संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३८८ * कूर्मपुराण *
| द्विजानां वपुरास्थाय नित्यं तिष्ठन्ति देवताः।<br>पूज्यन्ते ब्राह्मणालाभे प्रतिमादिष्वपि क्वचित्॥ ३७॥<br><br>तस्मात् सर्वप्रयत्नेन तत् तत् फलमभीप्सता।<br>द्विजेषु देवता नित्यं पूजनीया विशेषतः॥ ३८॥ | देवता नित्य ही ब्राह्मणोंके शरीरका आश्रय ग्रहणकर प्रतिष्ठित रहते हैं। कभी ब्राह्मणोंके प्राप्त न होनेपर प्रतिमा आदिमें भी उन देवताओंकी पूजा की जाती है। इसलिये उन-उन फलोंकी प्राप्तिकी इच्छासे सभी प्रकारके प्रयत्नोंसे विशेषरूपसे ब्राह्मणोंमें देवताओंकी नित्य पूजा करनी चाहिये॥ ३७-३८॥ |
| विभूतिकामः सततं पूजयेद् वै पुरन्दरम्।<br>ब्रह्मवर्चसकामस्तु ब्रह्माणं ब्रह्मकामुकः॥ ३९॥<br><br>आरोग्यकामोऽथ रविं धनकामो हुताशनम्।<br>कर्मणां सिद्धिकामस्तु पूजयेद् वै विनायकम्॥ ४०॥ | ऐश्वर्यकी इच्छा करनेवालेको सर्वदा इन्द्रकी पूजा करनी चाहिये। ब्रह्मतेज और ब्रह्मप्राप्तिके अभिलाषीको ब्रह्माकी आराधना करनी चाहिये। आरोग्यकी इच्छावालेको सूर्यकी, धनाभिलाषीको अग्निकी और कर्मोंमें सिद्धि प्राप्त करनेकी (अपने कार्यकी निर्विघ्न सम्पन्नताकी) इच्छावालेको विनायककी पूजा करनी चाहिये॥ ३९-४०॥ |
| भोगकामस्तु शशिनं बलकामः समीरणम्।<br>मुमुक्षुः सर्वसंसारात् प्रयत्नेनार्चयेद्धरिम्॥ ४१॥<br><br>यस्तु योगं तथा मोक्षमन्विच्छेज्ज्ञानमैश्वरम्।<br>सोऽर्चयेद् वै विरूपाक्षं प्रयत्नेनेश्वरेश्वरम्॥ ४२॥<br><br>ये वाञ्छन्ति महायोगान् ज्ञानानि च महेश्वरम्।<br>ते पूजयन्ति भूतेशं केशवं चापि भोगिनः॥ ४३॥ | भोग-प्राप्तिकी इच्छावालेको चन्द्रमाकी, बलप्राप्तिकी इच्छावालेको वायुकी और समस्त संसारसे मुक्तिके अभिलाषीको प्रयत्नपूर्वक विष्णुकी आराधना करनी चाहिये। जो योग, मोक्ष तथा ईश्वरसम्बन्धी ज्ञान प्राप्त करना चाहता हो, उसे प्रयत्नपूर्वक ईश्वरोंके भी ईश्वर विरूपाक्ष (शंकर)-की पूजा करनी चाहिये। जो महायोग और ज्ञानकी इच्छा करते हैं, वे भूताधिपति महेश्वरकी पूजा करते हैं और योगीजन केशवकी आराधना करते हैं॥ ४१-४३॥ |
| वारिदस्तृप्तिमाप्नोति सुखमक्षयमन्नदः।<br>तिलप्रदः प्रजामिष्टां दीपश्चक्षुरुत्तमम्॥ ४४॥<br><br>भूमिदः सर्वमाप्नोति दीर्घमायुर्हिरण्यदः।<br>गृहदोऽग्र्याणि वेश्मानि रूप्यदो रूपमुत्तमम्॥ ४५॥<br><br>वासोदश्चन्द्रसालोक्यमश्विसालोक्यमश्वदः।<br>अनडुदः श्रियं पुष्टां गोदो ब्रध्नस्य विष्टपम्॥ ४६॥<br><br>यानशय्याप्रदो भार्यामैश्वर्यमभयप्रदः।<br>धान्यदः शाश्वतं सौख्यं ब्रह्मदो ब्रह्मसात्म्यताम्॥ ४७॥<br><br>धान्यान्यपि यथाशक्ति विप्रेषु प्रतिपादयेत्।<br>वेदवित्सु विशिष्टेषु प्रेत्य स्वर्गं समश्नुते॥ ४८॥ | जलदान करनेवाला तृप्ति प्राप्त करता है, अन्नदान करनेवाला अक्षय सुख प्राप्त करता है, तिलदान करनेवाला इच्छित संतान प्राप्त करता है और दीपदान करनेवाला उत्तम ज्योति (चक्षु) प्राप्त करता है। भूमिदान करनेवाला सब कुछ प्राप्त करता है। स्वर्णदाता दीर्घ आयु, गृह-दान करनेवाला ऊँचे महल तथा चाँदी दान करनेवाला उत्तम रूप प्राप्त करता है। वस्त्र दान करनेवाला चन्द्रलोकमें निवास करता है और अश्व-दान करनेवाला अश्विनीकुमारोंके लोकमें जाता है। वृषभ-दान करनेवालेको पुष्ट लक्ष्मी और गो-दान करनेवालेको ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है। यान (सवारी) और शय्या-दान करनेवालेको भार्या तथा अभयदाताको ऐश्वर्य प्राप्त होता है। धान्यदाता शाश्वत सौख्य तथा वेदविद्याका दान करनेवाला ब्रह्म-तादात्म्यको प्राप्त करता है। विशिष्ट वेदज्ञाता ब्राह्मणोंको यथाशक्ति धान्य भी प्रदान करना चाहिये। ऐसा करनेसे मृत्युके अनन्तर स्वर्गकी प्राप्ति होती है॥ ४४-४८॥ |
| * अध्याय २६ * | ३८९ |
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| गवां घासप्रदानेन सर्वपापैः प्रमुच्यते।<br>इन्धनानां प्रदानेन दीप्ताग्निर्जायते नरः॥ ४९॥<br><br>फलमूलानि शाकानि भोज्यानि विविधानि च।<br>प्रदद्याद् ब्राह्मणेभ्यस्तु मुदा युक्तः सदा भवेत्॥ ५०॥<br><br>औषधं स्नेहमाहारं रोगिणे रोगशान्तये।<br>ददानो रोगरहितः सुखी दीर्घायुरेव च॥ ५१॥<br><br>असिपत्रवनं मार्गं क्षुरधारासमन्वितम्।<br>तीव्रतापं च तरति छत्रोपानत्प्रदो नरः॥ ५२॥<br><br>यद् यदिष्टतमं लोके यच्चापि दयितं गृहे।<br>तत्तद् गुणवते देयं तदेवाक्षयमिच्छता॥ ५३॥ | गौओंको घास प्रदान करनेसे सभी पापोंसे मुक्ति हो जाती है। ईंधनका दान करनेसे मनुष्य प्रदीप्त (जाठर) अग्निवाला (उत्तम पाचनशक्ति-सम्पन्न) होता है। जो ब्राह्मणोंको फल, मूल, शाक तथा विविध भोज्य पदार्थ प्रदान करता है, वह सर्वदा आनन्दित रहता है। रोगीके रोग-शान्तिके लिये जो उन्हें औषधि, स्नेह (तेल, घृत आदि) तथा आहार प्रदान करता है, वह रोगरहित, सुखी तथा दीर्घ आयुवाला होता है। छाता और जूता प्रदान करनेवाला मनुष्य छुरेकी धारसे पूर्ण असिपत्रवनके मार्गमें तीव्र तापको पार कर लेता है। संसारमें जो-जो भी स्वयंको अत्यन्त अभीष्ट हो और जो घरमें सबके लिये अत्यन्त प्रिय वस्तु हो, उस-उस वस्तुको गुणवान् ब्राह्मणको दानमें देना चाहिये, ऐसा करनेसे अभीष्ट एवं प्रिय वस्तु अक्षय होकर प्राप्त होती है॥ ४९-५३॥ |
| अयने विषुवे चैव ग्रहणे चन्द्रसूर्ययोः।<br>संक्रान्त्यादिषु कालेषु दत्तं भवति चाक्षयम्॥ ५४॥<br><br>प्रयागादिषु तीर्थेषु पुण्येष्वयतनेषु च।<br>दत्त्वा चाक्षयमाप्नोति नदीषु च वनेषु च॥ ५५॥ | अयन (उत्तरायण और दक्षिणायन), विषुव (मेष और तुला-संक्रान्ति), चन्द्र और सूर्यग्रहण तथा (अन्य) संक्रान्ति आदि समयोंमें दिया हुआ दान अक्षय होता है। प्रयाग आदि तीर्थों, पवित्र मन्दिरों, नदियोंके किनारों तथा (नैमिष आदि पुण्यप्रद) अरण्योंमें दान देनेसे अक्षय (फल) प्राप्त होता है॥ ५४-५५॥ |
| दानधर्मात् परो धर्मो भूतानां नेह विद्यते।<br>तस्माद् विप्राय दातव्यं श्रोत्रियाय द्विजातिभिः॥ ५६॥<br><br>स्वर्गायुर्भूतिकामेन तथा पापोपशान्तये।<br>मुमुक्षुणा च दातव्यं ब्राह्मणेभ्यस्तथाऽन्वहम्॥ ५७॥ | इस संसारमें प्राणियोंके लिये दानसे बढ़कर कोई अन्य धर्म नहीं है। इसलिये द्विजातियोंको श्रोत्रिय ब्राह्मणको दान देना चाहिये। स्वर्ग, आयु तथा ऐश्वर्यका अभिलाषी और पापकी शान्तिके इच्छुक तथा मोक्षार्थी पुरुषको प्रतिदिन ब्राह्मणोंके निमित्त दान करना चाहिये॥ ५६-५७॥ |
| दीयमानं तु यो मोहाद् गोविप्राग्निसुरेषु च।<br>निवारयति पापात्मा तिर्यग्योनिं व्रजेत् तु सः॥ ५८॥<br><br>यस्तु द्रव्यार्जनं कृत्वा नार्चयेद् ब्राह्मणान् सुरान्।<br>सर्वस्वमपहृत्यैनं राजा राष्ट्रात् प्रवासयेत्॥ ५९॥ | जो व्यक्ति मोहवश गौ, ब्राह्मण, अग्नि तथा देवताओंके निमित्त दिये जा रहे दानको रोकता है, वह पापात्मा तिर्यग्योनिमें जाता है। जो द्रव्यका अर्जन करके ब्राह्मणों तथा देवताओंकी पूजा नहीं करता है (अर्थात् धर्मसम्मत, लोकसम्मत-रूपमें धनका उपयोग नहीं करता है तो) उसका सर्वस्व अपहरण करके उसे राष्ट्रसे बाहर निकाल देना राजाका कर्तव्य है॥ ५८-५९॥ |
३९० * कूर्मपुराण *
| यस्तु दुर्भिक्षवेलायामन्नाद्यं न प्रयच्छति।<br>म्रियमाणेषु विप्रेषु ब्राह्मणः स तु गर्हितः ॥ ६० ॥ | जो व्यक्ति दुर्भिक्षके समय मरणप्राय विप्रोंको अन्न आदि नहीं देता, वह ब्राह्मण^१ (या मनुष्य) निन्दित होता है, उसके साथ न आदान-प्रदानका व्यवहार करना चाहिये और न उसके साथ बैठना ही चाहिये। राजा उसको चिह्नितकर^२ अपने राष्ट्रसे बाहर निकाल दे। संसारमें अपने धर्मके साधनरूप द्रव्यको जो असज्जनों (दानके अयोग्यों)-को दान करता है, वह मनुष्य पूर्वसे (पूर्वोक्त वर्णित सभी पापियोंसे) भी अधिक पापी होता है और नरकमें पड़ता है॥ ६०-६२॥ |
| न तस्मात् प्रतिगृह्णीयुर्न विशेयुश्च तेन हि।<br>अङ्कयित्वा स्वकाद् राष्ट्रात् तं राजा विप्रवासयेत् ॥ ६१ ॥ | |
| यस्त्वसद्भ्यो ददातीह स्वद्रव्यं धर्मसाधनम्।<br>स पूर्वाभ्यधिकः पापी नरके पच्यते नरः ॥ ६२ ॥ | |
| स्वाध्यायवन्तो ये विप्रा विद्यावन्तो जितेन्द्रियाः।<br>सत्यसंयमसंयुक्तास्तेभ्यो दद्याद् द्विजोत्तमाः ॥ ६३ ॥ | हे द्विजोत्तमो! जो ब्राह्मण स्वाध्यायनिरत, विद्यावान्, जितेन्द्रिय तथा सत्य और संयम-सम्पन्न है, उसे दान देना चाहिये। भोजन किये रहनेपर भी विद्वान् धार्मिक द्विजको भोजन कराना चाहिये, किंतु मूर्ख और सदाचारहीन ब्राह्मणको दस दिनोंका भूखा होनेपर भी भोजन नहीं कराना^३ चाहिये॥ ६३-६४॥ |
| सुभुक्तमपि विद्वांसं धार्मिकं भोजयेद् द्विजम्।<br>न तु मूर्खमवृत्तस्थं दशरात्रमुपोषितम् ॥ ६४ ॥ | |
