भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* अध्याय ३१ *४०७
स दृष्ट्वा वदनं दिव्यं मूर्ध्नि लोकपितामहः।<br>तेन तन्मण्डलं घोरमालोकयदनिन्दितम्॥ २५॥वह अनिन्दित मण्डल दिव्य था और तेजोमय होनेके कारण घोर (भीषण) था तथा मूर्धापर (सबसे ऊपर) स्थित था। उसे देखकर ब्रह्माने अपने मुखको, सबसे ऊपर विद्यमान उस मण्डलके आलोकसे आलोकित किया;॥ २५॥
प्रजज्वालातिकोपेन ब्रह्मणः पञ्चमं शिरः।<br>क्षणाददृश्यत महान् पुरुषो नीललोहितः॥ २६॥पर उसी समय अज्ञानवश अति कुपित ब्रह्माके ही अति कोपसे उन (ब्रह्मा)-का पाँचवाँ सिर जलने लगा। उसी क्षण भगवान् नीललोहित रुद्र (महेश्वरके गणके देवविशेष) प्रकट हुए। वे रुद्रदेव त्रिशूल धारण किये हुए थे, पिङ्गलवर्णके थे तथा सर्पका यज्ञोपवीत धारण किये हुए थे। उन नीललोहित शंकर रुद्रसे भगवान् ब्रह्माने कहा—हे महेशान! आपका मेरे ही ललाटसे सर्वप्रथम प्रादुर्भाव हुआ था, यह मैं जानता हूँ। आप मेरी शरणमें आयें॥ २६—२८॥
त्रिशूलपिङ्गलो देवो नागयज्ञोपवीतवान्।<br>तं प्राह भगवान् ब्रह्मा शंकरं नीललोहितम्॥ २७॥
जानामि भवतः पूर्वं ललाटादेव शंकर।<br>प्रादुर्भावं महेशान मामेव शरणं व्रज॥ २८॥
श्रुत्वा सगर्ववचनं पद्मयोनेरथेश्वरः।<br>प्राहिणोत् पुरुषं कालं भैरवं लोकदाहकम्॥ २९॥<br>स कृत्वा सुमहद् युद्धं ब्रह्मणा कालभैरवः।<br>चकर्त तस्य वदनं विरिञ्चस्याथ पञ्चमम्॥ ३०॥तदनन्तर पद्मयोनिके गर्वयुक्त वचनको सुनकर ईश्वर (नीललोहित रुद्र)-ने लोकको जलानेवाले पुरुष कालभैरवको भेजा। उस कालभैरवने ब्रह्माके साथ महान् युद्ध किया और उन ब्रह्माके पाँचवें मुखको काटडाला॥ २९-३०॥
निकृत्तवदनो देवो ब्रह्मा देवेन शम्भुना।<br>ममार चेशयोगेन जीवितं प्राप विश्वसृक्॥ ३१॥देव शम्भुकी प्रेरणासे कालभैरवद्वारा ब्रह्माका मस्तक काट दिये जानेपर उन देव ब्रह्माकी मृत्यु हो गयी, किंतु ईश्वरके योगसे पुनः वे विश्वस्रष्टा (ब्रह्मा) जीवित हो गये।
अथानुपश्यद् गिरिशं मण्डलान्तरसंस्थितम्।<br>समासीनं महादेव्या महादेवं सनातनम्॥ ३२॥तदनन्तर (ब्रह्माने) उस मण्डलके मध्यमें स्थित सनातन महादेव (गिरिश) महेश्वरको महादेवीके साथ विराजमान देखा। वे सर्पराजका कङ्कण पहने थे, चन्द्रमाके अवयवको (द्वितीयाके चन्द्रमाको) भूषणरूपमें धारण किये थे। करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान तथा जटाजूट धारण किये हुए थे। उन्होंने व्याघ्रचर्मका वस्त्र धारण किया था, दिव्य मालाओंसे समन्वित थे, हाथमें त्रिशूल धारण किये थे, कठिनतासे देखे जा सकने योग्य तथा भस्मसे सुशोभित ऐसे योगी (शंकर)-को उन्होंने देखा। योगनिष्ठ अपने हृदयके मध्य जिन ईश्वरका दर्शन करते हैं, उन ब्रह्मस्वरूप आदिदेव महादेवको (ब्रह्माने) देखा॥ ३१—३५॥
भुजङ्गराजवलयं चन्द्रावयवभूषणम्।<br>कोटिसूर्यप्रतीकाशं जटाजूटविराजितम्॥ ३३॥
शार्दूलचर्मवसनं दिव्यमालासमन्वितम्।<br>त्रिशूलपाणिं दुष्प्रेक्ष्यं योगिनं भूतिभूषणम्॥ ३४॥
यमन्तरा योगनिष्ठाः प्रपश्यन्ति हृदीश्वरम्।<br>तमादिदेवं ब्रह्माणं महादेवं ददर्श ह॥ ३५॥
यस्य सा परमा देवी शक्तिराकाशसंस्थिता।<br>सोऽनन्तैश्वर्ययोगात्मा महेशो दृश्यते किल॥ ३६॥आकाशमें स्थित वे परमा देवी जिनकी शक्ति हैं, वे अनन्त ऐश्वर्यसम्पन्न योगात्मा महेश्वर मुझे दिखलायी पड़ रहे हैं। जिन्हें एक बार प्रणाम मात्र कर लेनेसे ही प्रणाम करनेवालेके सम्पूर्ण मोहको उत्पन्न करनेवाला संसारका बीज विलीन हो जाता है, वे रुद्र दिखलायी पड़ रहे हैं। वे लोकोंके नायक दिखलायी पड़ रहे हैं, जो उन लोगोंको भी मुक्त कर देते हैं जो आचारयुक्त न होनेपर भी केवल उनकी भक्ति करते हैं॥ ३६—३८॥
यस्याशेषजगद् बीजं विलयं याति मोहनम्।<br>सकृत्प्रणाममात्रेण स रुद्रः खलु दृश्यते॥ ३७॥
योऽथ नाचारनिरतान् स्वभक्तानेव केवलम्।<br>विमोचयति लोकानां नायको दृश्यते किल॥ ३८॥