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संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

३६८ * कूर्मपुराण *


दातारो नोऽभिवर्धन्तां वेदाः संततिरेव च।<br>श्रद्धा च नो मा व्यगमद् बहुदेयं च नोऽस्त्विति॥ ७५॥हमारे (कुलमें) दान देनेवालोंकी, वेद (ज्ञान)-की तथा संततिकी वृद्धि हो। (शास्त्रों, ब्राह्मणों, पितरों, देवों आदिमें) हमारी श्रद्धा हटे नहीं। मेरे पास दान देनेके लिये बहुतसे पदार्थ हों॥ ७५॥
पिण्डांस्तु गोऽजविप्रेभ्यो दद्यादग्नौ जलेऽपि वा।<br>मध्यमं तु ततः पिण्डमद्यात् पत्नी सुतार्थिनी॥ ७६॥(श्राद्धके) पिण्डोंको गाय, अज (बकरा) अथवा ब्राह्मणको दे, ऐसा सम्भव न होनेपर अग्नि अथवा जलमें विसर्जित करना चाहिये। पुत्रकी इच्छा करनेवाली (श्राद्धकर्ताकी) पत्नीको मध्यम पिण्डका भक्षण करना चाहिये। तदनन्तर हाथोंको धोकर आचमन करके अवशिष्ट भोज्य पदार्थोंसे अपनी जातीय बान्धवोंको तृप्त करे, उन जातीय बन्धुओंके तृप्त हो जानेपर अपने भृत्यजनोंको भोजन कराये। तत्पश्चात् पत्नियोंके साथ स्वयं भी शेष अन्नको ग्रहण करे॥ ७६-७७॥
प्रक्षाल्य हस्तावाचम्य ज्ञातीन् शेषेण तोषयेत्।<br>ज्ञातिष्वपि च तृप्तेषु स्वान् भृत्यान् भोजयेत् ततः।<br>पश्चात् स्वयं च पत्नीभिः शेषमन्नं समाचरेत्॥ ७७॥
नोद्वासयेत् तदुच्छिष्टं यावन्नास्तंगतो रविः।<br>ब्रह्मचारी भवेतां तु दम्पती रजनीं तु ताम्॥ ७८॥(श्राद्धस्थलसे) जूठा अन्न तबतक नहीं उठाना चाहिये, जबतक सूर्यास्त न हो जाय। श्राद्धकी उस रात्रिमें पति-पत्नीको ब्रह्मचर्यपूर्वक रहना चाहिये। श्राद्ध करके और श्राद्धका भोजन करके जो मैथुन करता है, वह महारौरव नामक नरकमें जाता है, तदुपरान्त कीड़ेकी योनिमें जन्म लेता है। श्राद्धकर्ता तथा श्राद्धके भोजन करनेवालेको पवित्र, क्रोधरहित, शान्त, सत्यवादी तथा सावधान रहना चाहिये और स्वाध्याय तथा यात्राका त्याग करना चाहिये॥ ७८-८०॥
दत्त्वा श्राद्धं तथा भुक्त्वा सेवते यस्तु मैथुनम्।<br>महारौरवमासाद्य कीटयोनिं व्रजेत् पुनः॥ ७९॥
शुचिरक्रोधनः शान्तः सत्यवादी समाहितः।<br>स्वाध्यायं च तथाध्वानं कर्ता भोक्ता च वर्जयेत्॥ ८०॥
श्राद्धं भुक्त्वा परश्राद्धं भुञ्जते ये द्विजातयः।<br>महापातिकिभिस्तुल्या यान्ति ते नरकान् बहून्॥ ८१॥(किसी एक) श्राद्धमें भोजन करनेके बाद जो ब्राह्मण दूसरे श्राद्धमें भोजन करते हैं, वे महापातकियोंके समान हैं और बहुतसे नरकोंमें जाते हैं। इस प्रकार आप लोगोंसे मैंने इस सनातन श्राद्धकल्पका वर्णन किया। उदासीन (अनासक्त) तत्त्ववेत्ताको नित्य अपक्व अन्नसे श्राद्ध करना चाहिये॥ ८१-८२॥
एष वो विहितः सम्यक् श्राद्धकल्पः सनातनः।<br>आमेन वर्तयेन्नित्यमुदासीनोऽथ तत्त्ववित्॥ ८२॥
अनग्निरध्वगो वापि तथैव व्यसनान्वितः।<br>आमश्राद्धं द्विजः कुर्याद् विधिज्ञः श्रद्धयान्वितः।<br>तेनाग्नौकरणं कुर्यात् पिण्डांस्तेनैव निर्वपेत्॥ ८३॥अग्निहोत्रसे रहित, यात्रा करनेवाले अथवा व्यसनसे युक्त (किसी प्रकारकी आपत्ति या रोगसे ग्रस्त) श्रद्धालु और विधिको जाननेवाले द्विजको आमश्राद्ध (अपक्व अन्नसे किया जानेवाला श्राद्ध) करना चाहिये। वह उसी अपक्व अन्नसे 'अग्नौकरण'* करे और उसीसे पिण्डदान भी करे। जो इस विधिसे शान्त-मन होकर श्राद्ध करता है, वह सभी कल्मषोंसे दूर होता हुआ योगियोंके नित्य पदको प्राप्त करता है॥ ८३-८४॥
योऽनेन विधिना श्राद्धं कुर्यात् संयतमानसः।<br>व्यपेतकल्मषो नित्यं योगिनां वर्तते पदम्॥ ८४॥

* यह 'अग्नौकरण' ब्राह्मणके हाथपर होता है। (मनु० ३। २१२)

* अध्याय २२ *३६९
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन श्राद्धं कुर्याद् द्विजोत्तमः।<br>आराधितो भवेदीशस्तेन सम्यक् सनातनः॥ ८५॥<br><br>अपि मूलैःफलैर्वापि प्रकुर्यान्निर्धनो द्विजः।<br>तिलोदकैस्तर्पयेद् वा पितॄन् स्नात्वा समाहितः॥ ८६॥<br><br>न जीवत्पितृको दद्याद्धोमान्तं चाभिधीयते।<br>येषां वापि पिता दद्यात् तेषां चैके प्रचक्षते॥ ८७॥<br><br>पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः।<br>यो यस्य म्रियते तस्मै देयं नान्यस्य तेन तु॥ ८८॥<br><br>भोजयेद् वापि जीवन्तं यथाकामं तु भक्तितः।<br>न जीवन्तमतिक्रम्य ददाति श्रूयते श्रुतिः॥ ८९॥<br><br>द्व्यामुष्यायणिको दद्याद् बीजिक्षेत्रिकयोः समम्।<br>रिक्थादर्धं समादद्यान्नियोगोत्पादितो यदि॥ ९०॥<br><br>अनियुक्तः सुतो यश्च शुल्कतो जायते त्विह।<br>प्रदद्याद् बीजिने पिण्डं क्षेत्रिणे तु ततोऽन्यथा॥ ९१॥<br><br>द्वौ पिण्डौ निर्वपेत् ताभ्यां क्षेत्रिणे बीजिने तथा।<br>कीर्तयेदथ चैकस्मिन् बीजिनं क्षेत्रिणं ततः॥ ९२॥<br><br>मृताहनि तु कर्तव्यमेकोद्दिष्टं विधानतः।<br>अशौचे स्वे परिक्षीणे काम्यं वै कामतः पुनः॥ ९३॥इसलिये द्विजोत्तमको सभी प्रयत्नोंसे श्राद्ध करना चाहिये। इससे सनातन ईशकी सम्यक् रूपसे आराधना हो जाती है॥ ८५॥<br><br>सर्वथा निर्धन द्विजको मूल अथवा फलोंसे श्राद्ध करना चाहिये। अथवा स्नानकर समाहित होकर तिल और जलद्वारा पितरोंका तर्पण करना चाहिये। जिसके पिता जीवित हों उसे श्राद्ध नहीं करना चाहिये अथवा उसके लिये होमपर्यन्त श्राद्ध करनेका विधान है। कुछ लोगोंका कहना है कि पिता जिन्हें पिण्डदान करते हों उन्हें ही (वह) पिण्डदान करे। पिता, पितामह तथा प्रपितामहमेंसे जिसकी मृत्यु हुई हो उसीके निमित्त श्राद्धकर्ताको पिण्डदान करना चाहिये, न कि अन्य किसी (जीवित व्यक्ति)-के निमित्त। अथवा जीवित पुरुषको इसकी अभिरुचिके अनुसार भक्तिपूर्वक भोजन कराये। श्रुतिमें कहा गया है कि (पितादि) जीवित व्यक्तिका अतिक्रमणकर पिण्डदान नहीं करना चाहिये॥ ८६-८९॥<br><br>द्व्यामुष्यायणिक¹ पुत्र बीजी² एवं क्षेत्री³ दोनों पिताओंको पिण्डदान करे। यह पुत्र सम्पत्तिका आधा भाग ले सकता है। जो पुत्र नियोग-विधिसे उत्पन्न नहीं है, शुल्क⁴ (मूल्य) देकर गृहीत है, वह बीजी (जिस पुरुषके बीजसे उत्पन्न हुआ है वह बीजी है)-को पिण्डदान करेगा और क्षेत्राधिकारी पिताके पिण्डदानका उसे अधिकार नहीं होता। (नियोगसे उत्पन्न पुत्रको) क्रमशः क्षेत्री और बीजीको दो पिण्ड देने चाहिये। एक-एक पिण्ड देते समय क्रमशः अलग-अलग दोनोंका नाम कीर्तन करना चाहिये⁵॥ ९०-९२॥<br><br>(पिताकी) मृत्यु-तिथिमें विधिपूर्वक एकोद्दिष्ट श्राद्ध करना चाहिये। अपना अशौच समाप्त होनेपर इच्छानुसार काम्य श्राद्ध किये जा सकते हैं॥ ९३॥

१-शास्त्रीय विधिसे विवाहके लिये किसी योग्य वरको चुना जाय और उसे यह वचन दे दिया जाय कि 'मैं अपनी कन्याका विवाह तुमसे करूँगा' वह वर दैववश यदि गत हो जाय तो शास्त्रानुसार उस वाग्दत्ता कन्याका पुनर्विवाह सम्भव नहीं है, किंतु दिवंगत वरको पिण्ड देनेके लिये और उसकी सम्पत्तिके स्वामित्वके लिये पुत्रकी आवश्यकता हो तो उस वाग्दत्ता कन्याका देवर या सगोत्रसे विवाह करना शास्त्रविहित है। यही नियोग-विवाह है। इससे उत्पन्न पुरुषको द्व्यामुष्यायणिक कहते हैं।
२-वाग्दत्ता कन्यासे नियोग-विधिसे विवाह करनेवाला देवर आदि बीजी है अर्थात् विद्यमान पिता।
३-वाग्दत्ता कन्याका दिवंगत वर क्षेत्री है अर्थात् दिवङ्गत पिता।
४-औरस आदि बारह प्रकारके पुत्र धर्मशास्त्रमें बताये गये हैं। उनमें एक क्रीत पुत्र होता है। यह मूल्य देकर माता-पितासे ले लिया जाता है और अपने पुत्ररूपमें स्वीकार कर लिया जाता है। यही पुत्र शुल्कसे गृहीत पुत्ररूपमें यहाँ निर्दिष्ट है।
५-क्षेत्री एवं बीजी दोनोंको पिण्डदान नियोगसे उत्पन्न वही पुत्र करेगा, जिसकी उत्पत्तिके पूर्व देवर आदि तथा वाग्दत्ता कन्याने परस्पर यह संविदा कर ली हो कि यह उत्पन्न होनेवाला पुत्र हम दोनोंका होगा।

