भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 397, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 397
* अध्याय २६ *३८७
कृतान्नमुदकुम्भं च वैशाख्यां च विशेषतः।<br>निर्दिश्य धर्मराजाय विप्रेभ्यो मुच्यते भयात्॥ २३॥विशेषरूपसे वैशाखमासकी पूर्णिमाको ब्राह्मणोंको जो कृतान्न-पक्वान्न (अथवा सत्तू) तथा जलसे भरा घड़ा धर्मराजके उद्देश्यसे देता है, वह भयसे मुक्त हो जाता है। जो सात अथवा पाँच ब्राह्मणोंको स्वर्ण तथा तिलसे युक्त जलपूर्ण घड़ोंसे संतुष्ट करता है, वह ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है। माघमासकी (कृष्ण) द्वादशीको उपवास करके शुक्ल वस्त्र धारणकर काले तिलोंसे अग्निमें हवन कर जो विप्र (द्विज) समाहित होकर ब्राह्मणोंको (कृष्ण) तिल दान करता है, वह (द्विज) जन्मसे आजतकके सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ २३—२६॥
सुवर्णतिलयुक्तैस्तु ब्राह्मणान् सप्त पञ्च वा।<br>तर्पयेदुदपात्रैस्तु ब्रह्महत्यां व्यपोहति॥ २४॥
माघमासे तु विप्रस्तु द्वादश्यां समुपोषितः।<br>शुक्लाम्बरधरः कृष्णैस्तिलैर्हुत्वा हुताशनम्॥ २५॥
प्रदद्याद् ब्राह्मणेभ्यस्तु तिलानेव समाहितः।<br>जन्मप्रभृति यत्पापं सर्वं तरति वै द्विजः॥ २६॥
अमावास्यामनुप्राप्य ब्राह्मणाय तपस्विने।<br>यत्किंचिद् देवदेवेशं दद्याच्चोद्दिश्य शंकरम्॥ २७॥अमावस्या आनेपर जो देवदेवेश भगवान् शंकरको उद्दिष्ट कर ‘प्रीयतामीश्वरः सोमो महादेवः सनातनः’ अर्थात् (इस दानसे) ‘सनातन महादेव ईश्वर सोम प्रसन्न हों’ ऐसा कहकर तपस्वी ब्राह्मणको जो कुछ भी दान देता है, उससे सात जन्मोंमें किया हुआ उसका पाप उसी क्षण नष्ट हो जाता है॥ २७-२८॥
प्रीयतामीश्वरः सोमो महादेवः सनातनः।<br>सप्तजन्मकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति॥ २८॥
यस्तु कृष्णचतुर्दश्यां स्नात्वा देवं पिनाकिनम्।<br>आराधयेद् द्विजमुखे न तस्यास्ति पुनर्भवः॥ २९॥जो कृष्ण चतुर्दशीको स्नान करनेके अनन्तर भगवान् पिनाकीकी आराधनाकर ब्राह्मणको भोजन कराता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। विशेषरूपसे कृष्णपक्षकी अष्टमीको स्नान करके पादप्रक्षालन आदिके द्वारा विधिपूर्वक धार्मिक द्विजाति (ब्राह्मण)-की अर्चना करके जो ‘प्रीयतां मे महादेवः’ ऐसा कहकर अपना द्रव्य प्रदान करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर परम गतिको प्राप्त करता है॥ २९—३१॥
कृष्णाष्टम्यां विशेषेण धार्मिकाय द्विजातये।<br>स्नात्वाभ्यर्च्य यथान्यायं पादप्रक्षालनादिभिः॥ ३०॥
प्रीयतां मे महादेवो दद्याद् द्रव्यं स्वकीयकम्।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः प्राप्नोति परमां गतिम्॥ ३१॥
द्विजैः कृष्णचतुर्दश्यां कृष्णाष्टम्यां विशेषतः।<br>अमावास्यायां भक्तैस्तु पूजनीयस्त्रिलोचनः॥ ३२॥भक्त द्विजोंको कृष्ण चतुर्दशी विशेषरूपसे कृष्णाष्टमी और अमावस्याको त्रिलोचन (महादेव)-की पूजा करनी चाहिये। एकादशीको निराहार रहकर द्वादशीके दिन ब्राह्मणको भोजन कराकर जो पुरुषोत्तमकी पूजा करता है, वह परमपदको प्राप्त करता है। शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथि वैष्णवी तिथि है। इस तिथिको प्रयत्नपूर्वक भगवान् जनार्दनकी आराधना करनी चाहिये। भगवान् ईशान (शंकर)-को अथवा विष्णुको उद्दिष्ट कर पवित्र ब्राह्मणको जो कुछ दान दिया जाता है, वह अनन्त फल प्रदान करनेवाला होता है॥ ३२—३५॥
एकादश्यां निराहारो द्वादश्यां पुरुषोत्तमम्।<br>अर्चयेद् ब्राह्मणमुखे स गच्छेत् परमं पदम्॥ ३३॥
एषा तिथिवैष्णवी स्याद् द्वादशी शुक्लपक्षके।<br>तस्यामाराधयेद् देवं प्रयत्नेन जनार्दनम्॥ ३४॥
यत्किञ्चिद् देवमीशानमुद्दिश्य ब्राह्मणे शुचौ।<br>दीयते विष्णवे वापि तदनन्तफलप्रदम्॥ ३५॥
यो हि यां देवतामिच्छेत् समाराधयितुं नरः।<br>ब्राह्मणान् पूजयेद् यत्नात् स तस्यां तोषयेत् ततः॥ ३६॥जो मनुष्य जिस देवताकी आराधना करना चाहता है, वह यत्नपूर्वक (उस आराध्य देवताकी प्रतिमूर्ति-रूपमें) ब्राह्मणोंकी पूजा करे, इससे वह आराध्य देवता संतुष्ट हो जाते हैं॥ ३६॥