भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

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३८६* कूर्मपुराण *
श्रोत्रियाय कुलीनाय विनीताय तपस्विने।<br>वृत्तस्थाय दरिद्राय प्रदेयं भक्तिपूर्वकम् ॥ ११॥<br><br>यस्तु दद्यान्महीं भक्त्या ब्राह्मणाय्याहिताग्नये।<br>स याति परमं स्थानं यत्र गत्वा न शोचति ॥ १२ ॥<br><br>इक्षुभिः संततां भूमिं यवगोधूमशालिनीम्।<br>ददाति वेदविदुषे यः स भूयो न जायते ॥ १३ ॥<br><br>गोचर्ममात्रामपि वा यो भूमिं सम्प्रयच्छति।<br>ब्राह्मणाय दरिद्राय सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १४ ॥<br><br>भूमिदानात् परं दानं विद्यते नेह किञ्चन।<br>अन्नदानं तेन तुल्यं विद्यादानं ततोऽधिकम् ॥ १५ ॥<br><br>यो ब्राह्मणाय शान्ताय शुचये धर्मशालिने।<br>ददाति विद्यां विधिना ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६॥<br><br>दद्यादहरहस्त्वन्नं श्रद्धया ब्रह्मचारिणे।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्मणः स्थानमाप्नुयात् ॥ १७॥<br><br>गृहस्थायान्नदानेन फलं प्राप्नोति मानवः।<br>आममेवास्य दातव्यं दत्त्वाप्नोति परां गतिम् ॥ १८॥<br><br>वैशाख्यां पौर्णमास्यां तु ब्राह्मणान् सप्त पञ्च वा।<br>उपोष्य विधिना शान्तः शुचिः प्रयतमानसः ॥ १९ ॥<br><br>पूजयित्वा तिलैः कृष्णैर्मधुना च विशेषतः।<br>गन्धादिभिः समभ्यर्च्य वाचयेद् वा स्वयं वदेत् ॥ २० ॥<br><br>प्रीयतां धर्मराजेति यद् वा मनसि वर्तते।<br>यावज्जीवकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति ॥ २१ ॥<br><br>कृष्णाजिने तिलान् कृत्वा हिरण्यं मधुसर्पिषी।<br>ददाति यस्तु विप्राय सर्वं तरति दुष्कृतम् ॥ २२ ॥श्रोत्रिय, कुलीन, विनयी, तपस्वी, सदाचारी तथा धनहीन (ब्राह्मण)-को भक्तिपूर्वक दान देना चाहिये। जो अग्निहोत्री ब्राह्मणको भक्तिपूर्वक भूमिको दान करता है, वह उस परमपदको प्राप्त करता है, जहाँ जानेपर शोक नहीं करना पड़ता। ईख, जौ तथा गेहूँसे फली हुई विस्तृत भूमिको जो वेदज्ञ (ब्राह्मण)-को दानमें देता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। अथवा गोचर्म* (भूमिकी एक विशेष माप)-के बराबर भूमि जो धनहीन ब्राह्मणको दानमें देता है, वह सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। इस संसारमें भूमिदानसे श्रेष्ठ दान और कुछ भी नहीं है। उसके समान ही अन्नदान है और विद्यादान उससे बड़ा है ॥ ११–१५॥<br><br>जो पवित्र, शान्त, धर्माचरणसम्पन्न ब्राह्मणको विधिपूर्वक विद्या प्रदान करता है, वह ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। ब्रह्मचारीको प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक अन्नदान करना चाहिये। इससे (दाता) सभी पापोंसे मुक्त होकर ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है। गृहस्थ (ब्राह्मण)-को अन्नदान करनेसे मनुष्य (महान्) फल प्राप्त करता है। इसे आमान्न अर्थात् अपक्व अन्न ही देना चाहिये, दान देकर वह परम गति प्राप्त करता है ॥ १६–१८॥<br><br>वैशाखमासकी पूर्णमासीको संयतचित्तसे उपवासकर शान्ति और पवित्रतापूर्वक सात या पाँच ब्राह्मणोंकी विधिपूर्वक काले तिलों विशेषरूपसे मधु तथा गन्ध आदि उपचारोंसे अच्छी प्रकारसे पूजा करे तथा (सविधि भोजन कराकर) जो मनमें है उसका स्मरण करते हुए उन ब्राह्मणोंसे 'प्रीयतां धर्मराज' अर्थात् 'धर्मराज प्रसन्न हों' यह वाक्य कहलाये अथवा स्वयं कहे। इससे सम्पूर्ण जीवनमें किया हुआ पाप तत्क्षण ही नष्ट हो जाता है ॥ १९–२१॥<br><br>कृष्णाजिन नामके वृक्ष विशेषसे निर्मित पात्रमें तिल, स्वर्ण, मधु तथा घृत रखकर जो ब्राह्मणको देता है, वह सभी पापोंसे पार हो जाता है ॥ २२॥

* आचार्य बृहस्पतिने 'गोचर्म-भूमि' कितनी लंबी-चौड़ी होती है—इसे बताते हुए कहा है कि दस हाथके दण्डसे तीस दण्डका एक निवर्तन होता है और दस निवर्तन विस्तारवाली भूमि 'गोचर्म-भूमि' कहलाती है। इस प्रकार (१० हाथ=एक दण्ड, तीस दण्ड=३०० हाथ या एक निवर्तन और १० निवर्तन=३००० हाथ) तीन हजार हाथ या लगभग १ १/२ कि० मी० लंबी-चौड़ी भूमि 'गोचर्म-भूमि' कहलाती है। गोचर्म-भूमिका एक अन्य परिमाप देते हुए कहा गया है कि एक वृषभ तथा बछड़े-बछड़ियोंसहित एक हजार गायें, जितनी भूमिमें आरामसे इधर-उधर टहल सकें, घूम-फिर सकें, उतनी लंबी-चौड़ी भूमि 'गोचर्म-भूमि' कहलाती है।

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