संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* अध्याय २२ *
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नाग्रासनोपविष्टस्तु भुञ्जीत प्रथमं द्विजः।
बहूनां पश्यतां सोऽज्ञः पंक्त्या हरति किल्बिषम्॥ ६६॥
न किञ्चिद् वर्जयेच्छ्राद्धे नियुक्तस्तु द्विजोत्तमः।
न मांसं प्रतिषेधेत न चान्यस्यान्नमीक्षयेत्॥ ६७॥
यो नाश्नाति द्विजो मांसं नियुक्तः पितृकर्मणि।
स प्रेत्य पशुतां याति सम्भवानेकविंशतिम्॥ ६८॥
स्वाध्यायं श्रावयेदेषां धर्मशास्त्राणि चैव हि।
इतिहासपुराणानि श्राद्धकल्पांश्च शोभनान्॥ ६९॥
ततोऽन्नमुत्सृजेद् भुक्ते अग्रतो विकिरन् भुवि।
पृष्ट्वा तृप्ताः स्थ इत्येवं तृप्तानाचामयेत् ततः॥ ७०॥
आचान्ताननुजानीयादभितो रम्यतामिति।
स्वधाऽस्त्विति च तं ब्रूयुर्ब्राह्मणास्तदनन्तरम्॥ ७१॥
ततो भुक्तवतां तेषामन्नशेषं निवेदयेत्।
यथा ब्रूयुस्तथा कुर्यादनुज्ञातस्तु वै द्विजैः॥ ७२॥
पित्र्ये स्वदितमित्येव वाक्यं गोष्ठेषु सूनृतम्।
सम्पन्नमित्यभ्युदये दैवे रोचत इत्यपि॥ ७३॥
विसृज्य ब्राह्मणांस्तान् वै दैवपूर्वं तु वाग्यतः।
दक्षिणां दिशमाकाङ्क्षन् याचेतेमान् वरान् पितॄन्॥ ७४॥
अग्रासनपर (प्रथम पंक्तिमें) बैठे हुए किसी एक द्विजको उस पंक्ति या अन्य पंक्तिमें बैठे द्विजों (ब्राह्मणों)-के देखते-देखते (उनके द्वारा भोजन प्रारम्भ करनेके पूर्व) पहले अकेले भोजन आरम्भ नहीं करना चाहिये (अर्थात् अपनी तथा अन्य पंक्तियोंमें बैठे हुए सभी ब्राह्मणोंके साथ ही भोजन आरम्भ करना चाहिये)। क्योंकि ऐसा करनेपर वह अज्ञ (द्विज) पंक्तिमें बैठे हुए देखनेवालोंके पापका भागी होता है। श्राद्धमें नियुक्त श्रेष्ठ द्विजको किसी वस्तुका बहिष्कार नहीं करना चाहिये और दूसरेके अन्नकी ओर नहीं देखना चाहिये। श्राद्धमें भोजन करते हुए ब्राह्मणोंको वेद, धर्मशास्त्र, इतिहास-पुराण तथा शुभ श्राद्धकल्पों (श्राद्धीय नियमों)-को सुनाना चाहिये। ब्राह्मणोंके भोजन कर लेनेपर उनसे 'क्या आप लोग तृप्त हो गये?' इस प्रकार पूछना चाहिये और उनके भोजनपात्रके सम्मुख परिवेषणसे अवशिष्ट अन्नका विकिरण करना चाहिये (साथ ही वृद्ध प्रपितामह आदि लेपभागके अधिकारी पितरोंके लिये श्राद्धीय सिद्ध अन्नका उत्सर्ग करना चाहिये)। तदनन्तर तृप्त ब्राह्मणोंको आचमन कराना चाहिये॥ ६६-७०॥
आचमन कर लेनेपर उन्हें 'चतुर्दिक् रमण करें' ऐसा कहना चाहिये। तब ब्राह्मण उसे 'स्वधाऽस्तु' कहकर आशीर्वाद दें। उनके (ब्राह्मणोंके) भोजन करनेसे शेष बचे अन्नको (उन ब्राह्मणोंको ही) निवेदित करे। अनन्तर वे ब्राह्मण जैसा कहें, वैसा ही उनकी आज्ञासे करे¹॥ ७१-७२॥
पित्र्यकार्य (माता-पिताके एकोद्दिष्ट श्राद्ध)-में 'स्वदितम्', गोष्ठीश्राद्धमें² 'सूनृतम्', आभ्युदयिक³ श्राद्धमें 'सम्पन्नम्' तथा दैव (देवश्राद्ध⁴)-में 'रोचते' ऐसा कहना चाहिये॥ ७३॥
निमन्त्रित ब्राह्मणोंको बिदाकर मौन होकर दैव-कार्य (पूर्वाभिमुख आचमन, विष्णुस्मरण आदि पुनः) करके दक्षिणाभिमुख होकर पितरोंसे इन वरोंकी याचना करे-॥ ७४॥
१-ब्राह्मण-भोजनके अनन्तर 'शेषात्रं किं कर्तव्यम्?' पूछना चाहिये। ब्राह्मणको कहना चाहिये: 'इष्टैः सह भोक्तव्यम्'।
२-बारह श्राद्धोंमें गोष्ठीश्राद्ध विश्वामित्रके द्वारा बताया गया है।
३-आभ्युदयिक श्राद्ध-वृद्धिश्राद्ध (विवाह, यज्ञोपवीत-संस्कार आदिमें करणीय नान्दीश्राद्ध)।
४-भविष्यपुराणमें देवताओंके उद्देश्यसे श्राद्धका विधान है। (द्रष्टव्य मनु० ३। २५४ व्याख्या कुल्लूकभट्टी)