संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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३९० * कूर्मपुराण *
| यस्तु दुर्भिक्षवेलायामन्नाद्यं न प्रयच्छति।<br>म्रियमाणेषु विप्रेषु ब्राह्मणः स तु गर्हितः ॥ ६० ॥ | जो व्यक्ति दुर्भिक्षके समय मरणप्राय विप्रोंको अन्न आदि नहीं देता, वह ब्राह्मण^१ (या मनुष्य) निन्दित होता है, उसके साथ न आदान-प्रदानका व्यवहार करना चाहिये और न उसके साथ बैठना ही चाहिये। राजा उसको चिह्नितकर^२ अपने राष्ट्रसे बाहर निकाल दे। संसारमें अपने धर्मके साधनरूप द्रव्यको जो असज्जनों (दानके अयोग्यों)-को दान करता है, वह मनुष्य पूर्वसे (पूर्वोक्त वर्णित सभी पापियोंसे) भी अधिक पापी होता है और नरकमें पड़ता है॥ ६०-६२॥ |
| न तस्मात् प्रतिगृह्णीयुर्न विशेयुश्च तेन हि।<br>अङ्कयित्वा स्वकाद् राष्ट्रात् तं राजा विप्रवासयेत् ॥ ६१ ॥ | |
| यस्त्वसद्भ्यो ददातीह स्वद्रव्यं धर्मसाधनम्।<br>स पूर्वाभ्यधिकः पापी नरके पच्यते नरः ॥ ६२ ॥ | |
| स्वाध्यायवन्तो ये विप्रा विद्यावन्तो जितेन्द्रियाः।<br>सत्यसंयमसंयुक्तास्तेभ्यो दद्याद् द्विजोत्तमाः ॥ ६३ ॥ | हे द्विजोत्तमो! जो ब्राह्मण स्वाध्यायनिरत, विद्यावान्, जितेन्द्रिय तथा सत्य और संयम-सम्पन्न है, उसे दान देना चाहिये। भोजन किये रहनेपर भी विद्वान् धार्मिक द्विजको भोजन कराना चाहिये, किंतु मूर्ख और सदाचारहीन ब्राह्मणको दस दिनोंका भूखा होनेपर भी भोजन नहीं कराना^३ चाहिये॥ ६३-६४॥ |
| सुभुक्तमपि विद्वांसं धार्मिकं भोजयेद् द्विजम्।<br>न तु मूर्खमवृत्तस्थं दशरात्रमुपोषितम् ॥ ६४ ॥ | |
| संनिकृष्टमतिक्रम्य श्रोत्रियं यः प्रयच्छति।<br>स तेन कर्मणा पापी दहत्यासप्तमं कुलम् ॥ ६५ ॥ | जो समीपमें स्थित श्रोत्रियकी अवमानना कर अन्य (ब्राह्मण)-को दान देता है, वह पापी अपने उस पापके कारण अपने सात पीढ़ीहतकको दग्ध कर डालता है। यदि कोई ब्राह्मण शील, विद्या आदिमें अधिक गुणसम्पन्न हो, तो समीपके ब्राह्मणका भी अतिक्रमण कर यत्नपूर्वक उसे दान देना चाहिये। जो आदरपूर्वक दान ग्रहण करता है और जो आदरपूर्वक देता है, वे दोनों स्वर्ग प्राप्त करते हैं। इसके विपरीत करनेवाले नरक जाते हैं। धर्मज्ञको नास्तिक, कुतर्की, सभी पाखंडियों तथा वेदज्ञानसे हीन व्यक्तिके निमित्त जलका भी दान नहीं करना चाहिये^४॥ ६५-६८॥ |
| यदि स्यादधिको विप्रः शीलविद्यादिभिः स्वयम्।<br>तस्मै यत्नेन दातव्यं अतिक्रम्यापि संनिधिम् ॥ ६६ ॥ | |
| योऽर्चितं प्रतिगृह्णीयाद् दद्यादर्चितमेव च।<br>तावुभौ गच्छतः स्वर्गं नरकं तु विपर्यये ॥ ६७ ॥ | |
| न वार्यपि प्रयच्छेत नास्तिके हेतुकेऽपि च।<br>पाषण्डेषु च सर्वेषु नावेदविदि धर्मवित् ॥ ६८ ॥ | |
| अपूपं च हिरण्यं च गामश्वं पृथिवीं तिलान्।<br>अविद्वान् प्रतिगृह्णानो भस्मीभवति काष्ठवत् ॥ ६९ ॥ | अपूप (पुआ), स्वर्ण, गौ, अश्व, पृथ्वी तथा तिलका दान ग्रहण करनेवाला अविद्वान् व्यक्ति लकड़ीके समान भस्म हो जाता है (अर्थात् दान लेनेकी योग्यता न रहनेपर लोभवश दान नहीं लेना चाहिये)। श्रेष्ठ द्विजको प्रशस्त द्विजातियोंसे धनकी इच्छा करनी चाहिये अथवा अपनी जातिवालोंसे ही धन ग्रहण करना चाहिये, किंतु शूद्रसे किसी प्रकार धन नहीं लेना चाहिये॥ ६९-७०॥^५ |
| द्विजातिभ्यो धनं लिप्सेत् प्रशस्तेभ्यो द्विजोत्तमः।<br>अपि वा जातिमात्रेभ्यो न तु शूद्रात् कथञ्चन ॥ ७० ॥ |
१-मूलमें 'ब्राह्मण' शब्द है। पर वह मनुष्यमात्रका उपलक्षण है।
२-अपराधसूचक चिह्नसे अपराधीको अङ्कित करना भी दण्ड देनेके अन्तर्गत एक शास्त्रीय प्रक्रिया है।
३-यह अनुष्ठानके अङ्गभूत भोजनका निषेध है। सामान्यतः तो किसी भी भूखेको भोजन कराना गृहस्थका अनिवार्य कर्तव्य है।
४-यहाँ जलके दानका निषेध है। प्यासेको पानी पिलानेका निषेध नहीं है। दानके लिये ही योग्य पात्रकी अपेक्षा है।
५-शूद्र छोटा भाई है, इसलिये उससे धन लेनेका निषेध किया है। छोटेसे माँगना उचित नहीं होता।