| संनिकृष्टमतिक्रम्य श्रोत्रियं यः प्रयच्छति।<br>स तेन कर्मणा पापी दहत्यासप्तमं कुलम् ॥ ६५ ॥ | जो समीपमें स्थित श्रोत्रियकी अवमानना कर अन्य (ब्राह्मण)-को दान देता है, वह पापी अपने उस पापके कारण अपने सात पीढ़ीहतकको दग्ध कर डालता है। यदि कोई ब्राह्मण शील, विद्या आदिमें अधिक गुणसम्पन्न हो, तो समीपके ब्राह्मणका भी अतिक्रमण कर यत्नपूर्वक उसे दान देना चाहिये। जो आदरपूर्वक दान ग्रहण करता है और जो आदरपूर्वक देता है, वे दोनों स्वर्ग प्राप्त करते हैं। इसके विपरीत करनेवाले नरक जाते हैं। धर्मज्ञको नास्तिक, कुतर्की, सभी पाखंडियों तथा वेदज्ञानसे हीन व्यक्तिके निमित्त जलका भी दान नहीं करना चाहिये^४॥ ६५-६८॥ |
| यदि स्यादधिको विप्रः शीलविद्यादिभिः स्वयम्।<br>तस्मै यत्नेन दातव्यं अतिक्रम्यापि संनिधिम् ॥ ६६ ॥ | |
| योऽर्चितं प्रतिगृह्णीयाद् दद्यादर्चितमेव च।<br>तावुभौ गच्छतः स्वर्गं नरकं तु विपर्यये ॥ ६७ ॥ | |
| न वार्यपि प्रयच्छेत नास्तिके हेतुकेऽपि च।<br>पाषण्डेषु च सर्वेषु नावेदविदि धर्मवित् ॥ ६८ ॥ | |
| अपूपं च हिरण्यं च गामश्वं पृथिवीं तिलान्।<br>अविद्वान् प्रतिगृह्णानो भस्मीभवति काष्ठवत् ॥ ६९ ॥ | अपूप (पुआ), स्वर्ण, गौ, अश्व, पृथ्वी तथा तिलका दान ग्रहण करनेवाला अविद्वान् व्यक्ति लकड़ीके समान भस्म हो जाता है (अर्थात् दान लेनेकी योग्यता न रहनेपर लोभवश दान नहीं लेना चाहिये)। श्रेष्ठ द्विजको प्रशस्त द्विजातियोंसे धनकी इच्छा करनी चाहिये अथवा अपनी जातिवालोंसे ही धन ग्रहण करना चाहिये, किंतु शूद्रसे किसी प्रकार धन नहीं लेना चाहिये॥ ६९-७०॥^५ |
| द्विजातिभ्यो धनं लिप्सेत् प्रशस्तेभ्यो द्विजोत्तमः।<br>अपि वा जातिमात्रेभ्यो न तु शूद्रात् कथञ्चन ॥ ७० ॥ |
१-मूलमें 'ब्राह्मण' शब्द है। पर वह मनुष्यमात्रका उपलक्षण है।
२-अपराधसूचक चिह्नसे अपराधीको अङ्कित करना भी दण्ड देनेके अन्तर्गत एक शास्त्रीय प्रक्रिया है।
३-यह अनुष्ठानके अङ्गभूत भोजनका निषेध है। सामान्यतः तो किसी भी भूखेको भोजन कराना गृहस्थका अनिवार्य कर्तव्य है।
४-यहाँ जलके दानका निषेध है। प्यासेको पानी पिलानेका निषेध नहीं है। दानके लिये ही योग्य पात्रकी अपेक्षा है।
५-शूद्र छोटा भाई है, इसलिये उससे धन लेनेका निषेध किया है। छोटेसे माँगना उचित नहीं होता।
* अध्याय २६ * ३९१
| वृत्तिसंकोचमन्विच्छेन्नेहेत धनविस्तरम्।<br>धनलोभे प्रसक्तस्तु ब्राह्मण्यादेव हीयते ॥ ७१ ॥<br><br>वेदानधीत्य सकलान् यज्ञांश्चावाप्य सर्वशः।<br>न तां गतिमवाप्नोति संकोचाद् यामवाप्नुयात् ॥ ७२ ॥<br><br>प्रतिग्रहरुचिर्न स्यात् यात्रार्थं तु समाहरेत्।<br>स्थित्यर्थादधिकं गृह्णन् ब्राह्मणो यात्यधोगतिम् ॥ ७३ ॥ | ब्राह्मणको वृत्तिके संकोचकी इच्छा रखनी चाहिये, उसे धनका विस्तार करनेकी इच्छा नहीं रखनी चाहिये। धनके लोभमें आसक्त ब्राह्मण ब्राह्मणत्वसे च्युत हो जाता है। सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन करने और सभी यज्ञोंको कर लेनेपर भी वह गति नहीं प्राप्त होती जो (वृत्तिके) संकोचसे प्राप्त होती है (अर्थात् जीवननिर्वाहके लिये जीविकाका अधिक-से-अधिक विस्तार उचित नहीं है)। दान लेनेमें रुचि नहीं होनी चाहिये। मात्र जीवन-निर्वाहके लिये धन ग्रहण करना चाहिये। अपनी स्थितिमात्रसे अधिक धन लेनेवाला ब्राह्मण अधोगति प्राप्त करता है (अर्थात् अपने तथा अपने परिवारके पोषणके लिये जितना अत्यावश्यक है, उतना ही लेना चाहिये।) ॥ ७१—७३ ॥ |
| यस्तु याचनको नित्यं न स स्वर्गस्य भाजनम्।<br>उद्वेजयति भूतानि यथा चौरस्तथैव सः ॥ ७४ ॥<br><br>गुरून् भृत्यांश्चोज्जिहीर्षुरर्चिष्यन् देवतातिथीन्।<br>सर्वतः प्रतिगृह्णीयान्न तु तृप्येत् स्वयं ततः ॥ ७५ ॥ | जो नित्य याचना करता है, वह स्वर्गका भागी नहीं होता। वह प्राणियोंको उद्विग्न करता है, वह चोरके ही समान होता है। गुरुजनों तथा सेवकोंके उद्धारकी इच्छा करनेवाला तथा देवता और अतिथियोंकी आराधना करनेवाला सबसे दान ग्रहण कर सकता है, किंतु उस दानसे वह अपनी तृप्ति न करे ॥ ७४-७५ ॥ |
| एवं गृहस्थो युक्तात्मा देवतातिथिपूजकः।<br>वर्तमानः संयतात्मा याति तत् परमं पदम् ॥ ७६ ॥<br><br>पुत्रे निधाय वा सर्वं गत्वारण्यं तु तत्त्ववित्।<br>एकाकी विचरेन्नित्यमुदासीनः समाहितः ॥ ७७ ॥<br><br>एष वः कथितो धर्मो गृहस्थानां द्विजोत्तमाः।<br>ज्ञात्वानुतिष्ठेन्नियतं तथानुष्ठापयेद् द्विजान् ॥ ७८ ॥ | इस प्रकार संयत आत्मावाला, देवताओं तथा अतिथियोंकी पूजा करनेवाला युक्तात्मा गृहस्थ परमपदको प्राप्त करता है। अथवा पुत्रको अपना सर्वस्व समर्पित कर तत्त्वज्ञानी पुरुषको वनमें जाकर समाहित होकर, विरक्तभावसे नित्य एकाकी विचरण करना चाहिये। हे द्विजोत्तमो! यह मैंने आप लोगोंको गृहस्थोंका धर्म बतलाया। इसे जानकर इसका नियमपूर्वक स्वयं अनुष्ठान करना चाहिये और अन्य द्विजोंसे इसका पालन करवाना चाहिये ॥ ७६-७८ ॥ |
| इति देवमनादिमेकमीशं<br>गृहधर्मेण समर्च्चयेदजस्रम्।<br>समतीत्य स सर्वभूतयोनिं<br>प्रकृतिं याति परं न याति जन्म ॥ ७९ ॥ | इस प्रकार गृहस्थधर्मके द्वारा अनादि, अद्वितीय देव ईश्वरकी सतत आराधना करनी चाहिये। (ऐसा करनेवाला) वह व्यक्ति समस्त प्राणियोंके मूल कारण प्रकृतिका अतिक्रमण कर परमपदको प्राप्त कर लेता है और उसका पुनर्जन्म नहीं होता ॥ ७९ ॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिभागे षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिभागमें छब्बीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २६ ॥
| ३९२ | * कूर्मपुराण * |
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सत्ताईसवाँ अध्याय
वानप्रस्थ-आश्रम तथा वानप्रस्थ-धर्मका वर्णन, वानप्रस्थीके कर्तव्योंका निरूपण
| व्यास उवाच | **व्यासजीने कहा—**इस प्रकार आयुके द्वितीय |
|---|---|
| एवं गृहाश्रमे स्थित्वा द्वितीयं भागमायुषः ।<br>वानप्रस्थाश्रमं गच्छेत् सदारः साग्निरेव च ॥ १ ॥ | भागतक गृहस्थाश्रममें रहकर (तृतीय भागमें) अग्नि तथा भार्यासहित वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश करना चाहिये। अथवा पुत्रके भी पुत्रको देखकर और शरीरके जर्जर |
| निक्षिप्य भार्यां पुत्रेषु गच्छेद् वनमथापि वा।<br>दृष्टापत्यस्य चापत्यं जर्जरीकृतविग्रहः ॥ २ ॥ | हो जानेपर अपनी पत्नीको पुत्रोंके संरक्षणमें रख दे तथा स्वयं वनमें चला जाय। प्रशस्त उत्तरायणमें |
| शुक्लपक्षस्य पूर्वाह्ने प्रशस्ते चोत्तरायणे ।<br>गत्वारण्यं नियमवांस्तपः कुर्यात् समाहितः ॥ ३ ॥ | शुक्लपक्षके पूर्वाह्नमें वनमें जाकर नियम ग्रहणकर समाहित होकर तप करना चाहिये ॥ १–३ ॥ |
| फलमूलानि पूतानि नित्यमाहारमाहरेत् ।<br>यताहारो भवेत् तेन पूजयेत् पितृदेवताः ॥ ४ ॥ | नित्य पवित्र फल-मूलोंको आहारके लिये स्वीकार करना चाहिये और इस प्रकार संयत आहारवाला होकर उसी फल-मूल आदिसे पितरों तथा देवताओंका पूजन |
| पूजयित्वातिथिं नित्यं स्नात्वा चाभ्यर्चयेत् सुरान्।<br>गृहादाहृत्य चाश्नीयादष्टौ ग्रासान् समाहितः ॥ ५ ॥ | (संतर्पण) करना चाहिये। स्नान करके नित्य अतिथियोंका पूजन करके देवताओंका पूजन करे। घरसे लाकर एकाग्रतापूर्वक आठ ग्रास भोजन करे। नित्य जटा धारण |
| जटाश्च बिभृयान्नित्यं नखरोमाणि नोत्सृजेत्।<br>स्वाध्यायं सर्वदा कुर्यान्नियच्छेद् वाचमन्यतः ॥ ६ ॥ | करे, नख तथा रोम न कटवाये। सर्वदा स्वाध्याय करे और अन्य विषयोंसे वाणीको रोके ॥ ४–६ ॥ |
| अग्निहोत्रं च जुहुयात् पञ्चयज्ञान् समाचरेत्।<br>मुन्यन्नैर्विविधैर्मेध्यैः शाकमूलफलेन वा ॥ ७ ॥ | अग्निहोत्र करे और (वनमें स्वयं उत्पन्न होनेवाले) मुनियोंके विविध प्रकारके पवित्र अन्नों एवं शाक, मूल अथवा फलोंसे पञ्चमहायज्ञोंको सम्पन्न करे। नित्य |
| चीरवासा भवेन्नित्यं स्नायात् त्रिषवणं शुचिः ।<br>सर्वभूतानुकम्पी स्यात् प्रतिग्रहविवर्जितः ॥ ८ ॥ | चीररूपी (अचला, कौपीनमात्र) वस्त्र धारण करे, तीनों संध्याओंमें पवित्रतापूर्वक स्नान करे। सभी प्राणियोंपर दया रखे और दान ग्रहण न करे। (वानप्रस्थी) द्विजको |
| दर्शेन पौर्णमासेन यजेत नियतं द्विजः ।<br>ऋक्षेष्ववाग्रयणे चैव चातुर्मास्यानि चाहरेत्।<br>उत्तरायणं च क्रमशो दक्षस्यायनमेव च ॥ ९ ॥ | नियमसे दर्श-पौर्णमासयाग, नक्षत्रयाग, आग्रयण (नवसस्येष्टि) और चातुर्मासयाग करना चाहिये तथा क्रमशः उत्तरायण एवं दक्षिणायन याग करना चाहिये। वसन्त तथा |
| वासन्तैः शारदैर्मेध्यैर्मुन्न्यन्नैः स्वयमाहृतैः ।<br>पुरोडाशांश्चरूंश्चैव विधिवन्निर्वपेत् पृथक् ॥ १० ॥ | शरत्कालमें उत्पन्न स्वयं लाये हुए पवित्र मुन्यन्नोंसे पृथक्-पृथक् पुरोडाश एवं चरु बनाकर देवताओं (तथा पितरों)-को अतिपवित्र वन्य हवि प्रदान करना चाहिये। |