३७० * कूर्मपुराण *


पूर्वाह्ने चैव कर्तव्यं श्राद्धमभ्युदयार्थिना।<br>देववत्सर्वमेव स्याद् यवैः कार्या तिलक्रिया॥ ९४ ॥अभ्युदयकी कामना करनेवालेको पूर्वाह्नमें ही आभ्युदयिक (नान्दी) श्राद्ध करना चाहिये। देवकार्यके समान इसमें सभी कार्य करने चाहिये। तिलोंका कार्य जौसे करना चाहिये। इसमें सीधे कुशोंका प्रयोग करे (मोटकके रूपमें द्विगुणीकृत कुशोंका प्रयोग न करे)। युग्म ब्राह्मणोंको भोजन कराये और 'नान्दीमुखाः पितरः प्रीयन्ताम्' अर्थात् नान्दीमुख नामक पितर तृप्त हों—ऐसा कहना चाहिये॥ ९४-९५॥
दर्भाश्च ऋजवः कार्या युग्मान् वै भोजयेद् द्विजान्।<br>नान्दीमुखास्तु पितरः प्रीयन्तामिति वाचयेत्॥ ९५ ॥<br>मातृश्राद्धं तु पूर्वं स्यात् पितॄणां स्यादनन्तरम्।<br>ततो मातामहानां तु वृद्धौ श्राद्धत्रयं स्मृतम्॥ ९६ ॥पहले मातृश्राद्ध तदनन्तर पितृश्राद्ध करना चाहिये। उसके बाद मातामहादिका श्राद्ध होता है। वृद्धिश्राद्धमें इन्हीं तीन प्रकारके श्राद्धोंका वर्णन हुआ है¹। देवकार्य (विश्वेदेव कार्य) करनेके अनन्तर पिण्डदान करना चाहिये। दाहिनी ओरसे ही विश्वेदेवकार्य करना चाहिये। एकाग्रचित्तसे² सव्य होकर पूर्वाभिमुख हो पिण्डदान करना चाहिये॥ ९६-९७॥
देवपूर्वं प्रदद्याद् वै न कुर्यादप्रदक्षिणम्।<br>प्राङ्मुखो निर्वपेत् पिण्डानुपवीती समाहितः॥ ९७ ॥<br>पूर्वं तु मातरः पूज्या भक्त्या वै सगणेश्वराः।<br>स्थण्डिलेषु विचित्रेषु प्रतिमासु द्विजातिषु॥ ९८ ॥सर्वप्रथम (नान्दीश्राद्धके पूर्व) भक्तिपूर्वक गणेश्वरोंसे युक्त (षोडश) मातृकाओंका पूजन करना चाहिये। मनोरम स्थण्डिल, प्रतिमा अथवा ब्राह्मणोंमें पुष्प, धूप, नैवेद्य, गन्ध तथा अलंकारों आदिके द्वारा (षोडश मातृकाओंका) पूजन करना चाहिये। मातृगणोंकी पूजाकर विद्वान्‌को चाहिये कि वह तीनों श्राद्ध³ करे। मातृपूजन किये बिना जो श्राद्ध करता है, (षोडश) मातृकाएँ क्रुद्ध होकर उससे अप्रसन्न हो जाती हैं॥ ९८-१००॥
पुष्पैर्धूपैश्च नैवेद्यैर्गन्धाद्यैर्भूषणैरपि।<br>पूजयित्वा मातृगणं कुर्याच्छ्राद्धत्रयं बुधः॥ ९९ ॥
अकृत्वा मातृयागं तु यः श्राद्धं परिवेशयेत्।<br>तस्य क्रोधसमाविष्टा हिंसामिच्छन्ति मातरः॥ १००॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे द्वाविंशोऽध्यायः॥ २२॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिभागमें बाईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २२॥


१-पुत्रादिकी उत्पत्तिके समय होनेवाले विशेष श्राद्धके लिये यह व्यवस्था है। सामान्यतः सभी श्राद्धोंमें प्रथम पिता आदिका, अनन्तर माता आदिका श्राद्ध होता है।
२-यह किसी विशेष श्रौतकर्मके पिण्डदानकी व्यवस्था है। सामान्यतः पिण्डदान दक्षिणाभिमुख एवं अपसव्य होकर किया जाता है।
३-ये तीन श्राद्ध—पिता आदि तीन, माता आदि तीन तथा मातामह आदि तीनका समझना चाहिये। नान्दीश्राद्धमें ये तीनों श्राद्ध होते हैं।

  • अध्याय २३ * ३७१

तेईसवाँ अध्याय

आशौच-प्रकरणमें जननाशौच और मरणाशौचकी क्रियाविधि, शुद्धि-विधान, सपिण्डता, सद्यःशौच, अन्त्येष्टि-संस्कार, सपिण्डीकरण-विधि, मासिक तथा सांवत्सरिक श्राद्ध आदिका वर्णन

व्यास उवाच<br>दशाहं प्राहुराशौचं सपिण्डेषु विपश्चितः।<br>मृतेषु वाथ जातेषु ब्राह्मणानां द्विजोत्तमाः॥ १॥<br>नित्यानि चैव कर्माणि काम्यानि च विशेषतः।<br>न कुर्याद् विहितं किञ्चित् स्वाध्यायं मनसापि च॥ २॥**व्यासजीने कहा—**हे द्विजोत्तमो! विद्वानोंने ब्राह्मणोंके लिये सपिण्डोंकी मृत्यु अथवा जन्म होनेपर दस दिनका आशौच कहा है। (आशौचमें) विशेषरूपसे विहित नित्य तथा काम्य कुछ भी कर्म न करे। मनसे भी स्वाध्याय (वेदाध्ययन) न करे॥ १-२॥
शुचीनक्रोधनान् भूम्यान् शालाग्नौ भावयेद् द्विजान्।<br>शुष्कान्नेन फलैर्वापि वैतानं जुहुयात् तथा॥ ३॥यज्ञशालाके अग्निकार्यके लिये पवित्र, क्रोधरहित, भूमिदेवरूप ब्राह्मणोंको नियुक्त करना चाहिये। शुष्क अन्न अथवा फलोंके द्वारा वैतानाग्निमें हवन (श्रौत होम) करना चाहिये॥ ३॥
न स्पृशेयुरिमानन्ये न च तेभ्यः समाहरेत्।<br>चतुर्थे पञ्चमे वाह्नि संस्पर्शः कथितो बुधैः॥ ४॥दूसरे लोग इन आशौचग्रस्त व्यक्तियोंको स्पर्श न करें और न कोई वस्तु ही उनसे लें। विद्वानोंने चौथे अथवा पाँचवें दिन इनके स्पर्शका विधान किया है। (सपिण्डोंके) जननाशौचमें सपिण्डोंको स्पर्श करनेमें दोष नहीं होता। तथापि उत्पन्न हुए बालक और उसे जन्म देनेवाली (सद्यः) प्रसूता स्त्रीका मनुष्योंको स्पर्श नहीं करना चाहिये॥ ४-५॥
सूतके तु सपिण्डानां संस्पर्शो न प्रदुष्यति।<br>सूतकं सूतिकां चैव वर्जयित्वा नृणां पुनः॥ ५॥<br>अधीयानस्तथा यज्वा वेदविच्च पिता भवेत्।<br>संस्पृश्याः सर्व एवैते स्नानान्माता दशाहतः॥ ६॥जननाशौचमें वेदका अध्ययन करनेवाला, यज्ञ करनेवाला और वेद जाननेवाला पिता—ये सभी स्नान करनेसे स्पर्श करने योग्य हो जाते हैं। माता दस दिनोंके बाद (स्पर्श-योग्य होती है) निर्गुण¹ अथवा अति-निर्गुण लोगोंके लिये दस दिनोंका आशौच कहा गया है। एक², दो अथवा तीन गुणवालोंके लिये चार, तीन या एक दिनमें शुद्धि होनेका विधान है। दस दिन हो जानेपर सम्यक्-रूपसे अध्ययन एवं हवन करना चाहिये। प्रजापति मनुने चौथे दिन (एक गुणवाले अशौची)-के स्पर्शका विधान किया है। क्रियाहीन, मूर्ख, महारोगी और मनमाना आचरण करनेवाले व्यक्तियोंका आशौच मरणपर्यन्त कहा³ गया है॥ ६—९॥
दशाहं निर्गुणे प्रोक्तमशौचं चातिनिर्गुणे।<br>एकद्वित्रिगुणैर्युक्तं चतुस्त्र्येकदिनैः शुचिः॥ ७॥
दशाहात् तु परं सम्यगधीयीत जुहोति च।<br>चतुर्थे तस्य संस्पर्शं मनुराह प्रजापतिः॥ ८॥
क्रियाहीनस्य मूर्खस्य महारोगिण एव च।<br>यथेष्टाचरणस्याहुर्मरणान्तमशौचकम् ॥ ९॥

१-वेदाध्ययन एवं अग्निहोत्रादि कर्मसे रहितको निर्गुण कहा जाता है।
२-जो स्मार्ताग्निमान् है वह एक गुणवाला है। जो स्मार्ताग्निमान् तथा वेदाध्ययनसम्पन्न है, वह दो गुणवाला है। जो इन दोनोंके साथ श्रौताग्निमान् है, वह तीन गुणोंवाला है। (मनु० ३। ५९ कुल्लूकभट्टी)
३-इस वचनका तात्पर्य क्रियाहीनता आदिकी निन्दामें है।

३७२* कूर्मपुराण *

| त्रिरात्रं दशरात्रं वा ब्राह्मणानामशौचकम्।<br>प्राक्संस्कारात् त्रिरात्रं स्यात् तस्मादूर्ध्वं दशाहकम्॥ १०॥ | ब्राह्मणोंका आशौच तीन रात अथवा दस रात-तकका होता है। (उपनयन) संस्कार होनेके पूर्व (तथा चूडासंस्कारके अनन्तर मृत्यु होनेपर) तीन रातका और (उपनयन) संस्कार होनेपर दस रातका अशौच होता है॥ १०॥ | | ऊनद्विवार्षिके प्रेते मातापित्रोस्तदिष्यते।<br>त्रिरात्रेण शुचिस्त्वन्यो यदि ह्यात्यन्तनिर्गुणः॥ ११॥<br><br>अदन्तजातमरणे पित्रोरेकाहमिष्यते।<br>जातदन्ते त्रिरात्रं स्याद् यदि स्यातां तु निर्गुणौ॥ १२॥<br><br>आदन्तजननात् सद्य आचौलादेकरात्रकम्।<br>त्रिरात्रमौपनयनात् सपिण्डानामुदाहृतम्॥ १३॥<br><br>जातमात्रस्य बालस्य यदि स्यान्मरणं पितुः।<br>मातुश्च सूतकं तत् स्यात् पिता स्यात् स्पृश्य एव च॥ १४॥<br><br>सद्यः शौचं सपिण्डानां कर्तव्यं सोदरस्य च।<br>ऊर्ध्वं दशाहादेकाहं सोदरो यदि निर्गुणः॥ १५॥ | दो वर्षसे कम अवस्थावाले बालकके मरनेपर केवल माता-पिताको तीन रातका अशौच होता है। अत्यन्त निर्गुण (सपिण्डकी मृत्यु) होनेपर तीन रातमें शुद्धि होती है। बिना दाँतवाले शिशुके मरनेपर माता-पिताको एक दिनका अशौच कहा गया है। यदि माता-पिता निर्गुण हों तो दाँत उत्पन्न हुए शिशुकी मृत्यु होनेपर उन्हें तीन रातका अशौच होता है। दाँत उत्पन्न होनेके पूर्वतक बालककी मृत्यु होनेपर सद्यः चूडाकरण-संस्कारके पूर्वतक एक रात तथा उपनयनसे पूर्वतक तीन रातका आशौच सपिण्डोंके लिये कहा गया है। उत्पन्न होते ही बालककी मृत्यु होनेपर पिता और माताको अशौच होता है, किंतु पिता (स्नानके बाद) स्पर्शके योग्य होता है। सपिण्डों और सहोदर भाईकी (जन्मसे) दस दिनोंके भीतर मृत्यु होनेपर (स्नानमात्रसे) सद्यः पवित्रता होती है। दस दिनके पश्चात् (मृत्यु होनेपर) एक दिनका अशौच उस सहोदरको होगा जो निर्गुण होता है॥ ११—१५॥ | | अथोर्ध्वं दन्तजननात् सपिण्डानामाशौचकम्।<br>एकरात्रं निर्गुणानां चौलादूर्ध्वं त्रिरात्रकम्॥ १६॥<br><br>अदन्तजातमरणं सम्भवेद् यदि सत्तमाः।<br>एकरात्रं सपिण्डानां यदि तेऽत्यन्तनिर्गुणाः॥ १७॥<br><br>व्रतादेशात् सपिण्डानामार्वाक् स्नानं विधीयते।<br>सर्वेषामेव गुणिनामूर्ध्वं तु विषमं पुनः॥ १८॥ | तदनन्तर दाँत निकलनेतक निर्गुण सपिण्डोंको एक रातका अशौच होता है। चौलकर्मके उपरान्त (सपिण्डोंके मरनेपर) तीन रातका अशौच होता है। श्रेष्ठ जनो! सपिण्डी (यदि) अत्यन्त निर्गुण हों तो बिना दाँत निकले उनकी मृत्यु होनेपर एक रातका अशौच होता है। उपनयनके पूर्व सपिण्डोंकी मृत्यु होनेपर सभी गुणवानोंके लिये स्नानका विधान है, किंतु उपनयनके बाद मृत्यु होनेपर भिन्न स्थिति (अलग-अलग अशौचकी व्यवस्था) होती है॥ १६—१८॥ | | अर्वाक् षण्मासतः स्त्रीणां यदि स्याद् गर्भसंस्रवः।<br>तदा माससमैस्तासामशौचं दिवसैः स्मृतम्॥ १९॥<br><br>तत ऊर्ध्वं तु पतने स्त्रीणां द्वादशरात्रिकम्।<br>सद्यः शौचं सपिण्डानां गर्भस्रावाच्च वा ततः॥ २०॥ | छः महीनेसे पूर्व यदि स्त्रियोंका गर्भस्राव हो जाता है तो जितने महीनेका गर्भ रहता है, उतने ही दिनों-तकका उनका (स्त्रियोंका) अशौच कहा गया है, उसके बाद गर्भपात होनेपर स्त्रियोंके लिये बारह रात्रिका और सपिण्डोंके लिये सद्यः शौचका विधान है॥ १९-२०॥ |

