भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय २७ *३९३
न फालकृष्टमश्नीयादुत्सृष्टमपि केनचित्।<br>न ग्रामजातान्यार्त्तोऽपि पुष्पाणि च फलानि च ॥ १३ ॥हलसे जोती हुई भूमिमें उत्पन्न और दूसरोंके द्वारा परित्यक्त पदार्थका भक्षण नहीं करना चाहिये। कष्टमें होते हुए भी ग्राममें उत्पन्न पुष्पों-फलोंका भक्षण नहीं करना चाहिये ॥ १३ ॥
श्रावणेनैव विधिना वह्निं परिचरेत् सदा।<br>न द्रुह्येत् सर्वभूतानि निर्द्वन्द्वो निर्भयो भवेत् ॥ १४ ॥सर्वदा श्रावणी विधिके अनुसार अग्निकी परिचर्या करे। किसी भी प्राणीसे द्रोह न करे, द्वन्द्वोंसे परे और भयरहित रहे। रातमें कुछ भी भोजन न करे, रात्रिमें केवल ध्यानपरायण रहे। नित्य इन्द्रियजयी, क्रोधजयी, तत्त्वज्ञानका चिन्तक तथा ब्रह्मचर्यपरायण रहे। पत्नीका भी आश्रय न ले ॥ १४-१५ ॥
न नक्तं किंचिदश्नीयाद् रात्रौ ध्यानपरो भवेत्।<br>जितेन्द्रियो जितक्रोधस्तत्त्वज्ञानविचिन्तकः।<br>ब्रह्मचारी भवेन्नित्यं न पत्नीमपि संश्रयेत् ॥ १५ ॥<br>यस्तु पत्न्या वनं गत्वा मैथुनं कामतश्चरेत्।<br>तद् व्रतं तस्य लुप्येत प्रायश्चित्तीयते द्विजः ॥ १६ ॥जो (द्विज) वनमें जाकर कामवश पत्नीके साथ मैथुन करता है तो वह व्रत (वानप्रस्थव्रत)-से च्युत हो जाता है और प्रायश्चित्तका भागी होता है। वहाँ (वानप्रस्थाश्रममें) जो संतान उत्पन्न होती है, वह द्विजातियोंके द्वारा स्पर्शके योग्य नहीं होती। उसका वेदमें अधिकार नहीं होता और उसके वंशमें भी यही स्थिति रहती है। (वानप्रस्थीको) नित्य भूमिपर शयन करना चाहिये। गायत्रीके जपमें तत्पर रहना चाहिये। सभी प्राणियोंको शरण देनेवाला होना चाहिये और दानशील होना चाहिये ॥ १६-१८ ॥
तत्र यो जायते गर्भो न संस्पृश्यो द्विजातिभिः।<br>न हि वेदेऽधिकारोऽस्य तद्वंशेऽप्येवमेव हि ॥ १७ ॥
अधः शयीत सततं सावित्रीजाप्यतत्परः।<br>शरण्यः सर्वभूतानां संविभागपरः सदा ॥ १८ ॥<br>परिवादं मृषावादं निद्रालस्यं विवर्जयेत्।<br>एकाग्निरनिकेतः स्यात् प्रोक्षितां भूमिमाश्रयेत् ॥ १९ ॥परिवाद (परनिन्दा), असत्यभाषण, निद्रा तथा आलस्यका परित्याग करना चाहिये। एकाग्नि और घरसे रहित होना चाहिये। प्रोक्षित की गयी भूमिपर रहना चाहिये। (वनमें) मृगोंके साथ विचरण करना चाहिये और उन्हींके साथ रहना चाहिये (अर्थात् असंग हो वनमें ही रहे)। शिला या बालूके ऊपर शयन करना चाहिये और सदा समाहितचित्त रहना चाहिये। शीघ्र ही समाप्त होने योग्य फल-मूल आदिका संग्रह करनेवाला होना चाहिये अथवा एक महीनेतक, छः महीनेतक या एक वर्षतक उपयोग किये जानेवाले (फल-मूलादि)-का संग्रह करनेवाला होना चाहिये ॥ १९-२१ ॥
मृगैः सह चरेद् वासं तैः सहैव च संवसेत्।<br>शिलायां शर्करायां वा शयीत सुसमाहितः ॥ २० ॥
सद्यः प्रक्षालको वा स्यान्माससंचयिकोऽपि वा।<br>षण्मासनिचयो वा स्यात् समानिचय एव वा ॥ २१ ॥<br>त्यजेदाश्वयुजे मासि सम्पन्नं पूर्वसंचितम्।<br>जीर्णानि चैव वासांसि शाकमूलफलानि च ॥ २२ ॥पूर्वसंचित पदार्थों, जीर्ण वस्त्रों तथा शाक, फल, मूल आदिका आश्विनमासमें परित्याग कर देना चाहिये। दाँतोंको ही ऊखल (तथा मूसल) समझना चाहिये। कापोतीवृत्ति (कबूतरकी तरह दाना चुगकर खानेवाली वृत्ति)-का आश्रय ग्रहण करना चाहिये ॥ २२-२३ ॥
दन्तोलूखलिको वा स्यात् कापोतीं वृत्तिमाश्रयेत्।<br>अश्मकुट्टो भवेद् वापि कालपक्वभुगेव वा ॥ २३ ॥