| देवताभ्यश्च तद् हुत्वा वन्यं मेध्यतरं हविः ।<br>शेषं समुपभुञ्जीत लवणं च स्वयं कृतम् ॥ ११ ॥ | तदनन्तर अवशिष्ट उस हविको लवण मिलाकर स्वयं भक्षण करना चाहिये ॥ ७–११ ॥ |
| वर्जयेन्मधुमांसानि भौमानि कवकानि च।<br>भूस्तृणं शिग्रुकं चैव श्लेष्मातकफलानि च ॥ १२ ॥ | मधु, मांस, भूमिमें उत्पन्न कवक (कुकुरमुत्ता), भूस्तृण (शाकविशेष), शिग्रुक (सहिजन) तथा श्लेष्मातक (लिसोढ़ा)-के फलोंका त्याग करना चाहिये ॥ १२ ॥ |
| * अध्याय २७ * | ३९३ |
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| न फालकृष्टमश्नीयादुत्सृष्टमपि केनचित्।<br>न ग्रामजातान्यार्त्तोऽपि पुष्पाणि च फलानि च ॥ १३ ॥ | हलसे जोती हुई भूमिमें उत्पन्न और दूसरोंके द्वारा परित्यक्त पदार्थका भक्षण नहीं करना चाहिये। कष्टमें होते हुए भी ग्राममें उत्पन्न पुष्पों-फलोंका भक्षण नहीं करना चाहिये ॥ १३ ॥ |
| श्रावणेनैव विधिना वह्निं परिचरेत् सदा।<br>न द्रुह्येत् सर्वभूतानि निर्द्वन्द्वो निर्भयो भवेत् ॥ १४ ॥ | सर्वदा श्रावणी विधिके अनुसार अग्निकी परिचर्या करे। किसी भी प्राणीसे द्रोह न करे, द्वन्द्वोंसे परे और भयरहित रहे। रातमें कुछ भी भोजन न करे, रात्रिमें केवल ध्यानपरायण रहे। नित्य इन्द्रियजयी, क्रोधजयी, तत्त्वज्ञानका चिन्तक तथा ब्रह्मचर्यपरायण रहे। पत्नीका भी आश्रय न ले ॥ १४-१५ ॥ |
| न नक्तं किंचिदश्नीयाद् रात्रौ ध्यानपरो भवेत्।<br>जितेन्द्रियो जितक्रोधस्तत्त्वज्ञानविचिन्तकः।<br>ब्रह्मचारी भवेन्नित्यं न पत्नीमपि संश्रयेत् ॥ १५ ॥<br>यस्तु पत्न्या वनं गत्वा मैथुनं कामतश्चरेत्।<br>तद् व्रतं तस्य लुप्येत प्रायश्चित्तीयते द्विजः ॥ १६ ॥ | जो (द्विज) वनमें जाकर कामवश पत्नीके साथ मैथुन करता है तो वह व्रत (वानप्रस्थव्रत)-से च्युत हो जाता है और प्रायश्चित्तका भागी होता है। वहाँ (वानप्रस्थाश्रममें) जो संतान उत्पन्न होती है, वह द्विजातियोंके द्वारा स्पर्शके योग्य नहीं होती। उसका वेदमें अधिकार नहीं होता और उसके वंशमें भी यही स्थिति रहती है। (वानप्रस्थीको) नित्य भूमिपर शयन करना चाहिये। गायत्रीके जपमें तत्पर रहना चाहिये। सभी प्राणियोंको शरण देनेवाला होना चाहिये और दानशील होना चाहिये ॥ १६-१८ ॥ |
| तत्र यो जायते गर्भो न संस्पृश्यो द्विजातिभिः।<br>न हि वेदेऽधिकारोऽस्य तद्वंशेऽप्येवमेव हि ॥ १७ ॥ | |
| अधः शयीत सततं सावित्रीजाप्यतत्परः।<br>शरण्यः सर्वभूतानां संविभागपरः सदा ॥ १८ ॥<br>परिवादं मृषावादं निद्रालस्यं विवर्जयेत्।<br>एकाग्निरनिकेतः स्यात् प्रोक्षितां भूमिमाश्रयेत् ॥ १९ ॥ | परिवाद (परनिन्दा), असत्यभाषण, निद्रा तथा आलस्यका परित्याग करना चाहिये। एकाग्नि और घरसे रहित होना चाहिये। प्रोक्षित की गयी भूमिपर रहना चाहिये। (वनमें) मृगोंके साथ विचरण करना चाहिये और उन्हींके साथ रहना चाहिये (अर्थात् असंग हो वनमें ही रहे)। शिला या बालूके ऊपर शयन करना चाहिये और सदा समाहितचित्त रहना चाहिये। शीघ्र ही समाप्त होने योग्य फल-मूल आदिका संग्रह करनेवाला होना चाहिये अथवा एक महीनेतक, छः महीनेतक या एक वर्षतक उपयोग किये जानेवाले (फल-मूलादि)-का संग्रह करनेवाला होना चाहिये ॥ १९-२१ ॥ |
| मृगैः सह चरेद् वासं तैः सहैव च संवसेत्।<br>शिलायां शर्करायां वा शयीत सुसमाहितः ॥ २० ॥ | |
| सद्यः प्रक्षालको वा स्यान्माससंचयिकोऽपि वा।<br>षण्मासनिचयो वा स्यात् समानिचय एव वा ॥ २१ ॥<br>त्यजेदाश्वयुजे मासि सम्पन्नं पूर्वसंचितम्।<br>जीर्णानि चैव वासांसि शाकमूलफलानि च ॥ २२ ॥ | पूर्वसंचित पदार्थों, जीर्ण वस्त्रों तथा शाक, फल, मूल आदिका आश्विनमासमें परित्याग कर देना चाहिये। दाँतोंको ही ऊखल (तथा मूसल) समझना चाहिये। कापोतीवृत्ति (कबूतरकी तरह दाना चुगकर खानेवाली वृत्ति)-का आश्रय ग्रहण करना चाहिये ॥ २२-२३ ॥ |
| दन्तोलूखलिको वा स्यात् कापोतीं वृत्तिमाश्रयेत्।<br>अश्मकुट्टो भवेद् वापि कालपक्वभुगेव वा ॥ २३ ॥ |
| ३९४ | * कूर्मपुराण * |
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| नक्तं चान्नं समश्नीयाद् दिवा चाहृत्य शक्तितः।<br>चतुर्थकालिको वा स्यात् स्याद्वाप्यष्टमकालिकः ॥ २४ ॥ | अथवा पत्थरपर ही कूटकर अन्नका भक्षण करनेवाला होना चाहिये या समयानुसार पके हुए (फल-मूलादि)-का भक्षण करनेवाला होना चाहिये। यथाशक्ति दिनमें अन्न (फल-मूलादि) लाकर रात्रिमें भक्षण करना चाहिये अथवा चतुर्थकालिक या अष्टमकालिक भोजन करनेवाला होना चाहिये। अथवा शुक्ल और कृष्णपक्षमें चान्द्रायणविधिसे रहे। या प्रत्येक पक्षमें एक बार उबाले गये यवागूका भक्षण करे॥ २४-२५॥ |
| चान्द्रायणविधानैर्वा शुक्ले कृष्णे च वर्तयेत्।<br>पक्षे पक्षे समश्नीयाद् यवागूं क्वथितां सकृत्॥ २५॥<br>पुष्पमूलफलैर्वापि केवलैर्वर्तयेत् सदा।<br>स्वाभाविकैः स्वयं शीर्णैर्वैखानसमते स्थितः ॥ २६ ॥ | अथवा सर्वदा वैखानस (वानप्रस्थ) व्रतका पालन करते हुए केवल स्वाभाविक रीतिसे अपने-आप (वृक्षसे) गिरे हुए पुष्प, मूल एवं फलोंसे निर्वाह करता रहे। भूमिपर लेटना एवं रहना चाहिये। दिनमें पंजोंके बल उठना, बैठना या चलना चाहिये। धैर्य कभी भी न छोड़े। ग्रीष्म ऋतुमें पञ्चाग्नि-तप (तप-विशेषका सेवन) करे। वर्षाके दिनोंमें खुले आकाशके नीचे रहे और हेमन्तमें गीले वस्त्र धारण करे—इस प्रकार क्रमशः तपस्याको बढ़ाता रहे॥ २६-२८॥ |
| भूमौ वा परिवर्तेत तिष्ठेद् वा प्रपदैर्दिनम्।<br>स्थानासनाभ्यां विहरेन्न क्वचिद् धैर्यमुत्सृजेत् ॥ २७॥ | |
| ग्रीष्मे पञ्चतपाश्च स्याद् वर्षास्वभ्रावकाशकः।<br>आर्द्रवासास्तु हेमन्ते क्रमशो वर्धयंस्तपः ॥ २८॥<br>उपस्पृश्य त्रिषवणं पितृदेवांश्च तर्पयेत्।<br>एकपादेन तिष्ठेत मरीचीन् वा पिबेत् तदा ॥ २९ ॥ | आचमनकर तीनों संध्याओंमें स्नान तथा पितरों और देवताओंका तर्पण (एवं पूजन) करे। उस समय एक पैरसे खड़ा रहे अथवा सूर्यकिरणोंका पान करे। पञ्चाग्निका सेवन करे अथवा धुएँका पान करे या ऊष्माका पान करे अथवा सोमपान करे। शुक्लपक्षमें दुग्ध-पान करे और कृष्णपक्षमें गोमयका सेवन करे अथवा गिरे हुए पत्तोंका सेवन करे या सदा कृच्छ्रव्रतका पालन करता रहे॥ २९-३०॥ |
| पञ्चाग्निर्धूमपो वा स्यादुष्मपः सोमपोऽपि वा।<br>पयः पिबेच्छुक्लपक्षे कृष्णपक्षे तु गोमयम्।<br>शीर्णपर्णाशनो वा स्यात् कृच्छ्रैर्वा वर्तयेत् सदा ॥ ३० ॥<br>योगाभ्यासरतश्च स्याद् रुद्राध्यायी भवेत् सदा।<br>अथर्वशिरसोऽध्येता वेदान्ताभ्यासतत्परः ॥ ३१ ॥ | सदा योगका अभ्यास करता रहे, रुद्राध्यायका अध्ययन करता रहे। अथर्वशिरस्के अध्ययन और वेदान्तके अभ्यासमें तत्पर रहे। आलस्यरहित होकर निरन्तर यमों और नियमोंका पालन करे। कृष्ण-मृगचर्म, उत्तरीय और शुक्ल यज्ञोपवीत धारण करे। अग्नियोंको अपनी आत्मामें प्रतिष्ठित कर ध्यान-परायण रहे। अग्नि (गृह्याग्नि) और गृहका परित्याग कर दे और मुनिव्रतद्वारा मोक्षकी प्राप्तिका प्रयत्न करता रहे॥ ३१-३३॥ |
| यमान् सेवेत सततं नियमांश्चाप्यतन्द्रितः।<br>कृष्णाजिनी सोत्तरीयः शुक्लयज्ञोपवीतवान् ॥ ३२ ॥ | |
| अथ चाग्नीन् समारोप्य स्वात्मनि ध्यानतत्परः।<br>अनग्निरनिकेतः स्यान्मुनिर्मोक्षपरो भवेत् ॥ ३३ ॥ | |
| तापसेष्वेव विप्रेषु यात्रिकं भैक्षमाहरेत्।<br>गृहमेधिषु चान्येषु द्विजेषु वनवासिषु ॥ ३४ ॥ | जीवन-निर्वाहके लिये तपस्वी ब्राह्मणोंसे ही भिक्षा माँगे। अथवा अन्य गृहस्थों तथा वनवासी द्विजोंसे भिक्षा लेनी चाहिये॥ ३४॥ |
* अध्याय २८ * ३९५
| ग्रामादाहृत्य वाश्नीयादष्टौ ग्रासान् वने वसन्।<br>प्रतिगृह्य पुटेनैव पाणिना शकलेन वा॥ ३५॥ | अथवा वनमें रहते हुए ग्रामसे लाकर मात्र आठ ग्रास भोजन करना चाहिये। पत्तोंके दोने, हाथ अथवा कसोरे (मिट्टीके पात्र) इत्यादिके टुकड़ेमें ही भोजन ग्रहण करना चाहिये॥ ३५॥ |
| विविधाश्चोपनिषद आत्मसंसिद्धये जपेत्।<br>विद्याविशेषान् सावित्रीं रुद्राध्यायं तथैव च॥ ३६॥ | आत्मज्ञानकी प्राप्तिके लिये (विधिपूर्वक) विविध उपनिषदोंका निरन्तर पाठ करना चाहिये। इसी प्रकार विशिष्ट विद्याओं, गायत्री तथा रुद्राध्यायकी आवृत्ति करनी चाहिये। अथवा ब्रह्मार्पण-विधिमें स्थित रहते हुए महाप्रस्थान (मृत्यु-पथ)-के उद्देश्यसे अनशन करे या अग्निमें प्रवेश करे॥ ३६-३७॥ |
| महाप्रस्थानिकं चासौ कुर्यादनशनं तु वा।<br>अग्निप्रवेशमन्यद् वा ब्रह्मार्पणविधौ स्थितः॥ ३७॥ | |
| यस्तु सम्यगिममाश्रमं शिवं<br> संश्रयेदशिवपुञ्जनाशनम् ।<br>तापसः स परमैश्वरं पदं<br> याति यत्र जगतोऽस्य संस्थितिः॥ ३८॥ | जो तपस्वी अमंगल-समूहका नाश करनेवाले तथा कल्याणकारी इस (वानप्रस्थ) आश्रमका भलीभाँति आश्रयण करता है, वह उस परम ऐश्वर पदको प्राप्त करता है, जिसमें इस जगत्की स्थिति है॥ ३८॥ |
