संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * अध्याय २८ * | ३९७ |
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यस्तु मोहेन वालस्यादेकान्नादी भवेद् यतिः।
न तस्य निष्कृतिः काचिद् धर्मशास्त्रेषु कथ्यते॥ १६॥
रागद्वेषविमुक्तात्मा समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
प्राणिहिंसानिवृत्तश्च मौनी स्यात् सर्वनिस्पृहः॥ १७॥
दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।
सत्यपूतां वदेद् वाणीं मनःपूतं समाचरेत्॥ १८॥
नैकत्र निवसेद् देशे वर्षाभ्योऽन्यत्र भिक्षुकः।
स्नानशौचरतो नित्यं कमण्डलुकरः शुचिः॥ १९॥
ब्रह्मचर्यरतो नित्यं वनवासरतो भवेत्।
मोक्षशास्त्रेषु निरतो ब्रह्मसूत्री जितेन्द्रियः॥ २०॥
दम्भाहंकारनिर्मुक्तो निन्दापैशुन्यवर्जितः।
आत्मज्ञानगुणोपेतो यतिर्मोक्षमवाप्नुयात्॥ २१॥
अभ्यसेत् सततं वेदं प्रणवाख्यं सनातनम्।
स्नात्वाचम्य विधानेन शुचिर्देवालयादिषु॥ २२॥
यज्ञोपवीती शान्तात्मा कुशपाणिः समाहितः।
धौतकाषायवसनो भस्मच्छन्नत नूरुहः॥ २३॥
अधियज्ञं ब्रह्म जपेदाधिदैविकमेव च।
आध्यात्मिकं च सततं वेदान्ताभिहितं च यत्॥ २४॥
पुत्रेषु वाथ निवसन् ब्रह्मचारी यतिर्मुनिः।
वेदमेवाभ्यसेन्नित्यं स याति परमां गतिम्॥ २५॥
अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यं तपः परम्।
क्षमा दया च संतोषो व्रतान्यस्य विशेषतः॥ २६॥
वेदान्तज्ञाननिष्ठो वा पञ्च यज्ञान् समाहितः।
कुर्यादहरहः स्नात्वा भिक्षान्नेनैव तेन हि॥ २७॥ | जो संन्यासी मोह या आलस्यवश किसी एक ही व्यक्तिका अन्न भक्षण करता है, उसकी मुक्तिका कोई उपाय धर्मशास्त्रोंमें नहीं बतलाया गया है। (संन्यासीको) राग-द्वेषसे मुक्त, मिट्टी, पत्थर और सोनेमें समान भाव रखनेवाला, प्राणियोंकी हिंसासे निवृत्त, मौनी और सब प्रकारसे आसक्तिशून्य होना चाहिये, अच्छी तरह देखकर पैर रखना चाहिये, वस्त्रसे छानकर जल पीना चाहिये, सत्यसे पवित्र वाणी बोलनी चाहिये और मनसे शुद्ध आचरण करना चाहिये॥ १६-१८॥<br><br>संन्यासीको वर्षा-ऋतुके अतिरिक्त (अन्य ऋतुओंमें) किसी एक ही स्थानपर नहीं रहना चाहिये। नित्य स्नान एवं शौचमें तत्पर, हाथमें कमण्डलु धारण करनेवाला तथा पवित्र होना चाहिये। नित्य ब्रह्मचर्यव्रत धारण करना चाहिये, वनवासी ही रहना चाहिये तथा मोक्षविषयक शास्त्राध्ययनमें निरत रहते हुए ब्रह्मसूत्री (यज्ञोपवीतसे युक्त दण्डधारी) और जितेन्द्रिय रहना चाहिये। दम्भ-अहंकारसे मुक्त रहे, निन्दा तथा पिशुनता (चुगलखोरी)-का सर्वथा परित्याग करे। आत्मज्ञानसम्बन्धी गुणोंसे सम्पन्न रहे—ऐसा संन्यासी मोक्ष प्राप्त करता है। विधिपूर्वक स्नानोपरान्त आचमन करके पवित्रतापूर्वक देवालयोंमें प्रणव नामक सनातन वेद (मन्त्र)-का निरन्तर अभ्यास (जप) करे॥ १९-२२॥<br><br>यज्ञोपवीती, शान्तात्मा, हाथमें कुश धारण करनेवाला, एकाग्रचित्त, धुला हुआ काषाय वस्त्र धारण करनेवाला और भस्मसे धूसरित देहवाला रहना चाहिये*। संन्यासीको वेदान्त-प्रतिपादित अधियज्ञ, (समस्त यज्ञोंके अधिष्ठान) आधिदैविक तथा आध्यात्मिक ब्रह्म (मन्त्र-प्रणव)-का सतत जप करना चाहिये। अथवा मननशील तथा ब्रह्मचारी यतिको पुत्रोंके बीच रहते हुए नित्य वेदका ही अभ्यास करना चाहिये, इससे उसे परम गति प्राप्त होती है॥ २३-२५॥<br><br>अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, श्रेष्ठ तप, क्षमा, दया और संतोष—ये ब्रह्मचारी यतिके विशेष व्रत हैं। अथवा वेदान्त-ज्ञानमें निष्ठाके साथ समाहित होकर स्नानादि कर भिक्षामें प्राप्त अन्नसे नित्य पञ्चमहायज्ञोंका सम्पादन करना चाहिये (इसे विरक्त कर्मयोगीका धर्म समझना चाहिये)॥ २६-२७॥
* कुटीचक संन्यासी शिखा और यज्ञोपवीत धारण करते हैं। (नारदपरिव्राजकोपनिषद्-५)