भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय २६ *३८९
गवां घासप्रदानेन सर्वपापैः प्रमुच्यते।<br>इन्धनानां प्रदानेन दीप्ताग्निर्जायते नरः॥ ४९॥<br><br>फलमूलानि शाकानि भोज्यानि विविधानि च।<br>प्रदद्याद् ब्राह्मणेभ्यस्तु मुदा युक्तः सदा भवेत्॥ ५०॥<br><br>औषधं स्नेहमाहारं रोगिणे रोगशान्तये।<br>ददानो रोगरहितः सुखी दीर्घायुरेव च॥ ५१॥<br><br>असिपत्रवनं मार्गं क्षुरधारासमन्वितम्।<br>तीव्रतापं च तरति छत्रोपानत्प्रदो नरः॥ ५२॥<br><br>यद् यदिष्टतमं लोके यच्चापि दयितं गृहे।<br>तत्तद् गुणवते देयं तदेवाक्षयमिच्छता॥ ५३॥गौओंको घास प्रदान करनेसे सभी पापोंसे मुक्ति हो जाती है। ईंधनका दान करनेसे मनुष्य प्रदीप्त (जाठर) अग्निवाला (उत्तम पाचनशक्ति-सम्पन्न) होता है। जो ब्राह्मणोंको फल, मूल, शाक तथा विविध भोज्य पदार्थ प्रदान करता है, वह सर्वदा आनन्दित रहता है। रोगीके रोग-शान्तिके लिये जो उन्हें औषधि, स्नेह (तेल, घृत आदि) तथा आहार प्रदान करता है, वह रोगरहित, सुखी तथा दीर्घ आयुवाला होता है। छाता और जूता प्रदान करनेवाला मनुष्य छुरेकी धारसे पूर्ण असिपत्रवनके मार्गमें तीव्र तापको पार कर लेता है। संसारमें जो-जो भी स्वयंको अत्यन्त अभीष्ट हो और जो घरमें सबके लिये अत्यन्त प्रिय वस्तु हो, उस-उस वस्तुको गुणवान् ब्राह्मणको दानमें देना चाहिये, ऐसा करनेसे अभीष्ट एवं प्रिय वस्तु अक्षय होकर प्राप्त होती है॥ ४९-५३॥
अयने विषुवे चैव ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः।<br>संक्रान्त्यादिषु कालेषु दत्तं भवति चाक्षयम्॥ ५४॥<br><br>प्रयागादिषु तीर्थेषु पुण्येष्वयतनेषु च।<br>दत्त्वा चाक्षयमाप्नोति नदीषु च वनेषु च॥ ५५॥अयन (उत्तरायण और दक्षिणायन), विषुव (मेष और तुला-संक्रान्ति), चन्द्र और सूर्यग्रहण तथा (अन्य) संक्रान्ति आदि समयोंमें दिया हुआ दान अक्षय होता है। प्रयाग आदि तीर्थों, पवित्र मन्दिरों, नदियोंके किनारों तथा (नैमिष आदि पुण्यप्रद) अरण्योंमें दान देनेसे अक्षय (फल) प्राप्त होता है॥ ५४-५५॥
दानधर्मात् परो धर्मो भूतानां नेह विद्यते।<br>तस्माद् विप्राय दातव्यं श्रोत्रियाय द्विजातिभिः॥ ५६॥<br><br>स्वर्गायुर्भूतिकामेन तथा पापोपशान्तये।<br>मुमुक्षुणा च दातव्यं ब्राह्मणेभ्यस्तथाऽन्वहम्॥ ५७॥इस संसारमें प्राणियोंके लिये दानसे बढ़कर कोई अन्य धर्म नहीं है। इसलिये द्विजातियोंको श्रोत्रिय ब्राह्मणको दान देना चाहिये। स्वर्ग, आयु तथा ऐश्वर्यका अभिलाषी और पापकी शान्तिके इच्छुक तथा मोक्षार्थी पुरुषको प्रतिदिन ब्राह्मणोंके निमित्त दान करना चाहिये॥ ५६-५७॥
दीयमानं तु यो मोहाद् गोविप्राग्निसुरेषु च।<br>निवारयति पापात्मा तिर्यग्योनिं व्रजेत् तु सः॥ ५८॥<br><br>यस्तु द्रव्यार्जनं कृत्वा नार्चयेद् ब्राह्मणान् सुरान्।<br>सर्वस्वमपहृत्यैनं राजा राष्ट्रात् प्रवासयेत्॥ ५९॥जो व्यक्ति मोहवश गौ, ब्राह्मण, अग्नि तथा देवताओंके निमित्त दिये जा रहे दानको रोकता है, वह पापात्मा तिर्यग्योनिमें जाता है। जो द्रव्यका अर्जन करके ब्राह्मणों तथा देवताओंकी पूजा नहीं करता है (अर्थात् धर्मसम्मत, लोकसम्मत-रूपमें धनका उपयोग नहीं करता है तो) उसका सर्वस्व अपहरण करके उसे राष्ट्रसे बाहर निकाल देना राजाका कर्तव्य है॥ ५८-५९॥