भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय २४ *३८१
यस्य त्रैवार्षिकं भक्तं पर्याप्तं भृत्यवृत्तये।<br>अधिकं चापि विद्येत स सोमं पातुमर्हति॥ १३॥<br><br>एष वै सर्वयज्ञानां सोमः प्रथम इष्यते।<br>सोमेनाराधयेद् देवं सोमलोकमहेश्वरम्॥ १४॥<br><br>न सोमयागादधिको महेश्वराराधने क्रतुः।<br>समो वा विद्यते तस्मात् सोमेनाभ्यर्चयेत् परम्॥ १५॥जिसके पास सेवकोंके पोषणहेतु तीन वर्षतकके लिये पर्याप्त अथवा उससे भी अधिक (भोजन) सामग्री विद्यमान हो, वह सोमपानका अधिकारी होता है। सभी यज्ञोंमें सोमयाग सबसे श्रेष्ठ है। सोमद्वारा सोमलोकमें स्थित महेश्वरदेवकी आराधना करनी चाहिये। महेश्वरकी आराधनाके लिये सोमयागसे बड़ा अथवा उसके समान कोई यज्ञ नहीं है। इसलिये सोमके द्वारा श्रेष्ठ देवकी आराधना करनी चाहिये॥ १३-१५॥
पितामहेन विप्राणामादावभिहितः शुभः।<br>धर्मो विमुक्तये साक्षाच्छ्रौतः स्मार्तो द्विधा पुनः॥ १६॥<br><br>श्रौतस्त्रेताग्निसम्बन्धात् स्मार्तः पूर्वं मयोदितः।<br>श्रेयस्करतमः श्रौतस्तस्माच्छ्रौतं समाचरेत्॥ १७॥<br><br>उभाववभिहितौ धर्मौ वेदादेव विनिःसृतौ।<br>शिष्टाचारस्तृतीयः स्याच्छ्रुतिस्मृत्योरलाभतः॥ १८॥ब्राह्मणोंकी मुक्तिके लिये साक्षात् पितामहने आरम्भमें ही शुभ धर्म बतलाया है, वह श्रौत तथा स्मार्त नामसे दो प्रकारका है। तीन (आहवनीय, दक्षिणाग्नि, गार्हपत्यग्नि) अग्नियोंके सम्बन्धसे श्रौतधर्म होता है। स्मार्तधर्मको मैंने पूर्वमें बता दिया है। श्रौतधर्म अधिक श्रेयस्कर है, इसलिये श्रौतधर्मका पालन करना चाहिये। कहे गये ये दोनों धर्म वेदसे ही निकले हुए हैं। श्रुति तथा स्मृतिके अभावमें शिष्टाचार ही तीसरा धर्म होता* है॥ १६-१८॥
धर्मेणाभिगतो यैस्तु वेदः सपरिवृंहणः।<br>ते शिष्टा ब्राह्मणाः प्रोक्ता नित्यमात्मगुणान्विताः॥ १९॥<br><br>तेषामभिमतो यः स्याच्चेतसा नित्यमेव हि।<br>स धर्मः कथितः सद्भिर्नान्येषामिति धारणा॥ २०॥परिवृंहण (रामायण, महाभारत एवं पुराणादि ग्रन्थ) सहित वेदोंका धर्मपूर्वक ज्ञान प्राप्त करनेवाले और (दया, अहिंसा, सत्य आदि आठ) आत्मिक गुणोंसे सम्पन्न ब्राह्मण सदैव शिष्ट कहे गये हैं। इनके (शिष्टजनोंके) अन्तःकरणद्वारा जो समर्थित होता है, विद्वानोंद्वारा उसे ही धर्म कहा गया है। अन्य लोगोंके अभिमतको धर्म नहीं कहा जाता, यही निश्चित सिद्धान्त है॥ १९-२०॥
पुराणं धर्मशास्त्रं च वेदानामुपबृंहणम्।<br>एकस्माद् ब्रह्मविज्ञानं धर्मज्ञानं तथैकतः॥ २१॥<br><br>धर्मं जिज्ञासमानानां तत्प्रमाणतरं स्मृतम्।<br>धर्मशास्त्रं पुराणं तद् ब्रह्मज्ञाने परा प्रमा॥ २२॥<br><br>नान्यतो जायते धर्मो ब्रह्मविद्या च वैदिकी।<br>तस्माद् धर्मं पुराणं च श्रद्धातव्यं द्विजातिभिः॥ २३॥पुराण तथा धर्मशास्त्र वेदोंके उपबृंहण (विस्तार) हैं। एकसे ब्रह्मका विशेष ज्ञान होता है और दूसरेसे धर्मका ज्ञान होता है। धर्मकी जिज्ञासा करनेवालोंके लिये धर्मशास्त्र श्रेष्ठ प्रमाण कहा गया है और ब्रह्मज्ञानके लिये पुराण उत्कृष्ट प्रमाण है। वेदसे अतिरिक्त अन्य किसीसे धर्मका तथा वैदिक ब्रह्मविद्याका ज्ञान नहीं होता, इसलिये द्विजातियोंको धर्मशास्त्र तथा पुराणपर श्रद्धा रखनी चाहिये॥ २१-२३॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे चतुर्विंशोऽध्यायः॥ २४॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें चौबीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २४॥


* शिष्टाचारका भी मूल श्रुति एवं तन्मूलक स्मृति ही होती है। श्रुतियाँ अनन्त हैं, उनमें वर्णित धर्मोंका क्रमसे प्रसंगानुसार संग्रह करनेवाली स्मृतियाँ भी अनेक हैं। अतः सभी श्रुतियों एवं तन्मूलक स्मृतियोंका ज्ञान अल्पज्ञ मानवको नहीं भी हो सकता है। ऐसी स्थितिमें धर्माधर्म-विवेकमें कठिनाई होना अस्वाभाविक नहीं है। इसीलिये शिष्टोंके आचारसे धर्माधर्मका निर्णय करना पड़ता है और इस निर्णयके मूलमें यही भाव निहित है कि शिष्ट वही आचरण करते हैं जो श्रुति एवं तन्मूलक स्मृतिमें प्रतिपादित है।