संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
पृष्ठ 376, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 376
३६६ * कूर्मपुराण *
| उष्मन्नं द्विजातिभ्यो दातव्यं श्रेय इच्छता ।<br>अन्यत्र फलमूलेभ्यः पानकेभ्यस्तथैव च ॥ ५७ ॥ | कल्याण प्राप्त करनेकी इच्छावाले (श्राद्धकर्ताको चाहिये कि) ब्राह्मणोंको फल, मूल और पानक (विविध स्वादयुक्त पेय पदार्थविशेष)-को छोड़कर अन्य सभी अन्न उष्ण-अवस्थामें (गरम-गरम) प्रदान करे ॥ ५७॥ |
| नाश्रूणि पातयेज्जातु न कुप्येन्नानृतं वदेत्।<br>न पादेन स्पृशेदन्नं न चैतदवधूनयेत् ॥ ५८ ॥ | (श्राद्धकर्ता) कभी भी अश्रुपात न करे, न कोप करे, न झूठ बोले, पाँवसे अन्नको स्पर्श न करे और न अन्नका (पैरोंसे) अवधूनन (मर्दन) करे। |
| क्रोधेन चैव यद् दत्तं यद् भुक्तं त्वरया पुनः ।<br>यातुधाना विलुम्पन्ति जल्पता चोपपादितम् ॥ ५९ ॥ | क्रोध करके जो दिया जाता है, जल्दी-जल्दी जो भोजन किया जाता है और बोलते हुए जो खाया जाता है, उस पदार्थको राक्षस हर लेते हैं। ब्राह्मणोंके समीप स्वेदयुक्त शरीरसे न रहे। श्राद्धस्थलसे श्येन, |
| स्विन्नगात्रो न तिष्ठेत संनिधौ तु द्विजन्मनाम्।<br>न चात्र श्येनकाकादीन् पक्षिणः प्रतिषेधयेत् ।<br>तद्रूपाः पितरस्तत्र समायान्ति बुभुक्षवः ॥ ६० ॥<br>न दद्यात् तत्र हस्तेन प्रत्यक्षलवणं तथा।<br>न चायसेन पात्रेण न चैवाश्रद्धया पुनः ॥ ६१ ॥ | कौआ आदि पक्षियोंको हटाना नहीं चाहिये, क्योंकि (सम्भव है) इनके ही रूपमें पितृगण वहाँ खानेकी इच्छासे आये हों ॥ ५८-६०॥<br>वहाँ (श्राद्धमें) हाथसे प्रत्यक्ष लवण नहीं देना चाहिये। लोहेके पात्रद्वारा और अश्रद्धासे कोई वस्तु नहीं देनी चाहिये। स्वर्ण, रजत या औदुम्बरके पात्रसे तथा विशेष रूपसे खड्ग नामके पात्रविशेषसे दिया |
| काञ्चनेन तु पात्रेण राजतौदुम्बरेण वा।<br>दत्तमक्षयतां याति खड्गेन च विशेषतः ॥ ६२ ॥ | हुआ पदार्थ अक्षय होता है। जो व्यक्ति श्राद्धमें मिट्टीके बर्तनोंमें पितरोंको भोजन कराता है, वह घोर नरकमें जाता है, ऐसे ही भोजन करनेवाले |
| पात्रे तु मृण्मये यो वै श्राद्धे भोजयते पितॄन् ।<br>स याति नरकं घोरं भोक्ता चैव पुरोधसः ॥ ६३ ॥<br>न पंक्त्यां विषमं दद्यान्न याचेन्न च दापयेत्।<br>याचिता दापिता दाता नरकान् यान्ति दारुणान् ॥ ६४ ॥ | ब्राह्मण तथा (श्राद्ध करानेवाले) पुरोहित भी नरकमें जाते हैं ॥ ६१-६३॥<br>एक पंक्तिमें (भोजन करनेवालोंके साथ परोसनेमें) विषम व्यवहार नहीं करना चाहिये। सबको समान रूपसे देना चाहिये। (भोजन करनेवालोंको भी विषम दृष्टिसे) न तो माँगना चाहिये न किसी दूसरेको दिलाना चाहिये, क्योंकि ऐसा (करनेपर) माँगनेवाला, दिलानेवाला और देनेवाला-ये तीनों भीषण नरकोंमें जाते हैं। शिष्ट लोगोंको मौन होकर भोजन करना चाहिये। (अन्नके) प्राकृत गुणोंका वर्णन नहीं करना चाहिये। |
| भुञ्जीरन् वाग्यताः शिष्टा न ब्रूयुः प्राकृतान् गुणान् ।<br>तावद्धि पितरोऽश्नन्ति यावन्नोक्ता हविर्गुणाः ॥ ६५ ॥ | पितर तभीतक भोजन करते हैं, जबतक भोज्य पदार्थके गुणोंका वर्णन नहीं होता ॥ ६४-६५॥ |