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे सप्तविंशोऽध्यायः॥ २७॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें सत्ताईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २७॥
अट्ठाईसवाँ अध्याय
संन्यासधर्मका प्रतिपादन, संन्यासियोंके भेद तथा संन्यासीके कर्तव्योंका वर्णन
| व्यास उवाच<br><br>एवं वनाश्रमे स्थित्वा तृतीयं भागमायुषः।<br>चतुर्थमायुषो भागं संन्यासेन नयेत् क्रमात्॥ १॥<br><br>अग्नीनात्मनि संस्थाप्य द्विजः प्रव्रजितो भवेत्।<br>योगाभ्यासरतः शान्तो ब्रह्मविद्यापरायणः॥ २॥<br><br>यदा मनसि संजातं वैतृष्ण्यं सर्ववस्तुषु।<br>तदा संन्यासमिच्छेच्च पतितः स्याद् विपर्यये॥ ३॥<br><br>प्राजापत्यां निरूप्येष्टिमाग्नेयीमथवा पुनः।<br>दान्तः पक्वकषायोऽसौ ब्रह्माश्रममुपाश्रयेत्॥ ४॥ | व्यासजीने कहा— इस प्रकार वानप्रस्थ-आश्रममें आयुके तीसरे भागको व्यतीतकर क्रमशः आयुके चौथे भागको संन्यास-आश्रमद्वारा व्यतीत करना चाहिये। अग्नियोंको आत्मामें प्रतिष्ठित कर द्विजको संन्यास ग्रहण करना चाहिये। उसे योगाभ्यासमें निरत, शान्त तथा ब्रह्मविद्यापरायण रहना चाहिये। जब सभी वस्तुओंके प्रति मनमें वितृष्णा उत्पन्न हो जाय, तब संन्यास ग्रहण करनेकी इच्छा करनी चाहिये। इसके विपरीत करनेसे (अर्थात् स्वल्प भी तृष्णाके रहते संन्यास ग्रहण करनेपर) मनुष्य पतित हो जाता है। प्राजापत्य अथवा आग्नेय याग करके इन्द्रियनिग्रही एवं पूर्ण वैराग्यवान् द्विजको ब्रह्माश्रम (संन्यासाश्रम)-का आश्रय ग्रहण करना चाहिये॥ १—४॥ |
| ज्ञानसंन्यासिनः केचिद् वेदसंन्यासिनः परे।<br>कर्मसंन्यासिनस्त्वन्ये त्रिविधाः परिकीर्तिताः॥ ५॥ | कुछ ज्ञानसंन्यासी होते हैं, कुछ वेदसंन्यासी होते हैं और कुछ कर्मसंन्यासी होते हैं। इस प्रकार तीन प्रकारके संन्यासी कहे गये हैं॥ ५॥ |
३९६ * कूर्मपुराण *
यः सर्वसङ्गनिर्मुक्तो निर्द्वन्द्वश्चैव निर्भयः।
प्रोच्यते ज्ञानसंन्यासी स्वात्मन्येव व्यवस्थितः॥ ६ ॥
वेदमेवाभ्यसेन्नित्यं निराशी निष्परिग्रहः।
प्रोच्यते वेदसंन्यासी मुमुक्षुर्विजितेन्द्रियः॥ ७ ॥
यस्त्वग्नीनात्मसात्कृत्वा ब्रह्मार्पणपरो द्विजः।
ज्ञेयः स कर्मसंन्यासी महायज्ञपरायणः॥ ८ ॥
त्रयाणामपि चैतेषां ज्ञानी त्वभ्यधिको मतः।
न तस्य विद्यते कार्यं न लिङ्गं वा विपश्चितः॥ ९ ॥
जो सभी आसक्तियोंसे मुक्त है, सुख-दुःखादि द्वन्द्वोंसे रहित है और निर्भय है, अपनी आत्मामें ही प्रतिष्ठित रहनेवाला है, वह ज्ञानसंन्यासी कहलाता है। जो नित्य वेदका ही अभ्यास (स्वाध्याय) करता रहता है, आशारहित है, संग्रहशून्य है, जितेन्द्रिय है तथा मोक्षकी इच्छा रखनेवाला है, वह वेदसंन्यासी कहा जाता है। जो अग्नियोंको आत्मसात्कर ब्रह्मार्पणतत्पर रहता है, उस महायज्ञपरायण (सतत ब्रह्मचिन्तन-परायण) द्विजको कर्मसंन्यासी जानना चाहिये। इन तीनोंमें ज्ञानी (ज्ञान-संन्यासी)-को अधिक श्रेष्ठ माना गया है। उस (ज्ञानी)-का न कोई कर्तव्य (शेष) रह जाता है और न कोई चिह्न ही होता है॥ ६—९॥
निर्ममो निर्भयः शान्तो निर्द्वन्द्वः पर्णभोजनः।
जीर्णकौपीनवासाः स्यान्नग्नो वा ध्यानतत्परः॥ १० ॥
संन्यासीको ममताशून्य, भयरहित, शान्त, द्वन्द्वोंसे परे, पत्तोंका ही आहार करनेवाला, जीर्ण कौपीनको वस्त्र-रूपमें धारण करनेवाला अथवा नग्न और ध्यान-परायण होना चाहिये॥ १०॥
ब्रह्मचारी मिताहारो ग्रामादन्नं समाहरेत्।
अध्यात्ममतिरासीत निरपेक्षो निरामिषः॥ ११ ॥
आत्मनैव सहायेन सुखार्थं विचरेदिह।
नाभिनन्देत मरणं नाभिनन्देत जीवितम्॥ १२ ॥
कालमेव प्रतीक्षेत निदेशं भृतको यथा।
नाध्येतव्यं न वक्तव्यं श्रोतव्यं न कदाचन।
एवं ज्ञात्वा परो योगी ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ १३॥
(संन्यासी) ब्रह्मचर्यका पालन करे, सीमित मात्रामें आहार ग्रहण करे, ग्रामसे अन्न माँगकर लाये। अध्यात्म (ज्ञान)-में बुद्धि रखे, निरपेक्ष रहे तथा निरामिष रहे। अपनी ही सहायतासे अर्थात् स्वावलम्बी होकर आत्मतृप्तिके लिये इस संसारमें विचरण करे, न तो मृत्युका ही अभिनन्दन करे और न जीवनका अभिनन्दन करे। जिस प्रकार सेवक (अपने स्वामीके) आज्ञाकी प्रतीक्षा करता है, उसी प्रकार उसे भी कालकी प्रतीक्षा करनी चाहिये। न कभी अध्ययन करे, न प्रवचन करे और न कुछ श्रवण ही करे। इस प्रकारका ज्ञान रखकर (आत्मनिष्ठ होकर) वह श्रेष्ठ योगी ब्रह्मस्वरूप हो जाता है॥ ११—१३॥
एकवासाथवा विद्वान् कौपीनाच्छादनस्तथा।
मुण्डी शिखी वाथ भवेत् त्रिदण्डी निष्परिग्रहः।
काषायवासाः सततं ध्यानयोगपरायणः॥ १४॥
ग्रामान्ते वृक्षमूले वा वसेद् देवालयेऽपि वा।
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।
भैक्ष्येण वर्तयेन्नित्यं नैकान्नादी भवेत् क्वचित्॥ १५ ॥
विद्वान् संन्यासी (कौपीनके साथ) एक वस्त्र (उत्तरीय) धारण करे अथवा कौपीनमात्रसे शरीरका आच्छादन करे। मुण्डित सिर अथवा जटाधारी रहे। त्रिदण्डी रहे, संचयवृत्तिसे शून्य रहे। काषाय वस्त्र ही धारण करे और निरन्तर ध्यानयोगमें परायण रहे। उसे (संन्यासीको) ग्रामकी सीमापर, वृक्षके मूलमें अथवा किसी देवमन्दिरमें रहना चाहिये। शत्रु-मित्र तथा मान-अपमानमें समान रहना चाहिये। नित्य भिक्षावृत्तिसे निर्वाह करे। कभी भी उसे किसी एक ही व्यक्तिका अन्न खानेवाला नहीं होना चाहिये॥ १४-१५॥
| * अध्याय २८ * | ३९७ |
|---|
यस्तु मोहेन वालस्यादेकान्नादी भवेद् यतिः।
न तस्य निष्कृतिः काचिद् धर्मशास्त्रेषु कथ्यते॥ १६॥
रागद्वेषविमुक्तात्मा समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
प्राणिहिंसानिवृत्तश्च मौनी स्यात् सर्वनिस्पृहः॥ १७॥
दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।
सत्यपूतां वदेद् वाणीं मनःपूतं समाचरेत्॥ १८॥
नैकत्र निवसेद् देशे वर्षाभ्योऽन्यत्र भिक्षुकः।
स्नानशौचरतो नित्यं कमण्डलुकरः शुचिः॥ १९॥
ब्रह्मचर्यरतो नित्यं वनवासरतो भवेत्।
मोक्षशास्त्रेषु निरतो ब्रह्मसूत्री जितेन्द्रियः॥ २०॥
दम्भाहंकारनिर्मुक्तो निन्दापैशुन्यवर्जितः।
आत्मज्ञानगुणोपेतो यतिर्मोक्षमवाप्नुयात्॥ २१॥
अभ्यसेत् सततं वेदं प्रणवाख्यं सनातनम्।
स्नात्वाचम्य विधानेन शुचिर्देवालयादिषु॥ २२॥
यज्ञोपवीती शान्तात्मा कुशपाणिः समाहितः।
धौतकाषायवसनो भस्मच्छन्नत नूरुहः॥ २३॥
अधियज्ञं ब्रह्म जपेदाधिदैविकमेव च।
आध्यात्मिकं च सततं वेदान्ताभिहितं च यत्॥ २४॥
पुत्रेषु वाथ निवसन् ब्रह्मचारी यतिर्मुनिः।
वेदमेवाभ्यसेन्नित्यं स याति परमां गतिम्॥ २५॥
अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यं तपः परम्।
क्षमा दया च संतोषो व्रतान्यस्य विशेषतः॥ २६॥
वेदान्तज्ञाननिष्ठो वा पञ्च यज्ञान् समाहितः।
कुर्यादहरहः स्नात्वा भिक्षान्नेनैव तेन हि॥ २७॥ | जो संन्यासी मोह या आलस्यवश किसी एक ही व्यक्तिका अन्न भक्षण करता है, उसकी मुक्तिका कोई उपाय धर्मशास्त्रोंमें नहीं बतलाया गया है। (संन्यासीको) राग-द्वेषसे मुक्त, मिट्टी, पत्थर और सोनेमें समान भाव रखनेवाला, प्राणियोंकी हिंसासे निवृत्त, मौनी और सब प्रकारसे आसक्तिशून्य होना चाहिये, अच्छी तरह देखकर पैर रखना चाहिये, वस्त्रसे छानकर जल पीना चाहिये, सत्यसे पवित्र वाणी बोलनी चाहिये और मनसे शुद्ध आचरण करना चाहिये॥ १६-१८॥<br><br>संन्यासीको वर्षा-ऋतुके अतिरिक्त (अन्य ऋतुओंमें) किसी एक ही स्थानपर नहीं रहना चाहिये। नित्य स्नान एवं शौचमें तत्पर, हाथमें कमण्डलु धारण करनेवाला तथा पवित्र होना चाहिये। नित्य ब्रह्मचर्यव्रत धारण करना चाहिये, वनवासी ही रहना चाहिये तथा मोक्षविषयक शास्त्राध्ययनमें निरत रहते हुए ब्रह्मसूत्री (यज्ञोपवीतसे युक्त दण्डधारी) और जितेन्द्रिय रहना चाहिये। दम्भ-अहंकारसे मुक्त रहे, निन्दा तथा पिशुनता (चुगलखोरी)-का सर्वथा परित्याग करे। आत्मज्ञानसम्बन्धी गुणोंसे सम्पन्न रहे—ऐसा संन्यासी मोक्ष प्राप्त करता है। विधिपूर्वक स्नानोपरान्त आचमन करके पवित्रतापूर्वक देवालयोंमें प्रणव नामक सनातन वेद (मन्त्र)-का निरन्तर अभ्यास (जप) करे॥ १९-२२॥<br><br>यज्ञोपवीती, शान्तात्मा, हाथमें कुश धारण करनेवाला, एकाग्रचित्त, धुला हुआ काषाय वस्त्र धारण करनेवाला और भस्मसे धूसरित देहवाला रहना चाहिये*। संन्यासीको वेदान्त-प्रतिपादित अधियज्ञ, (समस्त यज्ञोंके अधिष्ठान) आधिदैविक तथा आध्यात्मिक ब्रह्म (मन्त्र-प्रणव)-का सतत जप करना चाहिये। अथवा मननशील तथा ब्रह्मचारी यतिको पुत्रोंके बीच रहते हुए नित्य वेदका ही अभ्यास करना चाहिये, इससे उसे परम गति प्राप्त होती है॥ २३-२५॥<br><br>अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, श्रेष्ठ तप, क्षमा, दया और संतोष—ये ब्रह्मचारी यतिके विशेष व्रत हैं। अथवा वेदान्त-ज्ञानमें निष्ठाके साथ समाहित होकर स्नानादि कर भिक्षामें प्राप्त अन्नसे नित्य पञ्चमहायज्ञोंका सम्पादन करना चाहिये (इसे विरक्त कर्मयोगीका धर्म समझना चाहिये)॥ २६-२७॥
