भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

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  • अध्याय ३१ * | ४०५

इकतीसवाँ अध्याय

प्रायश्चित्त-प्रकरणमें कपालमोचन-तीर्थका आख्यान

| ऋषय ऊचुः<br>कथं देवेन रुद्रेण शंकरेणामितौजसा।<br>कपालं ब्रह्मणः पूर्वं स्थापितं देहजं भुवि॥ १ ॥<br><br>सूत उवाच<br>शृणुध्वमृषयः पुण्यां कथां पापप्रणाशिनीम्।<br>माहात्म्यं देवदेवस्य महादेवस्य धीमतः॥ २ ॥<br><br>पुरा पितामहं देवं मेरुशृङ्गे महर्षयः।<br>प्रोचुः प्रणम्य लोकादिं किमेकं तत्त्वमव्ययम्॥ ३ ॥<br><br>स मायया महेशस्य मोहितो लोकसम्भवः।<br>अविज्ञाय परं भावं स्वात्मानं प्राह दर्षिणम्॥ ४ ॥<br><br>अहं धाता जगद्योनिः स्वयम्भूरेक ईश्वरः।<br>अनादिमत्परं ब्रह्म मामभ्यर्च्य विमुच्यते॥ ५ ॥<br><br>अहं हि सर्वदेवानां प्रवर्तकनिवर्तकः।<br>न विद्यते चाभ्यधिको मत्तो लोकेषु कश्चन॥ ६ ॥<br><br>तस्यैवं मन्यमानस्य जज्ञे नारायणांशजः।<br>प्रोवाच प्रहसन् वाक्यं रोषताम्रविलोचनः॥ ७ ॥<br><br>किं कारणमिदं ब्रह्मन् वर्तते तव साम्प्रतम्।<br>अज्ञानयोगयुक्तस्य न त्वेतदुचितं तव॥ ८ ॥<br><br>अहं धाता हि लोकानां यज्ञो नारायणः प्रभुः।<br>न मामृतेऽस्य जगतो जीवनं सर्वदा क्वचित्॥ ९ ॥<br><br>अहमेव परं ज्योतिरहमेव परा गतिः।<br>मत्प्रेरितेन भवता सृष्टं भुवनमण्डलम्॥ १०॥<br><br>एवं विवदतोर्मोहात् परस्परजयैषिणोः।<br>आजग्मुर्यत्र तौ देवौ वेदाश्चत्वार एव हि॥ ११॥<br><br>अन्वीक्ष्य देवं ब्रह्माणं यज्ञात्मानं च संस्थितम्।<br>प्रोचुः संविग्नहृदया याथात्म्यं परमेष्ठिनः॥ १२॥ | ऋषियोंने पूछा— अमित तेजस्वी देव शंकर रुद्रने पूर्वकालमें किस प्रकार ब्रह्माजीके शरीरसे उत्पन्न कपालको पृथ्वीपर स्थापित किया?॥ १॥<br><br>सूतजी बोले— ऋषियो! आप लोग पापको नष्ट करनेवाली इस पुण्य कथा एवं धीमान् देवाधिदेव महादेवके माहात्म्यको सुनें—॥ २॥<br><br>प्राचीन कालमें मेरुशृंगपर लोकोंके मूल कारण देव पितामहको प्रणाम कर महर्षियोंने उनसे पूछा—अव्यय अद्वितीय तत्त्व क्या है? महेश्वरकी मायासे मोहित, लोकोंको उत्पन्न करनेवाले उन ब्रह्माने (महर्षियोंके) परम भावको न जानते हुए अभिमानपूर्वक स्वयंको ही (अव्यय) तत्त्व बतलाया (और कहा—) मैं ही जगत्‌का मूल कारण, धाता, स्वयम्भू तथा अद्वितीय अनादि परम ब्रह्म ईश्वर हूँ। मेरी आराधना करनेसे मुक्ति हो जाती है। मैं ही सभी देवोंका प्रवर्तक तथा निवर्तक हूँ। लोकोंमें मुझसे महान् और कोई नहीं है॥ ३—६॥<br><br>(पितामह अहंभावपूर्वक) ऐसा कह ही रहे थे कि नारायणके अंशसे उत्पन्न यज्ञभगवान्‌ने क्रोधसे आरक्तनेत्र होकर परिहास करते हुए यह वाक्य कहा—ब्रह्मन्! सम्प्रति आपके ऐसे व्यवहारका क्या कारण है? आप अज्ञानसे युक्त हैं, आपके लिये यह उचित नहीं है। मैं लोकोंका धाता यज्ञरूप नारायण प्रभु हूँ, मेरे बिना इस संसारमें जीवन कभी भी नहीं रह सकता। मैं ही परम ज्योति हूँ, मैं ही परम गति हूँ, मेरे द्वारा प्रेरणा प्राप्तकर आपने इस भुवनमण्डलकी रचना की है॥ ७—१०॥<br><br>परस्पर विजयके अभिलाषी उन दोनोंके मोहपूर्वक इस प्रकार विवाद करते समय ही जहाँ वे दोनों देव (पितामह एवं यज्ञभगवान्) थे, वहीं चारों वेद (मूर्तिमान् होकर) आ गये। देव ब्रह्मा तथा यज्ञात्मा विष्णुको स्थित देखकर संविग्नहृदय होकर उन्होंने ब्रह्मासे यथार्थ तत्त्व कहा— ॥ ११-१२॥ |