संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय १९ * | ३४९ |
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| शेषमन्नं यथाकामं भुञ्जीतव्यं जनैर्युतम्।<br>ध्यात्वा तन्मनसा देवमात्मानं वै प्रजापतिम्॥ ८॥<br><br>अमृतापिधानमसीत्युपरिष्टादपः पिबेत्।<br>आचान्तः पुनराचामेदायं गौरिति मन्त्रतः॥ ९॥<br><br>द्रुपदां वा त्रिरावर्त्य सर्वपापप्रणाशिनीम्।<br>प्राणानां ग्रन्थिरसीत्यालभेद हृदयं ततः॥ १०॥<br>आचम्याङ्गुष्ठमात्रेति पादाङ्गुष्ठेऽथ दक्षिणे।<br>निःस्रावयेद् हस्तजलमूर्ध्वहस्तः समाहितः॥ ११॥<br><br>हुतानुमन्त्रणं कुर्यात् श्रद्धायामिति मन्त्रतः।<br>अथाक्षरेण स्वात्मानं योजयेद् ब्रह्मणोति हि॥ १२॥<br><br>सर्वेषामेव यागानामात्मयागः परः स्मृतः।<br>योऽनेन विधिना कुर्यात् स याति ब्रह्मणः क्षयम्॥ १३॥<br>यज्ञोपवीती भुञ्जीत स्रग्गन्धालङ्कृतः शुचिः।<br>सायंप्रातर्नान्तरा वै संध्यायां तु विशेषतः॥ १४॥<br><br>नाद्यात् सूर्यग्रहात् पूर्वमह्नि सायं शशिग्रहात्।<br>ग्रहकाले च नाश्नीयात् स्नात्वाश्नीयात् तु मुक्तयोः॥ १५॥<br><br>मुक्ते शशिनि भुञ्जीत यदि न स्यान्महानिशा।<br>अमुक्तयोरस्तंगतयोर्दृष्ट्वा दृष्ट्वा परेऽहनि॥ १६॥<br>नाश्नीयात् प्रेक्षमाणानामप्रदायैव दुर्मतिः।<br>न यज्ञशिष्टादन्यद् वा न क्रुद्धो नान्यमानसः॥ १७॥<br><br>आत्मार्थं भोजनं यस्य रत्यर्थं यस्य मैथुनम्।<br>वृत्त्यर्थं यस्य चाधीतं निष्फलं तस्य जीवितम्॥ १८॥ | फिर देव प्रजापति तथा आत्माका मनसे ध्यान करते हुए अवशिष्ट अन्न (भोजन)-का बन्धुओंके साथ इच्छानुसार भोजन करना चाहिये। (भोजन कर लेनेके बाद) 'अमृतापिधानमसि' यह मन्त्र पढ़कर जल पीना (आचमन करना) चाहिये। आचमनके उपरान्त पुनः 'आयं गौः*०' इस मन्त्रको पढ़ते हुए आचमन करना चाहिये। तदनन्तर सभी प्रकारके पापोंका नाश करनेवाली 'द्रुपदा०' का तीन बार पाठकर 'प्राणानां ग्रन्थिरसि' इस मन्त्रसे हृदयका स्पर्श करे॥ ८-१०॥<br><br>ऊपर हाथ किये हुए समाहितमन होकर आचमन करके 'अङ्गुष्ठमात्रेति' मन्त्रद्वारा दाहिने पैरके अँगुठेपर हाथका जल गिराना चाहिये। 'श्रद्धायाम्०' इस मन्त्रसे हुतानुमन्त्रण करे। तदनन्तर 'ब्रह्मण०' इस मन्त्रसे अपनी आत्माका अक्षर-तत्त्वसे योग करना चाहिये। सभी यागोंमें आत्मयाग श्रेष्ठ कहा गया है। जो इस विधिसे (आत्मयाग) करता है, वह ब्रह्मधाममें जाता है॥ ११-१३॥<br><br>यज्ञोपवीती होकर अर्थात् सव्य होकर तथा माला (एवं चन्दनकी) सुगन्धिसे अलंकृत होकर पवित्रतापूर्वक भोजन करना चाहिये। सायंकाल, प्रातःकाल, मध्याह्नकाल और विशेषरूपसे संध्याकाल (प्रदोषकाल)-के समय भोजन नहीं करना चाहिये। सूर्यग्रहणसे पहले दिनमें, चन्द्रग्रहणसे पूर्व सायंकालमें तथा ग्रहणकालमें भोजन नहीं करना चाहिये। ग्रहणकी मुक्ति हो जानेपर स्नान करनेके अनन्तर भोजन करना चाहिये। चन्द्रमाके ग्रहणसे मुक्त हो जानेपर यदि अर्धरात्रि न हो तो भोजन करना चाहिये। बिना ग्रहणसे मुक्त हुए चन्द्रमा और सूर्य दोनोंके अस्त हो जानेपर दूसरे दिन उनका दर्शन करके भोजन करना चाहिये॥ १४-१६॥<br><br>देखनेवालों (भूखे व्यक्तियों)-को बिना दिये हुए तथा दुर्मना होकर भोजन नहीं करना चाहिये। यज्ञसे अवशिष्ट अन्नसे भिन्न अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिये। अन्यमनस्क होकर तथा क्रुद्ध होकर भोजन नहीं करना चाहिये। जो केवल अपने लिये ही भोजन बनाता है, जो केवल कामसुखके लिये ही मैथुन करता है और जो केवल आजीविका प्राप्त हो जाय-इस उद्देश्यसे अध्ययन करता है, उसका जीवन निष्फल ही है॥ १७-१८॥ |
- आयं गौः पृश्निरक्रमीदसदनू मातरं पुरः। पितरं च प्रयन्त्स्वः। (यजु० ३। ६)