संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०४ * कूर्मपुराण *
कुर्यादनशनं वाथ भृगोः पतनमेव वा।
ज्वलन्तं वा विशेदग्निं जलं वा प्रविशेत् स्वयम्॥ १८॥
ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा सम्यक् प्राणान् परित्यजेत्।
ब्रह्महत्यापनोदार्थमन्तरा वा मृतस्य तु॥ १९॥
दीर्घामयान्वितं विप्रं कृत्वानामयमेव तु।
दत्त्वा चान्नं स दुर्भिक्षे ब्रह्महत्यां व्यपोहति॥ २०॥
अश्वमेधावभृथके स्नात्वा वा शुध्यते द्विजः।
सर्वस्वं वा वेदविदे ब्राह्मणाय प्रदाय तु॥ २१॥
सरस्वत्यास्त्वरुणाया संगमे लोकविश्रुते।
शुद्ध्येत् त्रिषवणस्नानात् त्रिरात्रोपोषितो द्विजः॥ २२॥
गत्वा रामेश्वरं पुण्यं स्नात्वा चैव महोदधौ।
ब्रह्मचर्यादिभिर्युक्तो दृष्ट्वा रुद्रं विमुच्यते॥ २३॥
कपालमोचनं नाम तीर्थं देवस्य शूलिनः।
स्नात्वाभ्यर्च्य पितॄन् भक्त्या ब्रह्महत्यां व्यपोहति॥ २४॥
यत्र देवादिदेवेन भैरवेणामितौजसा।
कपालं स्थापितं पूर्वं ब्रह्मणः परमेष्ठिनः॥ २५॥
समभ्यर्च्य महादेवं तत्र भैरवरूपिणम्।
तर्पयित्वा पितॄन् स्नात्वा मुच्यते ब्रह्महत्यया॥ २६॥
अथवा (ब्रह्मघातीको) स्वयं अनशन (व्रत) करना चाहिये या भृगु-पतन करे (उच्च स्थानसे गिरे) अथवा प्रज्वलित अग्नि या जलमें प्रविष्ट हो जाय। दूसरे प्रकारसे अर्थात् बुद्धिपूर्वक ब्राह्मणहत्या करनेपर ब्रह्म-हत्या दूर करनेके लिये, ब्राह्मण अथवा गौके निमित्त भलीभाँति अपने प्राणोंका परित्याग कर देना चाहिये। दीर्घ रोगसे ग्रस्त ब्राह्मणको रोगसे मुक्त करने तथा दुर्भिक्षके समय अन्न प्रदान करनेसे ब्रह्महत्या दूर होती है॥ १८–२०॥
अश्वमेध-यज्ञकी समाप्तिपर होनेवाले अवभृथ-स्नानसे अथवा वेदज्ञ ब्राह्मणको अपना सर्वस्व दान कर देनेसे द्विज (ब्रह्महत्याके पापसे) मुक्त हो जाता है। सरस्वती एवं अरुणा नदीके लोकप्रसिद्ध संगममें तीनों संध्याओंमें स्नान करने और तीन रात्रि उपवास करनेसे द्विज (ब्रह्महत्याजनित पापसे) शुद्ध हो जाता है॥ २१-२२॥
ब्रह्मचर्य आदिसे युक्त द्विज पवित्र (तीर्थ) रामेश्वर जाकर वहाँ सागरमें स्नान करके शंकरका दर्शन करके (ब्रह्महत्याके पापसे) मुक्त हो जाता है। त्रिशूलधारी भगवान् शंकरके कपालमोचन नामक तीर्थमें स्नान करके भक्तिपूर्वक पितरोंकी पूजा करनेसे (ब्रह्मघाती) ब्रह्महत्याके पापसे दूर हो जाता है। पूर्वकालमें वहाँ (कपालमोचन तीर्थमें) अमित तेजस्वी देवादिदेव भैरवने परमेष्ठी ब्रह्माके कपालको स्थापित किया। वहाँ स्नान करके भैरवरूपी महादेवकी भलीभाँति अर्चना करके एवं पितरोंका तर्पण करके ब्रह्महत्या (-के पाप)-से मुक्ति हो जाती है॥ २३–२६॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षत्साहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे त्रिंशोऽध्यायः॥ ३०॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३०॥