संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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४०० * कूर्मपुराण *
| गुह्याद् गुह्यतमं ज्ञानं यतीनामेतदीरितम्।<br>योऽनुतिष्ठेन्महेशेन सोऽश्नुते योगमैश्वरम् ॥ २० ॥ | यतियोंका यह गुह्यसे भी गुह्यतम ज्ञान महेशने बतलाया है। जो इसका अनुष्ठान करता है, वह ऐश्वर्ययोगको प्राप्त करता है॥ २०॥ |
| तस्माद् ध्यानरतो नित्यमात्मविद्यापरायणः।<br>ज्ञानं समभ्यसेद् ब्राह्मं येन मुच्येत बन्धनात् ॥ २१ ॥<br><br>मत्वा पृथक् स्वमात्मानं सर्वस्मादेव केवलम्।<br>आनन्दमजरं ज्ञानं ध्यायीत च पुनः परम् ॥ २२ ॥<br><br>यस्माद् भवन्ति भूतानि यद् गत्वा नेह जायते।<br>स तस्मादीश्वरो देवः परस्माद् योऽधितिष्ठति ॥ २३ ॥<br><br>यदन्तरे तद् गगनं शाश्वतं शिवमव्ययम्।<br>यदंशस्तत्परो यस्तु स देवः स्यान्महेश्वरः ॥ २४॥<br><br>व्रतानि यानि भिक्षूणां तथैवोपाव्रतानि च।<br>एकैकातिक्रमे तेषां प्रायश्चित्तं विधीयते ॥ २५ ॥ | अतएव नित्य ध्यानमें निरत और आत्मविद्यापरायण होते हुए ब्रह्मज्ञानका अभ्यास करते रहना चाहिये। इसके कारण बन्धनसे मुक्ति होती है। अपनी आत्माको सबसे भिन्न (शाश्वत-नित्य) समझकर उसकी अद्वितीय, अजर, आनन्दरूप, श्रेष्ठ ज्ञानरूपताका पुनः-पुनः ध्यान करना चाहिये। जिनसे चर-अचर समस्त प्रपञ्चकी उत्पत्ति होती है, जिन्हें प्राप्तकर जन्म-मरणके बन्धनसे मुक्ति हो जाती है और इसी कारण जो ईश्वर हैं, देव हैं, सर्वोत्कृष्ट हैं, सबके अधिष्ठाता हैं, वे ही महेश्वर हैं। जिनके अन्तर्गत शाश्वत, शिव, अव्यय, गगन विद्यमान है, जगन्नियन्ता परमात्मा जिनके अंश हैं, वे ही देव महेश्वर हैं (इनका पुनः-पुनः ध्यान यतिको करना चाहिये)। भिक्षुओं (संन्यासियों)-के जो व्रत और उपव्रत हैं, उनमेंसे एक-एकका अतिक्रमण करनेपर प्रायश्चित्तका विधान किया गया है॥ २१-२५॥ |
| उपेत्य च स्त्रियं कामात् प्रायश्चित्तं समाहितः।<br>प्राणायामसमायुक्तं कुर्यात् सांतपनं शुचिः ॥ २६ ॥<br><br>ततश्चरेत नियमात् कृच्छ्रं संयतमानसः।<br>पुनराश्रममागम्य चरेद् भिक्षुरतन्द्रितः ॥ २७॥ | कामवश स्त्रीप्रसंग करनेपर समाहित होकर प्राणायाम कर पवित्रतापूर्वक प्रायश्चित्तके लिये सांतपन नामक व्रत करना चाहिये। तदनन्तर संयतमानस होकर नियमसे कृच्छ्र (चान्द्रायण)-व्रत करे। पुनः अपने आश्रममें आकर आलस्यका परित्याग कर भिक्षुको आश्रमोचित आचरण करना चाहिये॥ २६-२७॥ |
| न धर्मयुक्तमनृतं हिनस्तीति मनीषिणः।<br>तथापि च न कर्तव्यं प्रसंगो ह्येष दारुणः ॥ २८ ॥<br><br>एकरात्रोपवासश्च प्राणायामशतं तथा।<br>उक्त्वानृतं प्रकर्तव्यं यतिना धर्मलिप्सुना ॥ २९ ॥<br><br>परमापदगतेनापि न कार्यं स्तेयमन्यतः।<br>स्तेयादभ्यधिकः कश्चिन्नास्त्यधर्म इति स्मृतिः।<br>हिंसा चैषापरा दिष्टा या चात्मज्ञाननाशिका ॥ ३० ॥ | विद्वानोंका यह कहना है कि धर्मयुक्त असत्यसे व्रतभङ्ग नहीं होता, तथापि ऐसा नहीं करना चाहिये। क्योंकि इसमें आसक्ति रखना दारुण कर्म है। धर्माभिलाषी यतिको चाहिये कि वह असत्यभाषण करनेपर एक रात्रि उपवास तथा सौ प्राणायाम करे। अत्यन्त संकटमें होनेपर भी भिक्षुको किसी अन्य प्रयोजनसे भी चोरी नहीं करनी चाहिये। चोरीसे बढ़कर दूसरा कोई अधर्म नहीं है, यही सबसे बड़ी हिंसा भी है, क्योंकि इससे आत्मज्ञान विनष्ट हो जाता है, ऐसा स्मृतियोंका सिद्धान्त है॥ २८-३०॥ |
| यदेतद् द्रविणं नाम प्राणा ह्येते बहिश्चराः।<br>स तस्य हरति प्राणान् यो यस्य हरते धनम् ॥ ३१ ॥ | यह जो द्रविण-धन नामकी वस्तु है, यह बाहरी प्राण ही है, इसलिये जो जिसके धनका अपहरण करता है, वह उसके प्राणोंका ही हरण करता है॥ ३१ ॥ |