संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ३९४ | * कूर्मपुराण * |
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| नक्तं चान्नं समश्नीयाद् दिवा चाहृत्य शक्तितः।<br>चतुर्थकालिको वा स्यात् स्याद्वाप्यष्टमकालिकः ॥ २४ ॥ | अथवा पत्थरपर ही कूटकर अन्नका भक्षण करनेवाला होना चाहिये या समयानुसार पके हुए (फल-मूलादि)-का भक्षण करनेवाला होना चाहिये। यथाशक्ति दिनमें अन्न (फल-मूलादि) लाकर रात्रिमें भक्षण करना चाहिये अथवा चतुर्थकालिक या अष्टमकालिक भोजन करनेवाला होना चाहिये। अथवा शुक्ल और कृष्णपक्षमें चान्द्रायणविधिसे रहे। या प्रत्येक पक्षमें एक बार उबाले गये यवागूका भक्षण करे॥ २४-२५॥ |
| चान्द्रायणविधानैर्वा शुक्ले कृष्णे च वर्तयेत्।<br>पक्षे पक्षे समश्नीयाद् यवागूं क्वथितां सकृत्॥ २५॥<br>पुष्पमूलफलैर्वापि केवलैर्वर्तयेत् सदा।<br>स्वाभाविकैः स्वयं शीर्णैर्वैखानसमते स्थितः ॥ २६ ॥ | अथवा सर्वदा वैखानस (वानप्रस्थ) व्रतका पालन करते हुए केवल स्वाभाविक रीतिसे अपने-आप (वृक्षसे) गिरे हुए पुष्प, मूल एवं फलोंसे निर्वाह करता रहे। भूमिपर लेटना एवं रहना चाहिये। दिनमें पंजोंके बल उठना, बैठना या चलना चाहिये। धैर्य कभी भी न छोड़े। ग्रीष्म ऋतुमें पञ्चाग्नि-तप (तप-विशेषका सेवन) करे। वर्षाके दिनोंमें खुले आकाशके नीचे रहे और हेमन्तमें गीले वस्त्र धारण करे—इस प्रकार क्रमशः तपस्याको बढ़ाता रहे॥ २६-२८॥ |
| भूमौ वा परिवर्तेत तिष्ठेद् वा प्रपदैर्दिनम्।<br>स्थानासनाभ्यां विहरेन्न क्वचिद् धैर्यमुत्सृजेत् ॥ २७॥ | |
| ग्रीष्मे पञ्चतपाश्च स्याद् वर्षास्वभ्रावकाशकः।<br>आर्द्रवासास्तु हेमन्ते क्रमशो वर्धयंस्तपः ॥ २८॥<br>उपस्पृश्य त्रिषवणं पितृदेवांश्च तर्पयेत्।<br>एकपादेन तिष्ठेत मरीचीन् वा पिबेत् तदा ॥ २९ ॥ | आचमनकर तीनों संध्याओंमें स्नान तथा पितरों और देवताओंका तर्पण (एवं पूजन) करे। उस समय एक पैरसे खड़ा रहे अथवा सूर्यकिरणोंका पान करे। पञ्चाग्निका सेवन करे अथवा धुएँका पान करे या ऊष्माका पान करे अथवा सोमपान करे। शुक्लपक्षमें दुग्ध-पान करे और कृष्णपक्षमें गोमयका सेवन करे अथवा गिरे हुए पत्तोंका सेवन करे या सदा कृच्छ्रव्रतका पालन करता रहे॥ २९-३०॥ |
| पञ्चाग्निर्धूमपो वा स्यादुष्मपः सोमपोऽपि वा।<br>पयः पिबेच्छुक्लपक्षे कृष्णपक्षे तु गोमयम्।<br>शीर्णपर्णाशनो वा स्यात् कृच्छ्रैर्वा वर्तयेत् सदा ॥ ३० ॥<br>योगाभ्यासरतश्च स्याद् रुद्राध्यायी भवेत् सदा।<br>अथर्वशिरसोऽध्येता वेदान्ताभ्यासतत्परः ॥ ३१ ॥ | सदा योगका अभ्यास करता रहे, रुद्राध्यायका अध्ययन करता रहे। अथर्वशिरस्के अध्ययन और वेदान्तके अभ्यासमें तत्पर रहे। आलस्यरहित होकर निरन्तर यमों और नियमोंका पालन करे। कृष्ण-मृगचर्म, उत्तरीय और शुक्ल यज्ञोपवीत धारण करे। अग्नियोंको अपनी आत्मामें प्रतिष्ठित कर ध्यान-परायण रहे। अग्नि (गृह्याग्नि) और गृहका परित्याग कर दे और मुनिव्रतद्वारा मोक्षकी प्राप्तिका प्रयत्न करता रहे॥ ३१-३३॥ |
| यमान् सेवेत सततं नियमांश्चाप्यतन्द्रितः।<br>कृष्णाजिनी सोत्तरीयः शुक्लयज्ञोपवीतवान् ॥ ३२ ॥ | |
| अथ चाग्नीन् समारोप्य स्वात्मनि ध्यानतत्परः।<br>अनग्निरनिकेतः स्यान्मुनिर्मोक्षपरो भवेत् ॥ ३३ ॥ | |
| तापसेष्वेव विप्रेषु यात्रिकं भैक्षमाहरेत्।<br>गृहमेधिषु चान्येषु द्विजेषु वनवासिषु ॥ ३४ ॥ | जीवन-निर्वाहके लिये तपस्वी ब्राह्मणोंसे ही भिक्षा माँगे। अथवा अन्य गृहस्थों तथा वनवासी द्विजोंसे भिक्षा लेनी चाहिये॥ ३४॥ |