भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३८८ * कूर्मपुराण *

द्विजानां वपुरास्थाय नित्यं तिष्ठन्ति देवताः।<br>पूज्यन्ते ब्राह्मणालाभे प्रतिमादिष्वपि क्वचित्॥ ३७॥<br><br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन तत् तत् फलमभीप्सता।<br>द्विजेषु देवता नित्यं पूजनीया विशेषतः॥ ३८॥देवता नित्य ही ब्राह्मणोंके शरीरका आश्रय ग्रहणकर प्रतिष्ठित रहते हैं। कभी ब्राह्मणोंके प्राप्त न होनेपर प्रतिमा आदिमें भी उन देवताओंकी पूजा की जाती है। इसलिये उन-उन फलोंकी प्राप्तिकी इच्छासे सभी प्रकारके प्रयत्नोंसे विशेषरूपसे ब्राह्मणोंमें देवताओंकी नित्य पूजा करनी चाहिये॥ ३७-३८॥
विभूतिकामः सततं पूजयेद् वै पुरन्दरम्।<br>ब्रह्मवर्चसकामस्तु ब्रह्माणं ब्रह्मकामुकः॥ ३९॥<br><br>आरोग्यकामोऽथ रविं धनकामो हुताशनम्।<br>कर्मणां सिद्धिकामस्तु पूजयेद् वै विनायकम्॥ ४०॥ऐश्वर्यकी इच्छा करनेवालेको सर्वदा इन्द्रकी पूजा करनी चाहिये। ब्रह्मतेज और ब्रह्मप्राप्तिके अभिलाषीको ब्रह्माकी आराधना करनी चाहिये। आरोग्यकी इच्छावालेको सूर्यकी, धनाभिलाषीको अग्निकी और कर्मोंमें सिद्धि प्राप्त करनेकी (अपने कार्यकी निर्विघ्न सम्पन्नताकी) इच्छावालेको विनायककी पूजा करनी चाहिये॥ ३९-४०॥
भोगकामस्तु शशिनं बलकामः समीरणम्।<br>मुमुक्षुः सर्वसंसारात् प्रयत्नेनार्चयेद्धरिम्॥ ४१॥<br><br>यस्तु योगं तथा मोक्षमन्विच्छेज्ज्ञानमैश्वरम्।<br>सोऽर्चयेद् वै विरूपाक्षं प्रयत्नेनेश्वरेश्वरम्॥ ४२॥<br><br>ये वाञ्छन्ति महायोगान् ज्ञानानि च महेश्वरम्।<br>ते पूजयन्ति भूतेशं केशवं चापि भोगिनः॥ ४३॥भोग-प्राप्तिकी इच्छावालेको चन्द्रमाकी, बलप्राप्तिकी इच्छावालेको वायुकी और समस्त संसारसे मुक्तिके अभिलाषीको प्रयत्नपूर्वक विष्णुकी आराधना करनी चाहिये। जो योग, मोक्ष तथा ईश्वरसम्बन्धी ज्ञान प्राप्त करना चाहता हो, उसे प्रयत्नपूर्वक ईश्वरोंके भी ईश्वर विरूपाक्ष (शंकर)-की पूजा करनी चाहिये। जो महायोग और ज्ञानकी इच्छा करते हैं, वे भूताधिपति महेश्वरकी पूजा करते हैं और योगीजन केशवकी आराधना करते हैं॥ ४१-४३॥
वारिदस्तृप्तिमाप्नोति सुखमक्षयमन्नदः।<br>तिलप्रदः प्रजामिष्टां दीपश्चक्षुरुत्तमम्॥ ४४॥<br><br>भूमिदः सर्वमाप्नोति दीर्घमायुर्हिरण्यदः।<br>गृहदोऽग्र्याणि वेश्मानि रूप्यदो रूपमुत्तमम्॥ ४५॥<br><br>वासोदश्चन्द्रसालोक्यमश्विसालोक्यमश्वदः।<br>अनडुदः श्रियं पुष्टां गोदो ब्रध्नस्य विष्टपम्॥ ४६॥<br><br>यानशय्याप्रदो भार्यामैश्वर्यमभयप्रदः।<br>धान्यदः शाश्वतं सौख्यं ब्रह्मदो ब्रह्मसात्म्यताम्॥ ४७॥<br><br>धान्यान्यपि यथाशक्ति विप्रेषु प्रतिपादयेत्।<br>वेदवित्सु विशिष्टेषु प्रेत्य स्वर्गं समश्नुते॥ ४८॥जलदान करनेवाला तृप्ति प्राप्त करता है, अन्नदान करनेवाला अक्षय सुख प्राप्त करता है, तिलदान करनेवाला इच्छित संतान प्राप्त करता है और दीपदान करनेवाला उत्तम ज्योति (चक्षु) प्राप्त करता है। भूमिदान करनेवाला सब कुछ प्राप्त करता है। स्वर्णदाता दीर्घ आयु, गृह-दान करनेवाला ऊँचे महल तथा चाँदी दान करनेवाला उत्तम रूप प्राप्त करता है। वस्त्र दान करनेवाला चन्द्रलोकमें निवास करता है और अश्व-दान करनेवाला अश्विनीकुमारोंके लोकमें जाता है। वृषभ-दान करनेवालेको पुष्ट लक्ष्मी और गो-दान करनेवालेको ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है। यान (सवारी) और शय्या-दान करनेवालेको भार्या तथा अभयदाताको ऐश्वर्य प्राप्त होता है। धान्यदाता शाश्वत सौख्य तथा वेदविद्याका दान करनेवाला ब्रह्म-तादात्म्यको प्राप्त करता है। विशिष्ट वेदज्ञाता ब्राह्मणोंको यथाशक्ति धान्य भी प्रदान करना चाहिये। ऐसा करनेसे मृत्युके अनन्तर स्वर्गकी प्राप्ति होती है॥ ४४-४८॥