संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| * अध्याय २५ * | ३८३ |
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| शिलोञ्छं वाप्याददीत गृहस्थः साधकः पुनः।<br>विद्याशिल्पादयस्त्वन्ये बहवो वृत्तिहेतवः॥ १०॥ | अथवा साधक (ब्राह्मण) गृहस्थको शिलोञ्छवृत्तिका^१ आश्रय लेना चाहिये। विद्या तथा शिल्प आदि भी अन्य बहुतसे जीविकाके साधन हैं। गृहस्थाश्रममें रहनेवाला जो असाधक (नामका दूसरा गृहस्थ) कहा गया है, श्रेष्ठ महर्षियोंद्वारा उसके लिये शिल तथा उञ्छ नामक दो वृत्तियाँ कही गयी हैं। अमृत अथवा मृत साधनद्वारा जीवनयापन करना चाहिये। अयाचित पदार्थ अमृत और याचनाद्वारा भिक्षास्वरूप प्राप्त वस्तु मृत होती है॥ १०—१२॥ |
| असाधकस्तु यः प्रोक्तो गृहस्थाश्रमसंस्थितः।<br>शिलोञ्छे तस्य कथिते द्वे वृत्ती परमर्षिभिः॥ ११॥ | |
| अमृतेनाथवा जीवेन्मृतेनाप्यथवा यदि।<br>अयाचितं स्यादमृतं मृतं भैक्षं तु याचितम्॥ १२॥ | |
| कुशूलधान्यको वा स्यात् कुम्भीधान्यक एव वा।<br>त्र्यहैहिको वापि भवेदश्वस्तनिक एव च॥ १३॥ | ब्राह्मणको कुशूलधान्यक (तीन वर्षोंतकके लिये संचित धान्यवाला), कुम्भीधान्यक (एक वर्षतकके लिये संचित धान्यवाला), त्र्यैहिक (तीन दिनोंतकके लिये संचित धान्यवाला) अथवा अश्वस्तनिक (अगले दिनके लिये भी धान्य संचित न करनेवाला) होना चाहिये। इन (उपर्युक्त) चार प्रकारके गृहस्थ द्विजों (ब्राह्मणों)-में उत्तरोत्तर श्रेष्ठ होता है (ऐसा ब्राह्मण) अपने धर्मके कारण श्रेष्ठ लोकजयी (स्वर्ग आदि लोकोंको जीतनेवाला) होता है। इनमें कोई (जिनके पास पोष्य-वर्ग अधिक है) द्विज (ब्राह्मण) षट्कर्मोंसे^२ अपनी जीविका निर्वाह करते हैं, दूसरे (अल्प परिग्रहवाले) कुछ द्विज (ब्राह्मण) तीन साधनोंसे^३ निर्वाह करते हैं, कुछ दो^४ साधनोंसे और चौथे प्रकारके ब्राह्मण ब्रह्मयज्ञ (अध्यापन)-द्वारा आजीविका चलाते हैं॥ १३—१५॥ |
| चतुर्णामपि चैतेषां द्विजानां गृहमेधिनाम्।<br>श्रेयान् परः परो ज्ञेयो धर्मतो लोकजित्तमः॥ १४॥ | |
| षट्कर्मैको भवत्येषां त्रिभिरन्यः प्रवर्तते।<br>द्वाभ्यामेकश्चतुर्थस्तु ब्रह्मसत्रेण जीवति॥ १५॥ | |
| वर्तयंस्तु शिलोञ्छाभ्यामग्निहोत्रपरायणः।<br>इष्टीः पार्वयणांतीयाः केवला निर्वपेत् सदा॥ १६॥ | जो ब्राह्मण केवल उञ्छ या शिल-वृत्तिसे अपना निर्वाह करे वह (धनसाध्य अन्य कर्मोंके अनुष्ठानमें असमर्थ होनेके कारण) केवल नित्य-कर्म अग्निहोत्रको ही करता रहे तथा पर्व एवं अयनके मध्य सम्पन्न की जानेवाली दर्शपौर्णमास एवं आग्रयण इष्टियाँ करता रहे॥ १६॥ |
१-जिस धान्यपर पशु-पक्षीतकका भी अधिकार नहीं है, उसके एक-एक कण (कणसमूह-मंजरीको छोड़ देना है)-को प्रतिदिन अंगुलीसे उठाकर एकत्र किया जाय और उसीसे जीविका निर्वाह किया जाय—यह उञ्छवृत्ति है और यदि धान्य-समूहरूप मंजरीका भी संग्रह प्रतिदिन करके जीविकानिर्वाह किया जाय तो यह 'शिल' वृत्ति है। ये दोनों वृत्तियाँ ब्राह्मणके लिये श्रेष्ठ हैं। इनमें भी प्रथम वृत्ति सर्वोत्तम है।
२-ऋत (उञ्छ, शिल), अयाचित, भैक्ष, कृषि, वाणिज्य तथा कुसीद—ये ही षट्कर्म हैं।
३-याजन, अध्यापन, परिग्रह—ये तीन साधन हैं।
४-याजन, अध्यापन—ये दो साधन हैं।