भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 378, कुल 506 में से

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३६८ * कूर्मपुराण *


दातारो नोऽभिवर्धन्तां वेदाः संततिरेव च।<br>श्रद्धा च नो मा व्यगमद् बहुदेयं च नोऽस्त्विति॥ ७५॥हमारे (कुलमें) दान देनेवालोंकी, वेद (ज्ञान)-की तथा संततिकी वृद्धि हो। (शास्त्रों, ब्राह्मणों, पितरों, देवों आदिमें) हमारी श्रद्धा हटे नहीं। मेरे पास दान देनेके लिये बहुतसे पदार्थ हों॥ ७५॥
पिण्डांस्तु गोऽजविप्रेभ्यो दद्यादग्नौ जलेऽपि वा।<br>मध्यमं तु ततः पिण्डमद्यात् पत्नी सुतार्थिनी॥ ७६॥(श्राद्धके) पिण्डोंको गाय, अज (बकरा) अथवा ब्राह्मणको दे, ऐसा सम्भव न होनेपर अग्नि अथवा जलमें विसर्जित करना चाहिये। पुत्रकी इच्छा करनेवाली (श्राद्धकर्ताकी) पत्नीको मध्यम पिण्डका भक्षण करना चाहिये। तदनन्तर हाथोंको धोकर आचमन करके अवशिष्ट भोज्य पदार्थोंसे अपनी जातीय बान्धवोंको तृप्त करे, उन जातीय बन्धुओंके तृप्त हो जानेपर अपने भृत्यजनोंको भोजन कराये। तत्पश्चात् पत्नियोंके साथ स्वयं भी शेष अन्नको ग्रहण करे॥ ७६-७७॥
प्रक्षाल्य हस्तावाचम्य ज्ञातीन् शेषेण तोषयेत्।<br>ज्ञातिष्वपि च तृप्तेषु स्वान् भृत्यान् भोजयेत् ततः।<br>पश्चात् स्वयं च पत्नीभिः शेषमन्नं समाचरेत्॥ ७७॥
नोद्वासयेत् तदुच्छिष्टं यावन्नास्तंगतो रविः।<br>ब्रह्मचारी भवेतां तु दम्पती रजनीं तु ताम्॥ ७८॥(श्राद्धस्थलसे) जूठा अन्न तबतक नहीं उठाना चाहिये, जबतक सूर्यास्त न हो जाय। श्राद्धकी उस रात्रिमें पति-पत्नीको ब्रह्मचर्यपूर्वक रहना चाहिये। श्राद्ध करके और श्राद्धका भोजन करके जो मैथुन करता है, वह महारौरव नामक नरकमें जाता है, तदुपरान्त कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है। श्राद्धकर्ता तथा श्राद्धके भोजन करनेवालेको पवित्र, क्रोधरहित, शान्त, सत्यवादी तथा सावधान रहना चाहिये और स्वाध्याय तथा यात्राका त्याग करना चाहिये॥ ७८-८०॥
दत्त्वा श्राद्धं तथा भुक्त्वा सेवते यस्तु मैथुनम्।<br>महारौरवमासाद्य कीटयोनिं व्रजेत् पुनः॥ ७९॥
शुचिरक्रोधनः शान्तः सत्यवादी समाहितः।<br>स्वाध्यायं च तथाध्वानं कर्ता भोक्ता च वर्जयेत्॥ ८०॥
श्राद्धं भुक्त्वा परश्राद्धं भुञ्जते ये द्विजातयः।<br>महापातिकिभिस्तुल्या यान्ति ते नरकान् बहून्॥ ८१॥(किसी एक) श्राद्धमें भोजन करनेके बाद जो ब्राह्मण दूसरे श्राद्धमें भोजन करते हैं, वे महापातकियोंके समान हैं और बहुतसे नरकोंमें जाते हैं। इस प्रकार आप लोगोंसे मैंने इस सनातन श्राद्धकल्पका वर्णन किया। उदासीन (अनासक्त) तत्त्ववेत्ताको नित्य अपक्व अन्नसे श्राद्ध करना चाहिये॥ ८१-८२॥
एष वो विहितः सम्यक् श्राद्धकल्पः सनातनः।<br>आमेन वर्तयेन्नित्यमुदासीनोऽथ तत्त्ववित्॥ ८२॥
अनग्निरध्वगो वापि तथैव व्यसनान्वितः।<br>आमश्राद्धं द्विजः कुर्याद् विधिज्ञः श्रद्धयान्वितः।<br>तेनाग्नौकरणं कुर्यात् पिण्डांस्तेनैव निर्वपेत्॥ ८३॥अग्निहोत्रसे रहित, यात्रा करनेवाले अथवा व्यसनसे युक्त (किसी प्रकारकी आपत्ति या रोगसे ग्रस्त) श्रद्धालु और विधिको जाननेवाले द्विजको आमश्राद्ध (अपक्व अन्नसे किया जानेवाला श्राद्ध) करना चाहिये। वह उसी अपक्व अन्नसे 'अग्नौकरण'* करे और उसीसे पिण्डदान भी करे। जो इस विधिसे शान्त-मन होकर श्राद्ध करता है, वह सभी कल्मषोंसे दूर होता हुआ योगियोंके नित्य पदको प्राप्त करता है॥ ८३-८४॥
योऽनेन विधिना श्राद्धं कुर्यात् संयतमानसः।<br>व्यपेतकल्मषो नित्यं योगिनां वर्तते पदम्॥ ८४॥

* यह 'अग्नौकरण' ब्राह्मणके हाथपर होता है। (मनु० ३। २१२)

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