भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३५० * कूर्मपुराण *


यदभुङ्क्ते वेष्टितशिरा यच्च भुङ्क्ते उदङ्मुखः।<br>सोपानत्कश्च यद् भुङ्क्ते सर्वं विद्यात् तदासुरम्॥ १९॥जो सिर ढककर भोजन करता है, उत्तरकी ओर मुख करके भोजन करता है और जूता पहनकर भोजन करता है, उसके इस प्रकार किये गये भोजनको आसुरी भोजन समझना चाहिये। ठीक अर्धरात्रि, ठीक मध्याह्न, अजीर्ण होनेपर, गीले वस्त्र धारणकर, दूसरेके लिये निर्दिष्ट आसनपर, सोते हुए, खड़े होकर, टूटे-फूटे पात्रमें, भूमिपर तथा हाथपर भोजन नहीं करना चाहिये। जूठे होकर न तो घृत ग्रहण करे और न सिरका ही स्पर्श करे॥ १९-२१॥
नार्धरात्रे न मध्याह्ने नाजीर्णे नार्द्रवस्त्रधृक्।<br>न च भिन्नासनगतो न शयानः स्थितोऽपि वा॥ २०॥
न भिन्नभाजने चैव न भूम्यां न च पाणिषु।<br>नोच्छिष्टो घृतमादद्यान्न मूर्धानं स्पृशेदपि॥ २१॥
न ब्रह्म कीर्तयन् वापि न निःशेषं न भार्यया।<br>नान्धकारे न चाकाशे न च देवालयादिषु॥ २२॥(भोजन करते हुए) वेदका उच्चारण नहीं करना चाहिये और बिना कुछ* भोजन छोड़े ही अर्थात् पूर्ण भोजन न करे तथा भार्याके साथ भी भोजन न करे। न अन्धकारमें, न आकाशके नीचे (शून्य स्थानमें), न देवमन्दिरोंमें ही भोजन करे। एक वस्त्र पहनकर, सवारी या शय्यापर बैठकर भोजन नहीं करना चाहिये। बिना खड़ाऊँ उतारे और हँसते हुए तथा रोते हुए भी भोजन नहीं करना चाहिये॥ २२-२३॥
नैकवस्त्रस्तु भुञ्जीत न यानशयनस्थितः।<br>न पादुकानिर्गतोऽथ न हसन् विलपन्नपि॥ २३॥
भुक्त्वैवं सुखमास्थाय तदन्नं परिणामयेत्।<br>इतिहासपुराणाभ्यां वेदार्थानुपबृंहयेत्॥ २४॥इस प्रकार भोजन करके सुखपूर्वक बैठकर उस अन्नको पचाना चाहिये और इतिहास तथा पुराणोंके द्वारा वेदके रहस्योंको विस्तारपूर्वक समझना चाहिये। तदनन्तर द्विजको पूर्वमें बतलायी गयी विधिके अनुसार संध्योपासना करनी चाहिये। पश्चिमकी ओर मुख करते हुए आसनपर बैठकर गायत्री देवीका जप करना चाहिये। जो व्यक्ति पूर्वकी अर्थात् प्रातःकालकी और पश्चिमकी अर्थात् सायंकालकी संध्या नहीं करता है, वह सभी धर्मोंसे रहित होता हुआ लोकमें शूद्रके समान होता है॥ २४-२६॥
ततः संध्यामुपासीत पूर्वोक्तविधिना द्विजः।<br>आसीनस्तु जपेद् देवीं गायत्रीं पश्चिमां प्रति॥ २५॥
न तिष्ठति तु यः पूर्वा नास्ते संध्यां तु पश्चिमाम्।<br>स शूद्रेण समो लोके सर्वधर्मविवर्जितः॥ २६॥
हुत्वाग्निं विधिवन्मन्त्रैर्भुक्त्वा यज्ञावशिष्टकम्।<br>सभृत्यबान्धवजनः स्वपेच्छुष्कपदो निशि॥ २७॥मन्त्रोंके द्वारा विधिपूर्वक अग्निमें हवन करके यज्ञसे बचे अन्नको बन्धु-बान्धव तथा भृत्यजनोंके साथ ग्रहणकर रात्रिमें सूखे पैर होकर (अर्थात् गीला पैर न रहे) शयन करना चाहिये। न तो उत्तरकी ओर सिर करके और न पश्चिमकी ओर सिर करके सोना चाहिये। खुले आकाशके नीचे (अथवा शून्य स्थानमें), नग्न होकर, अपवित्र अवस्थामें और बैठनेके आसनपर कभी नहीं सोना चाहिये॥ २७-२८॥
नोत्तराभिमुखः स्वप्यात् पश्चिमाभिमुखो न च।<br>न चाकाशे न नग्नो वा नाशुचिर्नासने क्वचित्॥ २८॥

* गृहस्थको भोज्य पदार्थ यथायोग्य अवशिष्ट रखकर भोजन करना चाहिये। इसका आशय यह है कि भोजन कर लेनेके अनन्तर यदि कोई ऐसा व्यक्ति आ जाय, जिसे स्वयं भोजन कर लेनेके बाद भी उसकी अपेक्षाके अनुसार भोजन कराया जा सके, जिससे भोज्य पदार्थके अभावमें वह भूखा न रह जाय।