संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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३८० * कूर्मपुराण *
चौबीसवाँ अध्याय
अग्निहोत्रका माहात्म्य, अग्निहोत्रीके कर्तव्य, श्रौत एवं स्मार्तरूप द्विविध धर्म, तृतीय शिष्टाचारधर्म, वेद, धर्मशास्त्र और पुराणसे धर्मका ज्ञान तथा इनपर श्रद्धा रखना आवश्यक
| व्यास उवाच | **व्यासजीने कहा—**सदैव सायं और प्रातः अग्निहोत्र करना चाहिये। पक्षके अन्तमें अमावस्या और पौर्णमासीको हवन (दर्शेष्टि एवं पौर्णमासेष्टि) करना चाहिये। द्विजको फसल कट जानेपर नवशस्येष्टि, ऋतुकी समाप्तिपर (किया जानेवाला) यज्ञ एवं अयनके अन्तमें अर्थात् छः-छः महीनेपर संवत्सरके अन्तमें सौमिक याग करना चाहिये। दीर्घ आयुकी इच्छा करनेवाले अग्निहोत्री द्विजको नवशस्येष्टि किये बिना नया अन्न नहीं खाना चाहिये। नवीन अन्नका अग्निमें हवन किये बिना नवान्न खानेका इच्छुक व्यक्ति अपने प्राणोंको ही खाना चाहता है। प्रत्येक पर्वोंमें नित्य ही सावित्रीहोम, शान्ति-होम करना चाहिये तथा अष्टकाओं और अन्वष्टकाओंमें नियमसे नित्य पितरोंकी अर्चना करनी चाहिये॥ १—५॥ |
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| अग्निहोत्रं तु जुहुयादाद्यन्तेऽहर्निशोः सदा।<br>दर्शेन चैव पक्षान्ते पौर्णमासेन चैव हि॥ १ ॥<br><br>शस्यान्ते नवशस्येष्ट्या तथर्त्वन्ते द्विजोऽध्वरैः।<br>पशुना त्वयनस्यान्ते समान्ते सौमिकैर्मखैः॥ २ ॥<br><br>नानिष्ट्वा नवशस्येष्ट्या पशुना वाग्निमान् द्विजः।<br>नवान्नमद्यान्मांसं वा दीर्घमायुर्जिजीविषुः॥ ३ ॥<br><br>नवेनान्नेन चानिष्ट्वा पशुहव्येन चाग्नयः।<br>प्राणानेवात्तुमिच्छन्ति नवान्नामिषगृद्धिनः॥ ४ ॥<br><br>सावित्रान् शान्तिहोमांश्च कुर्यात् पर्वसु नित्यशः।<br>पितॄंश्चैवाष्टकास्वर्चन् नित्यमन्वष्टकासु च॥ ५ ॥ | |
| एष धर्मः परो नित्यमपधर्मोऽन्य उच्यते।<br>त्रयाणामिह वर्णानां गृहस्थाश्रमवासिनाम्॥ ६ ॥<br><br>नास्तिक्यादथवालस्याद् योऽग्नीन् नाधातुमिच्छति।<br>यजेत वा न यज्ञेन स याति नरकान् बहून्॥ ७ ॥ | गृहस्थाश्रममें निवास करनेवाले तीनों वर्णों (द्विजाति)-का यह नियमित श्रेष्ठ धर्म है, अन्य धर्म अपधर्म कहलाता है। नास्तिकता अथवा आलस्यके कारण जो अग्नियोंका आधान एवं यज्ञसे यजन नहीं करना चाहता, वह बहुतसे नरकोंमें जाता है॥ ६-७॥ |
| तामिस्रमन्धतामिस्रं महारौरवरौरवौ।<br>कुम्भीपाकं वैतरणीमसिपत्रवनं तथा॥ ८ ॥<br><br>अन्यांश्च नरकान् घोरान् सम्प्राप्यान्ते सुदुर्मतिः।<br>अन्त्यजानां कुले विप्राः शूद्रयोनौ च जायते॥ ९ ॥<br><br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन ब्राह्मणो हि विशेषतः।<br>आधायाग्निं विशुद्धात्मा यजेत परमेश्वरम्॥ १०॥<br><br>अग्निहोत्रात् परो धर्मो द्विजानां नेह विद्यते।<br>तस्मादाराधयेन्नित्यमग्निहोत्रेण शाश्वतम्॥ ११॥<br><br>यश्चाधायाग्निमालस्यान्न यष्टुं देवमिच्छति।<br>सोऽसौ मूढो न सम्भाष्यः किं पुनर्नास्तिको जनः॥ १२॥ | विप्रो! (अग्न्याधान आदि कृत्य न करनेवाला) वह दुर्मति तामिस्र, अन्धतामिस्र, महारौरव, रौरव, कुम्भीपाक, वैतरणी, असिपत्रवन तथा अन्य घोर नरकोंको प्राप्तकर बादमें अन्त्यजोंके कुल तथा शूद्रयोनिमें जन्म लेता है। अतः विशेषरूपसे विशुद्धात्मा ब्राह्मणोंको सभी प्रकारके प्रयत्नोंद्वारा अग्निका आधानकर परमेश्वरका यजन-पूजन करना चाहिये। द्विजोंके लिये अग्निहोत्रसे श्रेष्ठ कोई अन्य धर्म नहीं है। इसलिये अग्निहोत्रके द्वारा नित्य शाश्वत (पुरुष)-की आराधना करनी चाहिये। जो अग्निका आधानकर फिर आलस्यवश यज्ञद्वारा देवताकी आराधना नहीं करना चाहता, वह व्यक्ति मूढ़ होता है, उससे बात नहीं करनी चाहिये। अधिक क्या, वह मनुष्य नास्तिक होता है॥ ८—१२॥ |