भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३७८* कूर्मपुराण *

| फलानि पुष्पं शाकं च लवणं काष्ठमेव च।<br>तोयं दधि घृतं तैलमौषधं क्षीरमेव च।<br>आशौचिनां गृहाद् ग्राह्यं शुष्कान्नं चैव नित्यशः ॥ ७६ ॥<br><br>आहिताग्नेर्यथान्यायं दग्धव्यस्त्रिभिरग्निभिः।<br>अनाहिताग्निर्गृह्येण लौकिकेनेतरो जनः ॥ ७७ ॥<br><br>देहाभावात् पलाशैस्तु कृत्वा प्रतिकृतिं पुनः।<br>दाहः कार्यो यथान्यायं सपिण्डैः श्रद्धयान्वितैः ॥ ७८ ॥<br>सकृत्प्रसिञ्चन्त्युदकं नामगोत्रेण वाग्यताः।<br>दशाहं बान्धवैः सार्धं सर्वे चैवार्द्रवाससः ॥ ७९ ॥<br><br>पिण्डं प्रतिदिनं दद्युः सायं प्रातर्यथाविधि।<br>प्रेताय च गृहद्वारि चतुर्थे भोजयेद् द्विजान् ॥ ८० ॥<br>द्वितीयेऽहनि कर्तव्यं क्षुरकर्म सबान्धवैः।<br>चतुर्थे बान्धवैः सर्वैरस्थ्नां संचयनं भवेत्।<br>पूर्वं तु भोजयेद् विप्रानयुग्मान् श्रद्धया शुचीन् ॥ ८१ ॥<br><br>पञ्चमे नवमे चैव तथैवैकादशेऽहनि।<br>अयुग्मान् भोजयेद् विप्रान् नवश्राद्धं तु तद्विदुः ॥ ८२ ॥<br><br>एकादशेऽह्नि कुर्वीत प्रेतमुद्दिश्य भावतः।<br>द्वादशे वाथ कर्तव्यमनिन्द्ये त्वथवाहनि।<br>एकं पवित्रमेकोऽर्घः पिण्डपात्रं तथैव च ॥ ८३ ॥<br>एवं मृताह्नि कर्तव्यं प्रतिमासं तु वत्सरम्।<br>सपिण्डीकरणं प्रोक्तं पूर्णे संवत्सरे पुनः ॥ ८४ ॥<br><br>कुर्याच्चत्वारि पात्राणि प्रेतादीनां द्विजोत्तमाः।<br>प्रेतार्घं पितृपात्रेषु पात्रमासेचयेत् ततः॥ ८५ ॥ | आशौची व्यक्तियोंके घरोंसे फल, पुष्प, शाक, लवण, काष्ठ, मट्ठा, दही, घी, तेल, औषधि तथा क्षीर और शुष्कान्नको नित्य ग्रहण किया जा सकता¹ है। आहिताग्नि श्रोत्रियका दाह-संस्कार तीनों अग्नियोंसे यथाविधि करना चाहिये और अनाहिताग्निका² दाह गृह्याग्निसे तथा दूसरे सामान्य लोगोंका दाह लौकिक अग्निसे करना चाहिये। (मृत व्यक्तिके) देहका अभाव (शव न मिलनेपर) होनेपर पलाशके पत्तोंसे उसके ही समान आकृति बनाकर सपिण्डीजनोंको चाहिये कि वे श्रद्धायुक्त होकर विधिपूर्वक दाह-संस्कार करें ॥ ७६-७८ ॥<br><br>सभी बान्धवोंको संयमपूर्वक दस दिनोंतक (मृत व्यक्तिके) नाम तथा गोत्रका उच्चारण करते हुए स्नानके गीले वस्त्र पहने हुए ही एक बार जलदान करना चाहिये। प्रेतके निमित्त यथाविधि प्रातःसे सायंकाल (अर्थात् दिनमें किसी भी समय) प्रतिदिन पिण्डदान करना चाहिये और चौथे दिनसे घरके द्वारपर (अभ्यागत) ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये ॥ ७९-८० ॥<br><br>दूसरे दिन बान्धवोंके साथ क्षौरकर्म करना चाहिये। चौथे दिन बन्धुओंसहित अस्थिसंचयन करना चाहिये। अस्थिसंचयनसे पूर्व श्रद्धापूर्वक पवित्र अयुग्म (विषम संख्यावाले) ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। पाँचवें, नवें तथा ग्यारहवें दिन अयुग्म (विषम संख्यामें) ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। इसे नवश्राद्ध जानना चाहिये। प्रेतके निमित्त ग्यारहवें, बारहवें अथवा किसी अनिन्दित दिनमें श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करना चाहिये। इस श्राद्धमें एक पवित्र, एक अर्घ और एक ही पिण्डपात्र होता है ॥ ८१-८३ ॥<br><br>इसी प्रकार एक वर्षतक प्रत्येक महीनेमें मृत्युकी तिथिको श्राद्ध करना चाहिये। संवत्सर (वर्ष)-के पूर्ण हो जानेपर सपिण्डीकरण श्राद्ध करनेका विधान किया गया है। हे द्विजोत्तमो! प्रेतादि अर्थात् प्रेत, पितामह, प्रपितामह तथा वृद्ध प्रपितामहके उद्देश्यसे चार अर्घ-पात्र बनाना चाहिये और पितृपात्रोंमें प्रेतपात्रका अर्घ डालना चाहिये ॥ ८४-८५ ॥ |


१-यहाँ नित्य ग्रहणका इतना ही अर्थ है कि अनिवार्य होनेपर ये वस्तुएँ कभी भी ली जा सकती हैं। रागतः इन्हें ग्रहण नहीं करना चाहिये।
२-स्मार्त अग्न्याधान करनेवालेको भी अनाहिताग्नि ही माना जाता है।