भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३८४ | * कूर्मपुराण *


न लोकवृत्तिं वर्तेत वृत्तिहेतोः कथंचन ।<br>अजिह्रामशठां शुद्धां जीवेद् ब्राह्मणजीविकाम् ॥ १७॥ब्राह्मण जीविकाके लिये लोकवृत्ति (विचित्र हास-परिहास आदिसे युक्त लोककथा आदि)-का आश्रय कभी न करे। अजिह्र (किसीकी झूठी निन्दा-स्तुति आदिके वर्णनरूप पापसे रहित), अशठ (दम्भ आदि अनेक प्रकारके बनावटी व्यवहारसे शून्य), शुद्ध (वैश्य आदिकी जीवनवृत्तिसे असम्बद्ध) शास्त्रीय वृत्तिका ही आश्रयण करना चाहिये ॥ १७ ॥
याचित्वा वापि सद्भ्योऽन्नं पितॄन् देवांस्तु तोषयेत् ।<br>याचयेद् वा शुचिं दान्तं न तृप्येत स्वयं ततः ॥ १८ ॥उसे (ब्राह्मणको) सज्जनोंसे अन्न माँगकर भी पितरों तथा देवताओंको संतुष्ट करना चाहिये। अथवा पवित्र इन्द्रियजयी व्यक्तियोंसे याचना करे, किंतु उससे स्वयं तृप्त न होवे (अर्थात् उस याचित द्रव्यका उपयोग स्वयंके लिये न करे)। जो गृहस्थ द्रव्योपार्जन करके देवताओं तथा पितरोंको विधिपूर्वक संतुष्ट नहीं करता है, वह कुत्तेकी योनिमें जाता है ॥ १८-१९॥
यस्तु द्रव्यार्जनं कृत्वा गृहस्थस्तोषयेन्न तु।<br>देवान् पितॄंश्च विधिना शुनां योनिं व्रजत्यसौ ॥ १९ ॥<br>धर्मश्चार्थश्च कामश्च श्रेयो मोक्षश्चतुष्टयम् ।<br>धर्माविरुद्धः कामः स्याद् ब्राह्मणानां तु नेतरः ॥ २० ॥धर्म, अर्थ, काम तथा कल्याणकारी मोक्ष नामक चार पुरुषार्थ हैं। ब्राह्मणोंका काम (नामक पुरुषार्थ) धर्मका अविरोधी होना चाहिये, इससे भिन्न (अर्थात् धर्मविरोधी कथमपि) नहीं होना चाहिये। जो अर्थ धर्मके लिये होता है अपने लिये नहीं वह (वास्तविक) अर्थ है, इससे भिन्न प्रकारका अर्थ तो अनर्थ है। इसलिये (धर्मपूर्वक) अर्थ प्राप्त होनेपर दान, हवन तथा यज्ञ करना चाहिये ॥ २०-२१ ॥
योऽर्थो धर्माय नात्मार्थः सोऽर्थोऽनर्थस्तथेतरः।<br>तस्मादर्थं समासाद्य दद्याद् वै जुहुयाद् यजेत् ॥ २१ ॥
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इति श्रीकूर्मपुराणे षत्साहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥

इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें पचीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २५ ॥


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