  • अध्याय २३ * | ३७३ ---|---
गर्भच्युतावहोरात्रं सपिण्डेऽत्यन्तनिर्गुणे।<br>यथेष्टाचरणे ज्ञातौ त्रिरात्रमिति निश्चयः॥ २१॥गर्भस्राव तथा अत्यन्त निर्गुण सपिण्डकी मृत्यु होनेपर एक अहोरात्रका और मनमाने आचरणवाले जाति-बन्धुके (यहाँ गर्भस्राव होनेपर) तीन रातका अशौच निश्चित है। यदि जननाशौचके मध्य दूसरा जननाशौच हो जाय और मरणाशौचके बीचमें दूसरा मरणाशौच पड़ जाय तो प्रथम अशौचके जितने दिन शेष रहते हैं, उतने ही दिनोंमें दूसरे अशौचकी भी शुद्धि हो जाती है। किंतु प्रथम अशौच एक ही दिनका बचा हो तो तीन रातका आशौच होता है। मरणाशौचके मध्य जननाशौच होनेपर अथवा जननाशौचके बीचमें मरणाशौच आ जानेपर मरणाशौचके पूरा होनेपर ही शुद्धि होती है। यदि पूर्वका अशौच वृद्धिमद् (बड़ा गुरुतर) अशौच हो तो पूर्वके अशौचकी शुद्धिसे ही दोनों अशौचोंकी शुद्धि होती है। यदि पाँचवीं रात्रि बीत जानेपर वृद्धिमद् अशौच हो तो दूसरे अशौचकी शुद्धि पूर्वके ही अशौचसे हो जाती है॥ २१-२४॥
यदि स्यात् सूतके सूतिर्मरणे वा मृतिर्भवेत्।<br>शेषेणैव भवेच्छुद्धिरहःशेषे त्रिरात्रकम्॥ २२॥
मरणोत्पत्तियोगे तु मरणाच्छुद्धिरिष्यते।<br>अघवृद्धिमदाशौचमूर्ध्वं चेत् तेन शुध्यति॥ २३॥
अथ चेत् पञ्चमीरात्रिमतीत्य परतो भवेत्।<br>अघवृद्धिमदाशौचं तदा पूर्वेण शुध्यति॥ २४॥
देशान्तरगतं श्रुत्वा सूतकं शावमेव तु।<br>तावत्प्रयतो मर्त्यो यावच्छेषः समाप्यते॥ २५॥देशान्तरमें गये हुएका जननाशौच या मरणाशौच-सम्बन्धी समाचार सुननेके बाद उतने समयतक संयम (अशौचके नियमका पालन) करना चाहिये जबतक शेष दिन समाप्त न हो जाय। (एक वर्षके भीतर) व्यतीत हुए मरणाशौचका समाचार सुननेपर सपिण्डोंको तीन रातका अशौच होता है, उसी प्रकार एक वर्ष बीतनेके बाद समाचार मिलनेपर मरणाशौचमें स्नानमात्र करना चाहिये॥ २५-२६॥
अतीते सूतके प्रोक्तं सपिण्डानां त्रिरात्रकम्।<br>तथैव मरणे स्नानमूर्ध्वं संवत्सराद् यदि॥ २६॥
वेदान्तविच्चाधीयानो योऽग्निमान् वृत्तिकर्शितः।<br>सद्यः शौचं भवेत् तस्य सर्वावस्थासु सर्वदा॥ २७॥वेदान्तको जाननेवाला (ब्रह्मनिष्ठ), अध्ययनकर्ता (गुरुकुलमें निवास करनेवाला ब्रह्मचारी), अग्निहोत्री तथा वृत्तिहीन लोगोंको सभी अवस्थाओंमें सदा सद्यः शौच होता है ॥ २७ ॥
स्त्रीणामसंस्कृतानां तु प्रदानात् पूर्वतः सदा।<br>सपिण्डानां त्रिरात्रं स्यात् संस्कारे भर्तुरेव हि॥ २८॥अविवाहित स्त्रियों (कन्याओं)-की पाणिग्रहणसे पूर्व मृत्यु होनेपर सपिण्डोंके निमित्त सदा तीन रातका अशौच होता है और विवाह-संस्कारके अनन्तर मृत्यु होनेपर केवल पति और पतिकुलमें अशौच होता है। वाग्दानसे पूर्व कन्याओंकी मृत्यु होनेपर एक दिनका अशौच कहा गया है और दो वर्षसे कम अवस्थावाली कन्याके मरनेपर सद्यः शौच बताया गया है॥ २८-२९॥
अहस्त्वदत्तकन्यानामशौचं मरणे स्मृतम्।<br>ऊनद्विवर्षान्मरणे सद्यः शौचमुदाहृतम्॥ २९॥
३७४* कूर्मपुराण *
आदन्तात् सोदरे सद्य आचौलादेकरात्रकम्।<br>आप्रदानात् त्रिरात्रं स्याद् दशरात्रमतः परम्॥ ३०॥दाँत निकलनेसे पूर्व कन्याकी मृत्यु होनेपर सहोदर भाईको सद्यः शौच होता है और चूड़ाकरणके कालतक मृत्यु होनेपर एक रात्रिका अशौच होता है। कन्यादानके पूर्व (कन्याका मरण होनेपर) तीन रातका और विवाहके बाद मरण होनेपर दस रातका (पतिकुलमें) अशौच होता है॥ ३०॥
मातामहानां मरणे त्रिरात्रं स्यादशौचकम्।<br>एकोदकानां मरणे सूतके चैतदेव हि॥ ३१॥मातामहकी मृत्यु होनेपर (दौहित्रको) तीन रातका अशौच होता है। समानोदकोंके^१ मरण या जन्ममें भी तीन रातका ही अशौच होता है। योनि-सम्बन्धवालों (भांजा, मामा, मौसी, बूआ-कुलके लोग आदि) तथा बान्धवोंकी मृत्यु होनेपर पक्षिणी (आगामी तथा वर्तमान दिनसे युक्त रात्रि)-तक अशौच होता है^२। गुरु एवं सहपाठी (-के मरणमें) एक रात्रिका अशौच बतलाया गया है। जिस देशमें निवास करता हो, उस देशके राजाकी मृत्यु होनेपर सज्ज्योतिकालतकका^३ अशौच होता है और पिताके घरमें विवाहित कन्याकी मृत्यु होनेपर पिताको तीन रातका अशौच होता है। पूर्वमें अन्यकी भार्या रहनेवाली स्त्री, उसके पुत्र तथा कृत्रिम पुत्रके मरणमें तीन रातका आशौच होता है। इसी प्रकार आचार्यके मरणमें भी तीन रातका आशौच होता है। गुरुपुत्र तथा गुरुपत्नीका एक अहोरात्रका और उपाध्याय तथा अपने ग्राममें श्रोत्रियकी मृत्यु होनेपर भी एक दिनका आशौच होता है॥ ३१—३५॥
पक्षिणी योनिसम्बन्धे बान्धवेषु तथैव च।<br>एकरात्रं समुद्दिष्टं गुरौ सब्रह्मचारिणि॥ ३२॥
प्रेते राजनि सञ्ज्योतिर्यस्य स्याद् विषये स्थितिः।<br>गृहे मृतासु दत्तासु कन्यकासु त्र्यहं पितुः॥ ३३॥
परपूर्वासु भार्यासु पुत्रेषु कृतकेषु च।<br>त्रिरात्रं स्यात् तथाचार्ये स्वभार्यास्वन्यगासु च॥ ३४॥
आचार्यपुत्रे पत्न्यां च अहोरात्रमुदाहृतम्।<br>एकाहं स्यादुपाध्याये स्वग्रामे श्रोत्रियेऽपि च॥ ३५॥
त्रिरात्रमसपिण्डेषु स्वगृहे संस्थितेषु च।<br>एकाहं चास्ववर्ये स्यादेकरात्रं तदिष्यते॥ ३६॥अपने घरमें रहनेवाले असपिण्डकी मृत्यु होनेपर तीन रातका अशौच होता है और अपने घरमें (स्वेच्छासे रहनेवाले) अन्य किसी व्यक्तिकी मृत्यु होनेपर एक दिनका अशौच होता है। सास एवं ससुरके मरनेपर तीन रातका और अपने घरमें स्थित रहनेवाले सगोत्रके मरणमें सद्यः शौच कहा गया है। ब्राह्मणकी शुद्धि दस दिनमें, क्षत्रियकी बारह दिनमें, वैश्यकी पंद्रह दिनमें और शूद्रकी एक माहमें शुद्धि होती है। ब्राह्मणद्वारा क्षत्राणी, वैश्या और शूद्रासे उत्पन्न बान्धवोंकी मृत्यु होनेपर ब्राह्मणकी शुद्धि दस दिनोंमें होती है॥ ३६—३९॥
त्रिरात्रं श्वश्रमरणे श्वशुरे वै तदेव हि।<br>सद्यः शौचं समुद्दिष्टं सगोत्रे संस्थिते सति॥ ३७॥
शुध्येद् विप्रो दशाहेन द्वादशाहेन भूमिपः।<br>वैश्यः पञ्चदशाहेन शूद्रो मासेन शुध्यति॥ ३८॥
क्षत्रविद्शूद्रदायादा ये स्युर्विप्रस्य बान्धवाः।<br>तेषामशौचे विप्रस्य दशाहाच्छुद्धिरिष्यते॥ ३९॥

१-सातवीं परम्परासे चौदहवीं परम्परातकके लोग समानोदक होते हैं।
२-इस प्रसंगमें यह विवेक है—दिनमें मरण होनेपर वह दिन उसके बादकी रात्रि, उसके बाद दूसरे दिन नक्षत्रदर्शनतक अशौच होगा। रात्रिमें मरण होनेपर वह रात्रि बादका दिन पुनः उसके बादकी रात्रितक पक्षिणी माना जायगा और तबतक अशौच होगा।
३-दिनमें मरण होनेपर रात्रिमें स्नानसे शुद्धि और रात्रिमें मरण होनेपर दिनमें स्नानसे शुद्धि यही 'सज्ज्योतिकाल' से अशौचमें शुद्धिका अर्थ है।

  • अध्याय २३ * | ३७५ ---|--- राजन्यवैश्यावप्येवं हीनवर्णासु योनिषु।<br>स्वमेव शौचं कुर्यातां विशुद्ध्यर्थमसंशयम्॥ ४०॥ | क्षत्रिय और वैश्यको भी हीनवर्णकी स्त्रियोंसे उत्पन्न बान्धवोंकी मृत्यु होनेपर पूर्ण शुद्धिके लिये अपने वर्णके अनुसार विहित शौच-विधिका पालन करना चाहिये^१॥ ३९-४०॥ सर्वे तूत्तरवर्णानाशौचं कुर्युरादृताः।<br>तद्वर्णविधिदृष्टेन स्वं तु शौचं स्वयोनिषु॥ ४१॥ | सभी वर्णके व्यक्तियोंको उत्तर वर्णके लिये विहित अशौचका आदरपूर्वक पालन करना चाहिये। किंतु अपने वर्णकी स्त्रीसे उत्पन्न बन्धुकी मृत्यु होनेपर अपने ही वर्णके अनुसार अशौचका पालन करना चाहिये। षड्रात्रं वा त्रिरात्रं स्यादेकरात्रं क्रमेण हि।<br>वैश्यक्षत्रियविप्राणां शूद्रेष्वाशौचमेव तु॥ ४२॥ | शूद्र सपिण्डकी मृत्यु या जन्म होनेपर वैश्य, क्षत्रिय तथा ब्राह्मणोंको क्रमानुसार छः रात, तीन रात और एक रातका आशौच होता है। द्विजश्रेष्ठो! वैश्य सपिण्डके अर्धमासोऽथ षड्रात्रं त्रिरात्रं द्विजपुंगवाः।<br>शूद्रक्षत्रियविप्राणां वैश्येष्वाशौचमिष्यते॥ ४३॥ | जन्म या मृत्युपर शूद्र, क्षत्रिय और ब्राह्मणोंको क्रमशः आधे मास, छः रात तथा तीन रातका आशौच होता है। षड्रात्रं वै दशाहं च विप्राणां वैश्यशूद्रयोः।<br>अशौचं क्षत्रिये प्रोक्तं क्रमेण द्विजपुंगवाः॥ ४४॥ | द्विजश्रेष्ठो! क्षत्रिय सपिण्डके जन्म या मरणमें क्रमशः ब्राह्मणको छः दिन और वैश्य तथा शूद्रको दस दिनोंका अशौच होता है। ब्रह्माजीने कहा है कि ब्राह्मण शूद्रविट्क्षत्रियाणां तु ब्राह्मणे संस्थिते सति।<br>दशरात्रेण शुद्धिः स्यादित्याह कमलोद्भवः॥ ४५॥ | (सपिण्ड)-का (जन्म-मरण होनेपर) शूद्र, वैश्य तथा क्षत्रियकी शुद्धि दस रातमें होती है^२॥ ४१-४५॥ असपिण्डं द्विजं प्रेतं विप्रो निर्हृत्य बन्धुवत्।<br>अशित्वा च सहोषित्वा दशरात्रेण शुध्यति॥ ४६॥ | असपिण्ड द्विजकी मृत्यु होनेपर बन्धुवत् उसके प्रेतकर्ममें सम्मिलित होकर भोजन एवं निवास करनेवाला ब्राह्मण दस रातमें शुद्ध होता है। मृत व्यक्तिके यहाँ यद्यन्नमत्ति तेषां तु त्रिरात्रेण ततः शुचिः।<br>अनदन्नन्नमह्नैव न च तस्मिन् गृहे वसेत्॥ ४७॥ | भोजन करनेपर तीन रातमें शुद्धि होती है। अन्न न खानेवालेकी उसी दिन शुद्धि हो जाती है, परंतु उसके घरमें निवास नहीं करना चाहिये। सोदकेष्वेतदेव स्यान्मातुराप्तेषु बन्धुषु।<br>दशाहेन शवस्पर्शे सपिण्डश्चैव शुध्यति॥ ४८॥ | समानोदक तथा माताके श्रेष्ठ बान्धवोंके मरणमें शव वहन करनेवाला सपिण्ड व्यक्ति दस दिनोंमें शुद्ध होता है। यदि निर्हरति प्रेतं प्रलोभाक्रान्तमानसः।<br>दशाहेन द्विजः शुध्येद् द्वादशाहेन भूमिपः॥ ४९॥ | यदि कोई व्यक्ति लोभके वशीभूत हो शवको ढोता है तो वह यदि ब्राह्मण है तो दस दिनोंमें, क्षत्रिय है तो बारह दिनोंमें, वैश्य है तो आधे मासमें और शूद्र है तो एक अर्धमासेन वैश्यस्तु शूद्रो मासेन शुध्यति।<br>षड्रात्रेणाथवा सर्वे त्रिरात्रेणाथवा पुनः॥ ५०॥ | मासमें शुद्ध होता है अथवा सभी वर्णके व्यक्ति छः रात या तीन रातमें शुद्ध हो जाते हैं॥ ४६-५०॥ अनाथं चैव निर्हृत्य ब्राह्मणं धनवर्जितम्।<br>स्नात्वा सम्प्राश्य तु घृतं शुध्यन्ति ब्राह्मणादयः॥ ५१॥ | धनहीन अनाथ ब्राह्मणके शवका वहन आदि कर्म करनेवाले ब्राह्मणादि स्नान करके घृतका प्राशन करनेसे शुद्ध हो जाते हैं॥ ५१॥

