भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 411, कुल 506 में से

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पृष्ठ 411
* अध्याय २१ *४०१
एवं कृत्वा स दुष्टात्मा भिन्नवृत्तो व्रताच्च्युतः।<br>भूयो निर्वेदमापन्नश्चरेच्चान्द्रायणव्रतम्॥ ३२॥<br><br>विधिना शास्त्रदृष्टेन संवत्सरमिति श्रुतिः।<br>भूयो निर्वेदमापन्नश्चरेद् भिक्षुरतन्द्रितः॥ ३३॥<br><br>अकस्मादेव हिंसां तु यदि भिक्षुः समाचरेत्।<br>कुर्यात् कृच्छ्रातिकृच्छ्रं तु चान्द्रायणमथापि वा॥ ३४॥<br><br>स्कन्देदिन्द्रियदौर्बल्यात् स्त्रियं दृष्ट्वा यतिर्यदि।<br>तेन धारयितव्या वै प्राणायामास्तु षोडश।<br>दिवास्कन्दे त्रिरात्रं स्यात् प्राणायामशतं तथा॥ ३५॥<br><br>एकान्ने मधुमांसे च नवश्राद्धे तथैव च।<br>प्रत्यक्षलवणे चोक्तं प्राजापत्यं विशोधनम्॥ ३६॥<br><br>ध्याननिष्ठस्य सततं नश्यते सर्वपातकम्।<br>तस्मान्महेश्वरं ज्ञात्वा तस्य ध्यानपरो भवेत्॥ ३७॥<br><br>यद् ब्रह्म परमं ज्योतिः प्रतिष्ठाक्षरमद्वयम्।<br>योऽन्तरात्र परं ब्रह्म स विज्ञेयो महेश्वरः॥ ३८॥<br><br>एष देवो महादेवः केवलः परमः शिवः।<br>तदेवाक्षरमद्वैतं तदादित्यान्तरं परम्॥ ३९॥<br><br>यस्मान्महीयते देवः स्वधाम्नि ज्ञानसंज्ञिते।<br>आत्मयोगाह्वये तत्त्वे महादेवस्ततः स्मृतः॥ ४०॥<br><br>नान्यद् देवान्महादेवाद् व्यतिरिक्तं प्रपश्यति।<br>तमेवात्मानमन्वेति यः स याति परं पदम्॥ ४१॥<br><br>मन्यन्ते ये स्वमात्मानं विभिन्नं परमेश्वरात्।<br>न ते पश्यन्ति तं देवं वृथा तेषां परिश्रमः॥ ४२॥<br><br>एकमेव परं ब्रह्म विज्ञेयं तत्त्वमव्ययम्।<br>स देवस्तु महादेवो नैतद् विज्ञाय बध्यते॥ ४३॥<br><br>तस्माद् यतेत नियतं यतिः संयतमानसः।<br>ज्ञानयोगरतः शान्तो महादेवपरायणः॥ ४४॥निश्चित ही धन हरण करनेवाला दुष्टात्मा आचारसे भ्रष्ट और व्रतसे च्युत हो जाता है। श्रुतिका विधान है कि यदि कोई अपने व्रतसे च्युत व्यक्ति अपने पुनः व्रतभङ्गपर पश्चात्ताप करे तो शास्त्रानुकूल विधिसे आलस्य-रहित होकर एक वर्षतक चान्द्रायणव्रत करे॥ ३२-३३॥<br><br>यदि भिक्षुसे अकस्मात् हिंसा हो जाय तो उसे पश्चात्तापपूर्वक कृच्छ्रव्रत, अतिकृच्छ्रव्रत अथवा चान्द्रायण-व्रत (हिंसाके स्वरूपके अनुसार) करना चाहिये। इन्द्रियकी दुर्बलताके कारण यदि स्त्रीको देखकर यति स्खलित हो जाय तो उसे सोलह प्राणायाम करना चाहिये। दिनमें स्खलन होनेपर तीन रातका उपवास और सौ प्राणायाम करना चाहिये॥ ३४-३५॥<br><br>एकका ही अन्न भक्षण करने, मधु ग्रहण करने, नवश्राद्ध-सम्बन्धी अन्न तथा प्रत्यक्ष लवण खानेपर प्राजापत्यव्रतको (पापकी) शुद्धिका उपाय बतलाया गया है। निरन्तर ध्याननिष्ठ पुरुषके सभी पातक नष्ट हो जाते हैं, इसलिये महेश्वरका ज्ञान प्राप्तकर उनके ध्यानमें परायण रहना चाहिये। जो ब्रह्म परम ज्योतिरूप, सभीका अधिष्ठान, अक्षर अद्वितीय है तथा जो सभीके भीतर स्थित है, परम ब्रह्म है, उसे महेश्वर जानना चाहिये। ये ही महेश्वर देव, महादेव एवं अद्वितीय परम शिव हैं। ये ही अविनाशी, अद्वैत हैं और ये ही आदित्यके भीतर प्रतिष्ठित परम (तत्त्व) हैं। आत्मयोग नामसे प्रसिद्ध, स्वप्रकाश, नित्य-ज्ञान नामसे भी विख्यात, परम तत्त्वरूप अपने धाममें सर्वाधिक पूजनीय-रूपसे ये महेश्वर प्रतिष्ठित हैं, इसीलिये महादेव कहे जाते हैं॥ ३६-४०॥<br><br>जो महादेवसे भिन्न किसी दूसरे देवको नहीं जानता और इन्हींको अपनी आत्मा मानता है, वह परम पदको प्राप्त होता है। जो अपनी आत्माको परमेश्वरसे भिन्न मानते हैं, वे उस देवका दर्शन नहीं करते हैं, उनका परिश्रम व्यर्थ होता है॥ ४१-४२॥<br><br>परम ब्रह्म एक ही हैं, इन्हें ही अव्यय तत्त्वके रूपमें जानना चाहिये। ये अव्यय तत्त्व ब्रह्म ही देव हैं, महादेव हैं, इन्हें जान लेनेपर बन्धन नहीं होता। इसलिये यतिको संयतमन होकर (इन्हें प्राप्त करनेके लिये) प्रयत्न करना चाहिये। ज्ञानयोगमें रत रहना चाहिये, शान्त रहना चाहिये और महादेवके परायण रहना चाहिये॥ ४३-४४॥
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