संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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| * अध्याय २९ * | ३९९ |
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| गोदोहमात्रं तिष्ठेत कालं भिक्षुरधोमुखः।<br>भिक्षेत्युक्त्वा सकृत् तूष्णीमश्नीयाद् वाग्यतः शुचिः॥ ६ ॥<br><br>प्रक्षाल्य पाणिपादौ च समाचम्य यथाविधि।<br>आदित्ये दर्शयित्वान्नं भुञ्जीत प्राङ्मुखोत्तरः॥ ७ ॥<br><br>हुत्वा प्राणाहुतीः पञ्च ग्रासानष्टौ समाहितः।<br>आचम्य देवं ब्रह्माणं ध्यायीत परमेश्वरम्॥ ८ ॥<br><br>अलाबुं दारुपात्रं च मृण्मयं वैणवं ततः।<br>चत्वारि यतिपात्राणि मनुराह प्रजापतिः॥ ९ ॥<br><br>प्रागरात्रे पररात्रे च मध्यरात्रे तथैव च।<br>संध्यास्वह्नि विशेषेण चिन्तयेन्नित्यमीश्वरम्॥ १० ॥<br><br>कृत्वा हृत्पद्मनिलये विश्वाख्यं विश्वसम्भवम्।<br>आत्मानं सर्वभूतानां परस्तात् तमसः स्थितम्॥ ११ ॥<br><br>सर्वस्याधारभूतानामानन्दं ज्योतिरव्ययम्।<br>प्रधानपुरुषातीतमाकाशं दहनं शिवम्॥ १२॥<br><br>तदन्तः सर्वभावानामीश्वरं ब्रह्मरूपिणम्।<br>ध्यायेदनादिमद्वैतमानन्दादिगुणालयम् ॥ १३ ॥<br><br>महान्तं परमं ब्रह्म पुरुषं सत्यमव्ययम्।<br>सितेतरारुणाकारं महेशं विश्वरूपिणम्॥ १४॥<br><br>ओंकारान्तेऽथ चात्मानं संस्थाप्य परमात्मनि।<br>आकाशे देवमीशानं ध्यायीताकाशमध्यगम्॥ १५॥<br><br>कारणं सर्वभावानामानन्दैकसमाश्रयम्।<br>पुराणं पुरुषं शम्भुं ध्यायन् मुच्येत बन्धनात्॥ १६॥<br><br>यद्वा गुहायां प्रकृतौ जगत्सम्मोहनालये।<br>विचिन्त्य परमं व्योम सर्वभूतैककारणम्॥ १७॥<br><br>जीवनं सर्वभूतानां यत्र लोकः प्रलीयते।<br>आनन्दं ब्रह्मणः सूक्ष्मं यत् पश्यन्ति मुमुक्षवः॥ १८॥<br><br>तन्मध्ये निहितं ब्रह्म केवलं ज्ञानलक्षणम्।<br>अनन्तं सत्यमीशानं विचिन्त्यासीत संयतः॥ १९॥ | एक बार 'भिक्षा' ऐसा शब्द उच्चारण कर भिक्षा माँगनेवाले संन्यासीको नीचे मुख किये हुए उतने समयतक प्रतीक्षा करनी चाहिये, जितनी देरमें गाय दुही जाती है। (भिक्षा प्राप्त होनेपर) पवित्रतापूर्वक मौन होकर भिक्षा ग्रहण करनी चाहिये। हाथ-पाँव धोकर यथाविधि आचमन कर सूर्यकी ओर अन्न दिखलाकर पूर्व अथवा उत्तरकी ओर मुख करके भोजन करना चाहिये। (प्राणाय स्वाहा इत्यादि) पाँच प्राणाहुति देकर समाहित होकर आठ ग्रास ग्रहण करे। तदनन्तर आचमन कर परमेश्वर देव ब्रह्मका ध्यान करे। प्रजापति मनुने संन्यासीके लिये लौकी, लकड़ी, मिट्टी तथा बाँसके बने चार प्रकारके पात्र बताये हैं। यतिको रात्रिके प्रथम भाग, अन्तिम भाग, मध्यरात्रि, संध्या-काल तथा दिनमें नित्य विशेषरूपसे ईश्वरका चिन्तन करना चाहिये॥ ६-१०॥<br><br>(संन्यासीको) हृदयकमलरूपी घरमें विश्व नामक संसारके उत्पादक, सभी भूतोंके आत्मरूप, तमोगुणसे परे रहनेवाले, सभीके आश्रय, प्राणियोंको आनन्द देनेवाले, ज्योतिःस्वरूप, अविनाशी, प्रधान एवं पुरुषसे अतीत, आकाशरूप, अग्नि एवं शिवरूप, वस्तुमात्रके अस्तित्वके अधिष्ठाता, ब्रह्मरूपी ईश्वर, अनादि, अद्वैत, आनन्दादि गुणोंके निधान, महान्, पुरुष, परम ब्रह्म, सत्य, शाश्वत, सित (शुक्ल), तदितर (कृष्ण) एवं अरुणवर्णवाले अर्थात् सत्त्व, रज, तमोरूप त्रिगुणात्मक, विश्वरूपी महेश्वरका ध्यान करना चाहिये। ओंकारका उच्चारणकर आत्माको प्रणवके परम तात्पर्यरूप परमात्मामें प्रतिष्ठितकर आकाशके मध्यमें स्थित रहनेवाले ईशानदेवका (हृदयरूपी) आकाशमें ध्यान करना चाहिये॥ ११-१५॥<br><br>सभी भावोंके कारणरूप, आनन्दके एकमात्र आश्रयस्वरूप पुराण-पुरुष शम्भुका ध्यान करनेसे बन्धनसे मुक्ति हो जाती है। अथवा संसारके सम्मोहनालयरूप मूलप्रकृतिरूपी गुहामें परम व्योमरूप सभी भूतोंके एकमात्र कारण, सभी प्राणियोंके जीवनरूप और संसारके विलय-स्थान, ब्रह्मानन्द-स्वरूप तथा मुमुक्षु लोग जिनका सूक्ष्मरूपसे दर्शन करते हैं, उनका (परम व्योम विराट् ब्रह्मका) ध्यानकर उनके मध्यमें स्थित शुद्ध ज्ञानस्वरूप अनन्त, सत्य एवं ईशानरूप ब्रह्मका चिन्तन करते हुए संयत होकर स्थित रहना चाहिये॥ १६-१९॥ |