१-यह अन्य युग-विषयक है। अपने वर्णसे इतर वर्णमें विवाह कलियुगमें सर्वथा निषिद्ध है।
२-यह अशौचकी व्यवस्था घनिष्ठ सम्पर्क, एक साथ रहने अथवा परस्पर उपकार्य-उपकारक-भाव रहनेपर है।

३७६ * कूर्मपुराण *


अवरश्चेद् वरं वर्णमवरं वा वरो यदि।<br>अशौचे संस्पृशेत् स्नेहात् तदाशौचेन शुध्यति॥ ५२॥स्नेहवश यदि हीनवर्णके व्यक्ति उच्च वर्णके शवका और उच्च वर्णके व्यक्ति हीनवर्णके शवका स्पर्श करते हैं तो वे उस मृतवर्णके निर्धारित अशौच (नियमपालन)-से शुद्ध होते हैं। यदि ब्राह्मण अपनी इच्छासे मरे हुए द्विजका अनुगमन करता है (शव-यात्रामें जाता है) तो वह वस्त्रसहित स्नानकर, अग्निका स्पर्श करके घृतका प्राशन करनेसे शुद्ध हो जाता है। (द्विजके शवका अनुगमन करनेपर) क्षत्रियकी शुद्धि एक दिनमें, वैश्यकी दो दिनमें, शूद्रकी तीन दिनोंमें कही गयी है। (अशौचके दिन बीतनेके बाद) सौ बार प्राणायाम (भी शुद्धिके लिये) करना चाहिये॥ ५२-५४॥
प्रेतीभूतं द्विजं विप्रो योऽनुगच्छेत् कामतः।<br>स्नात्वा सचैलं स्पृष्ट्वाग्निं घृतं प्राश्य विशुध्यति॥ ५३॥
एकाहात् क्षत्रिये शुद्धिर्वैश्ये स्याच्च द्व्यहेन तु।<br>शूद्रे दिनत्रयं प्रोक्तं प्राणायामशतं पुनः॥ ५४॥
अनस्थिसंचिते शूद्रे रौति चेद् ब्राह्मणः स्वकैः।<br>त्रिरात्रं स्यात् तथाशौचमेकाहं त्वन्यथा स्मृतम्॥ ५५॥शूद्रके अस्थिसंचय होनेसे पहले यदि ब्राह्मण उसके स्वजनोंके साथ विलाप करता है तो उसे तीन रातका अशौच होता है, इसके विपरीत (अस्थि-संचयनतक प्रेतकर्म हो जानेके अनन्तर यदि शूद्रका मरण जानकर ब्राह्मण उसके बान्धवोंके साथ विलाप करता है, उनका स्पर्श करता है तो उसे) एक दिनका अशौच होता है। अस्थिसंचयके पूर्व (शूद्रके घर विलाप करनेवाले) क्षत्रिय एवं वैश्यको एक दिनका और अन्य अवस्थामें सज्ज्योति(काल)-तकका आशौच होता है। ब्राह्मणकी स्नानमात्रसे शुद्धि होती है। ब्राह्मणके अस्थिसंचयके पूर्व यदि (असपिण्ड, असगोत्र, सम्बन्धरहित) ब्राह्मण रोता है तो वस्त्रोंसहित स्नानमात्रसे उसकी शुद्धि हो जाती है, इसमें संदेह नहीं॥ ५५-५७॥
अस्थिसंचयनादर्वागेकाहं क्षत्रवैश्ययोः।<br>अन्यथा चैव सज्ज्योतिर्ब्राह्मणे स्नानमेव तु॥ ५६॥
अनस्थिसंचिते विप्रे ब्राह्मणो रौति चेत् तदा।<br>स्नानेनैव भवेच्छुद्धिः सचैलेन न संशयः॥ ५७॥
यस्तैः सहाशनं कुर्याच्छयनादीनि चैव हि।<br>बान्धवो वापरो वापि स दशाहेन शुध्यति॥ ५८॥आशौचीजनोंके साथ जो भोजन तथा शयन आदि करता है, वह चाहे बान्धव हो या कोई दूसरा, दस दिनमें शुद्ध होता है। जो इच्छापूर्वक उनका एक बार भी अन्न ग्रहण करता है तो वह अशौच पूरा होनेपर स्नान करनेसे शुद्ध हो जाता है। दुर्भिक्षसे पीड़ित व्यक्ति जितने दिनतक उस (अशौची)-का अन्न ग्रहण करता है, उतने दिनोंतकका उसे अशौच होता है, तदनन्तर उसे प्रायश्चित्त करना चाहिये॥ ५८-६०॥
यस्तेषामन्नमश्नाति सकृदेवापि कामतः।<br>तदाशौचे निवृत्तेऽसौ स्नानं कृत्वा विशुध्यति॥ ५९॥
यावत्तदन्नमश्नाति दुर्भिक्षोपहतो नरः।<br>तावन्त्यहान्यशौचं स्यात् प्रायश्चित्तं ततश्चरेत्॥ ६०॥
दाहाद्यशौचं कर्तव्यं द्विजानामग्निहोत्रिणाम्।<br>सपिण्डानां तु मरणे मरणादितरेषु च॥ ६१॥अग्निहोत्री द्विजोंका दाह-कालसे अशौच आरम्भ होता है, अतः (तभीसे इनके मरणके निमित्त) नियमका पालन करना चाहिये। सपिण्डोंके मरने तथा जन्ममें भी अशौचका पालन करना चाहिये। पुरुषकी सपिण्डता सातवीं पीढ़ीमें समाप्त हो जाती है। अपने वंशके मूल पुरुषका नाम ज्ञात न होनेपर समानोदकता नष्ट हो जाती है॥ ६१-६२॥
सपिण्डता च पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते।<br>समानोदकभावस्तु जन्मनाम्नोरवेदने॥ ६२॥
  • अध्याय २३ * । ३७७

| पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः।<br>लेपभाजस्त्रयश्चात्मा सापिण्ड्यं साप्तपौरुषम्॥ ६३॥<br><br>अप्रत्तानां तथा स्त्रीणां सापिण्ड्यं साप्तपौरुषम्।<br>ऊढानां भर्तृसापिण्ड्यं प्राह देवः पितामहः॥ ६४॥<br><br>ये चैकजाता बहवो भिन्नयोनय एव च।<br>भिन्नवर्णास्तु सापिण्ड्यं भवेत् तेषां त्रिपूरुषम्॥ ६५॥<br><br>कारवः शिल्पिनो वैद्या दासीदासास्तथैव च।<br>दातारो नियमी चैव ब्रह्मविद्ब्रह्मचारिणौ॥ ६६॥<br><br>सत्रिणो व्रतिनस्तावत् सद्यःशौचा उदाहृताः।<br>राजा चैवाभिषिक्तश्च प्राणसत्रिण एव च॥ ६७॥<br><br>यज्ञे विवाहकाले च देवयागे तथैव च।<br>सद्यःशौचं समाख्यातं दुर्भिक्षे चाप्युपद्रवे॥ ६८॥<br><br>डिम्बाहवहतानां च विद्युता पार्थिवैर्द्विजैः।<br>सद्यःशौचं समाख्यातं सर्पादिमरणे तथा॥ ६९॥<br><br>अग्नौ मरुप्रपतने वीराध्वन्यप्यनाशके।<br>ब्राह्मणार्थे च संन्यस्ते सद्यः शौचं विधीयते॥ ७०॥<br><br>नैष्ठिकानां वनस्थानां यतीनां ब्रह्मचारिणाम्।<br>नाशौचं कीर्त्यते सद्भिः पतिते च तथा मृते॥ ७१॥<br><br>पतितानां न दाहः स्यान्नान्त्येष्टिर्नास्थिसंचयः।<br>न चाश्रुपातपिण्डौ वा कार्यं श्राद्धादिकं क्वचित्॥ ७२॥<br><br>व्यापादयेत् तथात्मानं स्वयं योऽग्निविषादिभिः।<br>विहितं तस्य नाशौचं नाग्निर्नाप्युदकादिकम्॥ ७३॥<br><br>अथ कश्चित् प्रमादेन म्रियतेऽग्निविषादिभिः।<br>तस्याशौचं विधातव्यं कार्यं चैवोदकादिकम्॥ ७४॥<br><br>जाते कुमारे तदहः कामं कुर्यात् प्रतिग्रहम्।<br>हिरण्यधान्यगोवासस्तिलान्नगुडसर्पिषाम् ॥ ७५॥ | पिता, पितामह तथा प्रपितामह—इन तीनोंसे आगेके पितर लेपभागी होते हैं। सात पुरुषोंतक सपिण्डता होती है। अविवाहित कन्याओंकी सपिण्डता उसके पिताके सात पुरुषों (पीढ़ीतक)-में होती है और विवाहित स्त्रियोंकी सपिण्डता उसके पतिके साथ (सात पीढ़ीतक) होती है—ऐसा भगवान् ब्रह्माने कहा है। एक पुरुषद्वारा भिन्न वर्णकी* स्त्रियोंसे उत्पन्न पुत्रोंकी सपिण्डता तीन पीढ़ीतक होती है॥ ६३—६५॥<br><br>बढ़ई, शिल्पी, वैद्य, दासी, दास, दाता, व्रतपरायण, ब्रह्मज्ञानी, ब्रह्मचारी, यज्ञकर्ता, व्रती—ये सभी (किसीका मरण होनेपर) स्नानमात्रसे शुद्ध हो जाते हैं। इसी प्रकार अभिषिक्त राजा एवं प्राणकी रक्षा करनेवाले अन्नदाताको भी सद्यः शौच होता है। यज्ञ, विवाहारम्भ, देवपूजनका आरम्भ हो जानेपर तथा दुर्भिक्ष और उपद्रवकी स्थितिमें सद्यः शौच होता है। क्षत्रियों तथा ब्राह्मणोंके साथ मामूली लड़ाई अथवा झड़प आदिमें मरनेवालों तथा विद्युत् और सर्पादिके कारण मरनेवालोंका सद्यः शौच कहा गया है। अग्निमें गिरकर अथवा मरुस्थलमें मरनेपर, दुर्गम मार्गमें गमन और अकाल-मृत्युपर, ब्राह्मणके लिये मरनेपर तथा संन्यासी होनेके उपरान्त मृत्यु होनेपर सद्यः शौचका विधान है॥ ६६—७०॥<br><br>विद्वानोंने नैष्ठिक अर्थात् जीवनभर ब्रह्मचर्यका व्रत धारण करनेवाले ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ-धर्मवलम्बी, यति तथा ब्रह्मचारीकी मृत्यु होनेपर और पतित व्यक्तिकी मृत्यु होनेपर अशौच नहीं बताया है। पतित व्यक्तियोंका न दाह होता है, न अन्त्येष्टि-संस्कार होता है और न अस्थिसंचय ही होता है। उनके लिये अश्रुपात, पिण्डदान तथा श्राद्धादि कार्य भी कभी नहीं करने चाहिये॥ ७१-७२॥<br><br>जो व्यक्ति अग्नि तथा विष आदिके द्वारा स्वयं अपनी आत्महत्या करता है, उसके निमित्त अशौच, दाह तथा उदकदान आदिका विधान नहीं है। यदि कोई प्रमादवश अग्नि अथवा विष आदिद्वारा मर जाता है, उसके (सम्बन्धियोंके) लिये अशौचका विधान है और उदकदान आदि भी करना चाहिये। पुत्रका जन्म होनेपर उस दिन स्वर्ण, धान्य, गौ, वस्त्र, तिल, अन्न, गुड़ तथा घृत—इन वस्तुओंका इच्छापूर्वक (कार्पण्यरहित होकर) दान करना चाहिये॥ ७३—७५॥ |


