्॥ २५ ॥<br><br>एतत् पञ्चविधं श्राद्धं मनुना परिकीर्तितम्।<br>यात्रायां षष्ठमाख्यातं तत्प्रयत्नेन पालयेत्॥ २६ ॥<br><br>शुद्धये सप्तमं श्राद्धं ब्रह्मणा परिभाषितम्।<br>दैविकं चाष्टमं श्राद्धं यत्कृत्वा मुच्यते भयात्॥ २७ ॥<br><br>संध्यारात्र्योर्न कर्तव्यं राहोरन्यत्र दर्शनात्।<br>देशानां च विशेषेण भवेत् पुण्यमनन्तकम्॥ २८ ॥ | प्रतिपदा तिथिको (श्राद्ध करनेसे) शुभ पुत्र प्राप्त होते हैं। द्वितीयामें श्राद्धसे कन्या, तृतीयामें वन्दीजनों, चतुर्थीमें क्षुद्र पशु और पञ्चमीको श्राद्ध करनेसे सुन्दर पुत्रोंकी प्राप्ति होती है। षष्ठीमें श्राद्ध करनेसे द्यूत (-में विजय) और सप्तमीमें श्राद्धसे कृषिकी प्राप्ति होती है। अष्टमीको श्राद्ध करनेवाला सदा वाणिज्य (-में लाभ) प्राप्त करता है। नवमीमें श्राद्धसे एक खुरवाले और दशमीमें श्राद्ध करनेसे दो खुरवाले बहुतसे पशु मिलते हैं। एकादशीको (श्राद्ध करनेसे) रौप्य (रजत) पदार्थ तथा ब्रह्मवर्चस्वी पुत्रोंकी प्राप्ति होती है। द्वादशीको (श्राद्ध करनेसे) जातरूप (स्वर्ण), चाँदी तथा कुप्य, त्रयोदशीको जातिमें श्रेष्ठता और चतुर्दशीको श्राद्ध करनेसे कुप्रजाकी प्राप्ति होती है। पञ्चदशी (पूर्णिमा एवं अमावास्या)-को श्राद्ध करनेवाला सदा सभी कामनाओंको प्राप्त करता है॥ १६-२१॥<br><br>इसलिये द्विजातियोंको चतुर्दशीके दिन श्राद्ध नहीं करना चाहिये। शस्त्र (आदि)-द्वारा जो मरे हुए हों, उनका श्राद्ध (इस चतुर्दशी तिथिको) करना चाहिये। द्रव्य एवं ब्राह्मणके उपलब्ध रहनेपर कालसम्बन्धी कोई नियम नहीं बताया गया है (अर्थात् कभी भी श्राद्ध किया जा सकता है)। इसलिये भोग और मोक्षकी प्राप्तिके लिये द्विजातियोंको श्राद्ध (अवश्य) करना चाहिये॥ २२-२३॥<br><br>सभी (शुभ) कर्मोंके प्रारम्भमें तथा पुत्रजन्म आदि समयोंमें आभ्युदयिक श्राद्ध करना चाहिये। पर्वके दिन पार्वण श्राद्ध करना चाहिये। मनुने प्रतिदिन किये जानेवाले नित्यश्राद्ध, काम्य-श्राद्ध (कामनाविशेषकी सिद्धिके लिये किया जानेवाला श्राद्ध), एकोद्दिष्टादि नैमित्तिक श्राद्ध, वृद्धिश्राद्ध और पार्वण श्राद्ध—इन पाँच प्रकारके श्राद्धोंका वर्णन किया है। यात्राके समय (किया जानेवाला) छठा श्राद्ध कहा गया है, उसे प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये। ब्रह्माने शुद्धिके लिये सातवें श्राद्धका वर्णन किया है। आठवाँ दैविक नामक श्राद्ध है, जिसे करनेसे भयसे मुक्ति हो जाती है। संध्या और रात्रिमें श्राद्ध नहीं करना चाहिये। किंतु राहु और केतुद्वारा सूर्य-चन्द्रके ग्रस्त किये जानेपर रात्रिमें भी श्राद्ध किया जा सकता है। देशविशेषके कारण श्राद्ध अनन्त पुण्य फल देनेवाला होता है॥ २४-२८॥ |