संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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* अध्याय २६ * ३९१
| वृत्तिसंकोचमन्विच्छेन्नेहेत धनविस्तरम्।<br>धनलोभे प्रसक्तस्तु ब्राह्मण्यादेव हीयते ॥ ७१ ॥<br><br>वेदानधीत्य सकलान् यज्ञांश्चावाप्य सर्वशः।<br>न तां गतिमवाप्नोति संकोचाद् यामवाप्नुयात् ॥ ७२ ॥<br><br>प्रतिग्रहरुचिर्न स्यात् यात्रार्थं तु समाहरेत्।<br>स्थित्यर्थादधिकं गृह्णन् ब्राह्मणो यात्यधोगतिम् ॥ ७३ ॥ | ब्राह्मणको वृत्तिके संकोचकी इच्छा रखनी चाहिये, उसे धनका विस्तार करनेकी इच्छा नहीं रखनी चाहिये। धनके लोभमें आसक्त ब्राह्मण ब्राह्मणत्वसे च्युत हो जाता है। सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन करने और सभी यज्ञोंको कर लेनेपर भी वह गति नहीं प्राप्त होती जो (वृत्तिके) संकोचसे प्राप्त होती है (अर्थात् जीवननिर्वाहके लिये जीविकाका अधिक-से-अधिक विस्तार उचित नहीं है)। दान लेनेमें रुचि नहीं होनी चाहिये। मात्र जीवन-निर्वाहके लिये धन ग्रहण करना चाहिये। अपनी स्थितिमात्रसे अधिक धन लेनेवाला ब्राह्मण अधोगति प्राप्त करता है (अर्थात् अपने तथा अपने परिवारके पोषणके लिये जितना अत्यावश्यक है, उतना ही लेना चाहिये।) ॥ ७१—७३ ॥ |
| यस्तु याचनको नित्यं न स स्वर्गस्य भाजनम्।<br>उद्वेजयति भूतानि यथा चौरस्तथैव सः ॥ ७४ ॥<br><br>गुरून् भृत्यांश्चोज्जिहीर्षुरर्चिष्यन् देवतातिथीन्।<br>सर्वतः प्रतिगृह्णीयान्न तु तृप्येत् स्वयं ततः ॥ ७५ ॥ | जो नित्य याचना करता है, वह स्वर्गका भागी नहीं होता। वह प्राणियोंको उद्विग्न करता है, वह चोरके ही समान होता है। गुरुजनों तथा सेवकोंके उद्धारकी इच्छा करनेवाला तथा देवता और अतिथियोंकी आराधना करनेवाला सबसे दान ग्रहण कर सकता है, किंतु उस दानसे वह अपनी तृप्ति न करे ॥ ७४-७५ ॥ |
| एवं गृहस्थो युक्तात्मा देवतातिथिपूजकः।<br>वर्तमानः संयतात्मा याति तत् परमं पदम् ॥ ७६ ॥<br><br>पुत्रे निधाय वा सर्वं गत्वारण्यं तु तत्त्ववित्।<br>एकाकी विचरेन्नित्यमुदासीनः समाहितः ॥ ७७ ॥<br><br>एष वः कथितो धर्मो गृहस्थानां द्विजोत्तमाः।<br>ज्ञात्वानुतिष्ठेन्नियतं तथानुष्ठापयेद् द्विजान् ॥ ७८ ॥ | इस प्रकार संयत आत्मावाला, देवताओं तथा अतिथियोंकी पूजा करनेवाला युक्तात्मा गृहस्थ परमपदको प्राप्त करता है। अथवा पुत्रको अपना सर्वस्व समर्पित कर तत्त्वज्ञानी पुरुषको वनमें जाकर समाहित होकर, विरक्तभावसे नित्य एकाकी विचरण करना चाहिये। हे द्विजोत्तमो! यह मैंने आप लोगोंको गृहस्थोंका धर्म बतलाया। इसे जानकर इसका नियमपूर्वक स्वयं अनुष्ठान करना चाहिये और अन्य द्विजोंसे इसका पालन करवाना चाहिये ॥ ७६-७८ ॥ |
| इति देवमनादिमेकमीशं<br>गृहधर्मेण समर्च्चयेदजस्रम्।<br>समतीत्य स सर्वभूतयोनिं<br>प्रकृतिं याति परं न याति जन्म ॥ ७९ ॥ | इस प्रकार गृहस्थधर्मके द्वारा अनादि, अद्वितीय देव ईश्वरकी सतत आराधना करनी चाहिये। (ऐसा करनेवाला) वह व्यक्ति समस्त प्राणियोंके मूल कारण प्रकृतिका अतिक्रमण कर परमपदको प्राप्त कर लेता है और उसका पुनर्जन्म नहीं होता ॥ ७९ ॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिभागे षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिभागमें छब्बीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २६ ॥