संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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होममन्त्राञ्जपेन्नित्यं काले काले समाहितः।
स्वाध्यायं चान्वहं कुर्यात् सावित्रीं संध्ययोर्जपेत् ॥ २८ ॥
ध्यायीत सततं देवमेकान्ते परमेश्वरम्।
एकान्नं वर्जयेन्नित्यं कामं क्रोधं परिग्रहम् ॥ २९ ॥
एकवासा द्विवासा वा शिखी यज्ञोपवीतवान्।
कमण्डलुकरो विद्वान् त्रिदण्डी याति तत्परम् ॥ ३० ॥
नियत समयपर समाहित होकर नित्य होम-मन्त्रोंका जप करना चाहिये। प्रतिदिन स्वाध्याय करे और संध्याओंमें गायत्रीका जप करे। एकान्तमें निरन्तर परमेश्वरदेवका ध्यान करे। नित्य एक ही व्यक्तिके अन्नका और काम, क्रोध तथा परिग्रहका त्याग करे। एक वस्त्र अथवा दो वस्त्र धारण करे। शिखा एवं यज्ञोपवीत धारण करे। हाथमें कमण्डलु धारण करे, ऐसा त्रिदण्डी विद्वान् भी (अनासक्त—द्वन्द्वातीत कर्मयोगी होनेके कारण) परम पदको प्राप्त करता है॥ २८-३०॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागेऽष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें अट्ठाईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २८॥
उनतीसवाँ अध्याय
संन्यासाश्रमधर्म-निरूपणमें यतियोंकी भैक्ष्यवृत्तिका स्वरूप, यतियोंके लिये महेश्वरके ध्यानका प्रतिपादन, व्रतभङ्गमें प्रायश्चित्तविधान तथा पुनः यथास्थितिमें आनेकी विधि, संन्यासधर्म-प्रकरणकी समाप्ति
व्यास उवाच
एवं स्वाश्रमनिष्ठानां यतीनां नियतात्मनाम्।
भैक्षेण वर्तनं प्रोक्तं फलमूलैरथापि वा ॥ १ ॥
एककालं चरेद् भैक्षं न प्रसज्येत विस्तरे।
भैक्षे प्रसक्तो हि यतिर्विषयेष्वपि सज्जति ॥ २ ॥
सप्तागारं चरेद् भैक्षमलाभात् तु पुनश्चरेत्।
प्रक्षाल्य पात्रे भुञ्जीयादद्भिः प्रक्षालयेत् तु तत् ॥ ३ ॥
अथवान्यदुपादाय पात्रे भुञ्जीत नित्यशः।
भुक्त्वा तत् संत्यजेत् पात्रं यात्रामात्रमलोलुपः ॥ ४ ॥
विधूमे सन्नमुसले व्यङ्गारे भुक्तवज्जने।
वृत्ते शरावसम्पाते भिक्षां नित्यं यतिश्चरेत् ॥ ५ ॥
व्यासजीने कहा— इस प्रकार अपने आश्रममें स्थित नियतात्मा यतियोंके लिये भिक्षा अथवा फल-मूलद्वारा जीवन-निर्वाह करना कहा गया है। एक समय ही भिक्षा करनी चाहिये। उसके विस्तारमें आसक्त नहीं होना चाहिये; क्योंकि भिक्षामें आसक्ति रखनेवाला संन्यासी विषयोंमें भी आसक्त हो जाता है॥ १-२॥
सात घरोंसे भिक्षा माँगनी चाहिये। (उतने घरोंमें) न मिलनेपर पुनः भिक्षा माँगनी चाहिये। पात्रको धोकर उसमें भिक्षा ग्रहण करनी चाहिये और भिक्षाके बाद पुनः उसे जलसे धोना चाहिये। अथवा (सम्भव हो तो) बिना लोभके जीवन-निर्वाहमात्र करनेवाले यतिको प्रतिदिन नवीन पात्र लाकर उसमें भिक्षा ग्रहण करनी चाहिये और भिक्षा ग्रहण करनेके बाद उसका परित्याग कर देना चाहिये। गृहस्थका घर धूएँसे रहित हो जानेपर, मूसलका शब्द बंद हो जानेपर, आगके न रहनेपर, सभी लोगोंके भोजन कर चुकनेपर, कसोरे एवं पत्रादिका ढेर लग जानेपर यतिको (गृहस्थके घर) नित्य भिक्षा माँगनी चाहिये ॥ ३–५ ॥