भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३४८ * कूर्मपुराण *


तस्मात् सर्वप्रयत्नेन कृत्वा कर्माणि वै द्विजाः।<br>भुञ्जीत स्वजनैः सार्धं स याति परमां गतिम्॥ १२१॥द्विजो! इसलिये सभी प्रकारके प्रयत्नोंके द्वारा (नित्य) (अपने अधिकारानुसार शास्त्रविहित) कर्मोंको (श्रद्धापूर्वक) करनेके बाद स्वजनोंके साथ भोजन करना चाहिये। ऐसा करनेवाला परमगति प्राप्त करता है॥ १२१॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे अष्टादशोऽध्यायः॥ १८॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें अठारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १८॥


उन्नीसवाँ अध्याय

भोजन-विधि, ग्रहणकालमें भोजनका निषेध, शयन-विधि, गृहस्थके नित्यकर्मोंके अनुष्ठानका महत्त्व

व्यास उवाचव्यासजीने कहा—पवित्र आसनपर बैठकर पाँवोंको भूमिपर रखकर पूर्वकी ओर अथवा सूर्याभिमुख होकर अन्न (भोजन) ग्रहण करना चाहिये। पूर्वाभिमुख होकर भोजन करनेसे लम्बी आयु, दक्षिणाभिमुख होकर भोजन करनेसे यश, पश्चिमाभिमुख होकर भोजन करनेसे सम्पत्ति और उत्तरकी ओर मुख करके भोजन करनेसे सत्यकी प्राप्ति होती है॥ १-२॥
प्राङ्मुखोऽन्नानि भुञ्जीत सूर्याभिमुख एव वा।<br>आसीनस्त्वासने शुद्धे भूम्यां पादौ निधाय तु॥ १॥<br><br>आयुष्यं प्राङ्मुखो भुङ्क्ते यशस्यं दक्षिणामुखः।<br>श्रियं प्रत्यङ्मुखो भुङ्क्ते ऋतं भुङ्क्ते उदङ्मुखः॥ २॥
पञ्चार्द्रो भोजनं कुर्याद् भूमौ पात्रं निधाय तु।<br>उपवासेन तत्तुल्यं मनुराह प्रजापतिः॥ ३॥<br><br>उपलिप्ते शुचौ देशे पादौ प्रक्षाल्य वै करौ।<br>आचम्यार्द्राननोऽक्रोधः पञ्चार्द्रो भोजनं चरेत्॥ ४॥<br><br>महाव्याहृतिभिस्त्वन्नं परिधायोदकेन तु।<br>अमृतोपस्तरणमसीत्यापोशानक्रियां चरेत्॥ ५॥पाँचों अङ्गों (दोनों हाथ, दोनों पैर तथा मुख)-का प्रक्षालनकर (भोजन) पात्रको भूमिपर रखकर भोजन करना चाहिये। प्रजापति मनुने इस प्रकारके भोजनको उपवासके समान बताया है। दोनों हाथ, पैर एवं मुखको धोनेके बाद आचमनकर (गोबर इत्यादिसे) लीपे गये पवित्र स्थानमें (बैठकर) क्रोधरहित होकर भोजन करना चाहिये। महाव्याहृतियोंका उच्चारण करते हुए जलसे अन्नको परिवेष्टितकर 'अमृतोपस्तरणमसि' ऐसा कहकर आपोशान¹ (आचमन) क्रिया (सम्पन्न) करे॥ ३-५॥
स्वाहाप्रणवसंयुक्तां प्राणायाद्याहुतिं ततः।<br>अपनाय ततो हुत्वा व्यानाय तदनन्तरम्॥ ६॥<br><br>उदानाय ततः कुर्यात् समानायेति पञ्चमीम्।<br>विज्ञाय तत्त्वमेतेषां जुहुयादात्मनि द्विजः॥ ७॥तदनन्तर स्वाहा एवं प्रणवके साथ 'प्राणाय' का उच्चारण कर (ॐ प्राणाय स्वाहा) कहकर पहली आहुति देनी चाहिये। तदुपरान्त 'ॐ अपानाय स्वाहा' और फिर 'ॐ व्यानाय स्वाहा', पुनः 'ॐ उदानाय स्वाहा' और अन्तमें 'ॐ समानाय स्वाहा' कहकर पाँचवीं आहुति देनी चाहिये। इनका रहस्य समझते हुए द्विजको आत्मामें आहुति देनी चाहिये²॥ ६-७॥

१-भोजनके आरम्भ एवं अन्तमें आपोशान (आचमन) करके अन्नको अनग्र एवं अमृत किया जाता है।
२-आत्मामें आहुति देनेकी भावनासे भोजनके प्रारम्भमें छोटे-छोटे पाँच ग्रास मुखमें 'प्राणाय स्वाहा' आदि पाँच मन्त्रोंसे देना चाहिये।