संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३९६ * कूर्मपुराण *
यः सर्वसङ्गनिर्मुक्तो निर्द्वन्द्वश्चैव निर्भयः।
प्रोच्यते ज्ञानसंन्यासी स्वात्मन्येव व्यवस्थितः॥ ६ ॥
वेदमेवाभ्यसेन्नित्यं निराशी निष्परिग्रहः।
प्रोच्यते वेदसंन्यासी मुमुक्षुर्विजितेन्द्रियः॥ ७ ॥
यस्त्वग्नीनात्मसात्कृत्वा ब्रह्मार्पणपरो द्विजः।
ज्ञेयः स कर्मसंन्यासी महायज्ञपरायणः॥ ८ ॥
त्रयाणामपि चैतेषां ज्ञानी त्वभ्यधिको मतः।
न तस्य विद्यते कार्यं न लिङ्गं वा विपश्चितः॥ ९ ॥
जो सभी आसक्तियोंसे मुक्त है, सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंसे रहित है और निर्भय है, अपनी आत्मामें ही प्रतिष्ठित रहनेवाला है, वह ज्ञानसंन्यासी कहलाता है। जो नित्य वेदका ही अभ्यास (स्वाध्याय) करता रहता है, आशारहित है, संग्रहशून्य है, जितेन्द्रिय है तथा मोक्षकी इच्छा रखनेवाला है, वह वेदसंन्यासी कहा जाता है। जो अग्नियोंको आत्मसात्कर ब्रह्मार्पणतत्पर रहता है, उस महायज्ञपरायण (सतत ब्रह्मचिन्तन-परायण) द्विजको कर्मसंन्यासी जानना चाहिये। इन तीनोंमें ज्ञानी (ज्ञान-संन्यासी)-को अधिक श्रेष्ठ माना गया है। उस (ज्ञानी)-का न कोई कर्तव्य (शेष) रह जाता है और न कोई चिह्न ही होता है॥ ६—९॥
निर्ममो निर्भयः शान्तो निर्द्वन्द्वः पर्णभोजनः।
जीर्णकौपीनवासाः स्यान्नग्नो वा ध्यानतत्परः॥ १० ॥
संन्यासीको ममताशून्य, भयरहित, शान्त, द्वन्द्वोंसे परे, पत्तोंका ही आहार करनेवाला, जीर्ण कौपीनको वस्त्र-रूपमें धारण करनेवाला अथवा नग्न और ध्यान-परायण होना चाहिये॥ १०॥
ब्रह्मचारी मिताहारो ग्रामादन्नं समाहरेत्।
अध्यात्ममतिरासीत निरपेक्षो निरामिषः॥ ११ ॥
आत्मनैव सहायेन सुखार्थं विचरेदिह।
नाभिनन्देत मरणं नाभिनन्देत जीवितम्॥ १२ ॥
कालमेव प्रतीक्षेत निदेशं भृतको यथा।
नाध्येतव्यं न वक्तव्यं श्रोतव्यं न कदाचन।
एवं ज्ञात्वा परो योगी ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ १३॥
(संन्यासी) ब्रह्मचर्यका पालन करे, सीमित मात्रामें आहार ग्रहण करे, ग्रामसे अन्न माँगकर लाये। अध्यात्म (ज्ञान)-में बुद्धि रखे, निरपेक्ष रहे तथा निरामिष रहे। अपनी ही सहायतासे अर्थात् स्वावलम्बी होकर आत्मतृप्तिके लिये इस संसारमें विचरण करे, न तो मृत्युका ही अभिनन्दन करे और न जीवनका अभिनन्दन करे। जिस प्रकार सेवक (अपने स्वामीके) आज्ञाकी प्रतीक्षा करता है, उसी प्रकार उसे भी कालकी प्रतीक्षा करनी चाहिये। न कभी अध्ययन करे, न प्रवचन करे और न कुछ श्रवण ही करे। इस प्रकारका ज्ञान रखकर (आत्मनिष्ठ होकर) वह श्रेष्ठ योगी ब्रह्मस्वरूप हो जाता है॥ ११—१३॥
एकवासाथवा विद्वान् कौपीनाच्छादनस्तथा।
मुण्डी शिखी वाथ भवेत् त्रिदण्डी निष्परिग्रहः।
काषायवासाः सततं ध्यानयोगपरायणः॥ १४॥
ग्रामान्ते वृक्षमूले वा वसेद् देवालयेऽपि वा।
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।
भैक्ष्येण वर्तयेन्नित्यं नैकान्नादी भवेत् क्वचित्॥ १५ ॥
विद्वान् संन्यासी (कौपीनके साथ) एक वस्त्र (उत्तरीय) धारण करे अथवा कौपीनमात्रसे शरीरका आच्छादन करे। मुण्डित सिर अथवा जटाधारी रहे। त्रिदण्डी रहे, संचयवृत्तिसे शून्य रहे। काषाय वस्त्र ही धारण करे और निरन्तर ध्यानयोगमें परायण रहे। उसे (संन्यासीको) ग्रामकी सीमापर, वृक्षके मूलमें अथवा किसी देवमन्दिरमें रहना चाहिये। शत्रु-मित्र तथा मान-अपमानमें समान रहना चाहिये। नित्य भिक्षावृत्तिसे निर्वाह करे। कभी भी उसे किसी एक ही व्यक्तिका अन्न खानेवाला नहीं होना चाहिये॥ १४-१५॥