भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 389

* अध्याय २३ * ३७९


ये समाना इति द्वाभ्यां पिण्डानप्येवमेव हि।<br>सपिण्डीकरणं श्राद्धं देवपूर्वं विधीयते ॥ ८६ ॥'ये समानाः०' इन दो मन्त्रोंका उच्चारणकर पितामहादिके पिण्डोंमें प्रेतपिण्डको मिलाना चाहिये। देवश्राद्ध करनेके अनन्तर सपिण्डीकरण श्राद्ध करना चाहिये। पहले पितरोंका आवाहनकर पुनः प्रेतका आवाहन करना चाहिये। जिन प्रेतोंका सपिण्डीकरण कर लिया जाता है, उनकी श्राद्धक्रिया पृथक् नहीं होती। जो (सपिण्डीकृत प्रेतका) पृथक् पिण्डदान करता है, वह पितृघाती कहलाता है ॥ ८६-८७ ॥
पितॄनावाहयेत् तत्र पुनः प्रेतं च निर्दिशेत्।<br>ये सपिण्डीकृताः प्रेता न तेषां स्यात् पृथक्क्रियाः।<br>यस्तु कुर्यात् पृथक् पिण्डं पितृहा सोऽभिजायते ॥ ८७ ॥<br>मृते पितरि वै पुत्रः पिण्डमब्दं समाचरेत्।<br>दद्याच्चान्नं सोदकुम्भं प्रत्यहं प्रेतधर्मतः ॥ ८८ ॥पिताके मर जानेपर पुत्रको वर्षपर्यन्त पिण्डदान करना चाहिये। प्रतिदिन प्रेतधर्मानुसार उदककुम्भ एवं अन्नका दान करना चाहिये। प्रत्येक वर्ष पार्वण-विधानके अनुसार सांवत्सरिक श्राद्ध करना चाहिये। यही सनातन विधि है १। पुत्रोंको माता-पिताका पिण्डदान आदि जो कार्य है, वह सब करना चाहिये। पुत्रके अभाव होनेपर पत्नी करे और पत्नीके अभाव होनेपर सहोदर भाई करे। अथवा (पुत्रादि श्राद्ध न कर सकें या इनके अभावमें) सभी दान आदि कर्म करनेके बाद समाहित होकर मनुष्यको श्रद्धापूर्वक यथाविधान जीते हुए ही श्राद्ध कर लेना चाहिये (इससे श्राद्धकी अनिवार्यता स्पष्ट है) ॥ ८८-९१ ॥
पार्वणेन विधानेन सांवत्सरिकमिष्यते।<br>प्रतिसंवत्सरं कार्यं विधिरेष सनातनः ॥ ८९ ॥
मातापित्रोः सुतैः कार्यं पिण्डदानादिकं च यत्।<br>पत्नी कुर्यात् सुताभावे पत्न्यभावे सहोदरः ॥ ९० ॥<br>अनेनैव विधानेन जीवन् वा श्राद्धमाचरेत्।<br>कृत्वा दानादिकं सर्वं श्रद्धायुक्तः समाहितः ॥ ९१ ॥
एष वः कथितः सम्यग् गृहस्थानां क्रियाविधिः।<br>स्त्रीणां तु भर्तृशुश्रूषा धर्मो नान्य इहेष्यते ॥ ९२ ॥इस प्रकार मैंने आप लोगोंको गृहस्थोंकी क्रिया-विधि सम्यक्रूपसे बतलायी। स्त्रियोंका तो पतिकी सेवा करना ही एकमात्र धर्म है, उनका अन्य कोई धर्म नहीं कहा गया है। नित्य अपने धर्मका पालन करनेवाला और भगवान्में समर्पित मनवाला वेदज्ञोंद्वारा बताये गये उस परम पदको प्राप्त करता है २॥ ९२-९३ ॥
स्वधर्मपरमो नित्यमीश्वरार्पितमानसः।<br>प्राप्नोति तत् परं स्थानं यदुक्तं वेदवादिभिः ॥ ९३ ॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें तेईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २३ ॥


१-इस वचनका तात्पर्य प्रतिवर्ष पार्वणश्राद्धमें है। सांवत्सरिक (एकोद्दिष्टश्राद्ध)-की विधि पार्वणविधिसे भिन्न है।
२-इस अध्यायमें श्राद्ध एवं अशौचका विधान संक्षेपमें सांकेतिक मात्र है। इसी आधारपर निर्णय नहीं लेना चाहिये। विभिन्न निबन्धग्रन्थोंसे श्राद्ध एवं अशौच-सम्बन्धी समस्त वचनोंका समाकलन कर सामान्य एवं अपवाद वचनादिकोंकी व्यवस्थाकर निष्कृष्ट निर्णय किया गया है। अतः उन्हींके आधारपर अन्तिम निर्णय लेना चाहिये। निबन्धग्रन्थोंमें सभी वचनोंका समन्वयकर युग, देश, काल आदिकी दृष्टिसे स्पष्ट व्यवस्था की गयी है।