संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- अध्याय २३ * । ३७७
| पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः।<br>लेपभाजस्त्रयश्चात्मा सापिण्ड्यं साप्तपौरुषम्॥ ६३॥<br><br>अप्रत्तानां तथा स्त्रीणां सापिण्ड्यं साप्तपौरुषम्।<br>ऊढानां भर्तृसापिण्ड्यं प्राह देवः पितामहः॥ ६४॥<br><br>ये चैकजाता बहवो भिन्नयोनय एव च।<br>भिन्नवर्णास्तु सापिण्ड्यं भवेत् तेषां त्रिपूरुषम्॥ ६५॥<br><br>कारवः शिल्पिनो वैद्या दासीदासास्तथैव च।<br>दातारो नियमी चैव ब्रह्मविद्ब्रह्मचारिणौ॥ ६६॥<br><br>सत्रिणो व्रतिनस्तावत् सद्यःशौचा उदाहृताः।<br>राजा चैवाभिषिक्तश्च प्राणसत्रिण एव च॥ ६७॥<br><br>यज्ञे विवाहकाले च देवयागे तथैव च।<br>सद्यःशौचं समाख्यातं दुर्भिक्षे चाप्युपद्रवे॥ ६८॥<br><br>डिम्बाहवहतानां च विद्युता पार्थिवैर्द्विजैः।<br>सद्यःशौचं समाख्यातं सर्पादिमरणे तथा॥ ६९॥<br><br>अग्नौ मरुप्रपतने वीराध्वन्यप्यनाशके।<br>ब्राह्मणार्थे च संन्यस्ते सद्यः शौचं विधीयते॥ ७०॥<br><br>नैष्ठिकानां वनस्थानां यतीनां ब्रह्मचारिणाम्।<br>नाशौचं कीर्त्यते सद्भिः पतिते च तथा मृते॥ ७१॥<br><br>पतितानां न दाहः स्यान्नान्त्येष्टिर्नास्थिसंचयः।<br>न चाश्रुपातपिण्डौ वा कार्यं श्राद्धादिकं क्वचित्॥ ७२॥<br><br>व्यापादयेत् तथात्मानं स्वयं योऽग्निविषादिभिः।<br>विहितं तस्य नाशौचं नाग्निर्नाप्युदकादिकम्॥ ७३॥<br><br>अथ कश्चित् प्रमादेन म्रियतेऽग्निविषादिभिः।<br>तस्याशौचं विधातव्यं कार्यं चैवोदकादिकम्॥ ७४॥<br><br>जाते कुमारे तदहः कामं कुर्यात् प्रतिग्रहम्।<br>हिरण्यधान्यगोवासस्तिलान्नगुडसर्पिषाम् ॥ ७५॥ | पिता, पितामह तथा प्रपितामह—इन तीनोंसे आगेके पितर लेपभागी होते हैं। सात पुरुषोंतक सपिण्डता होती है। अविवाहित कन्याओंकी सपिण्डता उसके पिताके सात पुरुषों (पीढ़ीतक)-में होती है और विवाहित स्त्रियोंकी सपिण्डता उसके पतिके साथ (सात पीढ़ीतक) होती है—ऐसा भगवान् ब्रह्माने कहा है। एक पुरुषद्वारा भिन्न वर्णकी* स्त्रियोंसे उत्पन्न पुत्रोंकी सपिण्डता तीन पीढ़ीतक होती है॥ ६३—६५॥<br><br>बढ़ई, शिल्पी, वैद्य, दासी, दास, दाता, व्रतपरायण, ब्रह्मज्ञानी, ब्रह्मचारी, यज्ञकर्ता, व्रती—ये सभी (किसीका मरण होनेपर) स्नानमात्रसे शुद्ध हो जाते हैं। इसी प्रकार अभिषिक्त राजा एवं प्राणकी रक्षा करनेवाले अन्नदाताको भी सद्यः शौच होता है। यज्ञ, विवाहारम्भ, देवपूजनका आरम्भ हो जानेपर तथा दुर्भिक्ष और उपद्रवकी स्थितिमें सद्यः शौच होता है। क्षत्रियों तथा ब्राह्मणोंके साथ मामूली लड़ाई अथवा झड़प आदिमें मरनेवालों तथा विद्युत् और सर्पादिके कारण मरनेवालोंका सद्यः शौच कहा गया है। अग्निमें गिरकर अथवा मरुस्थलमें मरनेपर, दुर्गम मार्गमें गमन और अकाल-मृत्युपर, ब्राह्मणके लिये मरनेपर तथा संन्यासी होनेके उपरान्त मृत्यु होनेपर सद्यः शौचका विधान है॥ ६६—७०॥<br><br>विद्वानोंने नैष्ठिक अर्थात् जीवनभर ब्रह्मचर्यका व्रत धारण करनेवाले ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ-धर्मवलम्बी, यति तथा ब्रह्मचारीकी मृत्यु होनेपर और पतित व्यक्तिकी मृत्यु होनेपर अशौच नहीं बताया है। पतित व्यक्तियोंका न दाह होता है, न अन्त्येष्टि-संस्कार होता है और न अस्थिसंचय ही होता है। उनके लिये अश्रुपात, पिण्डदान तथा श्राद्धादि कार्य भी कभी नहीं करने चाहिये॥ ७१-७२॥<br><br>जो व्यक्ति अग्नि तथा विष आदिके द्वारा स्वयं अपनी आत्महत्या करता है, उसके निमित्त अशौच, दाह तथा उदकदान आदिका विधान नहीं है। यदि कोई प्रमादवश अग्नि अथवा विष आदिद्वारा मर जाता है, उसके (सम्बन्धियोंके) लिये अशौचका विधान है और उदकदान आदि भी करना चाहिये। पुत्रका जन्म होनेपर उस दिन स्वर्ण, धान्य, गौ, वस्त्र, तिल, अन्न, गुड़ तथा घृत—इन वस्तुओंका इच्छापूर्वक (कार्पण्यरहित होकर) दान करना चाहिये॥ ७३—७५॥ |
* भिन्न वर्णकी स्त्री होना अन्य युगमें शास्त्रानुसार सम्भव है।