संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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* अध्याय २६ * ३८५
छब्बीसवाँ अध्याय
दानधर्मका निरूपण एवं नित्य, नैमित्तिक, काम्य तथा विमल-चतुर्विध दान-भेद, दानके अधिकारी तथा अनधिकारी, कामना-भेदसे विविध देवताओंकी आराधनाका विधान, ब्राह्मणकी महिमा तथा दानधर्मप्रकरणका उपसंहार
| व्यास उवाच | व्यासजीने कहा— अब मैं श्रेष्ठ दानधर्मका वर्णन करूँगा। इसे पूर्वमें ब्रह्माजीने ब्रह्मवादी ऋषियोंसे कहा था—॥ १॥ |
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| अथातः सम्प्रवक्ष्यामि दानधर्ममनुत्तमम्।<br>ब्रह्मणाभिहितं पूर्वमृषीणां ब्रह्मवादिनाम्॥ १ ॥<br>अर्थानामुदिते पात्रे श्रद्धया प्रतिपादनम्।<br>दानमित्यभिनिर्दिष्टं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम्॥ २ ॥<br><br>यद् ददाति विशिष्टेभ्यः श्रद्धया परया युतः।<br>तद् वै वित्तमहं मन्ये शेषं कस्यापि रक्षति॥ ३ ॥<br><br>नित्यं नैमित्तिकं काम्यं त्रिविधं दानमुच्यते।<br>चतुर्थं विमलं प्रोक्तं सर्वदानोत्तमोत्तमम्॥ ४ ॥ | उदित अर्थात् वेदवेदाङ्गाध्ययन करनेवाले प्रशस्त पात्रमें अर्थके श्रद्धापूर्वक प्रतिपादनको दान कहा गया है। यह भोग तथा मोक्षरूप फलको देनेवाला है। विशिष्ट अर्थात् सदाचारसम्पन्न व्यक्तियों (ब्राह्मणों)-को अत्यन्त श्रद्धासम्पन्न होकर जो धन दिया जाता है, उसे ही मैं धन मानता हूँ। अवशिष्ट धन (तो किसी दूसरेका ही है, वह) किसी अन्यकी रक्षा करता है। नित्य, नैमित्तिक तथा काम्य—इस प्रकारसे दान तीन प्रकारका कहा गया है। चौथा दान विमल-दान कहा गया है, जो सभी दानोंमें उत्तमोत्तम है॥ २–४॥ |
| अहन्यहनि यत् किंचिद् दीयतेऽनुपकारिणे।<br>अनुद्दिश्य फलं तस्माद् ब्राह्मणाय तु नित्यकम्॥ ५ ॥<br><br>यत् तु पापोपशान्त्यर्थं दीयते विदुषां करे।<br>नैमित्तिकं तदुद्दिष्टं दानं सद्द्भिरनुष्ठितम्॥ ६ ॥<br><br>अपत्यविजयैश्वर्यस्वर्गार्थं यत् प्रदीयते।<br>दानं तत् काम्यमाख्यातमृषिभिर्धर्मचिन्तकैः॥ ७ ॥<br><br>यदीश्वरप्रीणनार्थं ब्रह्मवित्सु प्रदीयते।<br>चेतसा धर्मयुक्तेन दानं तद् विमलं शिवम्॥ ८ ॥ | प्रत्येक दिन बिना किसी फल-प्राप्तिरूप प्रयोजनके अर्थात् निःस्वार्थभावसे (कर्तव्य समझकर) जो कुछ भी अनुपकारी (जिससे अपना उपकार करानेकी तनिक भी आशा न हो ऐसे) ब्राह्मणको दिया जाता है, वह नित्य-दान कहलाता है। पापके शमन करनेके लिये विद्वान् (ब्राह्मणों)-के हाथमें जो दिया जाता है, उसे नैमित्तिक दान कहा गया है। सज्जनोंद्वारा इसका अनुष्ठान किया जाता है। संतान, विजय, ऐश्वर्य तथा स्वर्ग-प्राप्तिके लिये जो दान दिया जाता है, वह धर्मविचारक ऋषियोंके द्वारा काम्य-दान कहा गया है। ईश्वरकी प्रसन्नताके लिये धर्मभावनासे ब्रह्मज्ञानियोंको जो दिया जाता है, वह कल्याणकारी दान विमल-दान कहलाता है॥ ५–८॥ |
| दानधर्मं निषेवेत पात्रमासाद्य शक्तितः।<br>उत्पत्स्यते हि तत्पात्रं यत् तारयति सर्वतः॥ ९ ॥<br><br>कुटुम्बभक्तवसनाद् देयं यदतिरिच्यते।<br>अन्यथा दीयते यद्धि न तद् दानं फलप्रदम्॥ १०॥ | सत्पात्र उपलब्ध होनेपर यथाशक्ति दानधर्मका पालन अवश्य करना चाहिये; क्योंकि वह सत्पात्र कदाचित् ही सौभाग्यसे उपलब्ध होता है जो दाताका हर तरहसे उद्धार कर देता है। कुटुम्बके भरण-पोषणसे अधिक अवशिष्ट पदार्थका दान करना चाहिये। इससे भिन्न प्रकारका दिया जानेवाला दान फलप्रद नहीं होता॥ ९-१०॥ |