* कुटीचक संन्यासी शिखा और यज्ञोपवीत धारण करते हैं। (नारदपरिव्राजकोपनिषद्-५)
३९८ * कूर्मपुराण *
होममन्त्राञ्जपेन्नित्यं काले काले समाहितः।
स्वाध्यायं चान्वहं कुर्यात् सावित्रीं संध्ययोर्जपेत् ॥ २८ ॥
ध्यायीत सततं देवमेकान्ते परमेश्वरम्।
एकान्नं वर्जयेन्नित्यं कामं क्रोधं परिग्रहम् ॥ २९ ॥
एकवासा द्विवासा वा शिखी यज्ञोपवीतवान्।
कमण्डलुकरो विद्वान् त्रिदण्डी याति तत्परम् ॥ ३० ॥
नियत समयपर समाहित होकर नित्य होम-मन्त्रोंका जप करना चाहिये। प्रतिदिन स्वाध्याय करे और संध्याओंमें गायत्रीका जप करे। एकान्तमें निरन्तर परमेश्वरदेवका ध्यान करे। नित्य एक ही व्यक्तिके अन्नका और काम, क्रोध तथा परिग्रहका त्याग करे। एक वस्त्र अथवा दो वस्त्र धारण करे। शिखा एवं यज्ञोपवीत धारण करे। हाथमें कमण्डलु धारण करे, ऐसा त्रिदण्डी विद्वान् भी (अनासक्त—द्वन्द्वातीत कर्मयोगी होनेके कारण) परम पदको प्राप्त करता है॥ २८-३०॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागेऽष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें अट्ठाईसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २८॥
उनतीसवाँ अध्याय
संन्यासाश्रमधर्म-निरूपणमें यतियोंकी भैक्ष्यवृत्तिका स्वरूप, यतियोंके लिये महेश्वरके ध्यानका प्रतिपादन, व्रतभङ्गमें प्रायश्चित्तविधान तथा पुनः यथास्थितिमें आनेकी विधि, संन्यासधर्म-प्रकरणकी समाप्ति
व्यास उवाच
एवं स्वाश्रमनिष्ठानां यतीनां नियतात्मनाम्।
भैक्षेण वर्तनं प्रोक्तं फलमूलैरथापि वा ॥ १ ॥
एककालं चरेद् भैक्षं न प्रसज्येत विस्तरे।
भैक्षे प्रसक्तो हि यतिर्विषयेष्वपि सज्जति ॥ २ ॥
सप्तागारं चरेद् भैक्षमलाभात् तु पुनश्चरेत्।
प्रक्षाल्य पात्रे भुञ्जीयादद्भिः प्रक्षालयेत् तु तत् ॥ ३ ॥
अथवान्यदुपादाय पात्रे भुञ्जीत नित्यशः।
भुक्त्वा तत् संत्यजेत् पात्रं यात्रामात्रमलोलुपः ॥ ४ ॥
विधूमे सन्नमुसले व्यङ्गारे भुक्तवज्जने।
वृत्ते शरावसम्पाते भिक्षां नित्यं यतिश्चरेत् ॥ ५ ॥
व्यासजीने कहा— इस प्रकार अपने आश्रममें स्थित नियतात्मा यतियोंके लिये भिक्षा अथवा फल-मूलद्वारा जीवन-निर्वाह करना कहा गया है। एक समय ही भिक्षा करनी चाहिये। उसके विस्तारमें आसक्त नहीं होना चाहिये; क्योंकि भिक्षामें आसक्ति रखनेवाला संन्यासी विषयोंमें भी आसक्त हो जाता है॥ १-२॥
सात घरोंसे भिक्षा माँगनी चाहिये। (उतने घरोंमें) न मिलनेपर पुनः भिक्षा माँगनी चाहिये। पात्रको धोकर उसमें भिक्षा ग्रहण करनी चाहिये और भिक्षाके बाद पुनः उसे जलसे धोना चाहिये। अथवा (सम्भव हो तो) बिना लोभके जीवन-निर्वाहमात्र करनेवाले यतिको प्रतिदिन नवीन पात्र लाकर उसमें भिक्षा ग्रहण करनी चाहिये और भिक्षा ग्रहण करनेके बाद उसका परित्याग कर देना चाहिये। गृहस्थका घर धूएँसे रहित हो जानेपर, मूसलका शब्द बंद हो जानेपर, आगके न रहनेपर, सभी लोगोंके भोजन कर चुकनेपर, कसोरे एवं पत्रादिका ढेर लग जानेपर यतिको (गृहस्थके घर) नित्य भिक्षा माँगनी चाहिये ॥ ३–५ ॥
| * अध्याय २९ * | ३९९ |
|---|---|
| गोदोहमात्रं तिष्ठेत कालं भिक्षुरधोमुखः।<br>भिक्षेत्युक्त्वा सकृत् तूष्णीमश्नीयाद् वाग्यतः शुचिः॥ ६ ॥<br><br>प्रक्षाल्य पाणिपादौ च समाचम्य यथाविधि।<br>आदित्ये दर्शयित्वान्नं भुञ्जीत प्राङ्मुखोत्तरः॥ ७ ॥<br><br>हुत्वा प्राणाहुतीः पञ्च ग्रासानष्टौ समाहितः।<br>आचम्य देवं ब्रह्माणं ध्यायीत परमेश्वरम्॥ ८ ॥<br><br>अलाबुं दारुपात्रं च मृण्मयं वैणवं ततः।<br>चत्वारि यतिपात्राणि मनुराह प्रजापतिः॥ ९ ॥<br><br>प्रागरात्रे पररात्रे च मध्यरात्रे तथैव च।<br>संध्यास्वह्नि विशेषेण चिन्तयेन्नित्यमीश्वरम्॥ १० ॥<br><br>कृत्वा हृत्पद्मनिलये विश्वाख्यं विश्वसम्भवम्।<br>आत्मानं सर्वभूतानां परस्तात् तमसः स्थितम्॥ ११ ॥<br><br>सर्वस्याधारभूतानामानन्दं ज्योतिरव्ययम्।<br>प्रधानपुरुषातीतमाकाशं दहनं शिवम्॥ १२॥<br><br>तदन्तः सर्वभावानामीश्वरं ब्रह्मरूपिणम्।<br>ध्यायेदनादिमद्वैतमानन्दादिगुणालयम् ॥ १३ ॥<br><br>महान्तं परमं ब्रह्म पुरुषं सत्यमव्ययम्।<br>सितेतरारुणाकारं महेशं विश्वरूपिणम्॥ १४॥<br><br>ओंकारान्तेऽथ चात्मानं संस्थाप्य परमात्मनि।<br>आकाशे देवमीशानं ध्यायीताकाशमध्यगम्॥ १५॥<br><br>कारणं सर्वभावानामानन्दैकसमाश्रयम्।<br>पुराणं पुरुषं शम्भुं ध्यायन् मुच्येत बन्धनात्॥ १६॥<br><br>यद्वा गुहायां प्रकृतौ जगत्सम्मोहनालये।<br>विचिन्त्य परमं व्योम सर्वभूतैककारणम्॥ १७॥<br><br>जीवनं सर्वभूतानां यत्र लोकः प्रलीयते।<br>आनन्दं ब्रह्मणः सूक्ष्मं यत् पश्यन्ति मुमुक्षवः॥ १८॥<br><br>तन्मध्ये निहितं ब्रह्म केवलं ज्ञानलक्षणम्।<br>अनन्तं सत्यमीशानं विचिन्त्यासीत संयतः॥ १९॥ | एक बार 'भिक्षा' ऐसा शब्द उच्चारण कर भिक्षा माँगनेवाले संन्यासीको नीचे मुख किये हुए उतने समयतक प्रतीक्षा करनी चाहिये, जितनी देरमें गाय दुही जाती है। (भिक्षा प्राप्त होनेपर) पवित्रतापूर्वक मौन होकर भिक्षा ग्रहण करनी चाहिये। हाथ-पाँव धोकर यथाविधि आचमन कर सूर्यकी ओर अन्न दिखलाकर पूर्व अथवा उत्तरकी ओर मुख करके भोजन करना चाहिये। (प्राणाय स्वाहा इत्यादि) पाँच प्राणाहुति देकर समाहित होकर आठ ग्रास ग्रहण करे। तदनन्तर आचमन कर परमेश्वर देव ब्रह्मका ध्यान करे। प्रजापति मनुने संन्यासीके लिये लौकी, लकड़ी, मिट्टी तथा बाँसके बने चार प्रकारके पात्र बताये हैं। यतिको रात्रिके प्रथम भाग, अन्तिम भाग, मध्यरात्रि, संध्या-काल तथा दिनमें नित्य विशेषरूपसे ईश्वरका चिन्तन करना चाहिये॥ ६-१०॥<br><br>(संन्यासीको) हृदयकमलरूपी घरमें विश्व नामक संसारके उत्पादक, सभी भूतोंके आत्मरूप, तमोगुणसे परे रहनेवाले, सभीके आश्रय, प्राणियोंको आनन्द देनेवाले, ज्योतिःस्वरूप, अविनाशी, प्रधान एवं पुरुषसे अतीत, आकाशरूप, अग्नि एवं शिवरूप, वस्तुमात्रके अस्तित्वके अधिष्ठाता, ब्रह्मरूपी ईश्वर, अनादि, अद्वैत, आनन्दादि गुणोंके निधान, महान्, पुरुष, परम ब्रह्म, सत्य, शाश्वत, सित (शुक्ल), तदितर (कृष्ण) एवं अरुणवर्णवाले अर्थात् सत्त्व, रज, तमोरूप त्रिगुणात्मक, विश्वरूपी महेश्वरका ध्यान करना चाहिये। ओंकारका उच्चारणकर आत्माको प्रणवके परम तात्पर्यरूप परमात्मामें प्रतिष्ठितकर आकाशके मध्यमें स्थित रहनेवाले ईशानदेवका (हृदयरूपी) आकाशमें ध्यान करना चाहिये॥ ११-१५॥<br><br>सभी भावोंके कारणरूप, आनन्दके एकमात्र आश्रयस्वरूप पुराण-पुरुष शम्भुका ध्यान करनेसे बन्धनसे मुक्ति हो जाती है। अथवा संसारके सम्मोहनालयरूप मूलप्रकृतिरूपी गुहामें परम व्योमरूप सभी भूतोंके एकमात्र कारण, सभी प्राणियोंके जीवनरूप और संसारके विलय-स्थान, ब्रह्मानन्द-स्वरूप तथा मुमुक्षु लोग जिनका सूक्ष्मरूपसे दर्शन करते हैं, उनका (परम व्योम विराट् ब्रह्मका) ध्यानकर उनके मध्यमें स्थित शुद्ध ज्ञानस्वरूप अनन्त, सत्य एवं ईशानरूप ब्रह्मका चिन्तन करते हुए संयत होकर स्थित रहना चाहिये॥ १६-१९॥ |
४०० * कूर्मपुराण *
| गुह्याद् गुह्यतमं ज्ञानं यतीनामेतदीरितम्।<br>योऽनुतिष्ठेन्महेशेन सोऽश्नुते योगमैश्वरम् ॥ २० ॥ | यतियोंका यह गुह्यसे भी गुह्यतम ज्ञान महेशने बतलाया है। जो इसका अनुष्ठान करता है, वह ऐश्वर्ययोगको प्राप्त करता है॥ २०॥ |
| तस्माद् ध्यानरतो नित्यमात्मविद्यापरायणः।<br>ज्ञानं समभ्यसेद् ब्राह्मं येन मुच्येत बन्धनात् ॥ २१ ॥<br><br>मत्वा पृथक् स्वमात्मानं सर्वस्मादेव केवलम्।<br>आनन्दमजरं ज्ञानं ध्यायीत च पुनः परम् ॥ २२ ॥<br><br>यस्माद् भवन्ति भूतानि यद् गत्वा नेह जायते।<br>स तस्मादीश्वरो देवः परस्माद् योऽधितिष्ठति ॥ २३ ॥<br><br>यदन्तरे तद् गगनं शाश्वतं शिवमव्ययम्।<br>यदंशस्तत्परो यस्तु स देवः स्यान्महेश्वरः ॥ २४॥<br><br>व्रतानि यानि भिक्षूणां तथैवोपाव्रतानि च।<br>एकैकातिक्रमे तेषां प्रायश्चित्तं विधीयते ॥ २५ ॥ | अतएव नित्य ध्यानमें निरत और आत्मविद्यापरायण होते हुए ब्रह्मज्ञानका अभ्यास करते रहना चाहिये। इसके कारण बन्धनसे मुक्ति होती है। अपनी आत्माको सबसे भिन्न (शाश्वत-नित्य) समझकर उसकी अद्वितीय, अजर, आनन्दरूप, श्रेष्ठ ज्ञानरूपताका पुनः-पुनः ध्यान करना चाहिये। जिनसे चर-अचर समस्त प्रपञ्चकी उत्पत्ति होती है, जिन्हें प्राप्तकर जन्म-मरणके बन्धनसे मुक्ति हो जाती है और इसी कारण जो ईश्वर हैं, देव हैं, सर्वोत्कृष्ट हैं, सबके अधिष्ठाता हैं, वे ही महेश्वर हैं। जिनके अन्तर्गत शाश्वत, शिव, अव्यय, गगन विद्यमान है, जगन्नियन्ता परमात्मा जिनके अंश हैं, वे ही देव महेश्वर हैं (इनका पुनः-पुनः ध्यान यतिको करना चाहिये)। भिक्षुओं (संन्यासियों)-के जो व्रत और उपव्रत हैं, उनमेंसे एक-एकका अतिक्रमण करनेपर प्रायश्चित्तका विधान किया गया है॥ २१-२५॥ |