* भिन्न वर्णकी स्त्री होना अन्य युगमें शास्त्रानुसार सम्भव है।

३७८* कूर्मपुराण *

| फलानि पुष्पं शाकं च लवणं काष्ठमेव च।<br>तोयं दधि घृतं तैलमौषधं क्षीरमेव च।<br>आशौचिनां गृहाद् ग्राह्यं शुष्कान्नं चैव नित्यशः ॥ ७६ ॥<br><br>आहिताग्नेर्यथान्यायं दग्धव्यस्त्रिभिरग्निभिः।<br>अनाहिताग्निर्गृह्येण लौकिकेनेतरो जनः ॥ ७७ ॥<br><br>देहाभावात् पलाशैस्तु कृत्वा प्रतिकृतिं पुनः।<br>दाहः कार्यो यथान्यायं सपिण्डैः श्रद्धयान्वितैः ॥ ७८ ॥<br>सकृत्प्रसिञ्चन्त्युदकं नामगोत्रेण वाग्यताः।<br>दशाहं बान्धवैः सार्धं सर्वे चैवार्द्रवाससः ॥ ७९ ॥<br><br>पिण्डं प्रतिदिनं दद्युः सायं प्रातर्यथाविधि।<br>प्रेताय च गृहद्वारि चतुर्थे भोजयेद् द्विजान् ॥ ८० ॥<br>द्वितीयेऽहनि कर्तव्यं क्षुरकर्म सबान्धवैः।<br>चतुर्थे बान्धवैः सर्वैरस्थ्नां संचयनं भवेत्।<br>पूर्वं तु भोजयेद् विप्रानयुग्मान् श्रद्धया शुचीन् ॥ ८१ ॥<br><br>पञ्चमे नवमे चैव तथैवैकादशेऽहनि।<br>अयुग्मान् भोजयेद् विप्रान् नवश्राद्धं तु तद्विदुः ॥ ८२ ॥<br><br>एकादशेऽह्नि कुर्वीत प्रेतमुद्दिश्य भावतः।<br>द्वादशे वाथ कर्तव्यमनिन्द्ये त्वथवाहनि।<br>एकं पवित्रमेकोऽर्घः पिण्डपात्रं तथैव च ॥ ८३ ॥<br>एवं मृताह्नि कर्तव्यं प्रतिमासं तु वत्सरम्।<br>सपिण्डीकरणं प्रोक्तं पूर्णे संवत्सरे पुनः ॥ ८४ ॥<br><br>कुर्याच्चत्वारि पात्राणि प्रेतादीनां द्विजोत्तमाः।<br>प्रेतार्घं पितृपात्रेषु पात्रमासेचयेत् ततः॥ ८५ ॥ | आशौची व्यक्तियोंके घरोंसे फल, पुष्प, शाक, लवण, काष्ठ, मट्ठा, दही, घी, तेल, औषधि तथा क्षीर और शुष्कान्नको नित्य ग्रहण किया जा सकता¹ है। आहिताग्नि श्रोत्रियका दाह-संस्कार तीनों अग्नियोंसे यथाविधि करना चाहिये और अनाहिताग्निका² दाह गृह्याग्निसे तथा दूसरे सामान्य लोगोंका दाह लौकिक अग्निसे करना चाहिये। (मृत व्यक्तिके) देहका अभाव (शव न मिलनेपर) होनेपर पलाशके पत्तोंसे उसके ही समान आकृति बनाकर सपिण्डीजनोंको चाहिये कि वे श्रद्धायुक्त होकर विधिपूर्वक दाह-संस्कार करें ॥ ७६-७८ ॥<br><br>सभी बान्धवोंको संयमपूर्वक दस दिनोंतक (मृत व्यक्तिके) नाम तथा गोत्रका उच्चारण करते हुए स्नानके गीले वस्त्र पहने हुए ही एक बार जलदान करना चाहिये। प्रेतके निमित्त यथाविधि प्रातःसे सायंकाल (अर्थात् दिनमें किसी भी समय) प्रतिदिन पिण्डदान करना चाहिये और चौथे दिनसे घरके द्वारपर (अभ्यागत) ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये ॥ ७९-८० ॥<br><br>दूसरे दिन बान्धवोंके साथ क्षौरकर्म करना चाहिये। चौथे दिन बन्धुओंसहित अस्थिसंचयन करना चाहिये। अस्थिसंचयनसे पूर्व श्रद्धापूर्वक पवित्र अयुग्म (विषम संख्यावाले) ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। पाँचवें, नवें तथा ग्यारहवें दिन अयुग्म (विषम संख्यामें) ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। इसे नवश्राद्ध जानना चाहिये। प्रेतके निमित्त ग्यारहवें, बारहवें अथवा किसी अनिन्दित दिनमें श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करना चाहिये। इस श्राद्धमें एक पवित्र, एक अर्घ और एक ही पिण्डपात्र होता है ॥ ८१-८३ ॥<br><br>इसी प्रकार एक वर्षतक प्रत्येक महीनेमें मृत्युकी तिथिको श्राद्ध करना चाहिये। संवत्सर (वर्ष)-के पूर्ण हो जानेपर सपिण्डीकरण श्राद्ध करनेका विधान किया गया है। हे द्विजोत्तमो! प्रेतादि अर्थात् प्रेत, पितामह, प्रपितामह तथा वृद्ध प्रपितामहके उद्देश्यसे चार अर्घ-पात्र बनाना चाहिये और पितृपात्रोंमें प्रेतपात्रका अर्घ डालना चाहिये ॥ ८४-८५ ॥ |


१-यहाँ नित्य ग्रहणका इतना ही अर्थ है कि अनिवार्य होनेपर ये वस्तुएँ कभी भी ली जा सकती हैं। रागतः इन्हें ग्रहण नहीं करना चाहिये।
२-स्मार्त अग्न्याधान करनेवालेको भी अनाहिताग्नि ही माना जाता है।

* अध्याय २३ * ३७९


ये समाना इति द्वाभ्यां पिण्डानप्येवमेव हि।<br>सपिण्डीकरणं श्राद्धं देवपूर्वं विधीयते ॥ ८६ ॥'ये समानाः०' इन दो मन्त्रोंका उच्चारणकर पितामहादिके पिण्डोंमें प्रेतपिण्डको मिलाना चाहिये। देवश्राद्ध करनेके अनन्तर सपिण्डीकरण श्राद्ध करना चाहिये। पहले पितरोंका आवाहनकर पुनः प्रेतका आवाहन करना चाहिये। जिन प्रेतोंका सपिण्डीकरण कर लिया जाता है, उनकी श्राद्धक्रिया पृथक् नहीं होती। जो (सपिण्डीकृत प्रेतका) पृथक् पिण्डदान करता है, वह पितृघाती कहलाता है ॥ ८६-८७ ॥
पितॄनावाहयेत् तत्र पुनः प्रेतं च निर्दिशेत्।<br>ये सपिण्डीकृताः प्रेता न तेषां स्यात् पृथक्क्रियाः।<br>यस्तु कुर्यात् पृथक् पिण्डं पितृहा सोऽभिजायते ॥ ८७ ॥<br>मृते पितरि वै पुत्रः पिण्डमब्दं समाचरेत्।<br>दद्याच्चान्नं सोदकुम्भं प्रत्यहं प्रेतधर्मतः ॥ ८८ ॥पिताके मर जानेपर पुत्रको वर्षपर्यन्त पिण्डदान करना चाहिये। प्रतिदिन प्रेतधर्मानुसार उदककुम्भ एवं अन्नका दान करना चाहिये। प्रत्येक वर्ष पार्वण-विधानके अनुसार सांवत्सरिक श्राद्ध करना चाहिये। यही सनातन विधि है १। पुत्रोंको माता-पिताका पिण्डदान आदि जो कार्य है, वह सब करना चाहिये। पुत्रके अभाव होनेपर पत्नी करे और पत्नीके अभाव होनेपर सहोदर भाई करे। अथवा (पुत्रादि श्राद्ध न कर सकें या इनके अभावमें) सभी दान आदि कर्म करनेके बाद समाहित होकर मनुष्यको श्रद्धापूर्वक यथाविधान जीते हुए ही श्राद्ध कर लेना चाहिये (इससे श्राद्धकी अनिवार्यता स्पष्ट है) ॥ ८८-९१ ॥
पार्वणेन विधानेन सांवत्सरिकमिष्यते।<br>प्रतिसंवत्सरं कार्यं विधिरेष सनातनः ॥ ८९ ॥
मातापित्रोः सुतैः कार्यं पिण्डदानादिकं च यत्।<br>पत्नी कुर्यात् सुताभावे पत्न्यभावे सहोदरः ॥ ९० ॥<br>अनेनैव विधानेन जीवन् वा श्राद्धमाचरेत्।<br>कृत्वा दानादिकं सर्वं श्रद्धायुक्तः समाहितः ॥ ९१ ॥
एष वः कथितः सम्यग् गृहस्थानां क्रियाविधिः।<br>स्त्रीणां तु भर्तृशुश्रूषा धर्मो नान्य इहेष्यते ॥ ९२ ॥इस प्रकार मैंने आप लोगोंको गृहस्थोंकी क्रिया-विधि सम्यक्रूपसे बतलायी। स्त्रियोंका तो पतिकी सेवा करना ही एकमात्र धर्म है, उनका अन्य कोई धर्म नहीं कहा गया है। नित्य अपने धर्मका पालन करनेवाला और भगवान्में समर्पित मनवाला वेदज्ञोंद्वारा बताये गये उस परम पदको प्राप्त करता है २॥ ९२-९३ ॥
स्वधर्मपरमो नित्यमीश्वरार्पितमानसः।<br>प्राप्नोति तत् परं स्थानं यदुक्तं वेदवादिभिः ॥ ९३ ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें तेईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २३ ॥


१-इस वचनका तात्पर्य प्रतिवर्ष पार्वणश्राद्धमें है। सांवत्सरिक (एकोद्दिष्टश्राद्ध)-की विधि पार्वणविधिसे भिन्न है।
२-इस अध्यायमें श्राद्ध एवं अशौचका विधान संक्षेपमें सांकेतिक मात्र है। इसी आधारपर निर्णय नहीं लेना चाहिये। विभिन्न निबन्धग्रन्थोंसे श्राद्ध एवं अशौच-सम्बन्धी समस्त वचनोंका समाकलन कर सामान्य एवं अपवाद वचनादिकोंकी व्यवस्थाकर निष्कृष्ट निर्णय किया गया है। अतः उन्हींके आधारपर अन्तिम निर्णय लेना चाहिये। निबन्धग्रन्थोंमें सभी वचनोंका समन्वयकर युग, देश, काल आदिकी दृष्टिसे स्पष्ट व्यवस्था की गयी है।

३८० * कूर्मपुराण *


चौबीसवाँ अध्याय

अग्निहोत्रका माहात्म्य, अग्निहोत्रीके कर्तव्य, श्रौत एवं स्मार्तरूप द्विविध धर्म, तृतीय शिष्टाचारधर्म, वेद, धर्मशास्त्र और पुराणसे धर्मका ज्ञान तथा इनपर श्रद्धा रखना आवश्यक

