भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 385, कुल 506 में से

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पृष्ठ 385
  • अध्याय २३ * | ३७५ ---|--- राजन्यवैश्यावप्येवं हीनवर्णासु योनिषु।<br>स्वमेव शौचं कुर्यातां विशुद्ध्यर्थमसंशयम्॥ ४०॥ | क्षत्रिय और वैश्यको भी हीनवर्णकी स्त्रियोंसे उत्पन्न बान्धवोंकी मृत्यु होनेपर पूर्ण शुद्धिके लिये अपने वर्णके अनुसार विहित शौच-विधिका पालन करना चाहिये^१॥ ३९-४०॥ सर्वे तूत्तरवर्णानाशौचं कुर्युरादृताः।<br>तद्वर्णविधिदृष्टेन स्वं तु शौचं स्वयोनिषु॥ ४१॥ | सभी वर्णके व्यक्तियोंको उत्तर वर्णके लिये विहित अशौचका आदरपूर्वक पालन करना चाहिये। किंतु अपने वर्णकी स्त्रीसे उत्पन्न बन्धुकी मृत्यु होनेपर अपने ही वर्णके अनुसार अशौचका पालन करना चाहिये। षड्रात्रं वा त्रिरात्रं स्यादेकरात्रं क्रमेण हि।<br>वैश्यक्षत्रियविप्राणां शूद्रेष्वाशौचमेव तु॥ ४२॥ | शूद्र सपिण्डकी मृत्यु या जन्म होनेपर वैश्य, क्षत्रिय तथा ब्राह्मणोंको क्रमानुसार छः रात, तीन रात और एक रातका आशौच होता है। द्विजश्रेष्ठो! वैश्य सपिण्डके अर्धमासोऽथ षड्रात्रं त्रिरात्रं द्विजपुंगवाः।<br>शूद्रक्षत्रियविप्राणां वैश्येष्वाशौचमिष्यते॥ ४३॥ | जन्म या मृत्युपर शूद्र, क्षत्रिय और ब्राह्मणोंको क्रमशः आधे मास, छः रात तथा तीन रातका आशौच होता है। षड्रात्रं वै दशाहं च विप्राणां वैश्यशूद्रयोः।<br>अशौचं क्षत्रिये प्रोक्तं क्रमेण द्विजपुंगवाः॥ ४४॥ | द्विजश्रेष्ठो! क्षत्रिय सपिण्डके जन्म या मरणमें क्रमशः ब्राह्मणको छः दिन और वैश्य तथा शूद्रको दस दिनोंका अशौच होता है। ब्रह्माजीने कहा है कि ब्राह्मण शूद्रविट्क्षत्रियाणां तु ब्राह्मणे संस्थिते सति।<br>दशरात्रेण शुद्धिः स्यादित्याह कमलोद्भवः॥ ४५॥ | (सपिण्ड)-का (जन्म-मरण होनेपर) शूद्र, वैश्य तथा क्षत्रियकी शुद्धि दस रातमें होती है^२॥ ४१-४५॥ असपिण्डं द्विजं प्रेतं विप्रो निर्हृत्य बन्धुवत्।<br>अशित्वा च सहोषित्वा दशरात्रेण शुध्यति॥ ४६॥ | असपिण्ड द्विजकी मृत्यु होनेपर बन्धुवत् उसके प्रेतकर्ममें सम्मिलित होकर भोजन एवं निवास करनेवाला ब्राह्मण दस रातमें शुद्ध होता है। मृत व्यक्तिके यहाँ यद्यन्नमत्ति तेषां तु त्रिरात्रेण ततः शुचिः।<br>अनदन्नन्नमह्नैव न च तस्मिन् गृहे वसेत्॥ ४७॥ | भोजन करनेपर तीन रातमें शुद्धि होती है। अन्न न खानेवालेकी उसी दिन शुद्धि हो जाती है, परंतु उसके घरमें निवास नहीं करना चाहिये। सोदकेष्वेतदेव स्यान्मातुराप्तेषु बन्धुषु।<br>दशाहेन शवस्पर्शे सपिण्डश्चैव शुध्यति॥ ४८॥ | समानोदक तथा माताके श्रेष्ठ बान्धवोंके मरणमें शव वहन करनेवाला सपिण्ड व्यक्ति दस दिनोंमें शुद्ध होता है। यदि निर्हरति प्रेतं प्रलोभाक्रान्तमानसः।<br>दशाहेन द्विजः शुध्येद् द्वादशाहेन भूमिपः॥ ४९॥ | यदि कोई व्यक्ति लोभके वशीभूत हो शवको ढोता है तो वह यदि ब्राह्मण है तो दस दिनोंमें, क्षत्रिय है तो बारह दिनोंमें, वैश्य है तो आधे मासमें और शूद्र है तो एक अर्धमासेन वैश्यस्तु शूद्रो मासेन शुध्यति।<br>षड्रात्रेणाथवा सर्वे त्रिरात्रेणाथवा पुनः॥ ५०॥ | मासमें शुद्ध होता है अथवा सभी वर्णके व्यक्ति छः रात या तीन रातमें शुद्ध हो जाते हैं॥ ४६-५०॥ अनाथं चैव निर्हृत्य ब्राह्मणं धनवर्जितम्।<br>स्नात्वा सम्प्राश्य तु घृतं शुध्यन्ति ब्राह्मणादयः॥ ५१॥ | धनहीन अनाथ ब्राह्मणके शवका वहन आदि कर्म करनेवाले ब्राह्मणादि स्नान करके घृतका प्राशन करनेसे शुद्ध हो जाते हैं॥ ५१॥

१-यह अन्य युग-विषयक है। अपने वर्णसे इतर वर्णमें विवाह कलियुगमें सर्वथा निषिद्ध है।
२-यह अशौचकी व्यवस्था घनिष्ठ सम्पर्क, एक साथ रहने अथवा परस्पर उपकार्य-उपकारक-भाव रहनेपर है।

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