संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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- अध्याय २२ * ३६५
| सोमाय वै पितृमते स्वधा नम इति ब्रुवन्।<br>अग्नये कव्यवाहाय स्वधेति जुहुयात् ततः॥ ४७ ॥ | तब ‘सोमाय वै पितृमते स्वधा नमः’ इस मन्त्रका उच्चारणकर ‘अग्नये कव्यवाहनाय स्वधा’ ऐसा कहकर हवन करे॥ ४७ ॥ |
| अग्न्यभावे तु विप्रस्य पाणावेवोपपादयेत्।<br>महादेवान्तिके वाथ गोष्ठे वा सुसमाहितः ॥ ४८ ॥ | अग्निके अभाव होनेपर सावधानचित्त होकर ब्राह्मणके हाथपर, महादेवके समीप अथवा गोशालामें हवनीय द्रव्य रखना चाहिये। |
| ततस्तैरभ्यनुज्ञातो गत्वा वै दक्षिणां दिशम्।<br>गोमयेनोपलिप्योर्वी स्थानं कृत्वा तु सैकतम् ॥ ४९ ॥<br><br>मण्डलं चतुरस्रं वा दक्षिणावनतं शुभम्।<br>त्रिरुल्लिखेत् तस्य मध्यं दर्भेणैकेन चैव हि ॥ ५० ॥<br><br>ततः संस्तीर्य तत्स्थाने दर्भान् वै दक्षिणाग्रकान्।<br>त्रीन् पिण्डान् निर्वपेत् तत्र हविः शेषात् समाहितः ॥ ५१ ॥ | तदनन्तर उनकी आज्ञा प्राप्तकर दक्षिण दिशामें जाकर भूमिको गोमय (गोबर)-से लीपकर उस स्थानमें बालू बिछाये। तदनन्तर उस स्थानपर दक्षिणकी ओर झुकी हुई गोल अथवा चौकोर शुभ (बालुकामय) बेदी बनाये, उस बेदीके बीचमें एक कुशसे तीन रेखा खींचे और उस स्थान (बेदी)-पर दक्षिणाग्र कुशोंको बिछाकर हविके बचे हुए अंशसे निर्मित तीन पिण्ड उस (बेदी)-पर प्रदान करे॥ ४८-५१॥ |
| न्युप्य पिण्डांस्तु तं हस्तं निमृज्याल्लेपभागिनाम्।<br>तेषु दर्भेष्वथाचम्य त्रिरायम्य शनैरसूनू।<br>तदन्नं तु नमस्कुर्यात् पितॄनेव च मन्त्रवित् ॥ ५२ ॥ | पिण्ड-प्रदानके अनन्तर लेपभागके अधिकारी* पितरोंके लिये पिण्डाधार-कुशोंके मूलमें उस (पिण्ड-शेषसे संसृष्ट) हाथका प्रोक्षण करे। तदनन्तर मन्त्रवेत्ताको चाहिये कि आचमन करे और धीरे-धीरे श्वास खींचकर अपने बायेंसे पीछे मुख करके धीरे-धीरे श्वास छोड़ते हुए पिण्डोंके सामने अपना मुख कर पूरा श्वास छोड़े तथा उस अन्न एवं पितरोंको नमस्कार करे। पुनः पिण्डके समीप (ऊपर) धीरे-धीरे (अर्घपात्रका) शेष जल छोड़े (इसे अवनेजन कहते हैं)। |
| उदकं निनयेच्छेषं शनैः पिण्डान्तिके पुनः।<br>अवजिघ्रेच्च तान् पिण्डान् यथान्युप्तान् समाहितः ॥ ५३ ॥ | तदनन्तर सावधानीके साथ रखे हुए उन पिण्डोंको झुककर क्रमानुसार सूंघे (और पाकपात्रमें रख दे)॥ ५२-५३॥ |
| अथ पिण्डावशिष्टान्नं विधिना भोजयेद् द्विजान्।<br>मांसान्यपूपान् विविधान् दद्यात् कृसरपायसम् ॥ ५४ ॥<br><br>सूपशाकफलानीक्षून् पयो दधि घृतं मधु।<br>अन्नं चैव यथाकामं विविधं भक्ष्यपेयकम् ॥ ५५ ॥ | पिण्डदानसे बचा हुआ अन्न ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक खिलाना चाहिये। पूआ, कृसर, पायस (तिलके साथ पकाये चावलकी खीर), सूप, शाक, फल, ईख, दूध, दही, घृत, मधु, अन्न तथा अनेक प्रकारके खाने और पीने योग्य पदार्थ उनकी (ब्राह्मणोंकी) रुचिके अनुसार खिलाने चाहिये॥ ५४-५५॥ |
| यद यदिष्टं द्विजेन्द्राणां तत्सर्वं विनिवेदयेत्।<br>धान्यांस्तिलांश्च विविधान् शर्करा विविधास्तथा ॥ ५६ ॥ | श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको जो-जो रुचिकर हो (और श्राद्धमें विहित हो) वह सब देना चाहिये। साथ ही अनेक प्रकारके धान्य, तिल तथा शर्कराका दान करना चाहिये॥ ५६॥ |
* पितामहके ऊपरके प्रपितामह आदि तीसरी परम्परासे आगेके सभी पितर पिण्डके अधिकारी नहीं होते हैं, अपितु पिण्ड बनाते समय हाथमें जो पिण्डका शेष अन्न संसृष्ट (लगा) रहता है, उसीको ग्रहण करनेके अधिकारी होते हैं, अतः प्रपितामहके आगेकी पीढ़ीवाले पितरोंको 'लेपभागभुक्' कहा जाता है। इनकी तृप्ति तभी होती है, जब प्रपितामहतक तीन परम्पराको पिण्ड प्रदान कर लेनेके अनन्तर पिण्डोंके आधारकुशोंके मूलमें उन दोनों हाथोंका प्रोक्षण किया जाय, जिनसे पिण्डोंको बनाया गया है।