संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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४०८ * कूर्मपुराण *
| यस्य वेदविदः शान्ता निर्द्वन्द्वा ब्रह्मचारिणः ।<br>विदन्ति विमलं रूपं स शम्भुर्दृश्यते किल ॥ ३९ ॥<br><br>यस्य ब्रह्मादयो देवा ऋषयो ब्रह्मवादिनः ।<br>अर्चयन्ति सदा लिङ्गं विश्वेशः खलु दृश्यते ॥ ४० ॥<br>यस्याशेषजगद् बीजं विलयं याति मोहनम्।<br>सकृत्प्रणाममात्रेण स रुद्रः खलु दृश्यते ॥ ४१ ॥<br><br>विद्यासहायो भगवान् यस्यासौ मण्डलन्तरम्।<br>हिरण्यगर्भपुत्रोऽसावीश्वरो दृश्यते किल ॥ ४२ ॥<br><br>यस्याशेषजगत्सूतिर्विज्ञानतनुरीश्वरी ।<br>न मुञ्चति सदा पार्श्वं शंकरोऽसावदृश्यत ॥ ४३ ॥<br><br>पुष्पं वा यदि वा पत्रं यत्पाद्युगले जलम्।<br>दत्त्वा तरति संसारं रुद्रोऽसौ दृश्यते किल ॥ ४४ ॥<br><br>तत्संनिधाने सकलं नियच्छति सनातनः ।<br>कालः किल स योगात्मा कालकालो हि दृश्यते ॥ ४५ ॥ | वेदोंके ज्ञाता, शान्त तथा द्वन्द्वरहित ब्रह्मचारी जिनके विशुद्ध स्वरूपको जानते हैं, वे शम्भु दिखलायी पड़ रहे हैं। ब्रह्मा आदि देवता तथा ब्रह्मवादी ऋषिजन जिनके लिङ्गकी सदा आराधना करते हैं, वे विश्वेश्वर दिखलायी पड़ रहे हैं॥ ३९-४०॥<br><br>जिन्हें एक बार प्रणाममात्र कर लेनेसे ही प्रणाम करनेवालेके सम्पूर्ण मोहको उत्पन्न करनेवाला संसारका बीज विलीन हो जाता है, वे रुद्र दिखलायी पड़ रहे हैं। जिनके मण्डलके मध्य सरस्वतीके साथ ये भगवान् ब्रह्मा स्थित हैं, हिरण्यगर्भके पुत्र वे ईश्वर दिखलायी पड़ रहे हैं। सम्पूर्ण संसारको उत्पन्न करनेवाली विज्ञान-तनुरूपी (विज्ञानमयी) ईश्वरी (शक्ति) जिनके पार्श्वका कभी त्याग नहीं करती, वे शंकर दिखलायी पड़ रहे हैं। जिनके चरणकमलोंमें पत्र, पुष्प अथवा जल अर्पण करनेसे (प्राणी) संसारसे पार हो जाते हैं, वे रुद्र दिखलायी पड़ रहे हैं। जिनकी संनिधिमात्रसे (अमोघशक्ति प्राप्तकर) सनातन (शाश्वतकाल) सब कुछ प्राणिमात्रको प्रदान करता है, वे कालके भी काल योगात्मा महेश्वर दृष्टिगोचर हो रहे हैं॥ ४१—४५॥ |
| जीवनं सर्वलोकानां त्रिलोकस्यैव भूषणम्।<br>सोमः स दृश्यते देवः सोमो यस्य विभूषणम् ॥ ४६ ॥<br><br>देव्या सह सदा साक्षाद् यस्य योगः स्वभावतः ।<br>गीयते परमा मुक्तिः स योगी दृश्यते किल ॥ ४७ ॥<br><br>योगिनो योगतत्त्वज्ञा वियोगाभिमुखाऽनिशम्।<br>योगं ध्यायन्ति देव्याऽसौ स योगी दृश्यते किल ॥ ४८ ॥ | जो सम्पूर्ण लोकोंके जीवन हैं, तीनों लोकोंके भूषण हैं तथा चन्द्रमा जिनका आभूषण है, वे देव सोम (उमाके साथ महेश्वर) दिखलायी पड़ रहे हैं। देवी उमा (पार्वती)-के साथ जिनका स्वभावसे ही नित्य साक्षात् संयोग है एवं जिनके अनुग्रहसे परम मुक्तिकी प्राप्ति शास्त्रोंमें बतायी जाती है, वे योगी महेश्वर दिखलायी पड़ रहे हैं। वैराग्यकी ओर उन्मुख, योगके तत्त्वको जाननेवाले योगीजन देवीके साथ निरन्तर जिनके योगका ध्यान करते हैं, वे ही योगी (शंकर) दिखलायी पड़ रहे हैं॥ ४६—४८॥ |
| सोऽनुवीक्ष्य महादेवं महादेव्या सनातनम्।<br>वरासने समासीनमवाप परमां स्मृतिम् ॥ ४९ ॥<br><br>लब्ध्वा माहेश्वरीं दिव्यां संस्मृतिं भगवानजः ।<br>तोषयामास वरदं सोमं सोमविभूषणम् ॥ ५० ॥ | महादेवीके साथ सनातन महादेवको श्रेष्ठ आसनपर विराजमान देखकर ब्रह्माको परम स्मृति प्राप्त हुई। भगवान् ब्रह्माने दिव्य माहेश्वरी स्मृतिको प्राप्तकर चन्द्रमाको आभूषणके रूपमें धारण करनेवाले तथा वर प्रदान करनेवाले सोम (शंकर)-को स्तुतिद्वारा प्रसन्न किया॥ ४९-५०॥ |
| <div align="center">ब्रह्मोवाच</div>नमो देवाय महते महादेव्यै नमो नमः।<br>नमः शिवाय शान्ताय शिवायै शान्तये नमः ॥ ५१ ॥ | ब्रह्माने कहा—महान् देव (महादेव)-को नमस्कार है। महादेवीको बार-बार नमस्कार है। शिवको, शान्तको नमस्कार है, शिवाको, शान्तिको नमस्कार है॥ ५१॥ |