भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

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पृष्ठ 413
  • अध्याय ३० * | ४०३ ---|--- मीमांसाज्ञानतत्त्वज्ञा वेदान्तकुशला द्विजाः।<br>एकविंशतिसंख्याताः प्रायश्चित्तं वदन्ति वै ॥ ७ ॥ | मीमांसाज्ञानके तत्त्वज्ञ (वेदवाक्यार्थ-विचार एवं श्रौत-स्मार्त-कर्मकाण्डके रहस्यको जाननेवाले) तथा वेदान्तके ज्ञानमें कुशल (पारमार्थिक तत्त्व अद्वैतके रहस्यवेत्ता) संख्यामें इक्कीस ब्राह्मण प्रायश्चित्तका विधान कर सकते हैं॥ ७॥ ब्रह्महा मद्यपः स्तेनो गुरुतल्पग एव च।<br>महापातकिनस्त्वेते यश्चैतैः सह संवसेत् ॥ ८ ॥<br><br>संवत्सरं तु पतितैः संसर्गं कुरुते तु यः।<br>यानशय्यासनैर्नित्यं जानन् वै पतितो भवेत् ॥ ९ ॥<br><br>याजनं योनिसम्बन्धं तथैवाध्यापनं द्विजः।<br>कृत्वा सद्यः पतेज्ज्ञानात् सह भोजनमेव च ॥ १० ॥<br>अविज्ञायाथ यो मोहात् कुर्यादध्यापनं द्विजः।<br>संवत्सरेण पतति सहाध्ययनमेव च ॥ ११ ॥ | ब्रह्मघाती, मद्यपायी, चोर, गुरुतल्पगामी तथा इनके साथ निवास करनेवाले—(ये सभी) महापातकी होते हैं। जो एक वर्षपर्यन्त नित्य सब कुछ जानते हुए भी पतितोंके साथ यान (सवारी), शय्या तथा आसन-सम्बन्धी संसर्ग करता है, वह पतित हो जाता है। जानते हुए भी (पतितोंका) यज्ञ कराने, अध्यापन करने, उनके साथ योनि अर्थात् विवाह आदिका सम्बन्ध रखने और भोजन करनेसे द्विज शीघ्र ही पतित हो जाता है॥ ८—१०॥<br>जो द्विज अज्ञानमें मोहवश इनके साथ अध्ययन अथवा अध्यापन करता है, वह एक वर्षमें पतित हो जाता है। आत्मशुद्धिके लिये ब्रह्मघातीको बारह वर्षोतक कुटी बनाकर वनमें रहना चाहिये और शवके सिरको ध्वजाके समान धारणकर भिक्षा माँगनी चाहिये। (ब्रह्मघातीको) ब्राह्मणोंके निवासस्थानों तथा देवमन्दिरोंमें नहीं जाना चाहिये और स्वयं अपनी आत्माकी निन्दा करते हुए तथा जिस ब्राह्मणको मारा है, उसका स्मरण करते हुए पहलेसे असंकल्पित (अनिश्चित), धूएँसे रहित, शान्त अग्निवाले तथा जहाँ लोगोंने भोजन कर लिया है—ऐसे सात घरोंसे नित्य धीरे-धीरे भिक्षा माँगनी चाहिये। उसे मनुष्योंको अपना दोष (पाप) बताते हुए एक समय भिक्षा माँगनी चाहिये अथवा धैर्य रखते हुए वन्य मूल-फलोंद्वारा निर्वाह करना चाहिये॥ ११—१५॥ ब्रह्महा द्वादशाब्दानि कुटि कृत्वा वने वसेत्।<br>भैक्षमात्मविशुद्ध्यर्थं कृत्वा शवशिरोध्वजम्॥ १२ ॥<br><br>ब्राह्मणावसथान् सर्वान् देवागाराणि वर्जयेत्।<br>विनिन्दन् स्वयमात्मानं ब्राह्मणं तं च संस्मरन् ॥ १३ ॥<br><br>असंकल्पितयोग्यानि सप्तागाराणि संविशेत्।<br>विधूमे शनकैर्नित्यं व्यङ्गारे भुक्तवज्जने ॥ १४ ॥<br><br>एककालं चरेद् भैक्षं दोषं विख्यापयन् नृणाम्।<br>वन्यमूलफलैर्वापि वर्तयेद् धैर्यमाश्रितः ॥ १५ ॥ | कपालपाणिः खट्वाङ्गी ब्रह्मचर्यपरायणः।<br>पूर्णे तु द्वादशे वर्षे ब्रह्महत्यां व्यपोहति ॥ १६ ॥ | हाथमें कपाल लिये हुए और खट्वाङ्ग (चारपाईके टुकड़ेको) धारणकर ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए बारह वर्ष व्यतीत हो जानेपर ब्रह्महत्या दूर होती है। अनिच्छापूर्वक किये गये पापका यह प्रायश्चित्त है, इससे कल्याण होता है, किंतु इच्छापूर्वक किये गये पापसे शुद्धि अनेक प्रायश्चित्तके बाद मृत्युके अनन्तर ही समझनी चाहिये। इसके अतिरिक्त अन्य किसी उपायसे नहीं ॥ १६-१७॥ अकामतः कृते पापे प्रायश्चित्तमिदं शुभम्।<br>कामतो मरणाच्छुद्धिर्ज्ञेया नान्येन केनचित् ॥ १७ ॥ |