| उपेत्य च स्त्रियं कामात् प्रायश्चित्तं समाहितः।<br>प्राणायामसमायुक्तं कुर्यात् सांतपनं शुचिः ॥ २६ ॥<br><br>ततश्चरेत नियमात् कृच्छ्रं संयतमानसः।<br>पुनराश्रममागम्य चरेद् भिक्षुरतन्द्रितः ॥ २७॥ | कामवश स्त्रीप्रसंग करनेपर समाहित होकर प्राणायाम कर पवित्रतापूर्वक प्रायश्चित्तके लिये सांतपन नामक व्रत करना चाहिये। तदनन्तर संयतमानस होकर नियमसे कृच्छ्र (चान्द्रायण)-व्रत करे। पुनः अपने आश्रममें आकर आलस्यका परित्याग कर भिक्षुको आश्रमोचित आचरण करना चाहिये॥ २६-२७॥ |
| न धर्मयुक्तमनृतं हिनस्तीति मनीषिणः।<br>तथापि च न कर्तव्यं प्रसंगो ह्येष दारुणः ॥ २८ ॥<br><br>एकरात्रोपवासश्च प्राणायामशतं तथा।<br>उक्त्वानृतं प्रकर्तव्यं यतिना धर्मलिप्सुना ॥ २९ ॥<br><br>परमापदगतेनापि न कार्यं स्तेयमन्यतः।<br>स्तेयादभ्यधिकः कश्चिन्नास्त्यधर्म इति स्मृतिः।<br>हिंसा चैषापरा दिष्टा या चात्मज्ञाननाशिका ॥ ३० ॥ | विद्वानोंका यह कहना है कि धर्मयुक्त असत्यसे व्रतभङ्ग नहीं होता, तथापि ऐसा नहीं करना चाहिये। क्योंकि इसमें आसक्ति रखना दारुण कर्म है। धर्माभिलाषी यतिको चाहिये कि वह असत्यभाषण करनेपर एक रात्रि उपवास तथा सौ प्राणायाम करे। अत्यन्त संकटमें होनेपर भी भिक्षुको किसी अन्य प्रयोजनसे भी चोरी नहीं करनी चाहिये। चोरीसे बढ़कर दूसरा कोई अधर्म नहीं है, यही सबसे बड़ी हिंसा भी है, क्योंकि इससे आत्मज्ञान विनष्ट हो जाता है, ऐसा स्मृतियोंका सिद्धान्त है॥ २८-३०॥ |
| यदेतद् द्रविणं नाम प्राणा ह्येते बहिश्चराः।<br>स तस्य हरति प्राणान् यो यस्य हरते धनम् ॥ ३१ ॥ | यह जो द्रविण-धन नामकी वस्तु है, यह बाहरी प्राण ही है, इसलिये जो जिसके धनका अपहरण करता है, वह उसके प्राणोंका ही हरण करता है॥ ३१ ॥ |
| * अध्याय २१ * | ४०१ |
|---|---|
| एवं कृत्वा स दुष्टात्मा भिन्नवृत्तो व्रताच्च्युतः।<br>भूयो निर्वेदमापन्नश्चरेच्चान्द्रायणव्रतम्॥ ३२॥<br><br>विधिना शास्त्रदृष्टेन संवत्सरमिति श्रुतिः।<br>भूयो निर्वेदमापन्नश्चरेद् भिक्षुरतन्द्रितः॥ ३३॥<br><br>अकस्मादेव हिंसां तु यदि भिक्षुः समाचरेत्।<br>कुर्यात् कृच्छ्रातिकृच्छ्रं तु चान्द्रायणमथापि वा॥ ३४॥<br><br>स्कन्देदिन्द्रियदौर्बल्यात् स्त्रियं दृष्ट्वा यतिर्यदि।<br>तेन धारयितव्या वै प्राणायामास्तु षोडश।<br>दिवास्कन्दे त्रिरात्रं स्यात् प्राणायामशतं तथा॥ ३५॥<br><br>एकान्ने मधुमांसे च नवश्राद्धे तथैव च।<br>प्रत्यक्षलवणे चोक्तं प्राजापत्यं विशोधनम्॥ ३६॥<br><br>ध्याननिष्ठस्य सततं नश्यते सर्वपातकम्।<br>तस्मान्महेश्वरं ज्ञात्वा तस्य ध्यानपरो भवेत्॥ ३७॥<br><br>यद् ब्रह्म परमं ज्योतिः प्रतिष्ठाक्षरमद्वयम्।<br>योऽन्तरात्र परं ब्रह्म स विज्ञेयो महेश्वरः॥ ३८॥<br><br>एष देवो महादेवः केवलः परमः शिवः।<br>तदेवाक्षरमद्वैतं तदादित्यान्तरं परम्॥ ३९॥<br><br>यस्मान्महीयते देवः स्वधाम्नि ज्ञानसंज्ञिते।<br>आत्मयोगाह्वये तत्त्वे महादेवस्ततः स्मृतः॥ ४०॥<br><br>नान्यद् देवान्महादेवाद् व्यतिरिक्तं प्रपश्यति।<br>तमेवात्मानमन्वेति यः स याति परं पदम्॥ ४१॥<br><br>मन्यन्ते ये स्वमात्मानं विभिन्नं परमेश्वरात्।<br>न ते पश्यन्ति तं देवं वृथा तेषां परिश्रमः॥ ४२॥<br><br>एकमेव परं ब्रह्म विज्ञेयं तत्त्वमव्ययम्।<br>स देवस्तु महादेवो नैतद् विज्ञाय बध्यते॥ ४३॥<br><br>तस्माद् यतेत नियतं यतिः संयतमानसः।<br>ज्ञानयोगरतः शान्तो महादेवपरायणः॥ ४४॥ | निश्चित ही धन हरण करनेवाला दुष्टात्मा आचारसे भ्रष्ट और व्रतसे च्युत हो जाता है। श्रुतिका विधान है कि यदि कोई अपने व्रतसे च्युत व्यक्ति अपने पुनः व्रतभङ्गपर पश्चात्ताप करे तो शास्त्रानुकूल विधिसे आलस्य-रहित होकर एक वर्षतक चान्द्रायणव्रत करे॥ ३२-३३॥<br><br>यदि भिक्षुसे अकस्मात् हिंसा हो जाय तो उसे पश्चात्तापपूर्वक कृच्छ्रव्रत, अतिकृच्छ्रव्रत अथवा चान्द्रायण-व्रत (हिंसाके स्वरूपके अनुसार) करना चाहिये। इन्द्रियकी दुर्बलताके कारण यदि स्त्रीको देखकर यति स्खलित हो जाय तो उसे सोलह प्राणायाम करना चाहिये। दिनमें स्खलन होनेपर तीन रातका उपवास और सौ प्राणायाम करना चाहिये॥ ३४-३५॥<br><br>एकका ही अन्न भक्षण करने, मधु ग्रहण करने, नवश्राद्ध-सम्बन्धी अन्न तथा प्रत्यक्ष लवण खानेपर प्राजापत्यव्रतको (पापकी) शुद्धिका उपाय बतलाया गया है। निरन्तर ध्याननिष्ठ पुरुषके सभी पातक नष्ट हो जाते हैं, इसलिये महेश्वरका ज्ञान प्राप्तकर उनके ध्यानमें परायण रहना चाहिये। जो ब्रह्म परम ज्योतिरूप, सभीका अधिष्ठान, अक्षर अद्वितीय है तथा जो सभीके भीतर स्थित है, परम ब्रह्म है, उसे महेश्वर जानना चाहिये। ये ही महेश्वर देव, महादेव एवं अद्वितीय परम शिव हैं। ये ही अविनाशी, अद्वैत हैं और ये ही आदित्यके भीतर प्रतिष्ठित परम (तत्त्व) हैं। आत्मयोग नामसे प्रसिद्ध, स्वप्रकाश, नित्य-ज्ञान नामसे भी विख्यात, परम तत्त्वरूप अपने धाममें सर्वाधिक पूजनीय-रूपसे ये महेश्वर प्रतिष्ठित हैं, इसीलिये महादेव कहे जाते हैं॥ ३६-४०॥<br><br>जो महादेवसे भिन्न किसी दूसरे देवको नहीं जानता और इन्हींको अपनी आत्मा मानता है, वह परम पदको प्राप्त होता है। जो अपनी आत्माको परमेश्वरसे भिन्न मानते हैं, वे उस देवका दर्शन नहीं करते हैं, उनका परिश्रम व्यर्थ होता है॥ ४१-४२॥<br><br>परम ब्रह्म एक ही हैं, इन्हें ही अव्यय तत्त्वके रूपमें जानना चाहिये। ये अव्यय तत्त्व ब्रह्म ही देव हैं, महादेव हैं, इन्हें जान लेनेपर बन्धन नहीं होता। इसलिये यतिको संयतमन होकर (इन्हें प्राप्त करनेके लिये) प्रयत्न करना चाहिये। ज्ञानयोगमें रत रहना चाहिये, शान्त रहना चाहिये और महादेवके परायण रहना चाहिये॥ ४३-४४॥ |
४०२ * कूर्मपुराण *
एष वः कथितो विप्रा यतीनामाश्रमः शुभः।
पितामहेन विभुना मुनीनां पूर्वमीरितम्॥ ४५॥
नापुत्रशिष्ययोगिभ्यो दद्यादिदमनुत्तमम्।
ज्ञानं स्वयम्भुवा प्रोक्तं यतिधर्माश्रयं शिवम्॥ ४६॥
इति यतिनियमानामेतदुक्तं विधानं
पशुपतिपरितोषे यद् भवेदेकहेतुः।
न भवति पुनरेषामुद्भवो वा विनाशः
प्रणिहितमनसो ये नित्यमेवाचरन्ति॥ ४७॥
हे विप्रो! यह आप लोगोंको संन्यासियोंके कल्याणकारी आश्रम (संन्यासाश्रम)-के विषयमें बतलाया। पूर्वकालमें पितामह विभुने मुनियोंसे इसे कहा था। ब्रह्माजीद्वारा कहे गये यतिधर्मविषयक इस कल्याणकारी उत्तम ज्ञानको पुत्र, शिष्य तथा योगियोंके अतिरिक्त अन्य किसीको नहीं देना चाहिये॥ ४५-४६॥
इस प्रकार संन्यासियोंके नियमोंके इस विधानको बतलाया गया। यह पशुपति (शंकर)-को संतुष्ट करनेका एकमात्र उपाय है। जो अव्यग्रभावसे एकाग्रतापूर्वक इसका नित्य आचरण करते हैं, उनका पुनः जन्म अथवा मरण कुछ भी नहीं होता अर्थात् वे मुक्त हो जाते हैं॥ ४७॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्सहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे एकोनत्रिंशोऽध्यायः॥ २९॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें उनतीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ २९॥
तीसवाँ अध्याय
प्रायश्चित्त-प्रकरणमें प्रायश्चित्तका स्वरूपनिरूपण, पाँच महापातकोंके नाम तथा ब्रह्महत्याके प्रायश्चित्तका संक्षिप्त निरूपण
व्यास उवाच
अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रायश्चित्तविधिं शुभम्।
हिताय सर्वविप्राणां दोषाणामपनुत्तये॥ १॥
अकृत्वा विहितं कर्म कृत्वा निन्दितमेव च।
दोषमाप्नोति पुरुषः प्रायश्चित्तं विशोधनम्॥ २॥
प्रायश्चित्तमकृत्वा तु न तिष्ठेद् ब्राह्मणः क्वचित्।
यद् ब्रूयुर्ब्राह्मणाः शान्ता विद्वांसस्तत्समाचरेत्॥ ३॥
वेदार्थवित्तमः शान्तो धर्मकामोऽग्रिमन् द्विजः।
स एव स्यात् परो धर्मो यमेकोऽपि व्यवस्यति॥ ४॥
अनाहिताग्नयो विप्रास्त्रयो वेदार्थपारगाः।
यद् ब्रूयुर्धर्मकामास्ते तज्ज्ञेयं धर्मसाधनम्॥ ५॥
अनेकधर्मशास्त्रज्ञा ऊहापोहविशारदाः।
वेदाध्ययनसम्पन्नाः सप्तैते परिकीर्तिताः॥ ६॥
**व्यासजीने कहा—**इसके अनन्तर अब मैं सभी ब्राह्मणोंके कल्याणके लिये और दोषोंके विनाशके लिये शुभ प्रायश्चित्त-विधिका वर्णन करूँगा॥ १॥
विहित कर्मोंको न करने और निन्दित कर्मोंको करनेसे पुरुष दोष (पाप)-का भागी होता है। इसकी निवृत्ति प्रायश्चित्त करनेसे होती है। ब्राह्मणको बिना प्रायश्चित्त किये कभी भी नहीं रहना चाहिये। शान्त एवं विद्वान् ब्राह्मण जो कहें, उसे करना चाहिये। वेदार्थज्ञानियोंमें श्रेष्ठ, शान्त, धर्मपालनको ही सर्वस्व माननेवाला एक भी अग्निहोत्री ब्राह्मण जो अपने आचरणमें लाता है, वही श्रेष्ठ धर्म होता है। वेदार्थमें पारंगत, धर्मपरायण अनाहिताग्नि* तीन ब्राह्मण जो कहें, उसे धर्मका साधन समझना चाहिये॥ २–५॥
