भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 402, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 402
३९२* कूर्मपुराण *

सत्ताईसवाँ अध्याय

वानप्रस्थ-आश्रम तथा वानप्रस्थ-धर्मका वर्णन, वानप्रस्थीके कर्तव्योंका निरूपण

व्यास उवाच**व्यासजीने कहा—**इस प्रकार आयुके द्वितीय
एवं गृहाश्रमे स्थित्वा द्वितीयं भागमायुषः ।<br>वानप्रस्थाश्रमं गच्छेत् सदारः साग्निरेव च ॥ १ ॥भागतक गृहस्थाश्रममें रहकर (तृतीय भागमें) अग्नि तथा भार्यासहित वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश करना चाहिये। अथवा पुत्रके भी पुत्रको देखकर और शरीरके जर्जर
निक्षिप्य भार्यां पुत्रेषु गच्छेद् वनमथापि वा।<br>दृष्टापत्यस्य चापत्यं जर्जरीकृतविग्रहः ॥ २ ॥हो जानेपर अपनी पत्नीको पुत्रोंके संरक्षणमें रख दे तथा स्वयं वनमें चला जाय। प्रशस्त उत्तरायणमें
शुक्लपक्षस्य पूर्वाह्ने प्रशस्ते चोत्तरायणे ।<br>गत्वारण्यं नियमवांस्तपः कुर्यात् समाहितः ॥ ३ ॥शुक्लपक्षके पूर्वाह्नमें वनमें जाकर नियम ग्रहणकर समाहित होकर तप करना चाहिये ॥ १–३ ॥
फलमूलानि पूतानि नित्यमाहारमाहरेत् ।<br>यताहारो भवेत् तेन पूजयेत् पितृदेवताः ॥ ४ ॥नित्य पवित्र फल-मूलोंको आहारके लिये स्वीकार करना चाहिये और इस प्रकार संयत आहारवाला होकर उसी फल-मूल आदिसे पितरों तथा देवताओंका पूजन
पूजयित्वातिथिं नित्यं स्नात्वा चाभ्यर्चयेत् सुरान्।<br>गृहादाहृत्य चाश्नीयादष्टौ ग्रासान् समाहितः ॥ ५ ॥(संतर्पण) करना चाहिये। स्नान करके नित्य अतिथियोंका पूजन करके देवताओंका पूजन करे। घरसे लाकर एकाग्रतापूर्वक आठ ग्रास भोजन करे। नित्य जटा धारण
जटाश्च बिभृयान्नित्यं नखरोमाणि नोत्सृजेत्।<br>स्वाध्यायं सर्वदा कुर्यान्नियच्छेद् वाचमन्यतः ॥ ६ ॥करे, नख तथा रोम न कटवाये। सर्वदा स्वाध्याय करे और अन्य विषयोंसे वाणीको रोके ॥ ४–६ ॥
अग्निहोत्रं च जुहुयात् पञ्चयज्ञान् समाचरेत्।<br>मुन्यन्नैर्विविधैर्मेध्यैः शाकमूलफलेन वा ॥ ७ ॥अग्निहोत्र करे और (वनमें स्वयं उत्पन्न होनेवाले) मुनियोंके विविध प्रकारके पवित्र अन्नों एवं शाक, मूल अथवा फलोंसे पञ्चमहायज्ञोंको सम्पन्न करे। नित्य
चीरवासा भवेन्नित्यं स्नायात् त्रिषवणं शुचिः ।<br>सर्वभूतानुकम्पी स्यात् प्रतिग्रहविवर्जितः ॥ ८ ॥चीररूपी (अचला, कौपीनमात्र) वस्त्र धारण करे, तीनों संध्याओंमें पवित्रतापूर्वक स्नान करे। सभी प्राणियोंपर दया रखे और दान ग्रहण न करे। (वानप्रस्थी) द्विजको
दर्शेन पौर्णमासेन यजेत नियतं द्विजः ।<br>ऋक्षेष्ववाग्रयणे चैव चातुर्मास्यानि चाहरेत्।<br>उत्तरायणं च क्रमशो दक्षस्यायनमेव च ॥ ९ ॥नियमसे दर्श-पौर्णमासयाग, नक्षत्रयाग, आग्रयण (नवसस्येष्टि) और चातुर्मासयाग करना चाहिये तथा क्रमशः उत्तरायण एवं दक्षिणायन याग करना चाहिये। वसन्त तथा
वासन्तैः शारदैर्मेध्यैर्मुन्न्यन्नैः स्वयमाहृतैः ।<br>पुरोडाशांश्चरूंश्चैव विधिवन्निर्वपेत् पृथक् ॥ १० ॥शरत्कालमें उत्पन्न स्वयं लाये हुए पवित्र मुन्यन्नोंसे पृथक्-पृथक् पुरोडाश एवं चरु बनाकर देवताओं (तथा पितरों)-को अतिपवित्र वन्य हवि प्रदान करना चाहिये।
देवताभ्यश्च तद् हुत्वा वन्यं मेध्यतरं हविः ।<br>शेषं समुपभुञ्जीत लवणं च स्वयं कृतम् ॥ ११ ॥तदनन्तर अवशिष्ट उस हविको लवण मिलाकर स्वयं भक्षण करना चाहिये ॥ ७–११ ॥
वर्जयेन्मधुमांसानि भौमानि कवकानि च।<br>भूस्तृणं शिग्रुकं चैव श्लेष्मातकफलानि च ॥ १२ ॥मधु, मांस, भूमिमें उत्पन्न कवक (कुकुरमुत्ता), भूस्तृण (शाकविशेष), शिग्रुक (सहिजन) तथा श्लेष्मातक (लिसोढ़ा)-के फलोंका त्याग करना चाहिये ॥ १२ ॥