भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३७४* कूर्मपुराण *
आदन्तात् सोदरे सद्य आचौलादेकरात्रकम्।<br>आप्रदानात् त्रिरात्रं स्याद् दशरात्रमतः परम्॥ ३०॥दाँत निकलनेसे पूर्व कन्याकी मृत्यु होनेपर सहोदर भाईको सद्यः शौच होता है और चूड़ाकरणके कालतक मृत्यु होनेपर एक रात्रिका अशौच होता है। कन्यादानके पूर्व (कन्याका मरण होनेपर) तीन रातका और विवाहके बाद मरण होनेपर दस रातका (पतिकुलमें) अशौच होता है॥ ३०॥
मातामहानां मरणे त्रिरात्रं स्यादशौचकम्।<br>एकोदकानां मरणे सूतके चैतदेव हि॥ ३१॥मातामहकी मृत्यु होनेपर (दौहित्रको) तीन रातका अशौच होता है। समानोदकोंके^१ मरण या जन्ममें भी तीन रातका ही अशौच होता है। योनि-सम्बन्धवालों (भांजा, मामा, मौसी, बूआ-कुलके लोग आदि) तथा बान्धवोंकी मृत्यु होनेपर पक्षिणी (आगामी तथा वर्तमान दिनसे युक्त रात्रि)-तक अशौच होता है^२। गुरु एवं सहपाठी (-के मरणमें) एक रात्रिका अशौच बतलाया गया है। जिस देशमें निवास करता हो, उस देशके राजाकी मृत्यु होनेपर सज्ज्योतिकालतकका^३ अशौच होता है और पिताके घरमें विवाहित कन्याकी मृत्यु होनेपर पिताको तीन रातका अशौच होता है। पूर्वमें अन्यकी भार्या रहनेवाली स्त्री, उसके पुत्र तथा कृत्रिम पुत्रके मरणमें तीन रातका आशौच होता है। इसी प्रकार आचार्यके मरणमें भी तीन रातका आशौच होता है। गुरुपुत्र तथा गुरुपत्नीका एक अहोरात्रका और उपाध्याय तथा अपने ग्राममें श्रोत्रियकी मृत्यु होनेपर भी एक दिनका आशौच होता है॥ ३१—३५॥
पक्षिणी योनिसम्बन्धे बान्धवेषु तथैव च।<br>एकरात्रं समुद्दिष्टं गुरौ सब्रह्मचारिणि॥ ३२॥
प्रेते राजनि सञ्ज्योतिर्यस्य स्याद् विषये स्थितिः।<br>गृहे मृतासु दत्तासु कन्यकासु त्र्यहं पितुः॥ ३३॥
परपूर्वासु भार्यासु पुत्रेषु कृतकेषु च।<br>त्रिरात्रं स्यात् तथाचार्ये स्वभार्यास्वन्यगासु च॥ ३४॥
आचार्यपुत्रे पत्न्यां च अहोरात्रमुदाहृतम्।<br>एकाहं स्यादुपाध्याये स्वग्रामे श्रोत्रियेऽपि च॥ ३५॥
त्रिरात्रमसपिण्डेषु स्वगृहे संस्थितेषु च।<br>एकाहं चास्ववर्ये स्यादेकरात्रं तदिष्यते॥ ३६॥अपने घरमें रहनेवाले असपिण्डकी मृत्यु होनेपर तीन रातका अशौच होता है और अपने घरमें (स्वेच्छासे रहनेवाले) अन्य किसी व्यक्तिकी मृत्यु होनेपर एक दिनका अशौच होता है। सास एवं ससुरके मरनेपर तीन रातका और अपने घरमें स्थित रहनेवाले सगोत्रके मरणमें सद्यः शौच कहा गया है। ब्राह्मणकी शुद्धि दस दिनमें, क्षत्रियकी बारह दिनमें, वैश्यकी पंद्रह दिनमें और शूद्रकी एक माहमें शुद्धि होती है। ब्राह्मणद्वारा क्षत्राणी, वैश्या और शूद्रासे उत्पन्न बान्धवोंकी मृत्यु होनेपर ब्राह्मणकी शुद्धि दस दिनोंमें होती है॥ ३६—३९॥
त्रिरात्रं श्वश्रमरणे श्वशुरे वै तदेव हि।<br>सद्यः शौचं समुद्दिष्टं सगोत्रे संस्थिते सति॥ ३७॥
शुध्येद् विप्रो दशाहेन द्वादशाहेन भूमिपः।<br>वैश्यः पञ्चदशाहेन शूद्रो मासेन शुध्यति॥ ३८॥
क्षत्रविद्शूद्रदायादा ये स्युर्विप्रस्य बान्धवाः।<br>तेषामशौचे विप्रस्य दशाहाच्छुद्धिरिष्यते॥ ३९॥

१-सातवीं परम्परासे चौदहवीं परम्परातकके लोग समानोदक होते हैं।
२-इस प्रसंगमें यह विवेक है—दिनमें मरण होनेपर वह दिन उसके बादकी रात्रि, उसके बाद दूसरे दिन नक्षत्रदर्शनतक अशौच होगा। रात्रिमें मरण होनेपर वह रात्रि बादका दिन पुनः उसके बादकी रात्रितक पक्षिणी माना जायगा और तबतक अशौच होगा।
३-दिनमें मरण होनेपर रात्रिमें स्नानसे शुद्धि और रात्रिमें मरण होनेपर दिनमें स्नानसे शुद्धि यही 'सज्ज्योतिकाल' से अशौचमें शुद्धिका अर्थ है।