भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४०२ * कूर्मपुराण *

एष वः कथितो विप्रा यतीनामाश्रमः शुभः।
पितामहेन विभुना मुनीनां पूर्वमीरितम्॥ ४५॥

नापुत्रशिष्ययोगिभ्यो दद्यादिदमनुत्तमम्।
ज्ञानं स्वयम्भुवा प्रोक्तं यतिधर्माश्रयं शिवम्॥ ४६॥

इति यतिनियमानामेतदुक्तं विधानं
 पशुपतिपरितोषे यद् भवेदेकहेतुः।
न भवति पुनरेषामुद्भवो वा विनाशः
 प्रणिहितमनसो ये नित्यमेवाचरन्ति॥ ४७॥

हे विप्रो! यह आप लोगोंको संन्यासियोंके कल्याणकारी आश्रम (संन्यासाश्रम)-के विषयमें बतलाया। पूर्वकालमें पितामह विभुने मुनियोंसे इसे कहा था। ब्रह्माजीद्वारा कहे गये यतिधर्मविषयक इस कल्याणकारी उत्तम ज्ञानको पुत्र, शिष्य तथा योगियोंके अतिरिक्त अन्य किसीको नहीं देना चाहिये॥ ४५-४६॥

इस प्रकार संन्यासियोंके नियमोंके इस विधानको बतलाया गया। यह पशुपति (शंकर)-को संतुष्ट करनेका एकमात्र उपाय है। जो अव्यग्रभावसे एकाग्रतापूर्वक इसका नित्य आचरण करते हैं, उनका पुनः जन्म अथवा मरण कुछ भी नहीं होता अर्थात् वे मुक्त हो जाते हैं॥ ४७॥

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे एकोनत्रिंशोऽध्यायः॥ २९॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें उनतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २९॥


तीसवाँ अध्याय

प्रायश्चित्त-प्रकरणमें प्रायश्चित्तका स्वरूपनिरूपण, पाँच महापातकोंके नाम तथा ब्रह्महत्याके प्रायश्चित्तका संक्षिप्त निरूपण

व्यास उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रायश्चित्तविधिं शुभम्।
हिताय सर्वविप्राणां दोषाणामपनुत्तये॥ १॥
अकृत्वा विहितं कर्म कृत्वा निन्दितमेव च।
दोषमाप्नोति पुरुषः प्रायश्चित्तं विशोधनम्॥ २॥

प्रायश्चित्तमकृत्वा तु न तिष्ठेद् ब्राह्मणः क्वचित्।
यद् ब्रूयुर्ब्राह्मणाः शान्ता विद्वांसस्तत्समाचरेत्॥ ३॥

वेदार्थवित्तमः शान्तो धर्मकामोऽग्रिमन् द्विजः।
स एव स्यात् परो धर्मो यमेकोऽपि व्यवस्यति॥ ४॥

अनाहिताग्नयो विप्रास्त्रयो वेदार्थपारगाः।
यद् ब्रूयुर्धर्मकामास्ते तज्ज्ञेयं धर्मसाधनम्॥ ५॥

अनेकधर्मशास्त्रज्ञा ऊहापोहविशारदाः।
वेदाध्ययनसम्पन्नाः सप्तैते परिकीर्तिताः॥ ६॥

**व्यासजीने कहा—**इसके अनन्तर अब मैं सभी ब्राह्मणोंके कल्याणके लिये और दोषोंके विनाशके लिये शुभ प्रायश्चित्त-विधिका वर्णन करूँगा॥ १॥

विहित कर्मोंको न करने और निन्दित कर्मोंको करनेसे पुरुष दोष (पाप)-का भागी होता है। इसकी निवृत्ति प्रायश्चित्त करनेसे होती है। ब्राह्मणको बिना प्रायश्चित्त किये कभी भी नहीं रहना चाहिये। शान्त एवं विद्वान् ब्राह्मण जो कहें, उसे करना चाहिये। वेदार्थज्ञानियोंमें श्रेष्ठ, शान्त, धर्मपालनको ही सर्वस्व माननेवाला एक भी अग्निहोत्री ब्राह्मण जो अपने आचरणमें लाता है, वही श्रेष्ठ धर्म होता है। वेदार्थमें पारंगत, धर्मपरायण अनाहिताग्नि* तीन ब्राह्मण जो कहें, उसे धर्मका साधन समझना चाहिये॥ २–५॥

अनेक धर्मशास्त्रोंके ज्ञाता, ऊहापोहमें दक्ष (शास्त्रीय विभिन्न सिद्धान्तोंके आकलन तथा समन्वयमें कुशल) तथा वेदाध्ययनशील सात ब्राह्मण धर्ममें प्रमाण कहे गये हैं॥ ६॥


* स्मार्त अग्निहोत्र करनेवाले भी अनाहिताग्नि होते हैं। श्रौत अग्निहोत्र करनेवाले ही आहिताग्नि कहे जाते हैं।