व्यास उवाच**व्यासजीने कहा—**सदैव सायं और प्रातः अग्निहोत्र करना चाहिये। पक्षके अन्तमें अमावस्या और पौर्णमासीको हवन (दर्शेष्टि एवं पौर्णमासेष्टि) करना चाहिये। द्विजको फसल कट जानेपर नवशस्येष्टि, ऋतुकी समाप्तिपर (किया जानेवाला) यज्ञ एवं अयनके अन्तमें अर्थात् छः-छः महीनेपर संवत्सरके अन्तमें सौमिक याग करना चाहिये। दीर्घ आयुकी इच्छा करनेवाले अग्निहोत्री द्विजको नवशस्येष्टि किये बिना नया अन्न नहीं खाना चाहिये। नवीन अन्नका अग्निमें हवन किये बिना नवान्न खानेका इच्छुक व्यक्ति अपने प्राणोंको ही खाना चाहता है। प्रत्येक पर्वोंमें नित्य ही सावित्रीहोम, शान्ति-होम करना चाहिये तथा अष्टकाओं और अन्वष्टकाओंमें नियमसे नित्य पितरोंकी अर्चना करनी चाहिये॥ १—५॥
अग्निहोत्रं तु जुहुयादाद्यन्तेऽहर्निशोः सदा।<br>दर्शेन चैव पक्षान्ते पौर्णमासेन चैव हि॥ १ ॥<br><br>शस्यान्ते नवशस्येष्ट्या तथर्त्वन्ते द्विजोऽध्वरैः।<br>पशुना त्वयनस्यान्ते समान्ते सौमिकैर्मखैः॥ २ ॥<br><br>नानिष्ट्वा नवशस्येष्ट्या पशुना वाग्निमान् द्विजः।<br>नवान्नमद्यान्मांसं वा दीर्घमायुर्जिजीविषुः॥ ३ ॥<br><br>नवेनान्नेन चानिष्ट्वा पशुहव्येन चाग्नयः।<br>प्राणानेवात्तुमिच्छन्ति नवान्नामिषगृद्धिनः॥ ४ ॥<br><br>सावित्रान् शान्तिहोमांश्च कुर्यात् पर्वसु नित्यशः।<br>पितॄंश्चैवाष्टकास्वर्चन् नित्यमन्वष्टकासु च॥ ५ ॥
एष धर्मः परो नित्यमपधर्मोऽन्य उच्यते।<br>त्रयाणामिह वर्णानां गृहस्थाश्रमवासिनाम्॥ ६ ॥<br><br>नास्तिक्यादथवालस्याद् योऽग्नीन् नाधातुमिच्छति।<br>यजेत वा न यज्ञेन स याति नरकान् बहून्॥ ७ ॥गृहस्थाश्रममें निवास करनेवाले तीनों वर्णों (द्विजाति)-का यह नियमित श्रेष्ठ धर्म है, अन्य धर्म अपधर्म कहलाता है। नास्तिकता अथवा आलस्यके कारण जो अग्नियोंका आधान एवं यज्ञसे यजन नहीं करना चाहता, वह बहुतसे नरकोंमें जाता है॥ ६-७॥
तामिस्रमन्धतामिस्रं महारौरवरौरवौ।<br>कुम्भीपाकं वैतरणीमसिपत्रवनं तथा॥ ८ ॥<br><br>अन्यांश्च नरकान् घोरान् सम्प्राप्यान्ते सुदुर्मतिः।<br>अन्त्यजानां कुले विप्राः शूद्रयोनौ च जायते॥ ९ ॥<br><br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन ब्राह्मणो हि विशेषतः।<br>आधायाग्निं विशुद्धात्मा यजेत परमेश्वरम्॥ १०॥<br><br>अग्निहोत्रात् परो धर्मो द्विजानां नेह विद्यते।<br>तस्मादाराधयेन्नित्यमग्निहोत्रेण शाश्वतम्॥ ११॥<br><br>यश्चाधायाग्निमालस्यान्न यष्टुं देवमिच्छति।<br>सोऽसौ मूढो न सम्भाष्यः किं पुनर्नास्तिको जनः॥ १२॥विप्रो! (अग्न्याधान आदि कृत्य न करनेवाला) वह दुर्मति तामिस्र, अन्धतामिस्र, महारौरव, रौरव, कुम्भीपाक, वैतरणी, असिपत्रवन तथा अन्य घोर नरकोंको प्राप्तकर बादमें अन्त्यजोंके कुल तथा शूद्रयोनिमें जन्म लेता है। अतः विशेषरूपसे विशुद्धात्मा ब्राह्मणोंको सभी प्रकारके प्रयत्नोंद्वारा अग्निका आधानकर परमेश्वरका यजन-पूजन करना चाहिये। द्विजोंके लिये अग्निहोत्रसे श्रेष्ठ कोई अन्य धर्म नहीं है। इसलिये अग्निहोत्रके द्वारा नित्य शाश्वत (पुरुष)-की आराधना करनी चाहिये। जो अग्निका आधानकर फिर आलस्यवश यज्ञद्वारा देवताकी आराधना नहीं करना चाहता, वह व्यक्ति मूढ़ होता है, उससे बात नहीं करनी चाहिये। अधिक क्या, वह मनुष्य नास्तिक होता है॥ ८—१२॥
* अध्याय २४ *३८१
यस्य त्रैवार्षिकं भक्तं पर्याप्तं भृत्यवृत्तये।<br>अधिकं चापि विद्येत स सोमं पातुमर्हति॥ १३॥<br><br>एष वै सर्वयज्ञानां सोमः प्रथम इष्यते।<br>सोमेनाराधयेद् देवं सोमलोकमहेश्वरम्॥ १४॥<br><br>न सोमयागादधिको महेश्वराराधने क्रतुः।<br>समो वा विद्यते तस्मात् सोमेनाभ्यर्चयेत् परम्॥ १५॥जिसके पास सेवकोंके पोषणहेतु तीन वर्षतकके लिये पर्याप्त अथवा उससे भी अधिक (भोजन) सामग्री विद्यमान हो, वह सोमपानका अधिकारी होता है। सभी यज्ञोंमें सोमयाग सबसे श्रेष्ठ है। सोमद्वारा सोमलोकमें स्थित महेश्वरदेवकी आराधना करनी चाहिये। महेश्वरकी आराधनाके लिये सोमयागसे बड़ा अथवा उसके समान कोई यज्ञ नहीं है। इसलिये सोमके द्वारा श्रेष्ठ देवकी आराधना करनी चाहिये॥ १३-१५॥
पितामहेन विप्राणामादावभिहितः शुभः।<br>धर्मो विमुक्तये साक्षाच्छ्रौतः स्मार्तो द्विधा पुनः॥ १६॥<br><br>श्रौतस्त्रेताग्निसम्बन्धात् स्मार्तः पूर्वं मयोदितः।<br>श्रेयस्करतमः श्रौतस्तस्माच्छ्रौतं समाचरेत्॥ १७॥<br><br>उभाववभिहितौ धर्मौ वेदादेव विनिःसृतौ।<br>शिष्टाचारस्तृतीयः स्याच्छ्रुतिस्मृत्योरलाभतः॥ १८॥ब्राह्मणोंकी मुक्तिके लिये साक्षात् पितामहने आरम्भमें ही शुभ धर्म बतलाया है, वह श्रौत तथा स्मार्त नामसे दो प्रकारका है। तीन (आहवनीय, दक्षिणाग्नि, गार्हपत्यग्नि) अग्नियोंके सम्बन्धसे श्रौतधर्म होता है। स्मार्तधर्मको मैंने पूर्वमें बता दिया है। श्रौतधर्म अधिक श्रेयस्कर है, इसलिये श्रौतधर्मका पालन करना चाहिये। कहे गये ये दोनों धर्म वेदसे ही निकले हुए हैं। श्रुति तथा स्मृतिके अभावमें शिष्टाचार ही तीसरा धर्म होता* है॥ १६-१८॥
धर्मेणाभिगतो यैस्तु वेदः सपरिवृंहणः।<br>ते शिष्टा ब्राह्मणाः प्रोक्ता नित्यमात्मगुणान्विताः॥ १९॥<br><br>तेषामभिमतो यः स्याच्चेतसा नित्यमेव हि।<br>स धर्मः कथितः सद्भिर्नान्येषामिति धारणा॥ २०॥परिवृंहण (रामायण, महाभारत एवं पुराणादि ग्रन्थ) सहित वेदोंका धर्मपूर्वक ज्ञान प्राप्त करनेवाले और (दया, अहिंसा, सत्य आदि आठ) आत्मिक गुणोंसे सम्पन्न ब्राह्मण सदैव शिष्ट कहे गये हैं। इनके (शिष्टजनोंके) अन्तःकरणद्वारा जो समर्थित होता है, विद्वानोंद्वारा उसे ही धर्म कहा गया है। अन्य लोगोंके अभिमतको धर्म नहीं कहा जाता, यही निश्चित सिद्धान्त है॥ १९-२०॥
पुराणं धर्मशास्त्रं च वेदानामुपबृंहणम्।<br>एकस्माद् ब्रह्मविज्ञानं धर्मज्ञानं तथैकतः॥ २१॥<br><br>धर्मं जिज्ञासमानानां तत्प्रमाणतरं स्मृतम्।<br>धर्मशास्त्रं पुराणं तद् ब्रह्मज्ञाने परा प्रमा॥ २२॥<br><br>नान्यतो जायते धर्मो ब्रह्मविद्या च वैदिकी।<br>तस्माद् धर्मं पुराणं च श्रद्धातव्यं द्विजातिभिः॥ २३॥पुराण तथा धर्मशास्त्र वेदोंके उपबृंहण (विस्तार) हैं। एकसे ब्रह्मका विशेष ज्ञान होता है और दूसरेसे धर्मका ज्ञान होता है। धर्मकी जिज्ञासा करनेवालोंके लिये धर्मशास्त्र श्रेष्ठ प्रमाण कहा गया है और ब्रह्मज्ञानके लिये पुराण उत्कृष्ट प्रमाण है। वेदसे अतिरिक्त अन्य किसीसे धर्मका तथा वैदिक ब्रह्मविद्याका ज्ञान नहीं होता, इसलिये द्विजातियोंको धर्मशास्त्र तथा पुराणपर श्रद्धा रखनी चाहिये॥ २१-२३॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे चतुर्विंशोऽध्यायः॥ २४॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें चौबीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २४॥


* शिष्टाचारका भी मूल श्रुति एवं तन्मूलक स्मृति ही होती है। श्रुतियाँ अनन्त हैं, उनमें वर्णित धर्मोंका क्रमसे प्रसंगानुसार संग्रह करनेवाली स्मृतियाँ भी अनेक हैं। अतः सभी श्रुतियों एवं तन्मूलक स्मृतियोंका ज्ञान अल्पज्ञ मानवको नहीं भी हो सकता है। ऐसी स्थितिमें धर्माधर्म-विवेकमें कठिनाई होना अस्वाभाविक नहीं है। इसीलिये शिष्टोंके आचारसे धर्माधर्मका निर्णय करना पड़ता है और इस निर्णयके मूलमें यही भाव निहित है कि शिष्ट वही आचरण करते हैं जो श्रुति एवं तन्मूलक स्मृतिमें प्रतिपादित है।

३८२ * कूर्मपुराण *

पचीसवाँ अध्याय

गृहस्थ ब्राह्मणकी मुख्य वृत्ति तथा आपत्कालकी वृत्ति, गृहस्थके साधक तथा असाधक दो भेद, न्यायोपार्जित धनका विभाग एवं उसका उपयोग

व्यास उवाच
एष वोऽभिहितः कृत्स्नो गृहस्थाश्रमवासिनः।
द्विजातेः परमो धर्मो वर्तनानि निबोधत ॥ १ ॥
द्विविधस्तु गृही ज्ञेयः साधकश्चाप्यसाधकः।
अध्यापनं याजनं च पूर्वस्याहुः प्रतिग्रहम्।
कुसीदकृषिवाणिज्यं प्रकुर्वीतास्वयंकृतम् ॥ २ ॥

कृषेरभावाद् वाणिज्यं तदभावात् कुसीदकम्।
आपत्कल्पो ह्ययं ज्ञेयः पूर्वोक्तो मुख्य इष्यते ॥ ३ ॥

स्वयं वा कर्षणं कुर्याद् वाणिज्यं वा कुसीदकम्।
कष्टा पापीयसी वृत्तिः कुसीदं तद् विवर्जयेत् ॥ ४ ॥
क्षात्रवृत्तिं परां प्राहुर्न स्वयं कर्षणं द्विजैः।
तस्मात् क्षात्रेण वर्तेत वर्तनेनापदि द्विजः ॥ ५ ॥

तेन नावाप्यजीवंस्तु वैश्यवृत्तिं कृषिं व्रजेत्।
न कथंचन कुर्वीत ब्राह्मणः कर्म कर्षणम् ॥ ६ ॥

लब्धलाभः पितॄन् देवान् ब्राह्मणांश्चापि पूजयेत्।
ते तृप्तास्तस्य तं दोषं शमयन्ति न संशयः ॥ ७ ॥
देवेभ्यश्च पितृभ्यश्च दद्याद् भागं तु विंशकम्।
त्रिंशद्भागं ब्राह्मणानां कृषिं कुर्वन् न दुष्यति ॥ ८ ॥

वणिक् प्रदद्याद् द्विगुणं कुसीदी त्रिगुणं पुनः।
कृषीवलो न दोषेण युज्यते नात्र संशयः ॥ ९ ॥


**व्यासजीने कहा—**यह मैंने आप लोगोंको गृहस्थाश्रममें निवास करनेवाले द्विजातियोंका सम्पूर्ण श्रेष्ठ धर्म बतलाया, अब उनकी वृत्तियोंका वर्णन सुनें ॥ १ ॥

साधक तथा असाधक-भेदसे (ब्राह्मण) गृहस्थको दो प्रकारका समझना चाहिये। पहले (साधक गृहस्थकी आजीविका) अध्ययन कराना, यज्ञ कराना और (दान लेना) है। इसके अतिरिक्त वे अपने द्वारा न किये गये कुसीद (ब्याजका लेन-देन), कृषि तथा वाणिज्य भी अन्यके द्वारा करा सकते हैं। कृषिके अभावमें वाणिज्य और उसके अभावमें कुसीदका आश्रय लिया जा सकता है। इसे आपत्कल्प कहा गया है और पहलेको मुख्यवृत्ति कही गयी है। अथवा (आपत्कालमें अन्य उपाय न होनेपर) स्वयं कृषि, वाणिज्य अथवा कुसीद-वृत्तिका आश्रय ले। कुसीद-वृत्ति (सूद लेना) अत्यन्त कष्टकारक और पापकी वृत्ति है, इसलिये इसका परित्याग करना चाहिये ॥ २–४ ॥

