संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८२ * कूर्मपुराण *
पचीसवाँ अध्याय
गृहस्थ ब्राह्मणकी मुख्य वृत्ति तथा आपत्कालकी वृत्ति, गृहस्थके साधक तथा असाधक दो भेद, न्यायोपार्जित धनका विभाग एवं उसका उपयोग
व्यास उवाच
एष वोऽभिहितः कृत्स्नो गृहस्थाश्रमवासिनः।
द्विजातेः परमो धर्मो वर्तनानि निबोधत ॥ १ ॥
द्विविधस्तु गृही ज्ञेयः साधकश्चाप्यसाधकः।
अध्यापनं याजनं च पूर्वस्याहुः प्रतिग्रहम्।
कुसीदकृषिवाणिज्यं प्रकुर्वीतास्वयंकृतम् ॥ २ ॥
कृषेरभावाद् वाणिज्यं तदभावात् कुसीदकम्।
आपत्कल्पो ह्ययं ज्ञेयः पूर्वोक्तो मुख्य इष्यते ॥ ३ ॥
स्वयं वा कर्षणं कुर्याद् वाणिज्यं वा कुसीदकम्।
कष्टा पापीयसी वृत्तिः कुसीदं तद् विवर्जयेत् ॥ ४ ॥
क्षात्रवृत्तिं परां प्राहुर्न स्वयं कर्षणं द्विजैः।
तस्मात् क्षात्रेण वर्तेत वर्तनेनापदि द्विजः ॥ ५ ॥
तेन नावाप्यजीवंस्तु वैश्यवृत्तिं कृषिं व्रजेत्।
न कथंचन कुर्वीत ब्राह्मणः कर्म कर्षणम् ॥ ६ ॥
लब्धलाभः पितॄन् देवान् ब्राह्मणांश्चापि पूजयेत्।
ते तृप्तास्तस्य तं दोषं शमयन्ति न संशयः ॥ ७ ॥
देवेभ्यश्च पितृभ्यश्च दद्याद् भागं तु विंशकम्।
त्रिंशद्भागं ब्राह्मणानां कृषिं कुर्वन् न दुष्यति ॥ ८ ॥
वणिक् प्रदद्याद् द्विगुणं कुसीदी त्रिगुणं पुनः।
कृषीवलो न दोषेण युज्यते नात्र संशयः ॥ ९ ॥
**व्यासजीने कहा—**यह मैंने आप लोगोंको गृहस्थाश्रममें निवास करनेवाले द्विजातियोंका सम्पूर्ण श्रेष्ठ धर्म बतलाया, अब उनकी वृत्तियोंका वर्णन सुनें ॥ १ ॥
साधक तथा असाधक-भेदसे (ब्राह्मण) गृहस्थको दो प्रकारका समझना चाहिये। पहले (साधक गृहस्थकी आजीविका) अध्ययन कराना, यज्ञ कराना और (दान लेना) है। इसके अतिरिक्त वे अपने द्वारा न किये गये कुसीद (ब्याजका लेन-देन), कृषि तथा वाणिज्य भी अन्यके द्वारा करा सकते हैं। कृषिके अभावमें वाणिज्य और उसके अभावमें कुसीदका आश्रय लिया जा सकता है। इसे आपत्कल्प कहा गया है और पहलेको मुख्यवृत्ति कही गयी है। अथवा (आपत्कालमें अन्य उपाय न होनेपर) स्वयं कृषि, वाणिज्य अथवा कुसीद-वृत्तिका आश्रय ले। कुसीद-वृत्ति (सूद लेना) अत्यन्त कष्टकारक और पापकी वृत्ति है, इसलिये इसका परित्याग करना चाहिये ॥ २–४ ॥
क्षात्रवृत्तिको (कृषिवृत्तिकी अपेक्षा) श्रेष्ठ वृत्ति कहा गया है, किंतु द्विजोंको स्वयं कर्षण नहीं करना चाहिये। अतएव द्विजको आपत्तिमें (ही) क्षात्रधर्मसे भी जीविकाका निर्वाह करना चाहिये। उस क्षात्रवृत्ति (शस्त्र-जीविका)-द्वारा भी निर्वाह न होनेपर कृषिस्वरूप वैश्यवृत्तिका आश्रय लेना चाहिये, किंतु ब्राह्मणको कभी भी खेत जोतनेका कार्य नहीं करना चाहिये। लाभ होनेपर (विशेषकर अन्य वर्णकी जीविकासे लाभ मिलनेपर अवश्य ही) पितरों, देवताओं तथा ब्राह्मणोंका पूजन करना चाहिये। तृप्त होनेपर वे उसके उस (कर्मजन्य) दोषको शान्त कर देते हैं, इसमें संशय नहीं ॥ ५–७ ॥
देवताओं और पितरोंको (कृषिसे प्राप्त लाभका) बीसवाँ भाग (५ प्रतिशत) और ब्राह्मणोंको तीसवाँ भाग (३ १/३ प्रतिशत) देना चाहिये। ऐसी अवस्थामें कृषिकर्म करनेवाला दोषी नहीं होता। वाणिज्य करनेपर (कृषिजन्य लाभसे दिये जानेवाले अंशकी अपेक्षा) दुगुना, कुसीद-वृत्तिपर तिगुना दान करना चाहिये। ऐसा करनेसे कृषि करनेवाला निस्संदेह दोषी नहीं होता ॥ ८–९ ॥