भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 416, कुल 506 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 416
४०६* कूर्मपुराण *
ऋग्वेद उवाच(मूर्तिमान्) ऋग्वेदने कहा—जिसके भीतर सभी प्राणी प्रतिष्ठित हैं, जिससे सभीकी प्रवृत्ति होती है और जिसे परम तत्त्व कहा गया है, उन्हें ही महेश्वर देव समझना चाहिये ॥ १३ ॥
यस्यान्तःस्थानि भूतानि यस्मात् सर्वं प्रवर्त्तते ।<br>यदाहुस्तत्परं तत्त्वं स देवः स्यान्महेश्वरः ॥ १३ ॥
यजुर्वेद उवाचयजुर्वेदने कहा—जो ईश सभी यज्ञों तथा योगके द्वारा अर्चित होते हैं और जिन देवको ईश्वर कहा गया है, वे देव ही पिनाक धारण करनेवाले (शंकर) हैं॥ १४॥
यो यज्ञैरखिलैरीशो योगेन च समर्च्यते ।<br>यमाहुरीश्वरं देवं स देवः स्यात् पिनाकधृक् ॥ १४ ॥
सामवेद उवाचसामवेदने कहा—जिसके द्वारा अनन्त ब्रह्माण्डरूपी चक्र प्रवर्तित है, जो (निरतिशय आकाशस्वरूप) आकाशके मध्य प्रतिष्ठित है, शिवस्वरूप है, योगियोंके द्वारा वेद्य है, वह परम तत्त्व ही शंकर हैं, महादेव हैं ॥ १५॥
येनेदं भ्राम्यते चक्रं यदाकाशान्तरं शिवम्।<br>योगिभिर्विद्यते तत्त्वं महादेवः स शंकरः ॥ १५ ॥
अथर्ववेद उवाचअथर्ववेदने कहा—यति लोग प्रयत्नपूर्वक जिन परम योगेश्वर महेशका दर्शन करते हैं, वे पुरुष रुद्र ही देव भगवान् भव हैं ॥ १६ ॥
यं प्रपश्यन्ति योगेशं यजन्तो यतयः परम्।<br>महेशं पुरुषं रुद्रं स देवो भगवान् भवः ॥ १६ ॥
एवं स भगवान् ब्रह्मा वेदानामीरितं शुभम्।<br>श्रुत्वाह प्रहसन् वाक्यं विश्वात्मापि विमोहितः ॥ १७ ॥इस प्रकार विश्वात्मा होनेपर भी वे भगवान् ब्रह्मा मोहित होनेके कारण वेदोंके द्वारा बनाये गये कल्याणकारी तत्त्वको सुननेपर भी हँसते हुए कहने लगे—जब वे परम ब्रह्म महेश सभी आसक्तियोंसे रहित हैं तो कैसे अपनी भार्याके साथ रमण करते हैं तथा अतिगर्वित अपने प्रमथगणोंके साथ सुख-सुविधाओंका भोग करते हैं ? ॥ १७-१८ ॥
कथं तत्परमं ब्रह्म सर्वसंगविवर्जितम्।<br>रमते भार्यया सार्धं प्रमथैश्चातिगर्वितैः ॥ १८ ॥
इतीरितेऽथ भगवान् प्रणवात्मा सनातनः।<br>अमूर्तो मूर्तिमान् भूत्वा वचः प्राह पितामहम् ॥ १९ ॥ऐसा कहे जानेपर सनातन, अमूर्त भगवान् प्रणवने मूर्तिमान् होकर पितामहसे कहा— ॥ १९ ॥
प्रणव उवाचप्रणव बोले—ये वे महेश्वर हैं, जो स्वात्माराम हैं। ये अपनी आत्मामें ही रमण करते हैं। इनकी आत्मा ही इनकी पत्नी हैं। यही वे भगवान् ईश स्वयंज्योति, सनातन हैं और देवी शिवा आत्मानन्द-स्वरूपिणी कही गयी हैं, वे आगन्तुक (देवी उन भगवान्‌से पृथक्) नहीं हैं॥ २०-२१ ॥
न ह्येष भगवान् पत्न्या स्वात्मनो व्यतिरिक्तया।<br>कदाचिद् रमते रुद्रस्तादृशो हि महेश्वरः ॥ २० ॥
अयं स भगवानीशः स्वयंज्योतिः सनातनः।<br>स्वानन्दभूता कथिता देवी नागन्तुका शिवा ॥ २१ ॥
इत्येवमुक्तेऽपि तदा यज्ञमूर्तेरजस्य च।<br>नाज्ञानमगमन्नाशमीश्वरस्यैव मायया ॥ २२ ॥इस प्रकार कहे जानेपर भी उस समय ईश्वरकी ही मायासे (मोहित) यज्ञमूर्ति भगवान् तथा ब्रह्माका अज्ञान नष्ट नहीं हुआ। इसी बीच विश्वभावन ब्रह्माने आकाशमध्यको व्याप्त करते हुए अद्भुत एवं दिव्य महाज्योतिका दर्शन किया। द्विजोत्तमो ! उस (महाज्योति)-के मध्य स्थित तेजसे उज्ज्वल दिव्य निर्मल मण्डल आकाशके मध्यमें प्रकट हुआ ॥ २२–२४ ॥
तदन्तरे महाज्योतिर्विरिञ्चो विश्वभावनः।<br>प्रापश्यदद्भुतं दिव्यं पूरयन् गगनान्तरम् ॥ २३ ॥
तन्मध्यसंस्थं विमलं मण्डलं तेजसोज्ज्वलम्।<br>व्योममध्यगतं दिव्यं प्रादुरासीद् द्विजोत्तमाः ॥ २४ ॥