क्षात्रवृत्तिको (कृषिवृत्तिकी अपेक्षा) श्रेष्ठ वृत्ति कहा गया है, किंतु द्विजोंको स्वयं कर्षण नहीं करना चाहिये। अतएव द्विजको आपत्तिमें (ही) क्षात्रधर्मसे भी जीविकाका निर्वाह करना चाहिये। उस क्षात्रवृत्ति (शस्त्र-जीविका)-द्वारा भी निर्वाह न होनेपर कृषिस्वरूप वैश्यवृत्तिका आश्रय लेना चाहिये, किंतु ब्राह्मणको कभी भी खेत जोतनेका कार्य नहीं करना चाहिये। लाभ होनेपर (विशेषकर अन्य वर्णकी जीविकासे लाभ मिलनेपर अवश्य ही) पितरों, देवताओं तथा ब्राह्मणोंका पूजन करना चाहिये। तृप्त होनेपर वे उसके उस (कर्मजन्य) दोषको शान्त कर देते हैं, इसमें संशय नहीं ॥ ५–७ ॥

देवताओं और पितरोंको (कृषिसे प्राप्त लाभका) बीसवाँ भाग (५ प्रतिशत) और ब्राह्मणोंको तीसवाँ भाग (३ १/३ प्रतिशत) देना चाहिये। ऐसी अवस्थामें कृषिकर्म करनेवाला दोषी नहीं होता। वाणिज्य करनेपर (कृषिजन्य लाभसे दिये जानेवाले अंशकी अपेक्षा) दुगुना, कुसीद-वृत्तिपर तिगुना दान करना चाहिये। ऐसा करनेसे कृषि करनेवाला निस्संदेह दोषी नहीं होता ॥ ८–९ ॥

* अध्याय २५ *३८३
शिलोञ्छं वाप्याददीत गृहस्थः साधकः पुनः।<br>विद्याशिल्पादयस्त्वन्ये बहवो वृत्तिहेतवः॥ १०॥अथवा साधक (ब्राह्मण) गृहस्थको शिलोञ्छवृत्तिका^१ आश्रय लेना चाहिये। विद्या तथा शिल्प आदि भी अन्य बहुतसे जीविकाके साधन हैं। गृहस्थाश्रममें रहनेवाला जो असाधक (नामका दूसरा गृहस्थ) कहा गया है, श्रेष्ठ महर्षियोंद्वारा उसके लिये शिल तथा उञ्छ नामक दो वृत्तियाँ कही गयी हैं। अमृत अथवा मृत साधनद्वारा जीवनयापन करना चाहिये। अयाचित पदार्थ अमृत और याचनाद्वारा भिक्षास्वरूप प्राप्त वस्तु मृत होती है॥ १०—१२॥
असाधकस्तु यः प्रोक्तो गृहस्थाश्रमसंस्थितः।<br>शिलोञ्छे तस्य कथिते द्वे वृत्ती परमर्षिभिः॥ ११॥
अमृतेनाथवा जीवेन्मृतेनाप्यथवा यदि।<br>अयाचितं स्यादमृतं मृतं भैक्षं तु याचितम्॥ १२॥
कुशूलधान्यको वा स्यात् कुम्भीधान्यक एव वा।<br>त्र्यहैहिको वापि भवेदश्वस्तनिक एव च॥ १३॥ब्राह्मणको कुशूलधान्यक (तीन वर्षोंतकके लिये संचित धान्यवाला), कुम्भीधान्यक (एक वर्षतकके लिये संचित धान्यवाला), त्र्यैहिक (तीन दिनोंतकके लिये संचित धान्यवाला) अथवा अश्वस्तनिक (अगले दिनके लिये भी धान्य संचित न करनेवाला) होना चाहिये। इन (उपर्युक्त) चार प्रकारके गृहस्थ द्विजों (ब्राह्मणों)-में उत्तरोत्तर श्रेष्ठ होता है (ऐसा ब्राह्मण) अपने धर्मके कारण श्रेष्ठ लोकजयी (स्वर्ग आदि लोकोंको जीतनेवाला) होता है। इनमें कोई (जिनके पास पोष्य-वर्ग अधिक है) द्विज (ब्राह्मण) षट्कर्मोंसे^२ अपनी जीविका निर्वाह करते हैं, दूसरे (अल्प परिग्रहवाले) कुछ द्विज (ब्राह्मण) तीन साधनोंसे^३ निर्वाह करते हैं, कुछ दो^४ साधनोंसे और चौथे प्रकारके ब्राह्मण ब्रह्मयज्ञ (अध्यापन)-द्वारा आजीविका चलाते हैं॥ १३—१५॥
चतुर्णामपि चैतेषां द्विजानां गृहमेधिनाम्।<br>श्रेयान् परः परो ज्ञेयो धर्मतो लोकजित्तमः॥ १४॥
षट्कर्मैको भवत्येषां त्रिभिरन्यः प्रवर्तते।<br>द्वाभ्यामेकश्चतुर्थस्तु ब्रह्मसत्रेण जीवति॥ १५॥
वर्तयंस्तु शिलोञ्छाभ्यामग्निहोत्रपरायणः।<br>इष्टीः पार्वयणांतीयाः केवला निर्वपेत् सदा॥ १६॥जो ब्राह्मण केवल उञ्छ या शिल-वृत्तिसे अपना निर्वाह करे वह (धनसाध्य अन्य कर्मोंके अनुष्ठानमें असमर्थ होनेके कारण) केवल नित्य-कर्म अग्निहोत्रको ही करता रहे तथा पर्व एवं अयनके मध्य सम्पन्न की जानेवाली दर्शपौर्णमास एवं आग्रयण इष्टियाँ करता रहे॥ १६॥

१-जिस धान्यपर पशु-पक्षीतकका भी अधिकार नहीं है, उसके एक-एक कण (कणसमूह-मंजरीको छोड़ देना है)-को प्रतिदिन अंगुलीसे उठाकर एकत्र किया जाय और उसीसे जीविका निर्वाह किया जाय—यह उञ्छवृत्ति है और यदि धान्य-समूहरूप मंजरीका भी संग्रह प्रतिदिन करके जीविकानिर्वाह किया जाय तो यह 'शिल' वृत्ति है। ये दोनों वृत्तियाँ ब्राह्मणके लिये श्रेष्ठ हैं। इनमें भी प्रथम वृत्ति सर्वोत्तम है।
२-ऋत (उञ्छ, शिल), अयाचित, भैक्ष, कृषि, वाणिज्य तथा कुसीद—ये ही षट्कर्म हैं।
३-याजन, अध्यापन, परिग्रह—ये तीन साधन हैं।
४-याजन, अध्यापन—ये दो साधन हैं।

३८४ | * कूर्मपुराण *


न लोकवृत्तिं वर्तेत वृत्तिहेतोः कथंचन ।<br>अजिह्रामशठां शुद्धां जीवेद् ब्राह्मणजीविकाम् ॥ १७॥ब्राह्मण जीविकाके लिये लोकवृत्ति (विचित्र हास-परिहास आदिसे युक्त लोककथा आदि)-का आश्रय कभी न करे। अजिह्र (किसीकी झूठी निन्दा-स्तुति आदिके वर्णनरूप पापसे रहित), अशठ (दम्भ आदि अनेक प्रकारके बनावटी व्यवहारसे शून्य), शुद्ध (वैश्य आदिकी जीवनवृत्तिसे असम्बद्ध) शास्त्रीय वृत्तिका ही आश्रयण करना चाहिये ॥ १७ ॥
याचित्वा वापि सद्भ्योऽन्नं पितॄन् देवांस्तु तोषयेत् ।<br>याचयेद् वा शुचिं दान्तं न तृप्येत स्वयं ततः ॥ १८ ॥उसे (ब्राह्मणको) सज्जनोंसे अन्न माँगकर भी पितरों तथा देवताओंको संतुष्ट करना चाहिये। अथवा पवित्र इन्द्रियजयी व्यक्तियोंसे याचना करे, किंतु उससे स्वयं तृप्त न होवे (अर्थात् उस याचित द्रव्यका उपयोग स्वयंके लिये न करे)। जो गृहस्थ द्रव्योपार्जन करके देवताओं तथा पितरोंको विधिपूर्वक संतुष्ट नहीं करता है, वह कुत्तेकी योनिमें जाता है ॥ १८-१९॥
यस्तु द्रव्यार्जनं कृत्वा गृहस्थस्तोषयेन्न तु।<br>देवान् पितॄंश्च विधिना शुनां योनिं व्रजत्यसौ ॥ १९ ॥<br>धर्मश्चार्थश्च कामश्च श्रेयो मोक्षश्चतुष्टयम् ।<br>धर्माविरुद्धः कामः स्याद् ब्राह्मणानां तु नेतरः ॥ २० ॥धर्म, अर्थ, काम तथा कल्याणकारी मोक्ष नामक चार पुरुषार्थ हैं। ब्राह्मणोंका काम (नामक पुरुषार्थ) धर्मका अविरोधी होना चाहिये, इससे भिन्न (अर्थात् धर्मविरोधी कथमपि) नहीं होना चाहिये। जो अर्थ धर्मके लिये होता है अपने लिये नहीं वह (वास्तविक) अर्थ है, इससे भिन्न प्रकारका अर्थ तो अनर्थ है। इसलिये (धर्मपूर्वक) अर्थ प्राप्त होनेपर दान, हवन तथा यज्ञ करना चाहिये ॥ २०-२१ ॥
योऽर्थो धर्माय नात्मार्थः सोऽर्थोऽनर्थस्तथेतरः।<br>तस्मादर्थं समासाद्य दद्याद् वै जुहुयाद् यजेत् ॥ २१ ॥
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इति श्रीकूर्मपुराणे षत्साहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें पचीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २५ ॥


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* अध्याय २६ * ३८५


छब्बीसवाँ अध्याय

दानधर्मका निरूपण एवं नित्य, नैमित्तिक, काम्य तथा विमल-चतुर्विध दान-भेद, दानके अधिकारी तथा अनधिकारी, कामना-भेदसे विविध देवताओंकी आराधनाका विधान, ब्राह्मणकी महिमा तथा दानधर्मप्रकरणका उपसंहार

