संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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३७६ * कूर्मपुराण *
| अवरश्चेद् वरं वर्णमवरं वा वरो यदि।<br>अशौचे संस्पृशेत् स्नेहात् तदाशौचेन शुध्यति॥ ५२॥ | स्नेहवश यदि हीनवर्णके व्यक्ति उच्च वर्णके शवका और उच्च वर्णके व्यक्ति हीनवर्णके शवका स्पर्श करते हैं तो वे उस मृतवर्णके निर्धारित अशौच (नियमपालन)-से शुद्ध होते हैं। यदि ब्राह्मण अपनी इच्छासे मरे हुए द्विजका अनुगमन करता है (शव-यात्रामें जाता है) तो वह वस्त्रसहित स्नानकर, अग्निका स्पर्श करके घृतका प्राशन करनेसे शुद्ध हो जाता है। (द्विजके शवका अनुगमन करनेपर) क्षत्रियकी शुद्धि एक दिनमें, वैश्यकी दो दिनमें, शूद्रकी तीन दिनोंमें कही गयी है। (अशौचके दिन बीतनेके बाद) सौ बार प्राणायाम (भी शुद्धिके लिये) करना चाहिये॥ ५२-५४॥ |
| प्रेतीभूतं द्विजं विप्रो योऽनुगच्छेत् कामतः।<br>स्नात्वा सचैलं स्पृष्ट्वाग्निं घृतं प्राश्य विशुध्यति॥ ५३॥ | |
| एकाहात् क्षत्रिये शुद्धिर्वैश्ये स्याच्च द्व्यहेन तु।<br>शूद्रे दिनत्रयं प्रोक्तं प्राणायामशतं पुनः॥ ५४॥ | |
| अनस्थिसंचिते शूद्रे रौति चेद् ब्राह्मणः स्वकैः।<br>त्रिरात्रं स्यात् तथाशौचमेकाहं त्वन्यथा स्मृतम्॥ ५५॥ | शूद्रके अस्थिसंचय होनेसे पहले यदि ब्राह्मण उसके स्वजनोंके साथ विलाप करता है तो उसे तीन रातका अशौच होता है, इसके विपरीत (अस्थि-संचयनतक प्रेतकर्म हो जानेके अनन्तर यदि शूद्रका मरण जानकर ब्राह्मण उसके बान्धवोंके साथ विलाप करता है, उनका स्पर्श करता है तो उसे) एक दिनका अशौच होता है। अस्थिसंचयके पूर्व (शूद्रके घर विलाप करनेवाले) क्षत्रिय एवं वैश्यको एक दिनका और अन्य अवस्थामें सज्ज्योति(काल)-तकका आशौच होता है। ब्राह्मणकी स्नानमात्रसे शुद्धि होती है। ब्राह्मणके अस्थिसंचयके पूर्व यदि (असपिण्ड, असगोत्र, सम्बन्धरहित) ब्राह्मण रोता है तो वस्त्रोंसहित स्नानमात्रसे उसकी शुद्धि हो जाती है, इसमें संदेह नहीं॥ ५५-५७॥ |
| अस्थिसंचयनादर्वागेकाहं क्षत्रवैश्ययोः।<br>अन्यथा चैव सज्ज्योतिर्ब्राह्मणे स्नानमेव तु॥ ५६॥ | |
| अनस्थिसंचिते विप्रे ब्राह्मणो रौति चेत् तदा।<br>स्नानेनैव भवेच्छुद्धिः सचैलेन न संशयः॥ ५७॥ | |
| यस्तैः सहाशनं कुर्याच्छयनादीनि चैव हि।<br>बान्धवो वापरो वापि स दशाहेन शुध्यति॥ ५८॥ | आशौचीजनोंके साथ जो भोजन तथा शयन आदि करता है, वह चाहे बान्धव हो या कोई दूसरा, दस दिनमें शुद्ध होता है। जो इच्छापूर्वक उनका एक बार भी अन्न ग्रहण करता है तो वह अशौच पूरा होनेपर स्नान करनेसे शुद्ध हो जाता है। दुर्भिक्षसे पीड़ित व्यक्ति जितने दिनतक उस (अशौची)-का अन्न ग्रहण करता है, उतने दिनोंतकका उसे अशौच होता है, तदनन्तर उसे प्रायश्चित्त करना चाहिये॥ ५८-६०॥ |
| यस्तेषामन्नमश्नाति सकृदेवापि कामतः।<br>तदाशौचे निवृत्तेऽसौ स्नानं कृत्वा विशुध्यति॥ ५९॥ | |
| यावत्तदन्नमश्नाति दुर्भिक्षोपहतो नरः।<br>तावन्त्यहान्यशौचं स्यात् प्रायश्चित्तं ततश्चरेत्॥ ६०॥ | |
| दाहाद्यशौचं कर्तव्यं द्विजानामग्निहोत्रिणाम्।<br>सपिण्डानां तु मरणे मरणादितरेषु च॥ ६१॥ | अग्निहोत्री द्विजोंका दाह-कालसे अशौच आरम्भ होता है, अतः (तभीसे इनके मरणके निमित्त) नियमका पालन करना चाहिये। सपिण्डोंके मरने तथा जन्ममें भी अशौचका पालन करना चाहिये। पुरुषकी सपिण्डता सातवीं पीढ़ीमें समाप्त हो जाती है। अपने वंशके मूल पुरुषका नाम ज्ञात न होनेपर समानोदकता नष्ट हो जाती है॥ ६१-६२॥ |
| सपिण्डता च पुरुषे सप्तमे विनिवर्तते।<br>समानोदकभावस्तु जन्मनाम्नोरवेदने॥ ६२॥ |