अनेक धर्मशास्त्रोंके ज्ञाता, ऊहापोहमें दक्ष (शास्त्रीय विभिन्न सिद्धान्तोंके आकलन तथा समन्वयमें कुशल) तथा वेदाध्ययनशील सात ब्राह्मण धर्ममें प्रमाण कहे गये हैं॥ ६॥
* स्मार्त अग्निहोत्र करनेवाले भी अनाहिताग्नि होते हैं। श्रौत अग्निहोत्र करनेवाले ही आहिताग्नि कहे जाते हैं।
- अध्याय ३० * | ४०३ ---|--- मीमांसाज्ञानतत्त्वज्ञा वेदान्तकुशला द्विजाः।<br>एकविंशतिसंख्याताः प्रायश्चित्तं वदन्ति वै ॥ ७ ॥ | मीमांसाज्ञानके तत्त्वज्ञ (वेदवाक्यार्थ-विचार एवं श्रौत-स्मार्त-कर्मकाण्डके रहस्यको जाननेवाले) तथा वेदान्तके ज्ञानमें कुशल (पारमार्थिक तत्त्व अद्वैतके रहस्यवेत्ता) संख्यामें इक्कीस ब्राह्मण प्रायश्चित्तका विधान कर सकते हैं॥ ७॥ ब्रह्महा मद्यपः स्तेनो गुरुतल्पग एव च।<br>महापातकिनस्त्वेते यश्चैतैः सह संवसेत् ॥ ८ ॥<br><br>संवत्सरं तु पतितैः संसर्गं कुरुते तु यः।<br>यानशय्यासनैर्नित्यं जानन् वै पतितो भवेत् ॥ ९ ॥<br><br>याजनं योनिसम्बन्धं तथैवाध्यापनं द्विजः।<br>कृत्वा सद्यः पतेज्ज्ञानात् सह भोजनमेव च ॥ १० ॥<br>अविज्ञायाथ यो मोहात् कुर्यादध्यापनं द्विजः।<br>संवत्सरेण पतति सहाध्ययनमेव च ॥ ११ ॥ | ब्रह्मघाती, मद्यपायी, चोर, गुरुतल्पगामी तथा इनके साथ निवास करनेवाले—(ये सभी) महापातकी होते हैं। जो एक वर्षपर्यन्त नित्य सब कुछ जानते हुए भी पतितोंके साथ यान (सवारी), शय्या तथा आसन-सम्बन्धी संसर्ग करता है, वह पतित हो जाता है। जानते हुए भी (पतितोंका) यज्ञ कराने, अध्यापन करने, उनके साथ योनि अर्थात् विवाह आदिका सम्बन्ध रखने और भोजन करनेसे द्विज शीघ्र ही पतित हो जाता है॥ ८—१०॥<br>जो द्विज अज्ञानमें मोहवश इनके साथ अध्ययन अथवा अध्यापन करता है, वह एक वर्षमें पतित हो जाता है। आत्मशुद्धिके लिये ब्रह्मघातीको बारह वर्षोतक कुटी बनाकर वनमें रहना चाहिये और शवके सिरको ध्वजाके समान धारणकर भिक्षा माँगनी चाहिये। (ब्रह्मघातीको) ब्राह्मणोंके निवासस्थानों तथा देवमन्दिरोंमें नहीं जाना चाहिये और स्वयं अपनी आत्माकी निन्दा करते हुए तथा जिस ब्राह्मणको मारा है, उसका स्मरण करते हुए पहलेसे असंकल्पित (अनिश्चित), धूएँसे रहित, शान्त अग्निवाले तथा जहाँ लोगोंने भोजन कर लिया है—ऐसे सात घरोंसे नित्य धीरे-धीरे भिक्षा माँगनी चाहिये। उसे मनुष्योंको अपना दोष (पाप) बताते हुए एक समय भिक्षा माँगनी चाहिये अथवा धैर्य रखते हुए वन्य मूल-फलोंद्वारा निर्वाह करना चाहिये॥ ११—१५॥ ब्रह्महा द्वादशाब्दानि कुटि कृत्वा वने वसेत्।<br>भैक्षमात्मविशुद्ध्यर्थं कृत्वा शवशिरोध्वजम्॥ १२ ॥<br><br>ब्राह्मणावसथान् सर्वान् देवागाराणि वर्जयेत्।<br>विनिन्दन् स्वयमात्मानं ब्राह्मणं तं च संस्मरन् ॥ १३ ॥<br><br>असंकल्पितयोग्यानि सप्तागाराणि संविशेत्।<br>विधूमे शनकैर्नित्यं व्यङ्गारे भुक्तवज्जने ॥ १४ ॥<br><br>एककालं चरेद् भैक्षं दोषं विख्यापयन् नृणाम्।<br>वन्यमूलफलैर्वापि वर्तयेद् धैर्यमाश्रितः ॥ १५ ॥ | कपालपाणिः खट्वाङ्गी ब्रह्मचर्यपरायणः।<br>पूर्णे तु द्वादशे वर्षे ब्रह्महत्यां व्यपोहति ॥ १६ ॥ | हाथमें कपाल लिये हुए और खट्वाङ्ग (चारपाईके टुकड़ेको) धारणकर ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए बारह वर्ष व्यतीत हो जानेपर ब्रह्महत्या दूर होती है। अनिच्छापूर्वक किये गये पापका यह प्रायश्चित्त है, इससे कल्याण होता है, किंतु इच्छापूर्वक किये गये पापसे शुद्धि अनेक प्रायश्चित्तके बाद मृत्युके अनन्तर ही समझनी चाहिये। इसके अतिरिक्त अन्य किसी उपायसे नहीं ॥ १६-१७॥ अकामतः कृते पापे प्रायश्चित्तमिदं शुभम्।<br>कामतो मरणाच्छुद्धिर्ज्ञेया नान्येन केनचित् ॥ १७ ॥ |
४०४ * कूर्मपुराण *
कुर्यादनशनं वाथ भृगोः पतनमेव वा।
ज्वलन्तं वा विशेदग्निं जलं वा प्रविशेत् स्वयम्॥ १८॥
ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा सम्यक् प्राणान् परित्यजेत्।
ब्रह्महत्यापनोदार्थमन्तरा वा मृतस्य तु॥ १९॥
दीर्घामयान्वितं विप्रं कृत्वानामयमेव तु।
दत्त्वा चान्नं स दुर्भिक्षे ब्रह्महत्यां व्यपोहति॥ २०॥
अश्वमेधावभृथके स्नात्वा वा शुध्यते द्विजः।
सर्वस्वं वा वेदविदे ब्राह्मणाय प्रदाय तु॥ २१॥
सरस्वत्यास्त्वरुणाया संगमे लोकविश्रुते।
शुद्ध्येत् त्रिषवणस्नानात् त्रिरात्रोपोषितो द्विजः॥ २२॥
गत्वा रामेश्वरं पुण्यं स्नात्वा चैव महोदधौ।
ब्रह्मचर्यादिभिर्युक्तो दृष्ट्वा रुद्रं विमुच्यते॥ २३॥
कपालमोचनं नाम तीर्थं देवस्य शूलिनः।
स्नात्वाभ्यर्च्य पितॄन् भक्त्या ब्रह्महत्यां व्यपोहति॥ २४॥
यत्र देवादिदेवेन भैरवेणामितौजसा।
कपालं स्थापितं पूर्वं ब्रह्मणः परमेष्ठिनः॥ २५॥
समभ्यर्च्य महादेवं तत्र भैरवरूपिणम्।
तर्पयित्वा पितॄन् स्नात्वा मुच्यते ब्रह्महत्यया॥ २६॥
अथवा (ब्रह्मघातीको) स्वयं अनशन (व्रत) करना चाहिये या भृगु-पतन करे (उच्च स्थानसे गिरे) अथवा प्रज्वलित अग्नि या जलमें प्रविष्ट हो जाय। दूसरे प्रकारसे अर्थात् बुद्धिपूर्वक ब्राह्मणहत्या करनेपर ब्रह्म-हत्या दूर करनेके लिये, ब्राह्मण अथवा गौके निमित्त भलीभाँति अपने प्राणोंका परित्याग कर देना चाहिये। दीर्घ रोगसे ग्रस्त ब्राह्मणको रोगसे मुक्त करने तथा दुर्भिक्षके समय अन्न प्रदान करनेसे ब्रह्महत्या दूर होती है॥ १८–२०॥
अश्वमेध-यज्ञकी समाप्तिपर होनेवाले अवभृथ-स्नानसे अथवा वेदज्ञ ब्राह्मणको अपना सर्वस्व दान कर देनेसे द्विज (ब्रह्महत्याके पापसे) मुक्त हो जाता है। सरस्वती एवं अरुणा नदीके लोकप्रसिद्ध संगममें तीनों संध्याओंमें स्नान करने और तीन रात्रि उपवास करनेसे द्विज (ब्रह्महत्याजनित पापसे) शुद्ध हो जाता है॥ २१-२२॥
ब्रह्मचर्य आदिसे युक्त द्विज पवित्र (तीर्थ) रामेश्वर जाकर वहाँ सागरमें स्नान करके शंकरका दर्शन करके (ब्रह्महत्याके पापसे) मुक्त हो जाता है। त्रिशूलधारी भगवान् शंकरके कपालमोचन नामक तीर्थमें स्नान करके भक्तिपूर्वक पितरोंकी पूजा करनेसे (ब्रह्मघाती) ब्रह्महत्याके पापसे दूर हो जाता है। पूर्वकालमें वहाँ (कपालमोचन तीर्थमें) अमित तेजस्वी देवादिदेव भैरवने परमेष्ठी ब्रह्माके कपालको स्थापित किया। वहाँ स्नान करके भैरवरूपी महादेवकी भलीभाँति अर्चना करके एवं पितरोंका तर्पण करके ब्रह्महत्या (-के पाप)-से मुक्ति हो जाती है॥ २३–२६॥
इति श्रीकूर्मपुराणे षत्साहस्र्यां संहितायामुपरिविभागे त्रिंशोऽध्यायः॥ ३०॥
इस प्रकार छः हजार श्लोकोंवाली श्रीकूर्मपुराणसंहिताके उपरिविभागमें तीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ३०॥
- अध्याय ३१ * | ४०५
इकतीसवाँ अध्याय
प्रायश्चित्त-प्रकरणमें कपालमोचन-तीर्थका आख्यान
| ऋषय ऊचुः<br>कथं देवेन रुद्रेण शंकरेणामितौजसा।<br>कपालं ब्रह्मणः पूर्वं स्थापितं देहजं भुवि॥ १ ॥<br><br>सूत उवाच<br>शृणुध्वमृषयः पुण्यां कथां पापप्रणाशिनीम्।<br>माहात्म्यं देवदेवस्य महादेवस्य धीमतः॥ २ ॥<br><br>पुरा पितामहं देवं मेरुशृङ्गे महर्षयः।<br>प्रोचुः प्रणम्य लोकादिं किमेकं तत्त्वमव्ययम्॥ ३ ॥<br><br>स मायया महेशस्य मोहितो लोकसम्भवः।<br>अविज्ञाय परं भावं स्वात्मानं प्राह दर्षिणम्॥ ४ ॥<br><br>अहं धाता जगद्योनिः स्वयम्भूरेक ईश्वरः।<br>अनादिमत्परं ब्रह्म मामभ्यर्च्य विमुच्यते॥ ५ ॥<br><br>अहं हि सर्वदेवानां प्रवर्तकनिवर्तकः।<br>न विद्यते चाभ्यधिको मत्तो लोकेषु कश्चन॥ ६ ॥<br><br>तस्यैवं मन्यमानस्य जज्ञे नारायणांशजः।<br>प्रोवाच प्रहसन् वाक्यं रोषताम्रविलोचनः॥ ७ ॥<br><br>किं कारणमिदं ब्रह्मन् वर्तते तव साम्प्रतम्।<br>अज्ञानयोगयुक्तस्य न त्वेतदुचितं तव॥ ८ ॥<br><br>अहं धाता हि लोकानां यज्ञो नारायणः प्रभुः।<br>न मामृतेऽस्य जगतो जीवनं सर्वदा क्वचित्॥ ९ ॥<br><br>अहमेव परं ज्योतिरहमेव परा गतिः।<br>मत्प्रेरितेन भवता सृष्टं भुवनमण्डलम्॥ १०॥<br><br>एवं विवदतोर्मोहात् परस्परजयैषिणोः।<br>आजग्मुर्यत्र तौ देवौ वेदाश्चत्वार एव हि॥ ११॥<br><br>अन्वीक्ष्य देवं ब्रह्माणं यज्ञात्मानं च संस्थितम्।<br>प्रोचुः संविग्नहृदया याथात्म्यं परमेष्ठिनः॥ १२॥ | ऋषियोंने पूछा— अमित तेजस्वी देव शंकर रुद्रने पूर्वकालमें किस प्रकार ब्रह्माजीके शरीरसे उत्पन्न कपालको पृथ्वीपर स्थापित किया?॥ १॥<br><br>सूतजी बोले— ऋषियो! आप लोग पापको नष्ट करनेवाली इस पुण्य कथा एवं धीमान् देवाधिदेव महादेवके माहात्म्यको सुनें—॥ २॥<br><br>प्राचीन कालमें मेरुशृंगपर लोकोंके मूल कारण देव पितामहको प्रणाम कर महर्षियोंने उनसे पूछा—अव्यय अद्वितीय तत्त्व क्या है? महेश्वरकी मायासे मोहित, लोकोंको उत्पन्न करनेवाले उन ब्रह्माने (महर्षियोंके) परम भावको न जानते हुए अभिमानपूर्वक स्वयंको ही (अव्यय) तत्त्व बतलाया (और कहा—) मैं ही जगत्का मूल कारण, धाता, स्वयम्भू तथा अद्वितीय अनादि परम ब्रह्म ईश्वर हूँ। मेरी आराधना करनेसे मुक्ति हो जाती है। मैं ही सभी देवोंका प्रवर्तक तथा निवर्तक हूँ। लोकोंमें मुझसे महान् और कोई नहीं है॥ ३—६॥<br><br>(पितामह अहंभावपूर्वक) ऐसा कह ही रहे थे कि नारायणके अंशसे उत्पन्न यज्ञभगवान्ने क्रोधसे आरक्तनेत्र होकर परिहास करते हुए यह वाक्य कहा—ब्रह्मन्! सम्प्रति आपके ऐसे व्यवहारका क्या कारण है? आप अज्ञानसे युक्त हैं, आपके लिये यह उचित नहीं है। मैं लोकोंका धाता यज्ञरूप नारायण प्रभु हूँ, मेरे बिना इस संसारमें जीवन कभी भी नहीं रह सकता। मैं ही परम ज्योति हूँ, मैं ही परम गति हूँ, मेरे द्वारा प्रेरणा प्राप्तकर आपने इस भुवनमण्डलकी रचना की है॥ ७—१०॥<br><br>परस्पर विजयके अभिलाषी उन दोनोंके मोहपूर्वक इस प्रकार विवाद करते समय ही जहाँ वे दोनों देव (पितामह एवं यज्ञभगवान्) थे, वहीं चारों वेद (मूर्तिमान् होकर) आ गये। देव ब्रह्मा तथा यज्ञात्मा विष्णुको स्थित देखकर संविग्नहृदय होकर उन्होंने ब्रह्मासे यथार्थ तत्त्व कहा— ॥ ११-१२॥ |
