संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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* अध्याय २८ * ३९५
| ग्रामादाहृत्य वाश्नीयादष्टौ ग्रासान् वने वसन्।<br>प्रतिगृह्य पुटेनैव पाणिना शकलेन वा॥ ३५॥ | अथवा वनमें रहते हुए ग्रामसे लाकर मात्र आठ ग्रास भोजन करना चाहिये। पत्तोंके दोने, हाथ अथवा कसोरे (मिट्टीके पात्र) इत्यादिके टुकड़ेमें ही भोजन ग्रहण करना चाहिये॥ ३५॥ |
| विविधाश्चोपनिषद आत्मसंसिद्धये जपेत्।<br>विद्याविशेषान् सावित्रीं रुद्राध्यायं तथैव च॥ ३६॥ | आत्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये (विधिपूर्वक) विविध उपनिषदोंका निरन्तर पाठ करना चाहिये। इसी प्रकार विशिष्ट विद्याओं, गायत्री तथा रुद्राध्यायकी आवृत्ति करनी चाहिये। अथवा ब्रह्मार्पण-विधिमें स्थित रहते हुए महाप्रस्थान (मृत्यु-पथ)-के उद्देश्यसे अनशन करे या अग्निमें प्रवेश करे॥ ३६-३७॥ |
| महाप्रस्थानिकं चासौ कुर्यादनशनं तु वा।<br>अग्निप्रवेशमन्यद् वा ब्रह्मार्पणविधौ स्थितः॥ ३७॥ | |
| यस्तु सम्यगिममाश्रमं शिवं<br> संश्रयेदशिवपुञ्जनाशनम् ।<br>तापसः स परमैश्वरं पदं<br> याति यत्र जगतोऽस्य संस्थितिः॥ ३८॥ | जो तपस्वी अमंगल-समूहका नाश करनेवाले तथा कल्याणकारी इस (वानप्रस्थ) आश्रमका भलीभाँति आश्रयण करता है, वह उस परम ऐश्वर पदको प्राप्त करता है, जिसमें इस जगत्की स्थिति है॥ ३८॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे सप्तविंशोऽध्यायः॥ २७॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें सत्ताईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २७॥
अट्ठाईसवाँ अध्याय
संन्यासधर्मका प्रतिपादन, संन्यासियोंके भेद तथा संन्यासीके कर्तव्योंका वर्णन
| व्यास उवाच<br><br>एवं वनाश्रमे स्थित्वा तृतीयं भागमायुषः।<br>चतुर्थमायुषो भागं संन्यासेन नयेत् क्रमात्॥ १॥<br><br>अग्नीनात्मनि संस्थाप्य द्विजः प्रव्रजितो भवेत्।<br>योगाभ्यासरतः शान्तो ब्रह्मविद्यापरायणः॥ २॥<br><br>यदा मनसि संजातं वैतृष्ण्यं सर्ववस्तुषु।<br>तदा संन्यासमिच्छेच्च पतितः स्याद् विपर्यये॥ ३॥<br><br>प्राजापत्यां निरूप्येष्टिमाग्नेयीमथवा पुनः।<br>दान्तः पक्वकषायोऽसौ ब्रह्माश्रममुपाश्रयेत्॥ ४॥ | व्यासजीने कहा— इस प्रकार वानप्रस्थ-आश्रममें आयुके तीसरे भागको व्यतीतकर क्रमशः आयुके चौथे भागको संन्यास-आश्रमद्वारा व्यतीत करना चाहिये। अग्नियोंको आत्मामें प्रतिष्ठित कर द्विजको संन्यास ग्रहण करना चाहिये। उसे योगाभ्यासमें निरत, शान्त तथा ब्रह्मविद्यापरायण रहना चाहिये। जब सभी वस्तुओंके प्रति मनमें वितृष्णा उत्पन्न हो जाय, तब संन्यास ग्रहण करनेकी इच्छा करनी चाहिये। इसके विपरीत करनेसे (अर्थात् स्वल्प भी तृष्णाके रहते संन्यास ग्रहण करनेपर) मनुष्य पतित हो जाता है। प्राजापत्य अथवा आग्नेय याग करके इन्द्रियनिग्रही एवं पूर्ण वैराग्यवान् द्विजको ब्रह्माश्रम (संन्यासाश्रम)-का आश्रय ग्रहण करना चाहिये॥ १—४॥ |
| ज्ञानसंन्यासिनः केचिद् वेदसंन्यासिनः परे।<br>कर्मसंन्यासिनस्त्वन्ये त्रिविधाः परिकीर्तिताः॥ ५॥ | कुछ ज्ञानसंन्यासी होते हैं, कुछ वेदसंन्यासी होते हैं और कुछ कर्मसंन्यासी होते हैं। इस प्रकार तीन प्रकारके संन्यासी कहे गये हैं॥ ५॥ |