व्यास उवाचव्यासजीने कहा— अब मैं श्रेष्ठ दानधर्मका वर्णन करूँगा। इसे पूर्वमें ब्रह्माजीने ब्रह्मवादी ऋषियोंसे कहा था—॥ १॥
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि दानधर्ममनुत्तमम्।<br>ब्रह्मणाभिहितं पूर्वमृषीणां ब्रह्मवादिनाम्॥ १ ॥<br>अर्थानामुदिते पात्रे श्रद्धया प्रतिपादनम्।<br>दानमित्यभिनिर्दिष्टं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्॥ २ ॥<br><br>यद् ददाति विशिष्टेभ्यः श्रद्धया परया युतः।<br>तद् वै वित्तमहं मन्ये शेषं कस्यापि रक्षति॥ ३ ॥<br><br>नित्यं नैमित्तिकं काम्यं त्रिविधं दानमुच्यते।<br>चतुर्थं विमलं प्रोक्तं सर्वदानोत्तमोत्तमम्॥ ४ ॥उदित अर्थात् वेदवेदाङ्गाध्ययन करनेवाले प्रशस्त पात्रमें अर्थके श्रद्धापूर्वक प्रतिपादनको दान कहा गया है। यह भोग तथा मोक्षरूप फलको देनेवाला है। विशिष्ट अर्थात् सदाचारसम्पन्न व्यक्तियों (ब्राह्मणों)-को अत्यन्त श्रद्धासम्पन्न होकर जो धन दिया जाता है, उसे ही मैं धन मानता हूँ। अवशिष्ट धन (तो किसी दूसरेका ही है, वह) किसी अन्यकी रक्षा करता है। नित्य, नैमित्तिक तथा काम्य—इस प्रकारसे दान तीन प्रकारका कहा गया है। चौथा दान विमल-दान कहा गया है, जो सभी दानोंमें उत्तमोत्तम है॥ २–४॥
अहन्यहनि यत् किंचिद् दीयतेऽनुपकारिणे।<br>अनुद्दिश्य फलं तस्माद् ब्राह्मणाय तु नित्यकम्॥ ५ ॥<br><br>यत् तु पापोपशान्त्यर्थं दीयते विदुषां करे।<br>नैमित्तिकं तदुद्दिष्टं दानं सद्द्भिरनुष्ठितम्॥ ६ ॥<br><br>अपत्यविजयैश्वर्यस्वर्गार्थं यत् प्रदीयते।<br>दानं तत् काम्यमाख्यातमृषिभिर्धर्मचिन्तकैः॥ ७ ॥<br><br>यदीश्वरप्रीणनार्थं ब्रह्मवित्सु प्रदीयते।<br>चेतसा धर्मयुक्तेन दानं तद् विमलं शिवम्॥ ८ ॥प्रत्येक दिन बिना किसी फल-प्राप्तिरूप प्रयोजनके अर्थात् निःस्वार्थभावसे (कर्तव्य समझकर) जो कुछ भी अनुपकारी (जिससे अपना उपकार करानेकी तनिक भी आशा न हो ऐसे) ब्राह्मणको दिया जाता है, वह नित्य-दान कहलाता है। पापके शमन करनेके लिये विद्वान् (ब्राह्मणों)-के हाथमें जो दिया जाता है, उसे नैमित्तिक दान कहा गया है। सज्जनोंद्वारा इसका अनुष्ठान किया जाता है। संतान, विजय, ऐश्वर्य तथा स्वर्ग-प्राप्तिके लिये जो दान दिया जाता है, वह धर्मविचारक ऋषियोंके द्वारा काम्य-दान कहा गया है। ईश्वरकी प्रसन्नताके लिये धर्मभावनासे ब्रह्मज्ञानियोंको जो दिया जाता है, वह कल्याणकारी दान विमल-दान कहलाता है॥ ५–८॥
दानधर्मं निषेवेत पात्रमासाद्य शक्तितः।<br>उत्पत्स्यते हि तत्पात्रं यत् तारयति सर्वतः॥ ९ ॥<br><br>कुटुम्बभक्तवसनाद् देयं यदतिरिच्यते।<br>अन्यथा दीयते यद्धि न तद् दानं फलप्रदम्॥ १०॥सत्पात्र उपलब्ध होनेपर यथाशक्ति दानधर्मका पालन अवश्य करना चाहिये; क्योंकि वह सत्पात्र कदाचित् ही सौभाग्यसे उपलब्ध होता है जो दाताका हर तरहसे उद्धार कर देता है। कुटुम्बके भरण-पोषणसे अधिक अवशिष्ट पदार्थका दान करना चाहिये। इससे भिन्न प्रकारका दिया जानेवाला दान फलप्रद नहीं होता॥ ९-१०॥
३८६* कूर्मपुराण *
श्रोत्रियाय कुलीनाय विनीताय तपस्विने।<br>वृत्तस्थाय दरिद्राय प्रदेयं भक्तिपूर्वकम् ॥ ११॥<br><br>यस्तु दद्यान्महीं भक्त्या ब्राह्मणाय्याहिताग्नये।<br>स याति परमं स्थानं यत्र गत्वा न शोचति ॥ १२ ॥<br><br>इक्षुभिः संततां भूमिं यवगोधूमशालिनीम्।<br>ददाति वेदविदुषे यः स भूयो न जायते ॥ १३ ॥<br><br>गोचर्ममात्रामपि वा यो भूमिं सम्प्रयच्छति।<br>ब्राह्मणाय दरिद्राय सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १४ ॥<br><br>भूमिदानात् परं दानं विद्यते नेह किञ्चन।<br>अन्नदानं तेन तुल्यं विद्यादानं ततोऽधिकम् ॥ १५ ॥<br><br>यो ब्राह्मणाय शान्ताय शुचये धर्मशालिने।<br>ददाति विद्यां विधिना ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६॥<br><br>दद्यादहरहस्त्वन्नं श्रद्धया ब्रह्मचारिणे।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मणः स्थानमाप्नुयात् ॥ १७॥<br><br>गृहस्थायान्नदानेन फलं प्राप्नोति मानवः।<br>आममेवास्य दातव्यं दत्त्वाप्नोति परां गतिम् ॥ १८॥<br><br>वैशाख्यां पौर्णमास्यां तु ब्राह्मणान् सप्त पञ्च वा।<br>उपोष्य विधिना शान्तः शुचिः प्रयतमानसः ॥ १९ ॥<br><br>पूजयित्वा तिलैः कृष्णैर्मधुना च विशेषतः।<br>गन्धादिभिः समभ्यर्च्य वाचयेद् वा स्वयं वदेत् ॥ २० ॥<br><br>प्रीयतां धर्मराजेति यद् वा मनसि वर्तते।<br>यावज्जीवकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति ॥ २१ ॥<br><br>कृष्णाजिने तिलान् कृत्वा हिरण्यं मधुसर्पिषी।<br>ददाति यस्तु विप्राय सर्वं तरति दुष्कृतम् ॥ २२ ॥श्रोत्रिय, कुलीन, विनयी, तपस्वी, सदाचारी तथा धनहीन (ब्राह्मण)-को भक्तिपूर्वक दान देना चाहिये। जो अग्निहोत्री ब्राह्मणको भक्तिपूर्वक भूमिको दान करता है, वह उस परमपदको प्राप्त करता है, जहाँ जानेपर शोक नहीं करना पड़ता। ईख, जौ तथा गेहूँसे फली हुई विस्तृत भूमिको जो वेदज्ञ (ब्राह्मण)-को दानमें देता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। अथवा गोचर्म* (भूमिकी एक विशेष माप)-के बराबर भूमि जो धनहीन ब्राह्मणको दानमें देता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। इस संसारमें भूमिदानसे श्रेष्ठ दान और कुछ भी नहीं है। उसके समान ही अन्नदान है और विद्यादान उससे बड़ा है ॥ ११–१५॥<br><br>जो पवित्र, शान्त, धर्माचरणसम्पन्न ब्राह्मणको विधिपूर्वक विद्या प्रदान करता है, वह ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। ब्रह्मचारीको प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक अन्नदान करना चाहिये। इससे (दाता) सभी पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है। गृहस्थ (ब्राह्मण)-को अन्नदान करनेसे मनुष्य (महान्) फल प्राप्त करता है। इसे आमान्न अर्थात् अपक्व अन्न ही देना चाहिये, दान देकर वह परम गति प्राप्त करता है ॥ १६–१८॥<br><br>वैशाखमासकी पूर्णमासीको संयतचित्तसे उपवासकर शान्ति और पवित्रतापूर्वक सात या पाँच ब्राह्मणोंकी विधिपूर्वक काले तिलों विशेषरूपसे मधु तथा गन्ध आदि उपचारोंसे अच्छी प्रकारसे पूजा करे तथा (सविधि भोजन कराकर) जो मनमें है उसका स्मरण करते हुए उन ब्राह्मणोंसे 'प्रीयतां धर्मराज' अर्थात् 'धर्मराज प्रसन्न हों' यह वाक्य कहलाये अथवा स्वयं कहे। इससे सम्पूर्ण जीवनमें किया हुआ पाप तत्क्षण ही नष्ट हो जाता है ॥ १९–२१॥<br><br>कृष्णाजिन नामके वृक्ष विशेषसे निर्मित पात्रमें तिल, स्वर्ण, मधु तथा घृत रखकर जो ब्राह्मणको देता है, वह सभी पापोंसे पार हो जाता है ॥ २२॥

* आचार्य बृहस्पतिने 'गोचर्म-भूमि' कितनी लंबी-चौड़ी होती है—इसे बताते हुए कहा है कि दस हाथके दण्डसे तीस दण्डका एक निवर्तन होता है और दस निवर्तन विस्तारवाली भूमि 'गोचर्म-भूमि' कहलाती है। इस प्रकार (१० हाथ=एक दण्ड, तीस दण्ड=३०० हाथ या एक निवर्तन और १० निवर्तन=३००० हाथ) तीन हजार हाथ या लगभग १ १/२ कि० मी० लंबी-चौड़ी भूमि 'गोचर्म-भूमि' कहलाती है। गोचर्म-भूमिका एक अन्य परिमाप देते हुए कहा गया है कि एक वृषभ तथा बछड़े-बछड़ियोंसहित एक हजार गायें, जितनी भूमिमें आरामसे इधर-उधर टहल सकें, घूम-फिर सकें, उतनी लंबी-चौड़ी भूमि 'गोचर्म-भूमि' कहलाती है।

७. उत्तरविभाग (अध्याय २६-३३) — दानधर्म, वानप्रस्थ, संन्यास, प्रायश्चित्त व कपालमोचन तीर्थ

* अध्याय २६ *३८७
कृतान्नमुदकुम्भं च वैशाख्यां च विशेषतः।<br>निर्दिश्य धर्मराजाय विप्रेभ्यो मुच्यते भयात्॥ २३॥विशेषरूपसे वैशाखमासकी पूर्णिमाको ब्राह्मणोंको जो कृतान्न-पक्वान्न (अथवा सत्तू) तथा जलसे भरा घड़ा धर्मराजके उद्देश्यसे देता है, वह भयसे मुक्त हो जाता है। जो सात अथवा पाँच ब्राह्मणोंको स्वर्ण तथा तिलसे युक्त जलपूर्ण घड़ोंसे संतुष्ट करता है, वह ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है। माघमासकी (कृष्ण) द्वादशीको उपवास करके शुक्ल वस्त्र धारणकर काले तिलोंसे अग्निमें हवन कर जो विप्र (द्विज) समाहित होकर ब्राह्मणोंको (कृष्ण) तिल दान करता है, वह (द्विज) जन्मसे आजतकके सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ २३—२६॥
सुवर्णतिलयुक्तैस्तु ब्राह्मणान् सप्त पञ्च वा।<br>तर्पयेदुदपात्रैस्तु ब्रह्महत्यां व्यपोहति॥ २४॥
माघमासे तु विप्रस्तु द्वादश्यां समुपोषितः।<br>शुक्लाम्बरधरः कृष्णैस्तिलैर्हुत्वा हुताशनम्॥ २५॥
प्रदद्याद् ब्राह्मणेभ्यस्तु तिलानेव समाहितः।<br>जन्मप्रभृति यत्पापं सर्वं तरति वै द्विजः॥ २६॥
अमावास्यामनुप्राप्य ब्राह्मणाय तपस्विने।<br>यत्किंचिद् देवदेवेशं दद्याच्चोद्दिश्य शंकरम्॥ २७॥अमावस्या आनेपर जो देवदेवेश भगवान् शंकरको उद्दिष्ट कर ‘प्रीयतामीश्वरः सोमो महादेवः सनातनः’ अर्थात् (इस दानसे) ‘सनातन महादेव ईश्वर सोम प्रसन्न हों’ ऐसा कहकर तपस्वी ब्राह्मणको जो कुछ भी दान देता है, उससे सात जन्मोंमें किया हुआ उसका पाप उसी क्षण नष्ट हो जाता है॥ २७-२८॥
प्रीयतामीश्वरः सोमो महादेवः सनातनः।<br>सप्तजन्मकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति॥ २८॥
यस्तु कृष्णचतुर्दश्यां स्नात्वा देवं पिनाकिनम्।<br>आराधयेद् द्विजमुखे न तस्यास्ति पुनर्भवः॥ २९॥जो कृष्ण चतुर्दशीको स्नान करनेके अनन्तर भगवान् पिनाकीकी आराधनाकर ब्राह्मणको भोजन कराता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। विशेषरूपसे कृष्णपक्षकी अष्टमीको स्नान करके पादप्रक्षालन आदिके द्वारा विधिपूर्वक धार्मिक द्विजाति (ब्राह्मण)-की अर्चना करके जो ‘प्रीयतां मे महादेवः’ ऐसा कहकर अपना द्रव्य प्रदान करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर परम गतिको प्राप्त करता है॥ २९—३१॥
कृष्णाष्टम्यां विशेषेण धार्मिकाय द्विजातये।<br>स्नात्वाभ्यर्च्य यथान्यायं पादप्रक्षालनादिभिः॥ ३०॥
प्रीयतां मे महादेवो दद्याद् द्रव्यं स्वकीयकम्।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः प्राप्नोति परमां गतिम्॥ ३१॥
द्विजैः कृष्णचतुर्दश्यां कृष्णाष्टम्यां विशेषतः।<br>अमावास्यायां भक्तैस्तु पूजनीयस्त्रिलोचनः॥ ३२॥भक्त द्विजोंको कृष्ण चतुर्दशी विशेषरूपसे कृष्णाष्टमी और अमावस्याको त्रिलोचन (महादेव)-की पूजा करनी चाहिये। एकादशीको निराहार रहकर द्वादशीके दिन ब्राह्मणको भोजन कराकर जो पुरुषोत्तमकी पूजा करता है, वह परमपदको प्राप्त करता है। शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथि वैष्णवी तिथि है। इस तिथिको प्रयत्नपूर्वक भगवान् जनार्दनकी आराधना करनी चाहिये। भगवान् ईशान (शंकर)-को अथवा विष्णुको उद्दिष्ट कर पवित्र ब्राह्मणको जो कुछ दान दिया जाता है, वह अनन्त फल प्रदान करनेवाला होता है॥ ३२—३५॥
एकादश्यां निराहारो द्वादश्यां पुरुषोत्तमम्।<br>अर्चयेद् ब्राह्मणमुखे स गच्छेत् परमं पदम्॥ ३३॥
एषा तिथिवैष्णवी स्याद् द्वादशी शुक्लपक्षके।<br>तस्यामाराधयेद् देवं प्रयत्नेन जनार्दनम्॥ ३४॥
यत्किञ्चिद् देवमीशानमुद्दिश्य ब्राह्मणे शुचौ।<br>दीयते विष्णवे वापि तदनन्तफलप्रदम्॥ ३५॥
यो हि यां देवतामिच्छेत् समाराधयितुं नरः।<br>ब्राह्मणान् पूजयेद् यत्नात् स तस्यां तोषयेत् ततः॥ ३६॥जो मनुष्य जिस देवताकी आराधना करना चाहता है, वह यत्नपूर्वक (उस आराध्य देवताकी प्रतिमूर्ति-रूपमें) ब्राह्मणोंकी पूजा करे, इससे वह आराध्य देवता संतुष्ट हो जाते हैं॥ ३६॥