| ४०६ | * कूर्मपुराण * |
|---|
| ऋग्वेद उवाच | (मूर्तिमान्) ऋग्वेदने कहा—जिसके भीतर सभी प्राणी प्रतिष्ठित हैं, जिससे सभीकी प्रवृत्ति होती है और जिसे परम तत्त्व कहा गया है, उन्हें ही महेश्वर देव समझना चाहिये ॥ १३ ॥ |
| यस्यान्तःस्थानि भूतानि यस्मात् सर्वं प्रवर्त्तते ।<br>यदाहुस्तत्परं तत्त्वं स देवः स्यान्महेश्वरः ॥ १३ ॥ | |
| यजुर्वेद उवाच | यजुर्वेदने कहा—जो ईश सभी यज्ञों तथा योगके द्वारा अर्चित होते हैं और जिन देवको ईश्वर कहा गया है, वे देव ही पिनाक धारण करनेवाले (शंकर) हैं॥ १४॥ |
| यो यज्ञैरखिलैरीशो योगेन च समर्च्यते ।<br>यमाहुरीश्वरं देवं स देवः स्यात् पिनाकधृक् ॥ १४ ॥ | |
| सामवेद उवाच | सामवेदने कहा—जिसके द्वारा अनन्त ब्रह्माण्डरूपी चक्र प्रवर्तित है, जो (निरतिशय आकाशस्वरूप) आकाशके मध्य प्रतिष्ठित है, शिवस्वरूप है, योगियोंके द्वारा वेद्य है, वह परम तत्त्व ही शंकर हैं, महादेव हैं ॥ १५॥ |
| येनेदं भ्राम्यते चक्रं यदाकाशान्तरं शिवम्।<br>योगिभिर्विद्यते तत्त्वं महादेवः स शंकरः ॥ १५ ॥ | |
| अथर्ववेद उवाच | अथर्ववेदने कहा—यति लोग प्रयत्नपूर्वक जिन परम योगेश्वर महेशका दर्शन करते हैं, वे पुरुष रुद्र ही देव भगवान् भव हैं ॥ १६ ॥ |
| यं प्रपश्यन्ति योगेशं यजन्तो यतयः परम्।<br>महेशं पुरुषं रुद्रं स देवो भगवान् भवः ॥ १६ ॥ | |
| एवं स भगवान् ब्रह्मा वेदानामीरितं शुभम्।<br>श्रुत्वाह प्रहसन् वाक्यं विश्वात्मापि विमोहितः ॥ १७ ॥ | इस प्रकार विश्वात्मा होनेपर भी वे भगवान् ब्रह्मा मोहित होनेके कारण वेदोंके द्वारा बनाये गये कल्याणकारी तत्त्वको सुननेपर भी हँसते हुए कहने लगे—जब वे परम ब्रह्म महेश सभी आसक्तियोंसे रहित हैं तो कैसे अपनी भार्याके साथ रमण करते हैं तथा अतिगर्वित अपने प्रमथगणोंके साथ सुख-सुविधाओंका भोग करते हैं ? ॥ १७-१८ ॥ |
| कथं तत्परमं ब्रह्म सर्वसंगविवर्जितम्।<br>रमते भार्यया सार्धं प्रमथैश्चातिगर्वितैः ॥ १८ ॥ | |
| इतीरितेऽथ भगवान् प्रणवात्मा सनातनः।<br>अमूर्तो मूर्तिमान् भूत्वा वचः प्राह पितामहम् ॥ १९ ॥ | ऐसा कहे जानेपर सनातन, अमूर्त भगवान् प्रणवने मूर्तिमान् होकर पितामहसे कहा— ॥ १९ ॥ |
| प्रणव उवाच | प्रणव बोले—ये वे महेश्वर हैं, जो स्वात्माराम हैं। ये अपनी आत्मामें ही रमण करते हैं। इनकी आत्मा ही इनकी पत्नी हैं। यही वे भगवान् ईश स्वयंज्योति, सनातन हैं और देवी शिवा आत्मानन्द-स्वरूपिणी कही गयी हैं, वे आगन्तुक (देवी उन भगवान्से पृथक्) नहीं हैं॥ २०-२१ ॥ |
| न ह्येष भगवान् पत्न्या स्वात्मनो व्यतिरिक्तया।<br>कदाचिद् रमते रुद्रस्तादृशो हि महेश्वरः ॥ २० ॥ | |
| अयं स भगवानीशः स्वयंज्योतिः सनातनः।<br>स्वानन्दभूता कथिता देवी नागन्तुका शिवा ॥ २१ ॥ | |
| इत्येवमुक्तेऽपि तदा यज्ञमूर्तेरजस्य च।<br>नाज्ञानमगमन्नाशमीश्वरस्यैव मायया ॥ २२ ॥ | इस प्रकार कहे जानेपर भी उस समय ईश्वरकी ही मायासे (मोहित) यज्ञमूर्ति भगवान् तथा ब्रह्माका अज्ञान नष्ट नहीं हुआ। इसी बीच विश्वभावन ब्रह्माने आकाशमध्यको व्याप्त करते हुए अद्भुत एवं दिव्य महाज्योतिका दर्शन किया। द्विजोत्तमो ! उस (महाज्योति)-के मध्य स्थित तेजसे उज्ज्वल दिव्य निर्मल मण्डल आकाशके मध्यमें प्रकट हुआ ॥ २२–२४ ॥ |
| तदन्तरे महाज्योतिर्विरिञ्चो विश्वभावनः।<br>प्रापश्यदद्भुतं दिव्यं पूरयन् गगनान्तरम् ॥ २३ ॥ | |
| तन्मध्यसंस्थं विमलं मण्डलं तेजसोज्ज्वलम्।<br>व्योममध्यगतं दिव्यं प्रादुरासीद् द्विजोत्तमाः ॥ २४ ॥ |
| * अध्याय ३१ * | ४०७ |
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| स दृष्ट्वा वदनं दिव्यं मूर्ध्नि लोकपितामहः।<br>तेन तन्मण्डलं घोरमालोकयदनिन्दितम्॥ २५॥ | वह अनिन्दित मण्डल दिव्य था और तेजोमय होनेके कारण घोर (भीषण) था तथा मूर्धापर (सबसे ऊपर) स्थित था। उसे देखकर ब्रह्माने अपने मुखको, सबसे ऊपर विद्यमान उस मण्डलके आलोकसे आलोकित किया;॥ २५॥ |
| प्रजज्वालातिकोपेन ब्रह्मणः पञ्चमं शिरः।<br>क्षणाददृश्यत महान् पुरुषो नीललोहितः॥ २६॥ | पर उसी समय अज्ञानवश अति कुपित ब्रह्माके ही अति कोपसे उन (ब्रह्मा)-का पाँचवाँ सिर जलने लगा। उसी क्षण भगवान् नीललोहित रुद्र (महेश्वरके गणके देवविशेष) प्रकट हुए। वे रुद्रदेव त्रिशूल धारण किये हुए थे, पिङ्गलवर्णके थे तथा सर्पका यज्ञोपवीत धारण किये हुए थे। उन नीललोहित शंकर रुद्रसे भगवान् ब्रह्माने कहा—हे महेशान! आपका मेरे ही ललाटसे सर्वप्रथम प्रादुर्भाव हुआ था, यह मैं जानता हूँ। आप मेरी शरणमें आयें॥ २६—२८॥ |
| त्रिशूलपिङ्गलो देवो नागयज्ञोपवीतवान्।<br>तं प्राह भगवान् ब्रह्मा शंकरं नीललोहितम्॥ २७॥ | |
| जानामि भवतः पूर्वं ललाटादेव शंकर।<br>प्रादुर्भावं महेशान मामेव शरणं व्रज॥ २८॥ | |
| श्रुत्वा सगर्ववचनं पद्मयोनेरथेश्वरः।<br>प्राहिणोत् पुरुषं कालं भैरवं लोकदाहकम्॥ २९॥<br>स कृत्वा सुमहद् युद्धं ब्रह्मणा कालभैरवः।<br>चकर्त तस्य वदनं विरिञ्चस्याथ पञ्चमम्॥ ३०॥ | तदनन्तर पद्मयोनिके गर्वयुक्त वचनको सुनकर ईश्वर (नीललोहित रुद्र)-ने लोकको जलानेवाले पुरुष कालभैरवको भेजा। उस कालभैरवने ब्रह्माके साथ महान् युद्ध किया और उन ब्रह्माके पाँचवें मुखको काटडाला॥ २९-३०॥ |
| निकृत्तवदनो देवो ब्रह्मा देवेन शम्भुना।<br>ममार चेशयोगेन जीवितं प्राप विश्वसृक्॥ ३१॥ | देव शम्भुकी प्रेरणासे कालभैरवद्वारा ब्रह्माका मस्तक काट दिये जानेपर उन देव ब्रह्माकी मृत्यु हो गयी, किंतु ईश्वरके योगसे पुनः वे विश्वस्रष्टा (ब्रह्मा) जीवित हो गये। |
| अथानुपश्यद् गिरिशं मण्डलान्तरसंस्थितम्।<br>समासीनं महादेव्या महादेवं सनातनम्॥ ३२॥ | तदनन्तर (ब्रह्माने) उस मण्डलके मध्यमें स्थित सनातन महादेव (गिरिश) महेश्वरको महादेवीके साथ विराजमान देखा। वे सर्पराजका कङ्कण पहने थे, चन्द्रमाके अवयवको (द्वितीयाके चन्द्रमाको) भूषणरूपमें धारण किये थे। करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान तथा जटाजूट धारण किये हुए थे। उन्होंने व्याघ्रचर्मका वस्त्र धारण किया था, दिव्य मालाओंसे समन्वित थे, हाथमें त्रिशूल धारण किये थे, कठिनतासे देखे जा सकने योग्य तथा भस्मसे सुशोभित ऐसे योगी (शंकर)-को उन्होंने देखा। योगनिष्ठ अपने हृदयके मध्य जिन ईश्वरका दर्शन करते हैं, उन ब्रह्मस्वरूप आदिदेव महादेवको (ब्रह्माने) देखा॥ ३१—३५॥ |
| भुजङ्गराजवलयं चन्द्रावयवभूषणम्।<br>कोटिसूर्यप्रतीकाशं जटाजूटविराजितम्॥ ३३॥ | |
| शार्दूलचर्मवसनं दिव्यमालासमन्वितम्।<br>त्रिशूलपाणिं दुष्प्रेक्ष्यं योगिनं भूतिभूषणम्॥ ३४॥ | |
| यमन्तरा योगनिष्ठाः प्रपश्यन्ति हृदीश्वरम्।<br>तमादिदेवं ब्रह्माणं महादेवं ददर्श ह॥ ३५॥ | |
| यस्य सा परमा देवी शक्तिराकाशसंस्थिता।<br>सोऽनन्तैश्वर्ययोगात्मा महेशो दृश्यते किल॥ ३६॥ | आकाशमें स्थित वे परमा देवी जिनकी शक्ति हैं, वे अनन्त ऐश्वर्यसम्पन्न योगात्मा महेश्वर मुझे दिखलायी पड़ रहे हैं। जिन्हें एक बार प्रणाम मात्र कर लेनेसे ही प्रणाम करनेवालेके सम्पूर्ण मोहको उत्पन्न करनेवाला संसारका बीज विलीन हो जाता है, वे रुद्र दिखलायी पड़ रहे हैं। वे लोकोंके नायक दिखलायी पड़ रहे हैं, जो उन लोगोंको भी मुक्त कर देते हैं जो आचारयुक्त न होनेपर भी केवल उनकी भक्ति करते हैं॥ ३६—३८॥ |
| यस्याशेषजगद् बीजं विलयं याति मोहनम्।<br>सकृत्प्रणाममात्रेण स रुद्रः खलु दृश्यते॥ ३७॥ | |
| योऽथ नाचारनिरतान् स्वभक्तानेव केवलम्।<br>विमोचयति लोकानां नायको दृश्यते किल॥ ३८॥ |